रविवार, 27 दिसंबर 2009

चौधरी हरमोहन सिंह यादव : ग्राम सभा से राज्य सभा तक


नाम ः चौधरी हरमोहन सिंह यादव/
जन्म ः 18 अक्टूबर, 1921, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर नगर/
पिता ः चौधरी धनीराम सिंह यादव/
वैवाहिक स्थति ः विवाह, श्रीमती गयाकुमारी जी के साथ। आपके पाँच पुत्र एवं एक पुत्री है/
शिक्षा ः हायर सेकेण्डरी/
राष्ट्रीय अध्यक्षः
अखिल भारतीय यादव महासभा, सन् 1980 (मथुरा)/
अखिल भारतीय यादव महासभा, सन् 1993 (हैदराबाद)/
अखिल भारतीय यादव सभा, सन् 1994 /
अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा के का0 अध्यक्ष 2007 तक/
संस्थापकः
श्रीकृष्ण भवन, वैशाली, गाजियाबाद/
कैलाश विद्यालोक इण्टर काॅलेज/
चौधरी रामगोपाल सिंह विधि महाविद्यालय, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर/
मनोरंजन एकता पार्क, कानपुर/
गयाकुमार इण्टर काॅलेज एवं छात्रावास, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर/
मोहन मंदिर, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर/
राजनैतिक :
प्रधान (निर्विरोध), लगातार दो बार, ग्रामसभा गुजैनी, सन् 1952/
सदस्य, (निर्विरोध), अंतरिम जिलापरिषद/
सभासद, कानपुर महापालिका सन् 1959, दूसरी बार, 1967/
पदेन सदस्य, कानपुर नगर निगम, लगभग 42 वर्ष/
जिला सहकारी बैंक के प्रथम अध्यक्ष/
उत्तर प्रदेश भूमि विकास बैंक के उपाध्यक्ष (निर्विरोध)/
दिनांक 06 मई, 1970 को प्रथम बार कानपुर-फर्रूखाबाद स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित। आपका कार्यकाल 05 मई, 1976 तक रहा।/
द्वितीय बार दिनांक 06 मई, 1976 को कानपुर-फर्रूखाबाद स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित। आपका कार्यकाल 05 मई, 1982 तक रहा। /
तृतीय बार दिनांक 06 मई, 1984 से जनता दल समाजवादी के टिकट पर विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित। आपका कार्यकाल 05 मई, 1990 तक रहा।/
सभापति (दो बार) उत्तर प्रदेश विधान परिषद की आश्वासन समिति के। /
संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य रहे।/
पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, लोकदल।/
पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय कार्यकारिणी, लोकदल एवं जनता दल।/
सदस्य, राज्य सभा सन् 1990 से 1996 तक।/
सदस्य राज्यसभा सन् 1997 से 2003/
महामहिम राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत।/
रुचिः समाजसेवा, ग्रामीण विकास एवं किसानों के हितों की रक्षा में। /
अन्यः सन् 1984 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद रतन लाल नगर, कानपुर के सिख भाइयों की लगभग 4-5 घण्टे अपने सुपुत्र चौधरी सुखराम सिंह यादव (सभापति, विधान परिषद उत्तर प्रदेश) के साथ हवाई फायरिंग करके दंगाइयों से रक्षा करने के कारण सन् 1991 में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।/
स्थायी पताः ग्राम मेहरबान सिंह का पुरवा, तहसील व जिला-कानपुर, उ0प्र0।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

'बाल साहित्य समीक्षा' का आकांक्षा यादव विशेषांक

बच्चों के समग्र विकास में बाल साहित्य की सदैव से प्रमुख भूमिका रही है। बाल साहित्य बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। बाल साहित्य बच्चों की एक भरी-पूरी, जीती-जागती दुनिया की समर्थ प्रस्तुति और बालमन की सूक्ष्म संवेदना की अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि बाल साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण व विषय की गम्भीरता के साथ-साथ रोचकता व मनोरंजकता का भी ध्यान रखना होता है। समकालीन बाल साहित्य केवल बच्चों पर ही केन्द्रित नहीं है अपितु उनकी सोच में आये परिवर्तन को भी बखूबी रेखाकित करता है। सोहन लाल द्विवेदी जी ने अपनी कविता ‘बड़ों का संग’ में बाल प्रवृत्ति पर लिखा है कि-''खेलोगे तुम अगर फूल से तो सुगंध फैलाओगे।/खेलोगे तुम अगर धूल से तो गन्दे हो जाओगे/कौवे से यदि साथ करोगे, तो बोलोगे कडुए बोल/कोयल से यदि साथ करोगे, तो दोगे तुम मिश्री घोल/जैसा भी रंग रंगना चाहो, घोलो वैसा ही ले रंग/अगर बडे़ तुम बनना चाहो, तो फिर रहो बड़ों के संग।''
आकांक्षा जी बाल साहित्य में भी उतनी ही सक्रिय हैं, जितनी अन्य विधाओं में। बाल साहित्य बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्य, आचार-विचार और व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने में अपनी भूमिका निभाता आया है। बाल साहित्यकार के रूप में आकांक्षा जी की दृष्टि कितनी व्यापक है, इसका अंदाजा उनकी कविताओं में देखने को मिलता है। इसी के मद्देनजर कानपुर से डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित-प्रकाशित ’बाल साहित्य समीक्षा’ ने नवम्बर 2009 अंक आकांक्षा यादव जी पर विशेषांक रूप में केन्द्रित किया है। 30 पृष्ठों की बाल साहित्य को समर्पित इस मासिक पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर बाल साहित्य की आशा को दृष्टांकित करता आकांक्षा यादव जी का सुन्दर चित्र सुशोभित है। इस विशेषांक में आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर कुल 9 रचनाएं संकलित हैं।
’’सांस्कृतिक टाइम्स’’ की विद्वान सम्पादिका निशा वर्मा ने ’’संवेदना के धरातल पर विस्तृत होती रचनाधर्मिता’’ के तहत आकांक्षा जी के जीवन और उनकी रचनाधर्मिता पर विस्तृत प्रकाश डाला है तो उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुडे दुर्गाचरण मिश्र ने आकांक्षा जी के जीवन को काव्य पंक्तियों में बखूबी गूंथा है। प्रसि़द्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु जी ने आकांक्षा जी के बाल रचना संसार को शब्दों में भरा है तो बाल-मन को विस्तार देती आकांक्षा यादव की कविताओं पर चर्चित समालोचक गोवर्धन यादव जी ने भी कलम चलाई है। डा0 कामना सिंह, आकांक्षा यादव की बाल कविताओं में जीवन-निर्माण का संदेश देखती हैं तो कविवर जवाहर लाल ’जलज’ उनकी कविताओं में प्रेरक तत्वों को परिलक्षित करते हैं।

वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 शकुन्तला कालरा, आकांक्षा जी की रचनाओं में बच्चों और उनके आस-पास की भाव सम्पदा को चित्रित करती हैं, वहीं चर्चित साहित्यकार प्रो0 उषा यादव भी आकांक्षा यादव के उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य के लिए अशेष शुभकामनाएं देती हैं। राष्ट्भाषा प्रचार समिति-उ0प्र0 के संयोजक डा0 बद्री नारायण तिवारी, आकांक्षा यादव के बाल साहित्य पर चर्चा के साथ दूर-दर्शनी संस्कृति से परे बाल साहित्य को समृद्ध करने पर जोर देते हैं, जो कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बेहद प्रासंगिक भी है। साहित्य साधना में सक्रिय सर्जिका आकांक्षा यादव के बहुआयामी व्यक्तित्व को युवा लेखिका डा0 सुनीता यदुवंशी बखूबी रेखांकित करती हैं। बचपन और बचपन की मनोदशा पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत आकांक्षा जी का आलेख ’’खो रहा है बचपन’’ बेहद प्रभावी व समयानुकूल है।

आकांक्षा जी बाल साहित्य में नवोदित रचनाकार हैं, पर उनका सशक्त लेखन भविष्य के प्रति आश्वस्त करता हैं। तभी तो अपने संपादकीय में डा0 राष्ट्रबन्धु लिखते हैं-’’बाल साहित्य की आशा के रूप में आकांक्षा यादव का स्वागत कीजिए, उन जैसी प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का रास्ता दीजिए। फूलों की यही नियति है।’’ निश्चिततः ’बाल साहित्य समीक्षा’ द्वारा आकांक्षा यादव पर जारी यह विशेषांक बेहतरीन रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक साथ स्थापित व नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन देना डाॅ0 राष्ट्रबन्धु जी का विलक्षण गुण हैं और इसके लिए डा0 राष्ट्रबन्धु जी साधुवाद के पात्र हैं।
समीक्ष्य पत्रिका-बाल साहित्य समीक्षा (मा0) सम्पादक-डा0 राष्ट्रबन्धु,, मूल्य 15 रू0, पता-109/309, रामकृष्ण नगर, कानपुर-208012समीक्षक- जवाहर लाल ‘जलज‘, ‘जलज निकुंज‘ शंकर नगर, बांदा (उ0प्र0)

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

1857 की झूठी वीरांगना : रानी लक्ष्मीबाई

"आल्हा-ऊदल और बुन्देलखण्ड" (लेखक-कौशलेन्द्र यादव, ARTO-बिजनौर) पुस्तक को लेकर एक विवाद खड़ा हो गया है. प्रथम खंड में सम्मलित अंतिम चैप्टर "1857 की झूठी वीरांगना-रानी लक्ष्मीबाई" को लेकर ही इस पुस्तक का तमाम लोगों द्वारा विरोध किया जा रहा है, यहाँ तक कि लेखक के सर की कीमत भी 30,000 रूपये मुक़र्रर कर दी गई है. अब लेखक के पक्ष में भी तमाम संगठन आगे आने लगे हैं. सारी लड़ाई इस बात को लेकर है कि क्या इतिहास कुछ छिपा रहा है ? क्या इतिहासकारों ने दलितों-पिछड़ों के योगदान को विस्मृत किया है ? आप भी इस चैप्टर को यहाँ पढ़ें और अपनी राय दें-










विवादों के घेरे में एक सार्थक पुस्तक : आल्हा-उदल और बुंदेलखंड

आजकल किताबें बाजार में बाद में आती हैं, उनकी चर्चा पहले आरंभ हो जाती है. किताब में कितने भी चैप्टर हों, पर यदि एक चैप्टर विवादित हो गया तो पूरी किताब को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. ऐसा ही हुआ है कौशलेन्द्र प्रताप यादव की पुस्तक "आल्हा-उदल और बुंदेलखंड" के साथ. कौशलेन्द्र उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद में ARTO के पद पर तैनात हैं. 198 पृष्ठों की यह पुस्तक तीन में खण्डों विभाजित हैं- बुंदेलखंड, आल्ह खण्ड, महोबा खण्ड. प्रथम खंड में बुंदेलखंड की पूरी संस्कृति खूबसूरत चित्रों के साथ समाहित है. पुस्तक का पहला चैप्टर ही खजुराहो की मूर्तियों के बारे में है कि ये अश्लील नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे तमाम रहस्य छुपे हुए हैं. बुंदेलखंड के तमाम अमर चरित्र और चर्चित स्थानों के बारे में पुस्तक में शोधपरक जानकारियां दी गई हैं. प्रथम खंड में सम्मलित अंतिम चैप्टर "1857 की झूठी वीरांगना-रानी लक्ष्मीबाई" को लेकर ही इस पुस्तक का तमाम लोगों द्वारा विरोध किया जा रहा है, यहाँ तक की लेखक के सर की कीमत भी 30,000 रूपये मुक़र्रर कर दी गई है. ऐसी घटनाओं को देखकर कई बार शक भी होता है कि हम एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र हैं या नहीं. आल्हा-उदल-मलखान के किस्से हमने बहुत सुने हैं, पर यह पुस्तक उनके सम्बन्ध में तमाम जानकारी उपलब्ध कराती है. महोबा के तालाब-बावड़ियों कि कहानी यहाँ दर्ज है, तो लखनऊ में भी महोबा कि बात यहाँ दर्ज की गई है। लोक-भाषा में दिए गए तमाम उद्धरण पुस्तक को रोचक बनाते हैं. कुल मिलाकर पुस्तक काफी रोचक और शोधपूर्ण है. लेखक ने महोबा में अपनी पोस्टिंग के दौरान जो अनुभव बटोरे, उन्हें शब्दों की धार दी, जिसके चलते पुस्तक और भी महत्वपूर्ण हो गई है. ग्लेज़्ड पृष्ठों पर उकेरी गई इस पुस्तक को लेकर एक शिकायत हो सकती है कि इसका मूल्य हर किसी के वश में नहीं है, पर इस पुस्तक को पढ़ना एक सुखद अनुभव हो सकता है. लेखक कौशलेन्द्र प्रताप यादव इस पुस्तक के लिए साधुवाद के पात्र हैं !!

पुस्तक : आल्हा-उदल और बुन्देलखण्ड/ लेखक : कौशलेन्द्र प्रताप यादव /मूल्य : 650/- / पृष्ठ : 198/प्रकाशक : प्रगति प्रकाशन-240, वैस्टर्न कचहरी रोड, मेरठ

रविवार, 13 दिसंबर 2009

भोजपुरी के जुबली स्टार : दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ

(इण्डिया टुडे के 11 नबम्बर 2009 अंक में यू0पी0- उत्तराखण्ड के कुछ ऐसे विलक्षण परन्तु अनचीन्ही शख्सियतों के बारे में चर्चा है जिन्होने जीवन के विविध क्षेत्रों में परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बूते कुछ अलग कार्य किया है। इनमें से कुछ एक नाम यदुवंश से हैं, इन सभी को यदुकुल की तरफ से बधाई)--
चार साल में वे 50 लाख रू. की प्राइज वाले जुबली स्टार हैं. उनकी अब तक रिलीज 22 फिल्मों में से 2 गोल्डन जुबली, 4 सिल्वर जुबली, 13 सुपर हिट, 2 औसत और मात्र एक फ्लॉप रहीं. बचपन से फिल्मों के दीवानें दिनेश लाल यादव रात को तीन किमी दूर बीडियो पर फिल्म देखने जाते थे, कुछ साल गायकी में संघर्ष करने के बाद 2003 में टी सीरीज के 'निरहुआ सटल रहे' ने उन्हें लोकप्रियता की बुलदिंयों पर पहुंचा दिया और ’निरहुआ’ उनके नाम के साथ चिपक गया. 2005 में फिल्म 'हमका अहइसा वइसा न समझा' में उन्हें बतौर हीरो मौका मिला और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सफलता का गुरः ईमानदारी और कड़ी मेहनत.
सबसे बड़ी बाधाः बेईमानी और धोखाधड़ी करने वालो पर गुस्सा फूट पड़ता है.
सबसे बड़ी ताकतः परिवार और प्रशंसकों का उनमें भरोसा, जिसने हमेशा हौसला बनाए रखा.
जिंदगी का सबसे अहम क्षणः 2007 में जब उन्होने माँ के लिए गाँव के पुराने मकान को महल-सा बनवाया तो उनकी ऑंखें छलक आई.

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

बिरहा से मोह रहे मन : डाॅ0 मन्नू यादव

(इण्डिया टुडे के 11 नबम्बर 2009 अंक में यू0पी0- उत्तराखण्ड के कुछ ऐसे विलक्षण परन्तु अनचीन्ही शख्सियतों के बारे में चर्चा है जिन्होने जीवन के विविध क्षेत्रों में परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बूते कुछ अलग कार्य किया है। इनमें से कुछ एक नाम यदुवंश से हैं, इन सभी को यदुकुल की तरफ से बधाई)-
आज संगीत की एक विधा बिरहा को बचाने में लगे हैं 37 वर्षीय डाॅ0 मन्नू यादव। चौथी कक्षा से बिरहा सीखने लग गए मन्नू यादव ने इस विधा की मौलिकता बनाकर रखी और उसे विश्व पटल पर ले जाने के लिए प्रयासरत हैं. नौंवी कक्षा तक जाते-जाते वे बाल कलाकार के रूप में विख्यात हो चुके थे और रामदेव, परशूराम तथा बुल्लू जैसे कलाकारों से उनका मुकाबला होने लगा था. मूलरूप से मिर्जापुर जिले के निवासी मन्नू यादव की गायकी में अश्लीलता और फूहड़ता की बजाए छंद, मात्रा, पिंगल, अलंकार, बंदिश, कलाघर छंद, माधवी छंद, जवाब बंद और अक्षर छंदों की सुन्दर मंचीय प्रस्तुती को लोगों ने खूब सराहा. नतीजतन उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी और उन्हें बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा. वे विभिन्न राज्यों में बिरहा गायन शैली प्रस्तुत कर चुके हैं. 2007 मे सार्क देशों के फोर फेस्टिवल में भी वे बिरहा प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किए गए, जहाँ उन्होंने अपने गायन से लोगों का मन मोह लिया।
सफलता का गुरः ईमानदारी और सच्चाई का पालन करना
सबसे बड़ी बाधा : ईर्ष्या करने वाले लोग हैं जो दूसरों को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते।
सबसे बड़ी ताकतः खुद पर भरोसा रखना, जिससे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है.
जिंदगी का सबसे अहम क्षणः सन् 1857 की क्रांति के 150 वर्ष पूरे होने पर लालकिले से जब राष्ट्रपति की उपस्थिति में उन्होने बिरहा गायन किया.

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

युद्धबंदियों और शहीदों के परिजनों को उम्मीदें बाँट रहा साइकिल यात्री : हीरालाल यादव

(इण्डिया टुडे के 11 नबम्बर 2009 अंक में यू0पी0- उत्तराखण्ड के कुछ ऐसे विलक्षण परन्तु अनचीन्ही शख्सियतों के बारे में चर्चा है जिन्होने जीवन के विविध क्षेत्रों में परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बूते कुछ अलग कार्य किया है। इनमें से कुछ एक नाम यदुवंश से हैं, इन सभी को यदुकुल की तरफ से बधाई)--


बगैर सीट वाली साइकिल से 52 वर्षीय हीरालाल यादव पिछले एक दशक में देश और दुनिया में 65,000 किमी की दूरी नाम चुके हैं, कभी वे किसी युद्धबंदी के परिजनों के पास बैठकर खत लिख रहे होते हैं तो कभी शहीद के परिजन से दुःख बांटते हैं, अन्य दिनों में वे युद्धबंदियों की रिहाई पर केंद्रित अपनी प्रदर्शनी में व्यस्त होते हैं या फिर सभागार में अभागे फौजियों और उनके परिजनों पर लिखी कविताएं सुना रहे होते हैं। गोरखपुर जिले के, पेशे से बीमा एजेण्ट हीरालाल यादव का यह जुनून 1997 में आजादी की स्वर्ण जयंती से शुरू हुआ. वे साइकिल से सद्भावना यात्रा पर निकल पड़े. 1999 में उन्होने कारगिल सलाम सैनिक यात्रा की. इसके बाद तो यह सिलसिला उनके जीवन का हिस्सा ही बन गया।
सफलता का गुरः कोई काम नामुमकिन नही है.
सबसे बड़ी बाधाः जब लोग इस अभियान के ’फायदे’ पर बहस करते हैं.
सबसे बड़ी ताकतः फल की दुकान चलाने वाली उनकी पत्नी शकुन्तला, जो अक्सर दौरे पर रहती है.
जिंदगी का सबसे अहम क्षणः 30 जुलाई 99 का दिन जब कारगिल में सैनिकों ने उनकी अगवानी की और उन्हें सगे भाई से ज्यादा सगा कहा.

रविवार, 6 दिसंबर 2009

कम उम्र में बड़ा सम्मान पाने वाला उदीयमान वैज्ञानिक-शिक्षक : डा0 अनिल कुमार यादव

(इण्डिया टुडे के 11 नबम्बर 2009 अंक में यू0पी0- उत्तराखण्ड के कुछ ऐसे विलक्षण परन्तु अनचीन्ही शख्सियतों के बारे में चर्चा है जिन्होने जीवन के विविध क्षेत्रों में परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बूते कुछ अलग कार्य किया है। इनमें से कुछ एक नाम यदुवंश से हैं, इन सभी को यदुकुल की तरफ से बधाई)--

वर्तमान में सुखद भविष्य के अंकुर दिखते हैं, आजमगढ़ के एक प्राइमरी अध्यापक के बेटे 26 वर्षीय डाॅ0 अनिल कुमार यादव को भारतीय अल्ट्रासोनिक सोसाइटी ने पिछले साल डाॅ0 एम।पांचोली सम्मान के लिए चुना, यह उनके उस निष्कर्ष का सम्मान था जिसमें उन्होने पता लगाया कि गैलियम नाइट्राइड नैनोट्यूब की मोटाई बदलने से उसकी ऊष्मा चालकता कितनी बदलती है, इसका उपयोग ऊर्जा संरक्षण, हाइपावर-हाइफ्रेक्वेंसी इलेक्ट्रानिक उपकरण, ब्लू लाइट एमिटिंग उपकरण, चिकित्सकीय परीक्षणों और बायोकेमिकल सेंसिंग उपकरणों को किफायती बना सकता है। सम्मान के निर्णायकों में देश और विदेश के नामी वैज्ञानिक थे. अनिल कुमार यादव कहते हैं, ’’अच्छा शिक्षक और वैज्ञानिक बनना मेरी तमन्ना है.’’ बतौर डा0 राजाराम यादव, रीडर, इलाहबाद विश्वविद्यालय-"अन्वेषी मष्तिक, टीम भावना, अहंकार शून्यता, जल्दी समझने की शक्ति अनिल कुमार यादव के गुण हैं।"

सफलता का गुरः हर काम को नये ढंग से और समर्पित भाव से करना.
सबसे बड़ी बाधाः इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अनुसंधान के लिए संसाधनों की कमी.
सबसे बड़ी ताकतः पढ़ाई, अध्यापन और अनुसंधान में दिलचस्पी,
जिंदगी का सबसे अहम क्षणः जब प्रथम डाॅ0 एम पंचोली अवार्ड के लिए चुना गया.

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

श्यामलाल यादव को पहला आरटीआई पुरस्कार

इंडिया टुडे के पत्रकार श्यामलाल यादव को देश के पहले पीसीआरएफ-एनडीटीवी राष्ट्रीय सूचना का अधिकार पुरस्कार के लिए चयन हुआ है. श्‍यामलाल यादव , इंडिया टुडे के स्‍पेशल कॉरेस्‍पॉडेंट है. श्‍यामलाल यादव को यह अवार्ड उन 1130 लोगों के बीच मिला है जो इस अवार्ड के लिए नामांकित किए गए थें. उन्हें यह पुरस्कार हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत किए गए उनके काम के लिए दिया गया है. यादव ने अब तक विभिन्न मंत्रालयों में सूचना के अधिकार के तहत 1,700 से ज्यादा आवेदन दायर किए हैं. इस अवार्ड के तहत श्‍यामलाल यादव को 1 दिसंबर को भारत के उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा एक लाख रुपये और एक प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस अवार्ड के लिए एक ज्‍यूरी बनाई गई थी जिसमें अभिनेता आमिर खान, इन्‍फोसिस के संस्‍थापक एन। आर. नारायण मूर्ति, एनडीटीवी के सीएमडी प्रणव रॉय, प्रसिद्ध नृत्‍यांगना मल्लिका साराभाई, मधु त्रेहन, जस्टिस (सेवानिवृत) जे. एस. वर्मा, पूर्व मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त जे. एम. लिंगदोह, पुलेला गोपीचंद और संजय गुप्‍ता शामिल थे. यह अवार्ड का पहला साल है और इसके पहले विजेता श्‍यामलाल यादव बने हैं.

श्यामलाल यादव पिछले पांच साल से इंडिया टुडे में हैं।श्यामलाल यादव इंडिया टुडे से पहले कुछ दिन अमर उजाला के दिल्ली ब्यूरो में रह चुके हैं। इससे पहले वो जनसत्ता में रहे। आजकल सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके वो सरकार से ऐसी ऐसी जानकारी निकलवा ले रहे हैं जिनके बारे में सुनकर आम पाठक भौंचक रह जाता है। मंत्रियों और अफसरों की विदेश यात्राओं पर आरटीआई के ज़रिये उन्होने ही जानकारी निकलवाई और लोगों को बताया कि उनके टैक्स का कितना पैसा ये लोग बेदर्दी से उड़ा रहे हैं।
श्यामलाल यादव को मंगलमय और उज्ज्‍वल भविष्य की कामना सहित यदुकुल-परिवार की ओर से ढेरों बधाई !!!!

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

एवरेस्ट की चढ़ाई ने जीने का सलीका सिखाया : संतोष यादव

संतोष यादव भारत की जानी-मानी पर्वतारोही हैं। वह माउन्ट एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली विश्व की प्रथम महिला हैं। इसके अलावा वे कांगसुंग (Kangshung) की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला भी हैं।उन्होने पहले मई 1992 में और तत्पश्चात मई सन् 1993 में एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में सफलता प्राप्त की। संतोष यादव का जन्म सन 1969 में हरियाणा के रेवाड़ी जनपद के में हुआ था। उन्होने महारानी कालेज, जयपुर से शिक्षा प्राप्त की है। सम्प्रति वह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस में एक पुलिस अधिकारी हैं। उन्हें सन 2000 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है।

संतोष यादव ने दो बार माउंट एवेरस्ट की दुर्गम चढ़ाई पर अपनी जीत दर्ज करते हुए तिरंगे का परचम लहराया है. ज़िन्दगी में मुश्किलों के अनगिनत थपेड़ों की मार से भी वह विचलित नहीं हुईं और अपनी इस हिम्मत की बदौलत माउंट एवरेस्ट की दो बार चढाई करने वाली विश्व की पहली महिला बनीं. उनके इस अदम्य साहस के लिए उन्हें साल २००० में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. हिमालय की चोटी पर पहुँचने का एहसास क्या होता है, इसे संतोष यादव ने दो बार जिया है. 'ऑन द टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड' जुमले का प्रयोग हम अक्सर करते हैं पर इसके सार को असल मायनो में संतोष ने समझा. वह भी आज से डेढ़ दशक पहले. अरावली की पहाड़ियों पर चढ़ते हुए कामगारों से प्रेरणा लेकर उन्होंने ऐसा करिश्मा कर दिखाया, जिसकी कल्पना खुद उन्होंने कभी नहीं की थी. हरियाणा के रेवाड़ी जिले के एक छोटे से गाँव से निकल कर, बर्फ से ढके हुए हिमालय के शिखर का आलिंगन करने के यादगार लम्हे तक का सफ़र संतोष यादव के लिए कितने उतार चढ़ाव भरा रहा, यह जानने की एक कोशिश (साभार-हिन्दीलोक) --

-जीवन के किस मोड़ पर आपने यह महसूस किया कि मैं माउंट एवरेस्ट जैसी दुर्गम चढ़ाई कर सकती हूँ?

यह बात साल १९९२ की है, जब हिमालय की चढ़ाई के लिए मेरा चयन हुआ। यह सोच कर अब भी मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. मेरा चयन होने मात्र से मेरे मन में ख्याल आया कि मैं भी एवरेस्ट की चढ़ाई कर सकती हूँ... मैं एक बहुत साधारण परिवार से हूँ. कभी ऐसा सोचा नहीं था कि इतना मुश्किल काम मैं कर पाऊँगी. खासकर माउंट एवरेस्ट की चढाई जैसा कठिन अभियान मेरे लिए सोच पाना भी उस वक़्त मुश्किल था. हालाँकि मेरे अन्दर बहुत आत्मविश्वास रहता है लेकिन मैं अति आत्मविश्वास खुद में कभी नहीं आने देती. चयन हुआ क्यूंकि उसके बारे में मैंने बहुत पढ़ा था और ट्रेनिंग भी ली थी उत्तरकाशी नेहरु माउंटइनीयारिंग महाविद्यालय से, जिसका निश्चित रूप से मुझे फायदा मिला. मुझे लोगों ने तब बहुत हतोत्साहित किया था. शुरुआत के कुछ दिनों में लोगों का नजरिया मुझे लेकर यह रहा कि 'ये भी ट्रेनिंग करेगी?' लेकिन मुझमे बहुत हिम्मत थी, मैं मानती हूँ. क्यूंकि चढ़ाई करने से पहले मुझे परिवार की ओर से भी खासी मुश्किलात थीं.

-आपके परिवार से विरोध के बावजूद जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा क्या रही?

परिवार से विरोध था इसलिए मैं अन्दर से बहुत टूटा हुआ महसूस करती थी। उस वक़्त सिर्फ मेरी हिम्मत मेरे साथ थी. खासकर माँ बाप जो आपको इतना प्यार करते हैं, उनका दिल भी नहीं दुखाना चाहती थी. मेरे माँ बाप भी मजबूर थे. जिस तरह से मेरे सामने एवरेस्ट का पहाड़ था, उनके सामने भी समाज का इतना बड़ा पहाड़ था. वह भी हरियाणा जैसे राज्य में मैं पली बढ़ी जहाँ लड़कियों को बंदिशों में रखा जाता है. आज की स्थिति थोड़ी अलग है. लेकिन जब मैं पढ़ रही थी, तब मेरे पिताजी को कहा जाता था 'राम सिंह तू बावडा हो गया है के... छोरी को इतना पढ़ा के, के करेगा.' मैं उन दिनों आईएएस की तैयारी कर रही थी. पिताजी को लोग बोलते थे "इतना पढ़ रही है छोरी, छोरा भी न मिलेगा पढ़ा लिखा." लाडली मैं बहुत थी घरवालों की. इसलिए मेरे अन्दर बहुत हिम्मत थी. और यह बात हर माँ-बाप से मैं कहूँगी कि जितना आप अपने बच्चों को प्यार करेंगे उतना उनके अन्दर हिम्मत और आत्मविश्वास बढ़ेगा.

-तकनीक और कौशल ही इंसान को ऊंचाई तक नहीं ले जा सकती। इसके लिए शिक्षा भी ज़रूरी है. इस बात से आप कितनी सहमत हैं ?
पढ़ाई और खेल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यदि आपकी शिक्षा अच्छी नहीं है तो आप किसी भी क्षेत्र में बेहतर नहीं कर पाएँगे. खेल को मैंने बहुत ही शिक्षात्मक ढ़ंग से लिया है. इसमें बहुत समय प्रबंधन की ज़रूरत है. मैं यह नहीं कहूँगी कि माउंटइनीयारिंग के कारण मैं पूरी तरह से आईएएस में चयनित नहीं हो पाई. बल्कि मुझे लगता है कि मेरी पढ़ाई ने मुझे बहुत फायदा पहुँचाया है. मैं बहुत ही लाड़ प्यार और नाजुकता से पली बढ़ी और स्पोर्ट्स पर्सन मैं शुरुआत से नहीं थी. मेरे अन्दर एक जिज्ञासा थी कि बर्फ से ढके पहाड़ और हिमालय कैसे लगते होंगे! इस सोच से मैं रोमांचित हो जाती थी. अपने इस सपने को साकार करने की चाह से मैंने एवरेस्ट की चढाई की. जब मैं वहां गई तो ऋषिकेश में हम सभी प्रशिक्षुओं का हमारे इंस्टिट्यूट वालों ने स्वागत किया. ट्रेनिंग के दौरान मेरा नंबर धूप में पड़ गया और मैं धूप में लाल हो गयी थी. मेरी पतली काया को देखकर प्रशिक्षकों ने मेरी ट्रेनिंग को लेकर शंका जताई. धीरे धीरे मैंने अपना प्रशिक्षण पूरा किया और समापन के समय मुझे भी यह देखकर आर्श्चय हुआ कि मेरा प्रदर्शन सबसे अच्छा आँका गया. मैं क्लिप ऑन क्लाइम्बिंग बड़ी ही फुर्ती से कर लेती थी और सब देखते थे कि आखिर ये इतनी जल्दी करती कैसे है. असल में मैं तकनीक को कार्य करने के साथ साथ बहुत अच्छे से समझती भी रहती थी. जल्दबाजी कभी नहीं करती थी. देखती थी, रास्ते को याद करती थी उसके बाद कोशिश करती थी. मैं खुद से यह सवाल भी करती रहती थी 'मैंने ये कर लिया, मैं यह कर गई?' फिर मुझे उसका जवाब मिलता था क्यूंकि मैंने इस तकनीक का इस्तेमाल इसमें किया.

-जिस ट्रेनिंग का आप हिस्सा रहीं, उसमे किन बातों पर ख़ास ध्यान रखना पड़ता था?

मानसिक और शारीरिक तौर पर सतर्क रहना पड़ता था। भोर सुबह उठना भी मेरे लिए फायदेमंद रहा. तीन बजे सवेरे हम उठ जाते थे और तैयार हो के साढ़े तीन बजे तक कैंप से निकल जाना होता था. क्यूंकि जितनी जल्दी हम चढ़ाई शुरू करेंगे उतना जीवन का खतरा कम है. माउंटइनीयारिंग में देरी जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है. ग्लेशिअर्स और बर्फ की दरारें इतनी चौड़ी होती हैं कि कभी कभी समझ में नहीं आता कि किस तरह से उसे पार किया जाए. कभी कभी नज़रंदाज़ भी करना होता है बर्फानी तूफानों को. हमे हर पल को बड़ी नाजुकता और संतुलित ढ़ंग से बिना आवाज़ किये आगे बढ़ना पड़ता था.

-उन्तीस हज़ार फीट की ऊंचाई पर अनेक बाधाएं आपके रास्ते में आई होंगी। कोई ऐसा वाक्या आपको याद है जिसने आपको अन्दर तक हिला दिया हो?

कई बार तो ऐसा हुआ कि मुझे उठा के बर्फानी तूफानों ने दूर तक फेंका है। कंचनजंघा की चढाई के वक़्त मुझे याद है कि बात लगभग तय हो चली थी कि मैं जिंदा नहीं बचूंगी. मैं नेपाल की तरफ लटक गयी थी क्यूंकि तूफ़ान ने मुझे पूरे वेग से उड़ा लिया था. मैं पेंडुलम की तरह लटकी हुई थी और उस समय मैंने अपने आप को मजबूती से रस्सी में बांधे रखा. साथ ही मेरे दो साथी जिसमे में एक फुदोर्जे थे, उन्हें भी तूफ़ान उड़ा ले गया था. यह देखकर मुझे थोड़ी घबराहट ज़रूर हुई लेकिन उस वक़्त मुझे मेरे मानसिक संतुलन ने बचाया. मैं हमेशा यह कहती हूँ कि जब भी इंसान परेशानी में आता है उसे अपने मानसिक संतुलन को नहीं खोना चाहिए. पहला हिम्मत और दूसरा मानसिक संतुलन ही आपका सबसे बड़ा हथियार है. इससे मुझे यह सीखने को मिला कि मानसिक संतुलन बड़ी ऊंची चीज़ है. अगर वो आप बनाये रखेंगे तो डर भय सब दूर हो जाते हैं और आप अच्छे से सोच के, दिमाग का इस्तेमाल करते हुए सही फैसला ले पाएँगे. मैं ऐसी परिस्थितियों से कई बार गुज़र चुकी हूँ.

-योजनाओं और सिद्धांतों को आप किस हद तक महत्वपूर्ण मानती हैं?

मैंने बचपन से लेकर अपना अभी तक का जीवन काल एक कुशल योजना के तहत बिताया है। यदि मैं ऐसा नहीं करती तो शायद यहाँ तक का सफ़र तय कर पाना मेरे लिए मुश्किल रहता. यह मैंने इसलिए समझ लिया था क्यूंकि मैं बहुत सुरक्षित क्लाइम्बर हूँ. बहुत ज़रूरी भी है क्यूंकि जब भी आप कोई रिस्क लेते हैं तो सुरक्षा का आपको पूरा ध्यान रखना होता है. मैं सिद्धांतों को बहुत मानती हूँ. चाहे वो जीवन के सिद्धांत हों या खेल के. यदि आप उसको सही रूप से निभाएँगे तो मेरे ख्याल से आप कभी मार नहीं खाएँगे. माउंटइनीयारिंग में अधिकतर आपकी सुरक्षा आपके ही हाथों में है. क्यूंकि बाहर मौसम ख़राब है तो आपने क्या फैसला लिया ऐसे में, किस वक़्त कहाँ जाना है, अचानक फंस भी गए तो आपके जो सिखाये हुए सिद्धांत हैं उसका पालन कीजिये. आपके मानसिक संतुलन को न खोएं. दूसरी बात है कि आप पूरी तैयारी से जाएँ. मैंने महसूस किया है कि तैयारी में कोताही जीवन के रिस्क का कारन बन सकती है. क्यूंकि माउंटइनीयारिंग के सिद्धांत के अनुसार आप सुबह में ही चढाई करें. बारह बजे के बाद यह उम्मीद मत कीजिये कि आपको मौसम अच्छा मिलेगा और आप सही सलामत अपने कैंप वापस पहुंचेंगे. बारह बजे के तुंरत बाद वापस आ जाएँ. दो बजे तक तो रिस्क लेने की बात है. अगर मौसम साफ़ रहे तो भी. क्यूंकि किस वक़्त मौसम ख़राब हो जाये ये मालूम नहीं.

-जिस जीवन मरण की स्थिति को आपने चढाई के दौरान जिया, उसे आप असल ज़िन्दगी में कैसे लागू करती हैं?

ये बहुत अच्छी बात आपने पूछी। इससे जीवन को जीने का बहुत अच्छा अनुभव आपको मिलता है. क्यूंकि जब भी आपके जीवन में परेशानी आती है तो उसको किस ढ़ंग से सँभालते हुए आगे बढ़ना है, उस परेशानी को किस तरीके से सुलझाना है, यह भी एक चुनौती है, जिसे सुलझाने की समझ मुझे अपने उन्ही अनुभवों से मिली.

-आपने एवरेस्ट की मुश्किल चढाई के साथ आईएएस की कठिन परीक्षा पर भी विजय पाई। इन दोनों अभियान के इतर घर परिवार की ज़िम्मेदारी को आप किस तरह निभाती हैं?

अपनी ज़िम्मेदारी को हर स्तर पे समझना ज़रूरी है। मुझे याद है कि मेरे स्नातक के समय में मैंने किसी से कहा था कि आपका जो व्यवहार है वही आपकी कसौटी है. हर जगह आपका व्यवहार उसके अनुरूप होना चाहिए. मैं दो बच्चों की माँ हूँ और मैं अपने दोनों बच्चों का पालन पोषण खुद करती हूँ. माँ बनना अपने आप में बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी की बात है. सही पालन पोषण और सही संस्कार देना, गलत चीज़ों से दूर रखना एक अभियान है. अति नहीं करनी चाहिए लेकिन सहज रूप से होना चाहिए ताकि बच्चे को पता भी न चले और उसका ख्याल भी रहे. यह बहुत ज़रूरी है. मेरी कोशिश रहेगी और इसकी मैं सरकार और कारपोरेट सेक्टर से अनुरोध करने वाली हूँ कि महिला कर्मचारियों को ख़ास तवज्जो दी जाये. राष्ट्र को अच्छा नागरिक देने वाली एक गर्भवती स्त्री/माँ को कुछ ज्यादा छुट्टियाँ होनी ही चाहिए. कम से कम तब तक जब तक बच्चा माँ पर आश्रित है. उससे बच्चे को बहुत सहारा मिलता है.

-आप अपनी इस ऊर्जा और अनुभवों की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानती हैं?

मुझे सबसे बड़ी चीज़ इससे 'इंसानियत' सीखने को मिली। इतने बड़े ब्रम्हांड में इतना छोटा है इंसान. यह बात महसूस होती थी कि हमें एक जीवन मिला है इंसान के रूप में. हम नहीं जानते कि अगला जीवन किस रूप में मिलेगा. इसलिए जो जीवन है उसे अच्छे से जीना चाहिए. हर एक के साथ अच्छा व्यवहार करके और मदद करके. व्यवहार सिर्फ इंसान के साथ नहीं होता. जीवन में हर एक के सामने हर तरह की कठिनाइयाँ आती हैं. उस समस्या का डट के और हिम्मत से मुकाबला करते हुए समाधान करना चाहिए. दूसरी बात, हम अक्सर यह कहते हैं कि हमारे किस्मत में यह नहीं. गलत है. बचपन से लेकर मैंने अभी तक के जीवन काल में देखा है कि मैंने शिक्षा हासिल की जिसके लिए मैंने बहुत संघर्ष किया. उसके बाद मेरी शादी दसवीं क्लास में हुई. मैं रोती रही और तब मैंने यह जिद्द की कि मुझे हॉस्टल जाना है क्यूंकि मैं जानती थी कि यहाँ रही तो मैं जीवन में शायद आगे न बढ़ पाऊं. हालाँकि मुझे बहुत तकलीफ हुई और माँ पिताजी की भी बहुत याद आती थी. लेकिन मैंने अपनी किस्मत का खुद निर्माण किया.

-एक महिला होने के नाते क्या इस अभियान में ख़ास परेशानियों से आपको दो चार होना पड़ा?

मुझे याद है साल १९९३ में मुझे चढाई से पहले हुए स्वास्थ जांच में फ़ेल कर दिया गया था। डॉक्टर को पता ही नहीं था कि मैं पहले ही एवरेस्ट की चढाई कर चुकी हूँ. मेरे फेंफडे बहुत छोटे बताये गए थे जांच में, इसलिए उन्होंने सलाह दी कि मेरा कैंप में न जाना ही अच्छा रहेगा. फिर मेरे एक साथी क्लाइम्बर ने डॉक्टर को मेरा परिचय दिया. मुझे टीम में रखने में हमेशा सुरक्षा के नज़रिए से सही माना गया. मैं सिर्फ एक महिला की हैसियत से नहीं बल्कि ज्यादातर महिला अभियान दल की लीडर की भूमिका में रही. मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि मैं ये काम इसलिए नहीं करुँगी क्यूंकि मैं महिला हूँ. दीवार फान्दनी होती थी, रस्सा चढ़ना, ऊपर से आग निकल रही होती थी और मैं नीचे से रेंगती हुई निकल जाती थी. इन सारे कामों को मैंने किया हुआ है. अन्दर से कुछ करने की इच्छा शक्ति मेरे अन्दर बहुत प्रबल थी. मैं मानती हूँ कि इंसान को हमेशा जिज्ञासु रहना चाहिए. यह बहुत ज़रूरी है. जानने की इच्छा से आपको बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

-जीवन की इस चढाई में और किन योजनाओं को अंजाम देने की ख्वाहिश है?

फिलहाल तो माँ का रोल अदा कर रही हूँ. बच्चों को पालना भी बहुत महत्वपूर्ण और ज़िम्मेदारी भरा काम है. जीवन में बहुत सारे उद्देश्य हैं. डेस्टिनी और किस्मत दोनों एक दूसरे के बहुत करीब हैं लेकिन अलग हैं. यदि भाग्य में कोई चीज़ लिखी है लेकिन उसे पाने के लिए आप कर्म ही नहीं करेंगे तो उसका कोई मतलब नहीं. मैं पहाड़ी इलाके से नहीं आती हूँ. हमारे हरयाणा के लोग तो पहाड़ देख के बहुत डरते हैं. इतनी ऊंचाई में और ठंडे मौसम में मेरे लिए सांस ले पाना भी मुश्किल था लेकिन मैंने अपनी इच्छा शक्ति से उसे हासिल किया इसलिए ताजिंदगी खुद को पर्यावरण से जुड़ा हुआ देखना चाहती हूँ और इसके बचाव के लिए काम करती रहूंगी. क्यूंकि प्रकृति को मैंने भगवान् माना है और अगर आप इसकी इज्ज़त करेंगे तो ये आपकी इज्ज़त करेगी वरना तमाम सुरक्षा उपकरणों के साथ भी आप अपना बचाव नहीं कर पाएँगे.

सोमवार, 23 नवंबर 2009

समाजवादी चिंतक राम सेवक यादव की पुण्य तिथि पर नमन !!

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद में जन्मे राम सेवक यादव ने छोटी आयु में ही राजनैतिक-सामाजिक मामलों में रूचि लेनी आरम्भ कर दी थी। लगातार दूसरी, तीसरी और चौथी लोकसभा के सदस्य रहे राम सेवक यादव लोक लेखा समिति के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता एवं उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य भी रहे। समाज के पिछड़े वर्ग के उद्धार के लिए प्रतिबद्ध राम सेवक यादव का मानना था कि कोई भी आर्थिक सुधार यथार्थ रूप तभी ले सकता है जब उससे भारत के गाँवों के खेतिहर मजदूरों की जीवन दशा में सुधार परिलक्षित हो। इस समाजवादी राजनेता के अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 2 जुलाई 1997 को उन पर डाक टिकट जारी किया गया। जन नायक समाजवादी चिंतक स्वर्गीय राम सेवक यादव को यह गौरव प्राप्त है कि वे प्रथम यादव विभूति थे, जिन पर डाक टिकट जारी किया गया।

स्वर्गीय राम सेवक यादव की पुण्य तिथि पर २२ नवम्बर को उनकी जन्म-कर्म स्थली बाराबंकी में श्रद्धाजंलि अर्पित की गयी। चेतना स्थल पर श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये विधायक अरविन्द सिंह गोप ने कहा कि स्वर्गीय रामसेवक यादव आज हम लोगो के लिये प्रेरणादायी है। उनके विचारों और रास्तों पर चलने की आज सख्त आवश्यकता है। श्रद्धाजंलि अर्पित करने वालों में विधान परिषद सदस्य अरविन्द कुमार यादव, स्वर्गीय राम सेवक यादव के पुत्र अमिताभ सिंह यादव, पुत्र वधु ऊषा यादव समेत कई लोग मौजूद रहे।

-:जीवन वृत्तः-
जन्म - २ जुलाई १९२६
देहावसान - २२ नवम्बर १९७४
जन्म-स्थल- ग्राम- ताला रुकुनुद्‌दीनपुर, पत्रालय- थलवारा, तहसील हैदरगढ, जनपद, बराबंकी (उ०प्र०)
पिता- राम गुलाम यादव
माता- ननका देवी यादव
शिक्षा- हाई स्कूल- १९४५, राजकीय इण्टर कालेज, बाराबंकी इण्टरमीडिएट- १९४७, कान्य कुब्ज कालेज, लखनऊ स्नातक- १९४९, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ विधिस्नातक- १९५१, लखनऊ विश्वविद्यालय
व्यवसाय - १९५२ ई० से १९५६ तक वकालत

-:राजनैतिक-वृत्त :-
१९४६-१९५१ - काग्रेस से सम्बद्ध
१९४६-१९५१ - जनपदीय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रभारी
१९५२-१९५६ - प्रदेशीय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के संयुक्त सचिव
१९५२-१९५६ - प्रदेशीय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के संयुक्त सचिव
१९५७-१९६२ - लोकसभा सद्स्य (बाराबंकी)
१९६२-१९६७ - लोकसभा सद्स्य (दूसरी बार)
१९६७-१९७१ - लोकसभा सद्स्य (तीसरी बार)
- अखिल भारतीय संयुक्त सोद्गालिस्ट पार्टी के महासचिव
१९७४ - उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (रुदौली)
- उपनेता विपक्ष एवं अध्यक्ष लोक लेखा समिति

-: सामाजिक अवदान :-
१. सामाजिक बुराईयों के प्रति सतत संघर्ष
२. समाज के असहाय व दुर्बल वर्ग के विशेष हित साधक उत्थान के लिए सतत प्रयत्नशील
३. समाजवादी समतामूलक समाज रचना के लिए आजीवन समर्पण

जन नायक समाजवादी चिंतक स्वर्गीय राम सेवक यादव जी की पुण्यतिथि पर पुनीत स्मरण !!

बुधवार, 11 नवंबर 2009

दिनेशलाल यादव निरहुआ - सफलता के आकाश पर नई उडान

भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार दिनेशलाल यादव निरहुआ अब क्षेत्रिय सिनेमा की सीमाएं लांघ कर राष्ट्रीय सिनेमा की मुख्य धारा में आ रहे है। इस कोशिश का पहला कदम उनका नया म्यूजिक अलबम 'हे अम्बे तेरा प्यार चाहिए' है । टी. सीरिज द्वारा जारी इस नए अलबम के सारे गीत हिन्दी में है । नौ में से पांच गीत दिनेशलाल यादव के स्वर में हैं और इन गीतों के गीतकार प्यारेलाल यादव है।'' भोजपुरी में टी. सीरिज से अब तक मेरे साठ से अधिक अलबम आ चुके ह किन्तु हिन्दी में यह मेरा पहला प्रयास है ।''
दिनेशलाल यादव बताते हुए स्पष्ट करते है ''मैं काफी समय से इस बात का प्रतीक्षा में था कि कंपनी मुझे अपने किसी हिन्दी अलबम के लिए गाने का प्रस्ताव देगी और इस नए अलबम से मुझे यह अवसर मिल गया है । हिन्दी में गाने की मेरी इच्छा इसलिए भी थी कि मेरे जो प्रशंसक भोजपुरी ठीक से नहीं समझ पाते वे हिन्दी में सुन कर समझ सकें । चूंकि देश - विदेश में मेरे लाखों करोडों प्रशंसकों को मेरी गायकी और शैली का एक खास अंदाज पसंद आता है, इसीलिए मैंने हिन्दी में गाते समय भी अपना वही अंदाज और वही शैली प्रयोग की है । मुझे मालूम है कि हिन्दी में एक से एक योग्य और मंजे गायक मौजूद है और उनके बीच अपनी जगह बनाना आसान काम नहीं है किन्तु मैं कोशिश तो कर ही सकता हूं । ''अलबम 'हे अम्बे तेरा प्यार चाहिए' नवरात्री के अवसर पर जारी एक सामयिक अलबम है । इसीलिए अलबम के सभी नौ गानों का वीडियो भी बनाया जा रहा है ।

इधर अभिनेता के रुप में निरहुआ की पारी हर नई फिल्म के साथ मजबूत होती जा रही है । हाल ही में प्रदर्शित निरहुआ की चार नई फिल्मों 'निरहुआ चलल ससुराल', 'लागल रहा राजा जी ''विधाता 'और' खिलाडी न.1' ने एक साथ प्रदर्शन के सौ दिन पूरे किए है और ये भोजपुरी सिनेमा में किसी भी अभिनेता का नया रेकार्ड है। ''मेरी अभिनेता के रुप में अब तक 15 फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं और आम दर्शक मुझे एक आदमी के पात्र में ही देखना पसंद करते ह । इसीलिए आज भी मैं अपनी मिट्टी और अपनी जमीन से जुडे पात्रों को ही निभा रहा हूं । यह सिलसिला पहली फिल्म 'चलत मुसाफिर मोह लियो रे' से ही चल रहा है । दूसरी फिल्म 'हो गइलबा प्यार ओढनिया वाली से' जब हिट हुई तब भी मैंने अपना ट्रेक नहीं बदला। आज मैं अभिनेता के रुप में सफलता की मंजिले तय करते समय भी इस संबंध में बहुत सतर्क और सावधान हूं । सफलता और लोकप्रियता के आकाश को छू लेने के बावजूद अपने पांवों को जमीन से जोडे रखा हैं । एक - एक फिल्म बहुत ही सोच समझ कर लेता हूं । अब तक जो भी भूमिकाएं की हैं उनमें से किसी को भी दोहराया नहीं है । अब तक जितनी फिल्में की हैं उनसे चार गुना अधिक फिल्में छोडी हैं । मैं अभिनय के प्रति पूरी तरह समर्पित हूं ।''

वास्तव में अभिनय के प्रति पूर्ण समर्पण की यह भावना हाल ही में उस समय भी सामने आ गई जब नई फिल्म ' नरसंहार ' के लिए निरहुआ ने अपने सिर के बालों का बलिदान दे दिया । इस फिल्म की भूमिका को सशक्त स्वाभाविक और जीवंत बनाने के लिए अपने सुन्दर और लंबे बालों को कटवा दिया ।'' इस फिल्म के लिए मुझे दस फिल्में छोडना पड । क्योंकि बाल कटाने के बाद मैं ' नरसंहार ' के अलावा अन्य किसी फिल्म की शूटिंग नहीं कर सकता था ।' नरसंहार' यू पी -बिहार में आज के दौर की एक जवलन्त समस्या पर आधारित है । हर दिन कहीं न कहीं सामूहिक हत्याएं होती रहती हैं । इसी जवलन्त समस्या की पृष्ठभूमि में ' नरसंहार 'की कहानी लिखी गई है । फिल्म के हीरो के संपूर्ण परिवार की हत्या कर दी जाती है । किस्मत से हीरो बुरी तरह घायल हो कर भी बच जाता है । उसी दशा में सिर मुंडवा कर वह अपने प्रियजनों का दाहसंस्कार करता है और इसी दाह संस्कार की ज्वाला के साथ ही साथ परिवार के हत्यारों से बदला भी लेता है ।' नरसंहार 'मेरी अब तक प्रदर्शित सभी फिल्मों बिल्कुल अलग एक एक्शन इमोशन से भरपूर विचारोंत्तेजक फिल्म है ।''

निरहुआ की शीघ्र आने वाली फिल्में ' रंग दे बसंती चोला ' और ' 'हम है बाहुबली 'ह । इनके अलावा ' निरहुआ तांगेवाला ', 'चलनी के चालल दुल्हा' , 'हो गई नी दीवाना तोहरे प्यार में ', ' दीवाना ', 'प्रतिज्ञा' और ' अमर -अकबर - अंथनी 'सेट पर निर्माणाधीन है ।' चलनी के चालल दुल्हा 'के साथ निरहुआ ने निर्माता के रुप में भी नयी उडान भर ली है और इस फिल्म के निर्माण के साथ अपने छोटे भाई प्रवेशलाल यादव को भी अभिनेता बना दिया है ।'' अपनी निर्माण संस्था 'निरहुआ एंटरटेनमेंट 'को आरंभ करने के पीछे मेरा एक ही लक्ष्य है कि मैं ऐसी अच्छी और स्तरीय फिल्में बनाऊं जो भोजपुरी सिनेमा को और उं'चा स्तर दे सकें । हमारी कंपनी फिल्म निर्माण के साथ म्यूजिक अलबम भी बनाएगी । अभी तो भोजपुरी फिल्मों की ही योजना है । भविष्य में कंपनी हिन्दी फिल्मों का निर्माण भी करेगी । किन्तु अभी कुछ निश्चित नहीं है । क्योंकि अभी तो कंपनी ने निर्माण के पथ पर अपना पहला ही कदम रखा है । यह कदम भविष्य में कंपनी को कहां ले जाएंगे अभी कहना संभव नहीं है ।''आजकल निरहुआ के अभिनय की उडान दक्षिण भारतीय सिनेमा के आकाश तक पहुंच गई है । वे दक्षिण भारत में बन रही भोजपुरी फिल्म के लिए डांस और एक्शन की विशेष ट्रेंनिग ले रहे ह । उनकी दो फिल्में जो हैदराबाद में शूट हुई है वहीं तेलगू में डब होकर चल रही है ।

इधर निरहुआ ने बिहार के बाढ पीडित लोगों के लिए अपनी एक फिल्म का पारिश्रमिक 50 लाख रुपए दान देने की घोषणा की है । शीघ्र ही निरहुआ अपनी एक फिल्म के प्रीमियर हेतु बिहार जाएंगे और अपने हाथों से बाढ पीडितों को इस राशि से आवश्यक्ता अनुसार सहायता देंगे । निरहुआ का यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि वे केवल सिनेमा के पर्दे पर ही नहीं बल्कि समाज के कैनवस पर भी एक सच्चे हीरो हैं ।
साभार प्रस्तुतिः राजकुमार/ http://www.khabarexpress.com/

रविवार, 8 नवंबर 2009

नवोदित रचनाकार : सुनीता यादव

नाम- सुनीता यादव / पति- श्री प्रेम यादव /जन्मतिथि - १२-११-१९७१स्थल- ब्रह्मपुर, उड़ीसा/शिक्षा- बी। ए. (आनर्स) (हिन्दी),खालिकोट कॉलेज ,ब्रह्मपुरएम.ए(हिन्दी),एम.फिल(हिंदी) (हैदराबाद विश्वविद्यालय)अनुवाद डिप्लोमा(दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा,खैराताबाद,हैदराबाद),बी.एड॰ (भारतीय शिक्षा परिषद्,लखनऊ)/रुचि- लेखन ( कविता, संस्मरण, नाटक, बाल-साहित्य-सृजन), पुस्तकें पढ़ना, गायन, तैराकी, मुसाफिरी व चित्रकला, हिन्दी व उड़िया के प्रति प्रेम के अलावा तेलुगु, बंगला, असमिया, मराठी व अंग्रेजी भाषाओं के प्रति लगावकार्य- १९९५ से १९९७ तक असाम में सांगी ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज ( हैदराबाद) के पेपर विभाग जोगिगोपा में वेलफेयर ऑफिसर,सन २००० से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ऑफिसर्स असोसिअशन पब्लिक स्कूल ,औरंगाबाद,महाराष्ट्र में शिक्षिका के रूप मेंकार्यरत,२००६ से (२०११ तक) महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा ,पुणे-औरंगाबाद विभाग के विभागीय मनोनीत सदस्यसम्मान:महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा ,पुणे द्वारा आदर्श शिक्षक पुरस्कार (२००४)जॉर्ज फेर्नादिश पुरस्कार(२००६)राज्यस्तरीय भाषा भूषण पुरस्कार (२००८)अन्य:महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे-औरंगाबाद विभाग द्वारा आयोजित बीड़ जिला चुनिन्दा हिन्दी अध्यापक कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शक के रूप में चयनित, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा आयोजित हिन्दी नव लेखक शिविरों में कविता पाठ, आकाशवाणी औरंगाबाद से भी कविताओं का प्रसारण, अंतर्राज्यीय (महाराष्ट्र तथा गुजरात) हिन्दी भाषण प्रतियोगिता में परीक्षक के रूप में चयनित (2006), परिचर्चायों में भागीदारी, गायन में अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत, २००५ में कत्थक नृत्यांगना कु।पार्वती दत्ता द्वारा आयोजित विश्व नृत्य दिवस कार्यक्रम का संचालन।
सम्पर्क-sunitay4u@gmail.com

रविवार, 1 नवंबर 2009

पंचायत राज पर कार्य हेतु लोकनाथ यादव सम्मानित

कहते हैं जज्बा हो तो उम्र भी बाधा नहीं बनती. अब 83 वर्षीय लोकनाथ सिंह यादव जी को ही लीजिये, कानपुर निवासी इस अनूठे व्यक्तित्व को पंचायत राज पर 50 साल से अधिक समय तक विशिष्ट कार्य करने के लिए पिछले दिनों विज्ञान भवन दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी उपस्थित थीं। लोक नाथ सिंह यादव जी लम्बे समय से लोक सेवा व राजनीति में सक्रिय रहे हैं।...यदुकुल की तरफ से आपके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना और ढेरों बधाइयाँ !!

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

श्री कृष्ण से जुड़ी है गोवर्धन पूजा

दीपवाली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपक्ष को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन की मानव आकृति बना उसके चारों तरफ गाय, बछडे़ और अन्य पशुओं के साथ बीच में भगवान कृष्ण की आकृति बनाई जाती है। इसी दिन छप्पन प्रकार की सब्जियों द्वारा निर्मित अन्नकूट एवं दही-बेसन की कढ़ी द्वारा गोवर्धन का पूजन एवं भोग लगाया जाता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत में यह पर्व हमें पशुओं मुख्यतः गाय, पहाड़, पेड़-पौधों, ऊर्जा के रूप में गोबर व अन्न की महत्ता बताता हैै। गाय को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर लक्ष्मी पूजा के बाद गौ-पूजा की भी अपने देश में परम्परा रही है।
पौराणिक मान्यतानुसार द्वापर काल में अपने बाल्य काल में श्री कृष्ण ने नन्दबाबा, यशोदा मैया व अन्य ब्रजवासियों को बादलों के स्वामी इन्द्र की पूजा करते हुए देखा ताकि इंद्र देवता वर्षा करें और उनकी फसलें लहलहायें व वे सुख-समृद्धि की ओर अग्रसर हों। श्रीकृष्ण ने ग्रामवासियों को समझाया कि वर्षा का जल हमें गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होता है न कि इंद्र की कृपा से। इससे सहमत होकर ग्रामवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा आरम्भ कर दी। श्रीकृष्ण ब्रजवासियांे को इस बात का विश्वास दिलाने के लिए कि गोवर्धन जी उनकी पूजा से प्रसन्न हैं, पर्वत के अंदर प्रवेश कर गए व सारी समाग्रियों को ग्रहण कर लिया और अपने दूसरे स्वरूप मंे ब्रजवासियों के साथ खडे़ होकर कहा-देखो! गोवर्धन देवता प्रसन्न होकर भोग लगा रहे हैं, अतः उन्हें और सामाग्री लाकर चढ़ाएं। इंद्र को जब अपनी पूजा बंद होने की बात पता चली तो उन्हांेने अपने संवर्तक मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज को पूरा डुबो दें। भारी वर्षा से घबराकर जब ब्रजवासी श्रीकृष्ण के पास पहुँचे तो उन्होंनेे उनके दुखों का निवारण करने हेतु अपनी तर्जनी पर पूरे गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया। पूरे सात दिनों तक वर्षा होती रही पर ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित पडे़ रहे। सुदर्शन चक्र ने संवर्तक मेघों के जल को सुखा दिया। अंततः पराजित होकर इंद्र श्रीकृष्ण के पास आए और क्षमा मांगी। उस समय सुरभि गाय ने श्रीकृष्ण का दुग्धाभिषेक किया और इस अवसर पर छप्पन भोग का भी आयोजन किया गया। तब से भारतीय संस्कृति में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परम्परा चली आ रही है।
के.के. यादव

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !!

!! दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !!

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

इंसानियत को खून से सींचते राम किशोर यादव

अपना खून किसे नहीं प्यारा होता है, पर यदि कोई अपना खून देकर दूसरों की जिंदगी बचाने का प्रयास करे तो इसे एक सकारात्मक कदम ही कहेंगे। ऐसे ही एक शख्स हैं- राम किशोर यादव। नेहरू युवा केन्द्र फैजाबाद के जिला युवा समन्वयक राम किशोर यादव ने वर्ष 2000 में किसी अखबार में खबर पढ़ी कि स्थानीय ब्लडबैंक में कतई रक्त नहीं है। इस घटना ने उनकी संवेदना को इस तरह झकझोरा कि स्वैच्छिक रक्तदान की अलख जगाना उनकी जिन्दगी का मकसद बन गया। इससे प्रेरणा लेकर उन्होंने हर ब्लाक में दस-दस युवाओं की टीमें तैयार कर दीं, जो नियमित रूप से रक्तदान करते हैं। सबसे खास बात यह है कि इस अभियान के लिए उन्हें किसी फंड की जरूरत नही पड़ी।

राम किशोर यादव के इस अथक प्रयास से फैजाबाद जिला अस्पताल का ब्लडबैंक अब प्रदेश के उन ब्लडबैंकों में शुमार किया जाता है, जहां कभी रक्त की कमी नहीं पड़ती। राम किशोर यादव अब तक करीब 1500 यूनिट रक्तदान करवा चुके हैं। उनसे प्रेरित रक्तदाताओं में फैजाबाद में मंडलायुक्त रहे आईएएस अधिकारी अरूण कुमार सिन्हा, डीएम रहे आलोक कुमार, दीपक कुमार, आमोद कुमार, एसएसपी रहे प्रशान्त कुमार तथा कई अन्य प्रशासनिक अधिकरी शामिल हैं। राम किशोर यादव ने फैजाबाद व आसपास के जिलों में करीब दस हजार युवाओं को प्रेरित कर रखा है जो किसी भी वक्त रक्तदान करने को तैयार रहते हैं। उनके रजिस्टर में करीब एक हजार स्वैच्छिक रक्तदाताओं के नाम, पते व ब्लडग्रुप दर्ज है, जिन्हें जरूरत के मुताबिक याद किया जाता है।

राम किशोर यादव की दिलीख्वाहिश है कि उनके अभियान को गति देने के लिए कोई मुख्यमंत्री फैजाबाद तशरीफ लाए, जिन्हें वह उनके वजन बराबर रक्त से तौलना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने चार मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखे, पर जवाब नहीं आया। खैर, उनका हौसला बरकरार है। वह ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिससे फैजाबाद जिला अन्य जिलों के ब्लडबैंकों को रक्त की आपूर्ति कर सके। फिलहाल वह लखनऊ के एसजीपीजीआई, चिकित्सा विश्वविद्यालय तथा राम मनोहर लोहिया अस्पताल के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि उनकी अलख दूर-दूर तक रोशनी बिखेर सके।

यदुकुल की तरफ से राम किशोर यादव को शुभकामनायें कि वे अपने नेक कार्य में सफल हों।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

राजपाल यादव ने खरीदी टी-10 गली क्रिकेट टीम

बॉलीवुड के जाने माने हास्य कलाकार राजपाल यादव टी-10 गली क्रिकेट सीजन-2 के लिए कानपुर गली क्रिकेट टीम के मालिक बन गए हैं। 5 अक्टूबर, 2009 को यह घोषणा की गई। राजपाल यादव गली क्रिकेट टीम का मालिक बनने वाले बॉलीवुड के दूसरे कलाकार हैं। उनसे पहले दिव्या दत्ता पिछले महीने लुधियाना गली क्रिकेट टीम की मालकिन बनी थी। राजपाल यादव ने इस मौके पर कहा कि कानपुर में क्रिकेट के प्रतिभावान खिलाड़ियों की कमी नहीं है। उनकी प्रतिभा को देश के समक्ष निखारने की जरूरत है।

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

राजपाल यादव: दर्शकों के चहेते हास्य कलाकार

करीब डेढ़ सौ फिल्मों में शानदार अभिनय के दम पर 38 वर्षीय राजपाल यादव आज हिंदी सिनेमा की जानी-मानी शख्सियत हैं। रंगमंच पर अभिनय की ठोस बुनियाद के सहारे फिल्मी मनोरंजन दुनिया के सफर पर उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से निकले राजपाल यादव लगभग हर तरह के किरदार में फिट नजर आते हैं, पहले खलनायकी में सफलता हासिल करने के बाद कॉमेडी में राजपाल यादव अपना लोहा मनवा चुके हैं। कॉमेडी के जरिए वे लोगों के दिलों पर राज कर रहे है। उनके लीड रोल्स की भी खासी चर्चा हुई है। फिल्म अभिनेता ओमपुरी कहते हैं- ''राजपाल यादव में गजब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर है। वह कॉमेडी ही नहीं, हर तरह के रोल शिद्दत से कर सकते हैं।'' गाँव से निकलकर मायानगरी मुंबई में अपनी सफलता का सिक्का जमाने वाले राजपाल यादव युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। राजपाल यादव के बारे में सौम्या अपराजिता का एक समीक्षात्मक आलेख यहाँ प्रस्तुत है-

जन्मदिन-1965
जन्मस्थान- कुलरा, उत्तर प्रदेश
कद- 5 फुट 3 इंच
छोटा कद, हंसमुख व्यक्तित्व और जबरदस्त अभिनय राजपाल यादव की पहचान है। बीते कुछ वर्षो में राजपाल ने स्वाभाविक अभिनय प्रतिभा के बल पर दर्शकों के चहेते हास्य कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनायी है। आलम तो यह है कि किसी फिल्म में राजपाल यादव की मौजूदगी भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक आकर्षित करने की क्षमता रखती है। समकालीन हिन्दी सिनेमा परिप्रेक्ष्य में जहाँ नायक और हास्य कलाकारों के बीच के दूरियां मिट रही हैं वहीं, राजपाल यादव ने हास्य अभिनेता के अस्तित्व को बनाए रखा है। जब मशहूर और दिग्गज निर्देशक प्रियदर्शन के साथ राजपाल काम करते हैं तो उनकी कॉमिक टाइमिंग और भी निखर कर आती है। हंगामा,भूलभूलैया,ढोल,9 चुप चुप के जैसी फिल्मों में निर्देशक-अभिनेता की इस जोड़ी ने मिलकर दर्शकों को खूब हंसाया। हास्य-रस से भरपूर भूमिकाओं के साथ-साथ गंभीर भूमिकाओं में भी राजपाल अपने अभिनय के रंग भरते रहे हैं। मैं मेरी पत्‍‌नी और वो में एक कुंठित पति की भूमिका को उन्होंने जितनी संजीदगी से जीया ,उतनी ही संवेदनशीलता के साथ मौलिक घटना पर आधारित अंडरट्रायल में अपनी पुत्रियों के साथ कुकर्म करने का आरोप झेल रहे एक अपराधी पिता की भूमिका को उन्होंने जीवंत किया। दरअसल, राजपाल यादव उन अभिनेताओं की सूची में शुमार हैं जो हर रस की भूमिकाओं में स्वयं को ढाल कर सिनेप्रेमियों की प्रशंसा बटोरने की क्षमता रखते है। अब, तो राजपाल को आकर्षक व्यक्तित्व वाले नायकों के समकक्ष की भूमिकाएं भी सौंपी जाने लगी हैं। जहां ढोल के चार नायकों में राजपाल यादव एक थे वहीं रामा रामा क्या है ड्रामा में भी उनकी मुख्य भूमिका थी। दरअसल, राजपाल यादव ने यह साबित कर दिया है कि अभिनय प्रतिभा और दर्शकों का मनोरंजन कर सकने की क्षमता ही हिन्दी फिल्मों में किसी कलाकार विशेष की सफलता का आधार होता है न कि मात्र आकर्षक व्यक्तित्व।
करियर की मुख्य फिल्में
2000-जंगल-सिप्पा
2001-प्यार तूने क्या किया-रामपाल यादव
2001-चांदनी बार-इकबाल चमड़ी
2001-यह जिंदगी का सफर-दादा
2002-कोई मेरे दिल से पूछे-राजा नायडू
2002-तुमको न भूल पाएंगे-लल्लन
2002-कंपनी-जोसेफ
2002-लाल सलाम-धत्तू
2002-मैंने दिल तुझको दिया-मुन्ना
2002- चोर मचाए शोर-छोटू
2002-रोड-भंवर सिंह
2003-एक और एक ग्यारह-छोटू
2003-हासिल-छोटकू
2003-हंगामा-राजा
2003-मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं-राजेश्वर सिंह
2003-कल हो न हो-गुरू
2004-लव इन नेपाल-बंटी गाइड
2004-आन-आप्टे
2004-मुझसे शादी करोगी-राज पुरोहित
2004-टार्जन:द वंडर कार-हवलदार सीताराम
2004-वास्तु शास्त्र-राजपाल
2005-वक्त-लक्ष्मण
2005-क्या कूल हैं हम-उमा शंकर त्रिपाठी
2005-नेताजी सुभाष चंद्र बोस-भगत राम तलवार
2005-पहेली-भोजा
2005-मैंने प्यार क्यों किया?-थापा
2005-जेम्स-टोनी
2005-गरम मसाला-बब्बन
2005-शादी नंबर वन-मिस्टर वाइ
2006-अपना सपना मनी-मनी-माथा प्रसाद
2006-मालामाल विकली-बाज बहादुर
2006-शादी से पहले-शायर कानपुरी
2006-डरना जरूरी है-इंश्योरेंस सेल्समैन
2006-फिर हेरा फेरी-पप्पू
2006-चुप चपु के-बंदया
2006-लेडिज टेलर-चंदर
2006-भागमभाग-गुलाम लखन सिंह
2007-अनवर-गोपीनाथ
2007-अंडरट्रायल-सागर हुसैन
2007-पार्टनर-छोटा डॉन
2007-रामगोपाल वर्मा की आग-रंभाभाई
2007-ढोल-मारू दामदेरे
2007-गो-जगताप तिवारी
2007-भूल भूलैया-छोटे पंडित
2008-रामा रामा क्या है ड्रामा
2008-क्रेजी फोर-गंगाधर
2008-भूतनाथ-एंथोनी
2008-हंसते हंसते-सनी
2008-कहानी गुडि़या की-तौफीक
आने वाली फिल्में- सी कंपनी, बिल्लू बार्बर, बंदा ये बिंदास है।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

विजयदशमी की शुभकामनायें ***

***विजयदशमी की शुभकामनायें ***
जीवन के हर मोड़ पर आप विजयी हों और अन्याय की पराजय हो.

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

सुरेखा यादव के जज्बे को सलाम !!

23 सितम्बर, 2009 को राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी ने उत्तर प्रदेश की सुरेखा यादव को अपने हाथों से पुरस्कृत किया. सुरेखा यादव के दोनों पैर काम नहीं करते।, फिर भी वो हाथों के बल चल कर लोगों को साक्षर बना रही हैं। 'यदुकुल' उनकी इस जीवटता को प्रणाम करता है और उनकी हिम्मत की दाद देता है !!

बुधवार, 16 सितंबर 2009

लोक संस्कृति की प्रतीक मड़ई

मड़ई का 2008 का अंक, उस श्रृंखला की नवीनतम कड़ी है जिसका आरंभ 14 नवंबर, 1987 को हुआ था। छत्तीसगढ़ में यदुवंशी लोग कार्तिक मास की एकादशी (जिस दिन देव जागते हैं और तुलसी विवाह का पर्व भी मनाया जाता है) से आगामी पंद्रह दिवसों तक अतिविशिष्ट लोक नृत्य करते हैं जो ‘राउत नाचा‘ के नाम से विख्यात है। ‘मड़ई‘ के संपादक डाॅ0 कालीचरण यादव सन् 1978 से कोतवाली के प्रांगण में राउत नाचा को व्यवस्थत रूप से आयोजित करने का कार्य अपने संयोजकत्व में कर रहे थे ताकि यादवों की ऊर्जा का रचनात्मक उन्नयन हो सके। सन् 1987 में जब इस आयोजन को वृहत्तर रूप देने की आवश्यकता अनुमत हुई और आयोजन स्थल लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय के प्रांगण को बनाया गया तभी ‘स्मारिका‘ के रूप में ‘मड़ई‘ का प्रकाशन भी आरंभ हुआ।

पहले अंक में कुल 35 लेख थे जिनमें से 31 लेख रावत नाच पर केंद्रित थे। आरंभ में रावत नाच का सांगोपांग निरूपण करना ही ‘मड़ई‘ का उद्देश्य था जो कि आगामी कुछ वर्षों तक बना रहा। फिर जल्दी ही इस पत्रिका ने स्वयं को आश्चर्यजनक गहराई और विस्तार देना आरंभ किया। यदुवंशियों की संस्कृति के ‘लोक पक्ष‘ का परिचय देने के बाद छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करते हुए ‘मड़ई‘ पूरे देश की लोक संस्कृति संबंधी ज्ञान का कोश बन गयी। देश के विभिन्न लोकांचलों के लोक साहित्य, लोक कला और लोक संस्कृति पर अधिकारी विद्वानों और लेखकों के लिखे सरस और तथ्यपूर्ण लेखों का हिंदी में प्रकाशन कर ‘मड़ई‘ने सामासिक लोक संस्कृति का विकास किया है और हर तरफ से राष्ट्र एवं राष्ट्रभाषा की अनूठी उपासना की है।

आज का समय एक ऐसा समय है जब लोक ही लोक के विरूद्ध युद्धरत है। लोक मानस में ‘प्रेय‘ निरंतर ‘श्रेय‘ को विस्थापित कर रहा है। ‘लोकतत्व‘, ‘लोकप्रिय‘ के द्वारा प्रतिदिन नष्ट और पराभूत किया जा रहा है। ‘लोक-समाज‘ का स्थान ‘जन-समाज‘ ने लगभग ले लिया है। जन-समाज की विडंबनाओं का चित्रण करते हुए टाॅक्केविले ने लिखा है- ‘सभी समान और सदृश्य असंख्य व्यक्तियों की एक ऐसी भीड़ जो छोटे और तुच्छ आनंद की प्राप्ति के लिये सतत प्रयासरत है..... इनमें से प्रत्येक एक-दूसरे से अलग रहता है और सभी एक-दूसरे के भाग्य से अनभिज्ञ होते हैं। उनके समस्त मानव संसार की कल्पना उनकी संतानों और निजी मित्रों तक सीमित होती है। जहां तक अन्य नागरिकों का प्रश्न है वे उनके नजदीक अवश्य हैं पर उन्हें जानते नहीं, वे परस्पर स्पर्श करते हैं पर एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील नहीं हैं।

वैश्वीकरण का हिरण्याक्ष पृथ्वी का अपहरण कर विष्ठा के परकोटे के भीतर उसे रखने हेतु लिये जा रहा है। ‘मड़ई‘ इस अपहृत होती हुई पृथ्वी के लोक जीवन के नैसर्गिक-सामाजिक सौंदर्य की गाथा है। वह वराह-अवतार को संभव करने वाला मुकम्मल आह्नान भले न हो पर एक पवित्र और सुंदर अभिलाषा तो जरूर है। हमारी स्मृतियों में तो नहीं, पर ‘मड़ई‘ जैसी विरल पत्रिकाओं में यह लोक जीवन दर्ज रहेगा। ऐसा इसलिए कि लोकसंस्कृति से दूर जाना ही स्मृतिविहीन होना है। ‘मड़ई‘ के ‘स्मारिका‘ होने का शायद यही संदर्भ है। मड़ई सर्वथा निःशुल्क वितरण के लिए है। इसका मूल्य आंका नहीं जा सकता।
(साभार : इण्डिया न्यूज, 12-18 सितम्बर 2009)

सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिन्दी में है दम

हिन्दी के प्रति मुलायम सिंह यादव का मोह जगजाहिर है। बात चाहे कम्प्यूटर और अंग्रेजी थोपने के विरोध की हो या फिर हिन्दी-उर्दू में नेमप्लेट लगवाने की, मुलायम सिंह काफी सख्त रहे हैं। उनके मुख्यमंत्री-कार्यकाल के दौरान यह बखूबी देखने को भी मिलता रहा है। 15वीं लोकसभा चुनाव के दौरान जारी सपा के घोषणा पत्र में इसका जिक्र होने पर काफी विवाद भी पैदा हुआ था। पर मुलायम सिंह अपनी बात पर अडिग भी हैं और होना भी चाहिए। स्वयं मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने भी हिन्दी को संपर्क भाषा बनाने पर जोर दिया है।

संसद में भी मुलायम सिंह का हिन्दी प्रेम जाहिर होता रहता है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते होंगे जब 15 जुलाई, 2009 को मुलायम सिंह ने लोकसभा मे हिन्दी के पक्ष में ऐसा माहौल बनाया कि कई गैर हिन्दी क्षेत्रों के सांसदों ने भी हिन्दी का दामन थाम लिया। लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जब लखनऊ और नोएडा में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से संबंधित मुलायम सिंह के एक सवाल का जवाब अंग्रेजी में देना शुरू किया तो मुलायम सिंह ने उनसे कहा, ‘जयराम जी, आपका नाम भी हिन्दी वाला है और आप हिन्दी जानते हैं। सवाल का जवाब हिंदी में दीजिए। यह लंदन नहीं लोकसभा है।‘

अभी हाल ही में दिल्ली में जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भी मुलायम सिंह के हिन्दी प्रेम का असर दिखा, यद्यपि इसमें स्वयं मुलायम सिंह शामिल नहीं थे। इस संगोष्ठी में चूंकि दक्षिण पूर्व एशियाई मुल्कों के प्रतिनिधि भी थे लिहाजा सम्मेलन की स्वाभाविक भाषा अंग्रेजी ही थी लेकिन केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अचानक हिन्दी में बोलना शुरू कर दिया तो आयोजक अचकचा गए। उन्हेंने अनुरोध किया कि मंत्री जी अंगे्रजी में बोलें, इस पर जयराम ने हंसते हुए खुलासा किया कि जब से मुलायम सिंह यादव ने संसद में उन्हें हिन्दी में न बोलने के लिए टोका है तब से वह हर जगह हिन्दी में ही बोलते हैं ताकि मुलायम सिंह या उन जैसा कोई हिन्दी प्रेमी नाराज न हो।..........अब तो मुलायम सिंह का हिन्दी प्रेम मानना ही पड़ेगा। केन्द्र सरकार उन्हें भले ही नाराज कर दे पर हिन्दी के नाम पर मुलायम सिंह को नाराज करना शायद इतना आसान नहीं है।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

स्पोर्ट्स के क्षेत्र में नाम कमाते यदुवंश

यदुवंश में होनहारों की कमी नहीं है। अभी पिछले दिनों हमने इस ब्लाग पर तैराकी में पाँच स्वर्ण जीतने वाली प्रियंका यादव का जिक्र किया गया था। हाल ही में राष्ट्रपति महोदया ने वर्ष 2009 के लिए सुशील कुमार को देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गाँधी खेल रत्न से और गिरधारी लाल यादव (पाल नौकायन) को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया है। पूर्व टेस्ट खिलाड़ी शिव लाल यादव के पुत्र अर्जुन यादव का चयन डेक्कन चार्जस (हैदराबाद) में किया गया। हाल ही में उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) की ओर से घोषित अंडर-19 महिला खिलाड़ियों के लिए आगरा की पूनम यादव को कप्तान की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा कानपुर की शुभांगी यादव एवं आगरा की प्रेमलता यादव को भी इस टीम में चुना गया है। यदुकुल की तरह से इन सभी को शुभकामनायें कि वे राष्ट्र का नाम रोशन करें।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

अब डिम्पल यादव !!

अन्ततः मुलायम सिंह ने अपने परिवार से पहली बार किसी महिला को राजनीति में उतारने का मन बना ही लिया। अखिलेश यादव द्वारा छोड़ी गई फिरोजाबाद सीट पर हो रहे लोकसभा उपचुनाव में मुलायम सिंह की बहू एवं अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव सपा से चुनाव लड़ेंगी। राजपूत परिवार से ताल्लुक रखने वाली तथा दो बेटियों और एक बेटे की माँ डिम्पल यादव की शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में हुई है। गौरतलब है कि इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राजबब्बर के लड़ने की घोषणा पहले ही हो चुकी है। कभी राजबब्बर मुलायम सिंह के बहुत करीबी लोगों में शामिल थे, पर वक्त ने दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया। कांच की चूड़ियों के लिए मशहूर फिरोजाबाद में डिम्पल यादव की उम्मीदवारी घोषित होते ही लोगों की निगाहें इस सीट पर जम गईं हैं। न सिर्फ सपा बल्कि मुलायम सिंह व अखिलेश यादव की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा भी इस सीट से जुड़ी हुई है। यादव बाहुल्य फिरोजाबाद लोकसभा में 13,71,000 मतदाताओं में सर्वाधिक 3,62,000 यादव मतदाता हैं। फिलहाल हमारी शुभकामनायें डिम्पल यादव के साथ हैं और आशा है कि वे न सिर्फ युवाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी बल्कि उनके आने से युवा महिलाओं को भी तरजीह मिलेगी।

बुधवार, 2 सितंबर 2009

यादवी राजनीति बनाम मुलायम-लालू

पिछले महीने आगरा में समाजवादी पार्टी का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन तीन दिनों तक चला। खूब भाषण हुए। कांग्रेस और बसपा दोनों निशाने पर। लेकिन मीडिया का फोकस रहा समाजवादी चोले में रंगे कल्याण सिंह पर और फोटोग्राफरों ने सबसे ज्यादा फ्लैश चमकाया-सिनेस्टार व रामपुर से सांसद जयाप्रदा के चेहरे पर। इन सब के बीच जमीनी कार्यकर्ताओं की नजर उन बंबइया चेहरों केा तलाश रही थी जिन्हें पार्टी ने लोकसभा चुनाव में गाजे-बाजे के साथ टिकट दिया था। मसलन मुन्ना भाई यानी संजय दत्त। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं लेकिन राष्ट्रीय अधिवेशन में नजर नहीं आए। भोजपुरी स्टार एवं गोरखपुर से सांसदी का चुनाव लड़े मनोज तिवारी भी नदारद। पता किया गया तो मालूम चला कि दोनों शूटिंग में व्यस्त हैं। बचीं लखनऊ से प्रत्याशी बनाई गईं नफीसा अली, तो वह भी नहीं आईं। उनके बारे में तो लोग बोल रहे हैं कि कंाग्रेस से फिर रिश्ते जोड़ने में लगी हैं। पार्टी वाले नाहक नहीं पूछ रहे हैं कि इन मौसमी चेहरों को टिकट और पद से नवाजने का क्या फायदा। उधर अमर सिंह सिंगापुर में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं, पर भारतीय राजनीति उन्हें करवटें नहीं बदलने दे रही है। हर दिन प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रानिक चैनल पर उनके बयान आ रहे हैं। कई बार तो मीडिया ऐसे पेश आता है मानो अमर सिंह समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा हों और मुलायम सिंह पार्टी के महासचिव। इसे मीडिया की खुराफात कहें या मुलायम सिंह की मजबूरी। फिलहाल जो भी हो यादवों के नाम पर राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव लोकसभा चुनावों से कोई सबक लेने को तैयार नहीं दिखते। उधर उनके पुत्र अखिलेश यादव भी युवाओं पर कोई जादू करने में असफल रहे। विधान सभा उपचुनावों में करारी हार इसी का परिणाम है। सबसे रोचक तथ्य तो यह है कि उधर सपा का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा था, दूसरी तरफ विधानसभा चुनावों में वे शिकस्त का सामना कर रहे थे। निश्चिततः यह समय है मुलायम सिंह के आत्मविश्लेषण एवं चिंतन का। एक ऐसा चिंतन जो सतही न हो, चाटुकारों के बीच न हों एवं ग्लैमर की चासनी में सजा न हो।

लालू प्रसाद यादव का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। कभी लोकसभा में 22 सीटें लाने वाले लालू यादव इस बार केवल 4 सीटें ही जीत पाये। उन्हें कोई मंत्रालय भी नहीं मिला, जिसकी तड़प अब भी बरकरार है। पर लालू यादव के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे मीडिया-फेस हैं और गाहे-बगाहे चर्चा में बने रहते हैं। फिलहाल उनकी समस्या यह है कि उन्हें लोसभा में फ्रंट रो की सीट छोड़नी पड़ेगी और उनकी पाटी्र के आफिस के लिए फस्र्ट फ्लोर से हटाकर थर्ड फ्लोर पर जगह दिए जाने की संभावना है, क्योंकि लोकसभा का नियम है कि यदि 10 से कम सीटें किसी पार्टी की आती हैं तो उस पार्टी को कार्यालय के लिए जगह थर्ड फ्लोर पर ही मिलती है। फिलहाल लालू प्रसाद इस मुसीबत से बचने का जुगाड़ ढूढ़ने में लगे हुए हैं। काश ऐसी ही मेहनत वे जनता के बीच जाकर करते तो शायद यह दिन उन्हें न देखना पड़ता।

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

शरद यादव दूसरी बार बने जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष

शरद यादव को 31 अगस्त को दूसरी बार जनता दल यूनाइटेड का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है। पार्टी की नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय परिषद की बैठक में शरद यादव के सर्वसम्मति से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की घोषण की गई। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए बनाए गए निर्वाचन अधिकारी सुभाष चन्द्र श्रीवास्तव ने शरद यादव को अध्यक्ष पद पर निर्वाचित किए जाने की औपचारिक रूप से घोषणा करते हुए बताया कि शरद यादव के अलावा किसी और की ओर से नामांकन दाखिल नहीं किया था। बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में पार्टी की सरकार बनने के कुछ महीने बाद अप्रैल 2006 में पटना में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में शरद यादव पहली बार जद यू0 के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में महत्वपूर्ण विभागों को सुशोभित कर चुके 62 वर्षीय शरद यादव वर्तमान में मधोपुरा से लोकसभा सदस्य हैं। गौरतलब है कि मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव अभी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। यदुकुल की तरफ से शरद यादव को हार्दिक बधाई !!

सोमवार, 31 अगस्त 2009

प्रियंका यादव ने तैराकी में जीते पांच स्वर्ण

व्यक्ति में हौसला हो तो वह आसमां से तारे भी तोड़ लाता है। ग्रामीण अंचलों में अभी भी कई ऐसी प्रतिभायें बसती हैं, जिन्हें यदि उचित परिवेश उपलब्ध कराया जाय तो वे वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं। 30 अगस्त 2009 को लखनऊ के के0डी0 सिंह बाबू स्टेडियम के ओलंपिक आकार के स्वीमिंग पूल में के0एन0 कपूर की याद में सम्पन्न राज्य सीनियर तैराकी चैंपियनशिप में कुशीनगर की प्रियंका यादव ने महिला वर्ग में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए चैंपियनशिप हासिल की। जितनी स्पर्धाओं में प्रियंका यादव उतरी सभी में अर्थात् पांच स्वर्ण पदक उसके गले लगा। तीन में तो राज्य का नया रिकार्ड ही बना दिया। पूल के इर्द-गिर्द बैठे खेल प्रेमी इंडीविजुअल मिडले के हर स्ट्रोक में उसको पानी को चीर कर तेजी से बढ़ते हुए आश्चर्य से देख रहे थे। जब लाउडस्पीकर पर गूँजा ‘प्रियंका ने कुशीनगर के देवरिया गाँव के तालाब में अभ्यास कर राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते हैं। प्रियंका पहली बार सीनियर लेवल पर हिस्सा ले रही है।‘ इसके बाद तो हर कोई प्रियंका को पास से देखने को उतावला था। प्रियंका यादव ने राज्य चैंम्पियनशिप में पाँच स्वर्ण पदक अपने नाम किए। यहीं पर गोताखोरी प्रतियोगिता में डी0एल0डब्ल्यू0 के गोताखोर नवीन यादव व्यक्तिगत चैंपियन बने।

प्रियंका के पिता जयलाल यादव ग्रामीण किसान हैं। खेती बस इतनी है कि परिवार का पेट ही भर पाता है। आय का कोई साधन नहीं है। जब से प्रियंका यादव ने होश संभाला तब से गाँव के पोखर में ही नहाने जाती थी। धीरे-धीरे पानी में उतरी और तैरना भी आ गया। पहली बार तो कुछ खास नहीं किया। पर 2004 के बाद पदक जीतने लगी। प्रियंका यादव बताती है कि ‘अब मैं अपने इवेंटों में चैंपियन हूँ। गाँव में न कोई कोच है और न ही अभ्यास का तय शेड्यूंल बस, सीनियर तैराक भूपेन्द्र उपाध्याय जो बताते रहे वही वह करती गई।‘ साल भर पहले प्रियंका ने भारतीय खेल प्राधिकरण के कैंप के लिए ट्रायल दिया। उसका चयन भी हो गया। प्रियंका बताती है कि अब वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर दिखाएगी।

(साभार - हिंदुस्तान, 31 अगस्त 2009)

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

80 साल के हुए राजेंद्र यादव

यूँ तो व्यक्ति का जन्म एक ही दिन होता है। अतः उसका जन्मदिन भी साल में एक बार ही पड़ता है। इंसान बुलंदियों पर होता है तो उसका जन्मदिन उत्सव के रूप में कई-कई दिनों तक चलता रहता है। अब यही चर्चित साहित्यकार राजेंद्र यादव जी के साथ हो रहा है. साहित्याकाश के वह चमकते सितारे हैं। जिसकी कथा उन्होंने ’हंस‘ में छाप दी, वह भी रातोंरात स्टार बन जाता है। तो जनाब इसी शख्सियत का 80वां जन्मदिन आज 28 अगस्त (1929 में जन्म) को है लेकिन उनके चाहने वालों ने इस बार उनका जन्मदिनोंत्सव दो दिन मनाने का फैसला किया है। एक दिन का जिम्मा ख्यात साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने अपने कंधे पर उठा रखा है तो दूसरे दिन की जिम्मेदारी स्वयं राजेंद्र यादव की नृत्यांगना बिटिया रचना यादव पर है। अब बिटिया की बात तो समझ में आती है लेकिन अशोक वाजपेयी के ‘होस्ट‘ बनने का कारण क्या है? इस बारे में पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह की बातें हो रही हैं, लेकिन सुना यह भी जा रहा है कि जबसे एक मंच से नामवर सिंह ने राजेंद्र यादव की खिंचाई की है, अशोक वाजपेयी राजेंद्र यादव जी के और करीब सरक आए हैं। अब यह तो सभी जानते हैं कि नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी के साहित्य जगत में परस्पर रिश्ते कैसे हैं? इसलिए यह बताने की जरूरत भी नहीं कि अशोक वाजपेयी दावत क्यों दे रहे हैं....! खैर, हम तो यही कहेंगे हैप्पी बर्थ-डे टू राजेंद्र यादव जी. आप दीर्घायु हों...आपकी साहित्यिक उम्र दीर्घायु हो...आखिरकार आप साहित्य जगत के साथ-साथ यदुवंशियों के भी सिरमौर हैं.

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

"अनंता" पत्रिका में "यदुकुल" की चर्चा

लखनऊ से पूनम यादव के संपादन में प्रकाशित मासिक पत्रिका अनंता ने अगस्त-2009 अंक में यदुकुल ब्लॉग की चर्चा की है....अनंता का आभार !!

शनिवार, 22 अगस्त 2009

विदेशी राजनीति में भी छाये यदुवंशी

भारत वर्ष में यादवों के राजनैतिक उत्कर्ष के तमाम उदाहरण मिलते हैं, पर अब विदेशों में भी तमाम उदाहरण मिलने लगे हैं। नेपाल की जनता ने अपने 240 वर्ष पुराने राजतंत्र को उखाड़कर लोकतांत्रिक पद्धति अपनाई और डा0 रामबरन यादव को अपना पहला राष्ट्रपति चुना. डा0 रामबरन यादव ने 1981 में मेडिकल कालेज कलकत्ता से एम0बी0बी0एस0 की डिग्री प्राप्त की और उसके बाद 1985 में एम0डी0 (फिजीशियन) की डिग्री चंडीगढ़ से प्राप्त की। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लगभग आठ साल तक चण्डीगढ़ में रहकर ही अपनी मैडिकल प्रैक्टिस की। यह भारत और विशेषकर यहां के यादवों के लिए गौरव का विषय है। इससे पूर्व विदेशों में त्रिनिडाड व टोबैगो के पूर्व प्रधानमंत्री श्री वासुदेव पांडे (उनके पूर्वज पानी पिलाते थे, अतः पानी पांडे कहलाने से पांडे सरनेम आया) और मारीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरूद्ध जगन्नाथ को भी यादव मूल का माना जाता है। नेपाल के उपप्रधानमंत्री रहे उपेन्द्र यादव और वहाँ संसद की डिप्टी स्पीकर चन्द्र लेखा यादव भी यादवों की ही वंशज हैं।

सशक्त यदुवंशी राजनेता: मुलायम सिंह यादव

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव एक सधे हुए राजनेता हंै। तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार केन्द्र में रक्षामंत्री की कुर्सी संभाल चुके मुलायम सिंह एक ऐसे राज्य में सत्तासीन रहे हैं जहाँ सत्ता की लड़ाई के लिए चार प्रमुख राजनैतिक दलों में सीधी लड़ाई है, जबकि अन्य राज्यों में यह दो या तीन दलों मंे सिमटी हुई है। 9 सितम्बर 1992 को सजपा से अलग होकर उन्होंने समाजवादी पार्टी का गठन किया। पहली बार 5 दिसम्बर 1989-24 जून 1991 तक वे उ0प्र0 के मुख्यमंत्री रहे एवं तत्पश्चात सपा-बसपा गठजोड़ से 5 दिसम्बर 1993-3 जून 1995 तक और तीसरी बार 29 अगस्त 2003-11 मई 2007 तक मुख्यमंत्री रहे। देवगौड़ा सरकार में 1 जून 1996 को मुलायम सिंह ने केन्द्रीय रक्षा मंत्री का कार्यभार संभाला।

अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मुलायम सिंह ने अपने कुशल वित्तीय प्रबंधन का परिचय देते हुए जहाँ एक तरफ कन्याओं, बेरोजगारों, महिलाओं इत्यादि तमाम वर्गों को तमाम कल्याणकारी योजनाओं से उपकृत किया वहीं एक लम्बे समय बाद प्रदेश सरकार हेतु भारी मात्रा में राजस्व भी एकत्र किया। तथ्य बतातें हैं कि उनके कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में 23 वर्ष के बाद राजस्व घाटा बेहद कम हुआ, आर्थिक पिछड़ापन पाँच पायदान सुधरा और राजकोषीय घाटा भी संतोषजनक स्तर तक नीचे आ गया। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी माना कि उत्तर प्रदेश में तीन वर्षो के दौरान न केवल राजस्व और राजकोषीय घाटे में कमी आई अपितु ऋणग्रस्तता भी कम हुई और विकास दर भी 3.2 प्रतिशत से बझ़कर सात प्रतिशत तक पहुच गई। स्वयं मुलायम सिंह यादव कई बार दोहरा चुके हैं कि सरकार के पास धन की कमी नहीं है वरन् धन को खर्च करने की समस्या है।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

लोकप्रिय यदुवंशी राजनेता: लालू प्रसाद यादव

लालू प्रसाद यादव ने एक राजनेता के रूप में काफी ख्याति अर्जित की। लालू प्रसाद यादव का अंदाज ही निराला है। कभी-कभी उनके विरोधी उन्हें ‘‘पाॅलिटिक्स का जोकर‘‘ भी कहते हैं पर उनके मैनेजमेंट के हुनर को देखते हुए तमाम प्रतिष्ठित संस्थानों और यहांँ तक कि विदेशों से उन्हें लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया गया। आलम ये है कि उन पर किताब लिखने से लेकर उनसे मिलते-जुलते खिलौनों तक बाजार में उतारने की होड़ मची रहती है। प्रबंधन पर 40 से भी अधिक पुस्तकें लिख चुके प्रख्यात लेखक प्रमोद बत्रा लालू के नुस्खों पर भी अब एक किताब लिखने जा रहे हैं। बिहार में लम्बे समय तक मुख्यमंत्री (10 मार्च 1990-31 मार्च 1995 एवं 4 अप्रैल 1995-25 जुलाई 1997) के रूप में शासन करने वाले लालू यादव ने केन्द्रीय रेलमंत्री के रूप में रेल सेवा का भी भारत में कायापलट कर डाला।

ग्रामीण जीवन से जुड़े प्रबंधन के सहज तत्वों को मंत्रालय के रोजमर्रा के कार्यों से जोड़ने का लालू यादव का कौशल बेमिसाल है। अपनी देहाती छवि के अनुरूप उन्होंने पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के नियमों का अनुसरण करने की बजाय देशी नुस्खा दे डाला कि यदि गाय को पूरी तरफ नहीं दुहोगे तो वह बीमार पड़ जाएगी। भूतल परिवहन क्षेत्र के जिस सबसे बड़े सरकारी उपक्रम को राकेश मोहन समिति की रिपोर्ट में घाटे का सौदा करार दे दिया गया था, वही लालू यादव के कार्यकाल में लगातार अपने कारोबार में उल्लेखनीय सुधार करता रहा। यह लालू प्रसाद यादव की प्रबन्धन क्षमता का ही कमाल था कि रेलवे की व्यवसायिक सफलता की कहानी को समझने के लिए हार्वर्ड के अकादमीशियनों और एचएसबीसी-गोल्डमैन शैच्स व मेरिल लिंच जैसे कई अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के विशेषज्ञ उनके कार्यकाल में रेल मंत्रालय के मुख्यालय का दौरा करने आये। यही नहीं भारतीय प्रबंध संस्थान, बंगलौर और भारतीय प्रशासनिक सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को प्रशिक्षण देने वाली लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय अकादमी, मसूरी ने लालू यादव को व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया। भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद ने अपने पाठ्यक्रम में लालू की रेल की कहानी को विशेष विषय के रूप में शामिल किया और स्वयं लालू प्रसाद यादव ने इस संस्थान के विद्यार्थियों की मैनेजमेंट की क्लास ली। भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद के निदेशक बकुल एच0 ढोलकिया के अनुसार- ‘‘हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि श्री लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक छवि कैसी है। हम तो बस इतना जानते हैं कि वह व्यक्ति मैनेजमेंट गुरू होने के काबिल है और हम हमेशा नई चीजें सीखने के लिए तैयार रहते हंै।’’

बुधवार, 19 अगस्त 2009

प्रथम यदुवंशी पर डाक टिकट : राम सेवक यादव

प्रथम यदुवंशी जिनके ऊपर डाक टिकट जारी हुआ, वे हैं राम सेवक यादव। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद में जन्मे राम सेवक यादव ने छोटी आयु में ही राजनैतिक-सामाजिक मामलों में रूचि लेनी आरम्भ कर दी थी। लगातार दूसरी, तीसरी और चौथी लोकसभा के सदस्य रहे राम सेवक यादव लोक लेखा समिति के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता एवं उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य भी रहे। समाज के पिछड़े वर्ग के उद्धार के लिए प्रतिबद्ध राम सेवक यादव का मानना था कि कोई भी आर्थिक सुधार यथार्थ रूप तभी ले सकता है जब उससे भारत के गाँवों के खेतिहर मजदूरों की जीवन दशा में सुधार परिलक्षित हो। इस समाजवादी राजनेता के अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 2 जुलाई 1997 को उन पर डाक टिकट जारी किया गया। राम सेवक यादव को यह गौरव प्राप्त है कि वे प्रथम यादव विभूति थे, जिन पर डाक टिकट जारी किया गया। अन्य लोगों में बी0पी0 मण्डल (1 जून, 2001), चौधरी ब्रह्म प्रकाश (11 अगस्त, 2001) एवं राव तुलाराम (23 सितम्बर, 2001) शामिल हैं।

प्रथम यदुवंशी मुख्यमंत्री :चौधरी ब्रह्म प्रकाश

भारत में यादवों का राजनीति में पदार्पण आजादी के बाद ही आरम्भ हो चुका था, जब शेर-ए-दिल्ली एवं मुगले-आजम के रूप में मशहूर चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री बने थे।1952 में मात्र 34 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री पद पर पदस्थ चौधरी ब्रह्म प्रकाश 1955 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। बाद में वे संसद हेतु निर्वाचित हुए एवं खाद्य एवं केन्द्रीय खाद्य, कृषि, सिंचाई और सहकारिता मंत्री के रूप में उल्लेखनीय कार्य किये। 1977 में उन्होंने पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों व अल्पसंख्यकों का एक राष्ट्रीय संघ बनाया ताकि समाज के इन कमजोर वर्गों की भलाई के लिए कार्य किया जा सके। राष्ट्र को अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 11 अगस्त 2001 को चौधरी ब्रह्म प्रकाश के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

सामाजिक न्याय के पैरोकार: बी. पी. मंडल

स्वतन्त्रता पश्चात यादव कुल के जिन लोगों ने प्रतिष्ठित कार्य किये, उनमें बी0पी0 मंडल का नाम प्रमुख है। बिहार के मधेपुरा जिले के मुरहो गाँव में पैदा हुए बी0पी0 मंडल 1968 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1978 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रूप में 31 दिसम्बर 1980 को मंडल कमीशन के अध्यक्ष रूप में इसके प्रस्तावों को राष्ट्र के समक्ष उन्होंने पेश किया। यद्यपि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने में एक दशक का समय लग गया पर इसकी सिफारिशों ने देश के समाजिक व राजनैतिक वातावरण में काफी दूरगामी परिवर्तन किए। कहना गलत न होगा कि मंडल कमीशन ने देश की भावी राजनीति के समीकरणांे की नींव रख दी। बहुत कम ही लोगों को पता होगा कि बी0 पी0 मंडल के पिता रास बिहारी मंडल जो कि मुरहो एस्टेट के जमींदार व कांग्रेसी थे, ने ‘‘अखिल भारतीय गोप जाति महासभा’’ की स्थापना की और सर्वप्रथम माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड समिति के सामने 1917 में यादवों को प्रशासनिक सेवा में आरक्षण देने की माँग की। यद्यपि मंडल परिवार रईस किस्म का था और जब बी0पी0 मंडल का प्रवेश दरभंगा महाराज (उस वक्त दरभंगा महाराज देश के सबसे बडे़ जमींदार माने जाते थे) हाई स्कूल में कराया गया तो उनके साथ हाॅस्टल में दो रसोईये व एक खवास (नौकर) को भी भेजा गया। पर इसके बावजूद मंडल परिवार ने सदैव सामाजिक न्याय की पैरोकारी की, जिसके चलते अपने हलवाहे किराय मुसहर को इस परिवार ने पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में यादव बहुल मधेपुरा से सांसद बनाकर भेजा। राष्ट्र के प्रति बी0पी0 मंडल के अप्रतिम योगदान पर 1 जून 2001 को उन पर डाक टिकट जारी किया गया।

रविवार, 16 अगस्त 2009

राजनीति में यदुवंशी- अब तक 9 यादव मुख्यमंत्री

लोकतंत्र में राजनीति सत्ता को निर्धारित करती है। राजनीति में सशक्त भागीदारी ही अंतोगत्वा सत्ता में परिणिति होती है। भारत के संविधान निर्माण हेतु गठित संविधान सभा के सदस्य रूप में लक्ष्मी शंकर यादव ने अपनी भूमिका का निर्वाह किया। वे बाद में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री एवं उ0प्र0 कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे। भारत में यादवों का राजनीति में पदार्पण आजादी के बाद ही आरम्भ हो चुका था, जब शेर-ए-दिल्ली एवं मुगले-आजम के रूप में मशहूर चौधरीब्रह्म प्रकाश दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री बने थे। तब से अब तक भारत के विभिन्न राज्यों में 9 यादव मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो चुके हैं।
1952 में मात्र 34 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री पद पर पदस्थ चौधरी ब्रह्म प्रकाश 1955 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। हरियाणा में 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व करने वाले राव तुलाराम के वंशज राव वीरेन्द्र सिंह हरियाणा के द्वितीय मुख्यमंत्री (1967) रहे। उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव (23 जून 1977-5 फरवरी 1979) व मुलायम सिंह यादव, बिहार में बी0पी0मण्डल (1 फरवरी 1968-22 मार्च 1968), दरोगा प्रसाद राय (16 फरवरी 1970-22 सितम्बर 1970), लालू प्रसाद यादव (10 मार्च 1990-31 मार्च 1995 एवं 4 अप्रैल 1995-25 जुलाई 1997), राबड़ी देवी (25 जुलाई 1997-12 फरवरी 1999, 9 मार्च 1999-1 मार्च 2000 एवं 11 मार्च 2000-22 मई 2005) एवं मध्य प्रदेश में बाबू लाल गौर ने मुख्यमंत्री पद को सुशोभित कर यादव समाज को गौरवान्वित किया। सुभाष यादव मध्य प्रदेश के तो सिद्धरमैया कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री रहे।
चौधरी ब्रह्म प्रकाश, राव वीरेन्द्र सिंह, देवनंदन प्रसाद यादव, चन्द्रजीत यादव, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, बलराम सिंह यादव, राम लखन सिंह यादव, सुरेश कलमाड़ी, सत्यपाल सिंह यादव, कांती सिंह, जय प्रकाश यादव, राव इन्द्रजीत सिंह, अरूण यादव इत्यादि तमाम यदुवंशी राजनेताओं ने केन्द्रीय मंत्रिपरिषद का समय-समय पर मान बढ़ाया है। वर्तमान में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव एवं शरद यादव क्रमशः राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी तथा जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तो मुलायम सिंह के सुपुत्र अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में सपा अध्यक्ष का पद सम्भाले हुए हैं। अरुण यादव केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री हैं। वर्तमान 15वीं लोकसभा में कुल 20 यादव सांसद हैं।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

पराक्रमी एवं स्वतंत्रता प्रिय जाति यादव

किसी भी राष्ट्र के उत्थान में विभिन्न जाति समुदायों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। जाति समाज की एक महत्वपूर्ण इकाई है। समाज में वही जाति प्रमुख स्थान बना पाती है जिसका न सिर्फ अपना गौरवशाली इतिहास हो बल्कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने का सत्साहस भी हो। यही कारण है कि तमाम जातियाँ कभी न कभी संक्रमण काल से गुजरती हैं। जातीय सर्वोच्चता एवं जातिवाद जैसे तत्व कहीं न कहीं समाज को प्रभावित करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के वंशज कहे जाने वाले यादवों के बारे में पौराणिक व ऐतिहासिक ग्रन्थों में विस्तार से जानकारी मिलती है। श्रीमद्भागवत (9/23/19) में कहा गया है कि-

यदोर्वंशः नरः श्रुत्वा सर्व पापैः प्रमुच्यते।
यत्रावतीर्ण कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।।
यादव आरम्भ से ही पराक्रमी एवं स्वतंत्रता प्रिय जाति रही है। यूरोपीय वंश में जो स्थान ग्रीक व रोमन लोगों का रहा है, वही भारतीय इतिहास में यादवों का है। आजादी के आन्दोलन से लेकर आजादी पश्चात तक के सैन्य व असैन्य युद्धों में यादवों ने अपने शौर्य की गाथा रची और उनमें से कई तो मातृभूमि की बलिवेदी पर शहीद हो गये। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरूद्ध सर्वप्रथम 1739 में कट्टलापुरम् (तमिलनाडु) के यादव अजगमुत्थु कोणें ने विद्रोह का झण्डा उठाया और प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के गौरव के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में यादवों ने प्रमुख भूमिका निभाई। बिहार में कुँवर सिंह की सेना का नेतृत्व रणजीत सिंह यादव ने किया। रेवाड़ी (हरियाणा) के राव रामलाल ने 10 मई 1857 को दिल्ली पर धावा बोलने वाले क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया एवं लाल किले के किलेदार मिस्टर डगलस को गोली मारकर क्रान्तिकारियों व बहादुर शाह जफर के मध्य सम्पर्क सूत्र की भूमिका निभाई। 1857 की क्रांति की चिंगारी प्रस्फुटित होने के साथ ही रेवाड़ी के राजा राव तुलाराम भी बिना कोई समय गंवाए तुरन्त हरकत में आ गये। उन्होंने रेवाड़ी में अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान कर्मचारियों को बेदखल कर स्थानीय प्रशासन अपने नियन्त्रण में ले लिया तथा दिल्ली के शहंशाह बहादुर शाह ज़फर के आदेश से अपने शासन की उद्घोषणा कर दी। 18 नवम्बर 1857 को राव तुलाराम ने नारनौर (हरियाणा) में जनरल गेरार्ड और उसकी सेना को जमकर टक्कर दी। इसी युद्ध के दौरान राव कृष्ण गोपाल ने गेरार्ड के हाथी पर अपने घोड़े से आक्रमण कर गेरार्ड का सिर तलवार से काटकर अलग कर दिया। अंग्रेजों ने जब स्वतंत्रता आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया तो राव तुलाराम ने रूस आदि देशों की मदद लेकर आन्दोलन को गति प्रदान की। अंततः 2 सितम्बर 1863 को इस अप्रतिम वीर का काबुल में देहंात हो गया। वीर-शिरोमणि यदुवंशी राव तुलाराम के काबुल में देहान्त के बाद वहीं उनकी समाधि बनी जिस पर आज भी काबुल जाने वाले भारतीय यात्री बडी श्रद्वा से सिर झुकाते हैं और उनके प्रति आदर व्यक्त करते हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राव तुलाराम के अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 23 सितम्बर 2001 को उन पर एक डाक टिकट जारी किया गया।

चौरी-चौरा काण्ड से भला कौन अनजान होगा। इस काण्ड के बाद ही महात्मा गाँंधी ने असहयोग आन्दोलन वापस लेने की घोषणा की थी। कम ही लोग जानते होंगे कि अंग्रेजी जुल्म से आजिज आकर गोरखपुर में चैरी-चैरा थाने में आग लगाने वालों का नेतृत्व भगवान यादव ने किया था। इसी प्रकार भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान गाजीपुर के थाना सादात के पास स्थित मालगोदाम से अनाज छीनकर गरीबों में बांँटने वाले दल का नेतृत्व करने वाले अलगू यादव अंग्रेज दरोगा की गोलियों के शिकार हुये और बाद में उस दरोगा को घोड़े से गिराकर बद्री यादव, बदन सिंह इत्यादि यादवों ने मार गिराया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जब ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा‘ का नारा दिया तो तमाम पराक्रमी यादव उनकी आई0एन0एस0 सेना में शामिल होने के लिए तत्पर हो उठे। रेवाड़ी के राव तेज सिंह तो नेताजी के दाहिने हाथ रहे और 28 अंग्रेजों को मात्र अपनी कुल्हाड़ी से मारकर यादवी पराक्रम का परिचय दिया। आई0एन0ए0 का सर्वोच्च सैनिक सम्मान ‘शहीद-ए-भारत‘ नायक मौलड़ सिंह यादव को हरि सिंह यादव को ‘शेर-ए-हिन्द‘ सम्मान और कर्नल राम स्वरूप यादव को ‘सरदार-ए-जंग‘ सम्मान से सम्मानित किया गया। नेता जी के व्यक्तिगत सहयोगी रहे कैप्टन उदय सिंह आजादी पश्चात दिल्ली में असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर बने एवं कई बार गणतंत्र परेड में पुलिस बल का नेतृत्व किया।

आजादी के बाद का इतिहास भी यादव सैन्य अधिकारियों तथा सैनिकों की वीरता एवं शहादत से भरा पड़ा है। फिर चाहे वह सन् 1947-48 का कबाइली युद्ध, 1955 का गोवा मुक्ति युद्ध, 1962 का भारत-चीन युद्ध हो अथवा 1965 व 1971 का भारत-पाक युद्ध। भारत-चीन युद्ध के दौरान 18,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित चिशूल की रक्षा में तैनात कुमायँू रेजीमेन्ट के मेजर शैतान सिंह यादव ने चीनियों के छक्के छुडा़ दिये। गौरतलब है कि चिशूल के युद्व में 114 यादव जवान शहीद हुए थे। चिशूल की हवाई पट्टी के पास एक द्वार पर लिखा शब्द ‘वीर अहीर‘ यादवों के गौरव में वृद्धि करता है। 1971 के युद्ध में प्रथम शहीद बी0एस0एफ0 कमाण्डर सुखबीर सिंह यादव की वीरता को कौन भुला पायेगा। मातादीन यादव (जार्ज क्रास मेडल), नामदेव यादव (विक्टोरिया क्रास विजेता), राव उमराव सिंह(द्वितीय विश्व युद्ध में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु विक्टोरिया क्रास), हवलदार सिंह यादव (विक्टोरिया क्रास विजेता), प्राणसुख यादव (आंग्ल सिख युद्ध में सैन्य कमाण्डर), मेजर शैतान सिंह यादव (मरणोपरान्त परमवीर चक्र), कैप्टन राजकुमार यादव (वीर चक्र, 1962 का युद्ध), बभ्रुबाहन यादव (महावीर चक्र, 1971 का युद्ध), ब्रिगेडियर राय सिंह यादव (महावीर चक्र), चमन सिंह यादव (महावीर चक्र विजेता), ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव (1999 में कारगिल युद्ध में उत्कृष्टम प्रदर्शन के चलते सबसे कम उम्र में 19 वर्ष की आयु में सर्वोच्च सैन्य पदक परमवीर चक्र विजेता) जैसे न जाने कितने यादव जंाबांजों की सूची शौर्य-पराक्रम से भरी पड़ी है। कारगिल युद्ध के दौरान अकेले 91 यादव जवान शहादत को प्राप्त हुए। गाजियाबाद के कोतवाल रहे ध्रुवलाल यादव ने कुख्यात आतंकी मसूद अजगर को नवम्बर 1994 में सहारनपुर से गिरतार कर कई अमेरिकी व ब्रिटिश बंधकों को मुक्त कराया था। उन्हें तीन बार राष्ट्रपति पुरस्कार (एक बार मरणोपरान्त) मिला। ब्रिगेडियर वीरेन्द्र सिंह यादव ने नामीबिया में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूर्व सांसद चैधरी हरमोहन सिंह यादव को 1984 के दंगों में सिखों की हिफाजत हेतु असैनिक क्षेत्र के सम्मान ‘शौर्य चक्र‘ (1991) से सम्मानित किया जा चुका है। संसद हमले में मरणोपरान्त अशोक चक्र से नवाजे गये जगदीश प्रसाद यादव, विजय बहादुर सिंह यादव अक्षरधाम मंदिर पर हमले के दौरान आपरेशन लश आउट के कार्यकारी प्रधान कमाण्डो सुरेश यादव तो मुंबई हमले के दौरान आर0पी0एफ0 के जिल्लू यादव तथा होटल ताज आपरेशन के जाँबाज गौरी शंकर यादव की वीरता यदुवंशियों का सीना गर्व से चौडा कर देती है। वाकई यादव इतिहास तमाम जांबाजों की वीरताओं से भरा पड़ा है !!

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं कृष्ण (कृष्ण-जन्माष्टमी की बधाई )

विगत पांच हजार वर्षों में श्रीकृष्ण जैसा अद्भुत व्यक्तित्व भारत क्या, विश्व मंच पर नहीं हुआ और न होने की संभावना है। यह सौभाग्य व पुण्य भारत भूमि को ही मिला है कि यहाँ एक से बढकर एक दिव्य पुरूषों ने जन्म लिया। इनमें श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अनूठा, अपूर्व और अनुपमेय है। हजारों वर्ष बीत जाने पर भी भारत वर्ष के कोने-कोने में श्रीकृष्ण का पावन जन्मदिन अपार श्रद्धा, उल्लास व प्रेम से मनाया जाता है। श्रीकृष्ण अतीत के होते हुए भी भविष्य की अमूल्य धरोहर हैं। उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी है कि उन्हें पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। मुमकिन है कि भविष्य में उन्हें समझा जा सकेगा। हमारे अध्यात्म के विराट आकाश में श्रीकृष्ण ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊंचाइयों पर जाकर भी गंभीर या उदास नहीं हैं। श्रीकृष्ण उस ज्योतिर्मयी लपट का नाम है जिसमें नृत्य है, गीत है, प्रीति है, समर्पण है, हास्य है, रास है, और है जरूरत पड़ने पर युद्ध का महास्वीकार। धर्म व सत्य के रक्षार्थ महायुद्ध का उद्घोष। एक हाथ में वेणु और दूसरे में सुदर्शन चक्र लेकर महाइतिहास रचने वाला दूसरा व्यक्तित्व नहीं हुआ संसार में।

कृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। प्रेम भी किया तो पूरी शिद्दत के साथ, मैत्री की तो सौ प्रतिशत निष्ठा के साथ और युद्ध के मैदान में उतरे तो पूरी स्वीकृति के साथ। हाथ में हथियार न लेकर भी विजयश्री प्राप्त की। भले ही वो साइड में रहे। सारथी की जिम्मेदारी संभाली पर कौन नहीं जानता कि अर्जुन के पल-पल के प्रेरणा स्त्रोत और दिशा निर्देशक कृष्ण थे।

अल्बर्ट श्वाइत्जर ने भारतीय धर्म की आलोचना में एक बात बड़ी मूल्यवान कही। वह यह कि भारत का धर्म जीवन निषेधक है। यह बात एकदम सत्य है, यदि कृष्ण का नाम भुला दिया जाए तो ओशो के शब्दों में कृष्ण अकेले दुख के महासागर में नाचते हुए एक छोटे से द्वीप हैं। यानी कि उदासी, दमन, नकारात्मकता और निंदा के मरूस्थल में नाचते-गाते मरू-उद्यान हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि कृष्ण केवल रास रचैया भर थे। इन लोगों ने रास का अर्थ व मर्म ही नहीं समझा है। कृष्ण का गोपियों के साथ नाचना साधारण नृत्य नहीं है। संपूर्ण ब्राह्मांड में जो विराट नृत्य चल रहा है प्रकृति और पुरूष (परमात्मा) का, श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य उस विराट नृत्य की एक झलक मात्र है। उस रास का कोई सामान्य या सेक्सुअल मीनिंग नहीं है। कृष्ण पुरूष तत्व है और गोपिकाएं प्रकृति। प्रकृति और पुरूष का महानृत्य है यह। विराट प्रकृति और विराट पुरूष का महारस है यह, तभी तो हर गोपी को महसूस होता है कि कृष्ण उसी के साथ नृत्यलीन हैं। यह कोई मनोरंजन नहीं, पारमार्थिक है।

कृष्ण एक महासागर हैं। वे कोई एक नदी या लहर नहीं, जिसे पकड़ा जा सके। कोई उन्हें बाल रूप से मानता है, कोई सखा रूप में तो कोई आराध्य के रूप में। किसी को उनका मोर मुकुट, पीतांबर भूषा, कदंब वृक्ष तले, यमुना के तट पर भुवनमोहिनी वंशी बजाने वाला, प्राण वल्लभा राधा के संग साथ वाला प्रेम रूप प्रिय है, तो किसी को उनका महाभारत का महापराक्रमी रणनीति विशारद योद्धा का रूप प्रिय है। एक ओर हैं-

वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात्,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्,
पूर्णेंदु संुदर मुखादरविंदनेत्रात्,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने।।

तो दूसरी ओर-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।।

वस्तुतः श्रीकृष्ण पूर्ण पुरूष हैं। पूर्णावतार सोलह कलाओं से युक्त उनको योगयोगेश्वर कहा जाता है और हरि हजार नाम वाला भी।

आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकों को यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया। वे महान योगी थे तो ऋषि शिरोमणि भी। उन्होंने वासना को नहीं, जीवन रस को महत्व दिया। वे मीरा के गोपाल हैं तो राधा के प्राण बल्लभ और द्रोपदी के उदात्त सखा मित्र। वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान और सर्व का कल्याण व शुभ चाहने वाले हैं। अति रूपवान, असीम यशस्वी और सत् असत् के ज्ञाता हैं। जिसने भी श्रीकृष्ण को प्रेम किया या उनकी भक्ति में लीन हो गया, उसका जन्म सफल हो गया। धर्म, शौय और प्रेम के दैदीप्यमान चंद्रमा श्रीकृष्ण को कोटि कोटि नमन।

यतो सत्यं यतो धर्मों यतो हीरार्जव यतः !
ततो भवति गोविंदो यतः श्रीकृष्णस्ततो जयः !!

सत्या सक्सेना

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

एक अनूठी पहल ऐसी भी

पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित अखबार के कोने में छपी एक खबर ने ध्यान आकर्षित किया। समाज में कुछेक कार्य ऐसे होते हैं, जो भले ही अनायास होते हैं पर ऐसी पहल समाज के लिए प्रेरणास्पद होती है। यह वाकया है गाजीपुर जिले के दो मित्रों का, जिसके चलते एक मित्र न सिर्फ पढ़ाई कर पा रहा है बल्कि उसकी फीस भी माफ कर दी गई है। सर, यह मेरा दोस्त है। पढ़ना चाहता है लेकिन इसके पापा के पास पैसा नहीं है। छोटा सा है यह वाक्य, इसे बोलने वाला भी छोटा सा ही बालक है,लेकिन काम उसने बड़ा कर दिखाया। इस बच्चे ने अपने साधनहीन दोस्त को न सिर्फ विद्यालय में प्रवेश दिलाया बल्कि प्रधानाचार्य से उसकी फीस माफ करा दी।

यह प्रशंसनीय काम करने वाला करीब छह वर्र्षीय बालक है विशाल चौहान। ‘सब पढ़ें और सब बढ़ें‘ के जुमले को सच कर दिखाया एक ऐसे मासूम ने, जिसे सरकारी नारों से कुछ लेना देना नहीं। बरही निवासी विशाल अलगू यादव इण्टर कालेज, बरेंदा, गाजीपुर में कक्षा एक का छात्र है। पड़ोसी हम उम्र रामविलास उसका दोस्त है। विशाल रोज स्कूल जाता और रामविलास से भी चलने को कहता,लेकिन परिवार की गरीबी के कारण रामविलास स्कूल नहीं जा पा रहा था। विशाल ने रामविलास के घरवालों से बात की। घरवालों ने अपनी जर्जर माली हालत का हवाला दिया। तब विशाल ने पहल कर प्रधानाचार्य वासुदेव यादव से चर्चा की। प्रधानाचार्य उसकी बात सुन कर चकित हुए। उन्होंने कोशिश करके रामविलास का विद्यालय में न केवल निःशुल्क नाम लिखा बल्कि पूरी फीस भी माफ कर दी। विशाल ने रामविलास को अपनी यूनीफार्म व कुछ पाठ्य पुस्तकें भी दी। अब दोनों दोस्त साथ स्कूल जाते हैं। विशाल के अनुकरणीय कार्य से प्रधानाचार्य इतने अभिभूत हुए कि स्कूल की दैनिक प्रार्थना सभा समाप्त होने के बाद सभी बच्चों के सामने उसका उदाहरण रखा। उन्होंने विशाल को विद्यालय की ओर से पुरस्कृत भी किया।