गुरुवार, 20 मई 2010

नैसर्गिकता को सहेजते : रजनीकांत यादव

रजनीकांत यादव 37 वर्षों से फोटोग्राफी से जुड़े हुए हैं। वे मानते हैं कि कोई भी विधा व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती। रजनीकांत यादव पिछले 16 वर्षों से आदिवासी और ग्रामीण भारत की फोटोग्राफी कर रहे हैं। जब वे इन क्षेत्रों में फोटोग्राफी करने गए, तब उन्हें इस बात का आभास हुआ कि निर्धन और मूलभूत सुविधाओं से वंचित लोग कितनी भयावह जिंदगी जी रहे हैं। आदिवासियों और ग्रामीणों की स्थिति को देख कर रजनीकांत यादव के कुछ मिथक भी टूटे। उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वे अपने छायाचित्रों के माध्यम से आदिवासियों और ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं को जन-साधारण के सामने ला कर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाधान करने का प्रयास करेंगे। इसी मुहिम में कैमरे के साथ कलम भी उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम कब बन गई, यह रजनीकांत यादव को भी याद नहीं। रजनीकांत यादव ने मेघा पाटकर के नर्मदा बचाओं आंदोलन में कैमरे के साथ सार्थक भूमिका निभाते हुए खयाति अर्जित की है।

रजनीकांत यादव ने नर्मदा चित्र प्रदर्शनी के माध्यम से नर्मदा घाटी की उस अविकृत रूप की एक झलक प्रस्तुत की है 'जो था, जो है और जो नहीं रहेगा'। उन्होंने नर्मदा का गद्‌गद्‌ गुणगान या लच्छेदार भाषा में लिखा गया चित्रित वृतांत प्रस्तुत नहीं किया है। उनके छायाचित्र तो उस डूबती और खत्म होती दुनिया के छवि चित्र हैं, जो हमें जीवन सहज और इस धरती पर सबसे अनुकूल जीवन का गुणसूत्र समझाती है।


फोटो फीचर-रजनीकांत यादव के फोटो फीचर द हिंदु, टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, एशियन एज, हिंदुस्तान टाइम्स, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नवभारत, मिड-डे, बासुमति, आजकल, जन्मभूमि, अमृत बाजार पत्रिका, डाउन टू अर्थ, द इकोलॉजिस्ट, ह्‌यूमन स्पेस, सेंचुरी एशिया, संडे, इंडिया टुडे, एकलव्य पब्लिकेशन, पहल और कादम्बिनी जैसे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो कर खूब सराहे गए हैं।

एकल प्रदर्शनी-उनकी एकल प्रदर्शनी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, सी। एस. इ., गांधी पीस फाउंडेशन (नई दिल्ली), बिरला एकेडमी आफ आट्‌र्स (कोलकाता), बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री आफ सोसायटी, नेशन सेंटर फार परफार्मिंग आट्‌र्स-एनसीपीए, टाटा इंस्टीट्‌यूट आफ फार सोशल साइंस-टीआईएसएस (मुंबई), म्यूजियम आफ मेनकाइंड-आईजीआरएमएस, रवीन्द्र भवन (भोपाल) में आयोजित हो चुकी है।

चयन-छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रदेश की स्थापना की प्रथम वर्षगांठ के अवसर पर रायपुर में रजनीकांत यादव की आदिवासी संस्कृति पर आधारित फोटो प्रदर्शनी आयोजित। छत्तीसगढ शासन के कला एवं संस्कृति विभाग ने उनके छायाचित्रों स्थाई वीथिका में संजोकर रखा है। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित घुमंतू प्रदर्शनी ''मोबाइल एक्जीबिशन-ब्लैक एंड वाइट-ए कलेक्शन आफ रिप्रेजेन्टेटिव पिक्चर्स आफ 40 लेंस मेन एंड वूमेन फार्म अराउंड द ग्लोब'' में छायाचित्र चयनित।

सम्मान-फेडरेशन आफ इंडियन फोटोग्राफी द्वारा सम्मानित, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह द्वारा सर्वश्रेष्ठ छायाकार सम्मान से अलंकृत और कई राष्ट्रीय प्रदर्शनी में निर्णायक के रूप में सम्मिलित।

रजनीकांत के लिए कुछ शब्द- रजनीकांत को हम सब मुकम्मल नहीं जानते। उनकी काया को जानते भी हों, उनकी आत्मा को नहीं जानते। मैं भी उनको आधा-अधूरा जानता हूं, पर मैं उनके प्रति हमेशा उत्सुक और जागरूक रहा हूं। जब वे शहर के मध्य अपने स्टूडियो में बैठते और काम करते थे, तब मैं उनके पास जाता था। फिर हम लोग अपनी-अपनी दुनिया में खो गए और मिलना बाधित हो गया। रजनीकांत बेहद संकोची, आत्मजयी, अन्तर्मुखी और अपनी मार्केटिंग एवं अपनी सेल्समेनशिप से निरंतर बचने वाले जीव हैं। उनके जीवन और उनकी कार्यप्रणाली में गांधीवादी झलक है, वे पुरानी साधना पद्धति से काम करते हैं, पर मानवतावादी और आधुनिक संवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति हैं। उन्हें सम्पूर्ण और वास्तविक रूप में जानना कठिन है, पर वे काम करते हुए भीतरी उमंग, श्रम और लक्ष्य से सदा भरे रहते हैं। यह तो जाहिर सच्चाई है।

नर्मदा घाटी अपने विशद रूप में इन दिनों काफी चर्चित है। उस पर अध्ययन करने वाली एजेंसियों, फिल्म निर्माण करने वाले उत्साहियों, यायावरों, लेखकों, राजनैतिक, सामाजिक आंदोलनकारियों और उद्योग धंधों की, नई पूंजी की गहरी नजर पड़ रही है। कुछ ही साल पहले हरसूद का बडा इलाका डूब गया, जैसे टेहरी डूब गई। इस बडे अंचल पर लूट के भावी खतरे मंडरा रहे हैं। प्राकृतिक संपदा का जहां भी भंडार होगा, वहां छद्‌म विकास के खतरे मंडराएंगे ही। सभ्यताएं उथल-पुथल में होंगी, पर्यावरण अशांत होगा और नर्मदा का जल ही नहीं, उसकी गोद में जो जीवन है, वह भी क्षतिग्रस्त होगा। मुझे इसका खतरा दिख रहा है, वह भले ही दूर हों। जिसे आज रेड कोरिडोर कहा जाता है और जो देश के सर्वाधिक अशांत इलाके हैं, अनेक राज्यों का जीवन, जिसकी चपेट में है, वे आदिवासी बहुल्य अंचल हैं। इस देश का सर्वोच्च खनन लकडी, बिजली, औषधि और शिल्प जिन इलाकों से आ रहा है, वहीं सर्वाधिक रक्तपात, हिंसा और युद्ध है। इसलिए नर्मदा घाटी का विपुल जीवन भले आपको रसिक, सुंदर, श्रद्धालु, शांत और समृद्ध दिख रहा हो, उस पर विकास के गिद्ध मंडरा रहे हैं। गरीबी, भोलेपन और सुंदरता को यह सेलेब्रट करने का समय नहीं है। हिंसा के अंखुए कभी भी फूट सकते हैं। ज्वालामुखी जो अभी ठंडा है, कभी भी गरम हो सकता है। नर्मदा घाटी के प्रति हमारा नया आचरण एक जिम्मेदार और चिंता प्रमुख नागरिक का होना चाहिए। जहां तक मैं जानता हूं रजनीकांत की स्टडी, उनका डेटा उपक्रम, उनकी यात्राएं और कैमरा वर्क हमारी सबसे खरी और उज्जवल सच्चाई को बोलता है। उनकी किताबें जब खंडों में प्रकाशित होंगी, तब लोग सच्चाई से अवगत होंगे। जिन वंचितों की त्वचा पर आंसू, रक्त, धूल, पसीना और हंसी चिपकी हुई है, वहां रजनीकांत का कैमरा भी उपस्थित है, पहुंचा हुआ है। यह आपको उनकी प्रदर्शनी भी बतलाती है।यह जो हमारी तत्कालिक दुनिया है, उसमें कब पापुलर कल्चर ने सेंध लगा दी, यह हमें भी पता नहीं चला। संभवतः भू-मण्डलीकरण के दौर में ऐसा हुआ है। बाजार संगीत और शोर के कारण यह हुआ है और इसलिए कि सिनेमा, मीडिया की चमक ने भी इस मीना बाजार को समर्थन दिया है। मुझे याद है, वह दौर हाल ही का जब अखबार ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीनी की तरफ पलटे थे, तो एक हल्की सी मुठभेड़ विचारों की हुई थी, पर फिर सब कुछ परास्त हो गया। हम उन लोगों को तो जानने लगते हैं, जो मीडिया में प्रतिदिन आते है, जाते हैं, रमते हैं, बोलते हैं, पर हर शहर के खंडहरों में कुछ खोए हुए लोग बचे हैं, जिन्हें हम स्वमेव नहीं पा लेते, उन्हें खोजना पड़ता है। अब हीरों के खोजी लोग दुर्लभ है, गायब हैं, इसलिए हीरों की तलाश भी खत्म हो गई है। जबलपुर में भी अलग-अलग विधाओं में ऐसे लोग बहुतेरे होंगे, जैसे हमारे रजनीकांत हैं। देश-विदेश में उनका काम सराहा गया, प्रदर्शित हुआ, पर जबलपुर में जहां तक मुझे ज्ञात है, रजनीकांत की यह संभवतः पहली नुमाइश है। हम भी यह काम बहुत विलंब से कर सके।

जिस तरह राहुल सांस्कृत्यायन ने एशिया के दुर्गम भूखंडों की यात्राएं की हैं और उन यात्राओं को अभिव्यक्त भी किया है, उसी तरह अपने अन्वेषण, अपनी जानकारियों और अपनी जनसेवा से भरे ज्ञान को अर्जित करने के लिए रजनीकांत ने भी अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया। नर्मदा घाटी में अपनी घुमक्कडी से अपने घुटने ध्वस्त कर लिए और हृदय की धौंकनी को इतना थका डाला कि कुशल डाक्टर और अस्पताल ही उन्हें बचा सके। अब वे काफी स्वस्थ हुए है, अपनी कार्यशैली भी बदली है और टेबल पर अधिक बैठ रहे हैं, बरसों के संग्रहण को लिपिबद्ध कर रहे हैं।ऐसा व्यक्ति जो प्रामाणिक जीवन से स्पंदित दस्तावेजों और विचारों को एक बड़ी पोटली में एकट्ठा कर चुका है और जो उनको लिपिबद्ध कर रहा है और साथ में कैमरे की आंख को ले कर नदियों के मुहानों, जंगल की खोई पगडंडियों, सात-आठ से अधिक राज्यों के बीहड , आदिवासी अंचलों में घूमता रहता आया हो, उनका एक हिस्सा ही हो गया हो, उस रजनीकांत को हम-तुम कितना जानते हैं, हमारे नागरिक, हमारे सामाजिक, हमारे जबलपुरिया और हमारे मॉल-मल्टीप्लेक्स, मल्टीप्लेक्स चिल्लाने वाले विकास के नाम पर गलत राहों पर दौड ने वाले लोगों और इसी शहर के दर्प भरे, प्रतिद्वंदिता से भरे अखबार कितना जानते हैं। उनके पन्ने अपराधिक और राजनैतिक डायरियों से भरे रहते हैं। उनके पन्ने लोकल ही लोकल हैं। पर फिर भी अनेक पन्ने शहर के अंधेरे में ही रहते हैं। दिनोंदिन यह अंधेरा बढ रहा है। जबकि शहरों की सड कों पर उजाला बढ गया है।मित्रों यह सब कड़वा मैं जो कह रहा हूं, रजनीकांत की यह सब शिकायतें नहीं हैं। वे तो तल्लीन है, रोज अपनी दुनिया में, अपने काम में। अगर मुझे एक शब्द में, एक वाक्य में रजनीकांत को संबोधित करना हो तो मैं कहूंगा-आइसबर्ग, आइसबर्ग। तीन हिस्सा डूबा हुआ, बस एक हिस्सा पानी में। अर्थात्‌ रजनीकांत एक आइसबर्ग। तैरता हुआ, घूमता हुआ। जो थोडा-बहुत नजर आता है, वह टिप आफ द आइसबर्ग है। अधिकांश लोग रजनीकांत को फोटोग्राफर कहते हैं। वे हैं भी, पर उनके कैमरे में जो लेंस है, उससे बडा और बेहतर लेंस उनकी प्रगतिशील क्रांतिकारी जीवन दृष्टि में है। वे घुमंतू हैं, अन्वेषक हैं, पुरातात्विक है और विनाश, पतनोन्मुखता, क्षय के खिलाफ सभ्यता की मूलगामी सच्चाईयों को बचाने वाले हैं। उनकी सौंदर्यवादी नजर रस सम्प्रदाय, धर्मांधता और मध्ययुगीन पिछडेपन को तोड कर आगे बढ ती है। एक नर्मदा और उसके इर्द-गिर्द के जीवन को हम सर्व साधरण लोग देखते हैं। एक को यायावर वेगड देखते हैं, एक को पंचायतें, सरकारें, मठाधीश, योजनाकार देखते हैं, एक को रजनीकांत देखते हैं।रजनीकांत की वाणी, उनकी शारीरिक भाषा, उनका कैमरा, उनकी लेखनी परिवर्तन दर्द और जीवन-मृत्यु को देखती है। इसलिए उनकी रचनाएं, उनके दस्तावेज, उनके फोटोग्राफ अधिक समकालीन और संवेदनाओं के पास हैं। उन्होंने ध्यानस्थ हो कर काम किया, वे शोर मचाते नहीं चले, उन्होंने अपनी कृतियां बाजार में नहीं बेंची। वे काल को लांघते हुए, भविष्य के संग्रहालयों और आगे की दुनिया के लिए काम कर रहे हैं।उनका एक परिचय यह भी है कि वे उस जबलपुर के बड़े और कम उम्र में ही विदा हो गए महान फोटोग्राफर शशिन के भाई हैं। जो मृत्यु के बाद कई दशक तक चुपचाप अपने फोटोग्राफ के साथ छपते रहे। देश ही देश में। उन्होंने परसाई और मुक्तिबोध को अमरचित्र कथा का हिस्सा बनाया। एक अच्छा चित्र क्या होता है, यह आप जैसे फोटोग्राफरों को बताने की जरूरत नहीं है। एक अच्छा पोट्रेट सम्पूर्ण आत्मा का उजाला होता है, वह प्यासों के लिए कुंओं से निकाला गया, बालटी भर जल होता है। वह आजीवन धधकता रहता है। रजनीकांत ऐसे ही छायाचित्रों के फोटोग्राफर हैं। उनकी नदियां और उनके आदिवासी धरती के प्राणतत्व हैं, जिसको छत्तीसगढ का एक पुलिस अधिकारी और देश के गृह मंत्री खदेड -खदेड कर हिंद महासागर में डुबो देना चाहते हैं। रजनीकांत की कार्यकारी मैत्री देश की उन विभूतियों और महापुरूषों से है, जो जन संग्राम में लगे हैं। जो तालाब बना रहे हैं, जो विस्थापन के दर्द की दवा बनाते हैं, जो उखडे और बियावन लोगों के बीच काम कर रहे हैं, जो स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा और कुटीर की रक्षा कर रहे हैं। स्वयं रजनीकांत ने इन्हीं लोगों के बीच और देश के आधे दर्जन से अधिक राज्यों में घूम-घूम कर काम किया है और टूटे पुलों, टूटी नाव, उजाड बंजारों, भुखमरों की मुस्कानों के बीच वे कई बार खो गए हैं, गुम गए हैं।रजनीकांत से पहली बार 67-68 में कहीं मेरे एक छात्र जयंतीलाल पटेल ने मुलाकात कराई थी। यह छात्र एक दुर्लभ प्राणी था, ऐसा कि उसे हम लोग बापू कहने लगे थे। बापू-याने गांधी। आज वह जयंती गुजरात के एक सखत इलाके में फंसा हुआ, जीवन-मृत्यु की लड़ाई लड रहा है। सफलता उसे छू नहीं गई है। हमेशा खुश रहता है और पक्का ईडियट है।एक प्रसंग और है। जो न मैं भूला और न रजनीकांत। दिल्ली में रजनीकांत की प्रदर्शनी एक विश्वसनीय और सम्मानित केन्द्र इंडिया इंटरनेशनल में थी। संभवतः 8-10 साल पहले। मैं दिल्ली में था, उन दिनों। लम्बे समय के लिए। इस प्रदर्शनी से देश के अनेक उज्जवल कीर्तिमान समाज वैज्ञानिक और पुरस्कृत सेवाभावी लोग जुडे थे। मुझे उसमें पहुंचना था। मेरी प्रतीक्षा थी वहां, वहां सुख और संतोष की संभावना थी, पर मैं भटक गया, वहां नहीं पहुंच सका। मेरे और रजनीकांत के बीच एक गहरा खेद आज तक बना है। और मैं उसकी क्षतिपूर्ति आजीवन करना चाहता हूं। रजनीकांत के काम में मुझे वहीं तरंग मिलती है, जो मुझे अपने काम में मिलती थी। और पीछे पड -पड के एक बार उनसे 'पहल' में लिखवाया भी था। मुख पृष्ठ पर उनका एक दुर्लभ फोटोग्राफ भी दिया था।विकास की अवधारणाओं पर हमारा देश बंटा हुआ है। बुनियादी तौर पर हम जिस ढांचे को निर्मित कर रहे हैं, वह हमारे देश में मिस फिट है। जिसके कारण असंखय समस्याएं पैदा हो रहीं हैं। हमारे वास्तविक सुर मंद पड़ गए हैं। हम इमारतों, बाजारों, मशीनों के विप्लव, हाईटेक जिंदगी को विकास मानते हैं। यह तेजी-मंदी की धारणा विनाशकारी है। जिस तरह से संसार के महान्‌ आदिवासियों, जन जातियों को मौत के कंसों ने निगल लिया है, हम उसके खिलाफ हैं। हम अल्पसंख्यक भी हों, पर हम उसके खिलाफ हैं।रजनीकांत ने इसी खिलाफत को सच्चाई और सौंदर्य में बदला है। वास्तविक सौंदर्य हमारी नैसर्गिकता में है। रजनीकांत का कैमरा, रजनीकांत की कलम विकास के असहमत मार्गों पर चल रही है। उन्हें हमारा सलाम।

(प्रसिद्ध साहित्यकार ज्ञानरंजन ने यह वक्तव्य पिछले दिनों जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में आयोजित रजनीकांत यादव की नर्मदा घाटी संस्कृति : छायाचित्र प्रदर्शनी एवं व्याख्यान के अवसर पर दिया था।)


4 टिप्‍पणियां:

KK Yadava ने कहा…

रजनीकांत जी के बारे में जानकर अच्छा लगा. ..साधुवाद.

Shyama ने कहा…

यदुवंश में ऐसी विभूतियाँ भी छुपी हुई हैं..जानकारी हेतु आभार.

Amit Kumar ने कहा…

रजनीकांत यादव ने उसी समय तय कर लिया कि वे अपने छायाचित्रों के माध्यम से आदिवासियों और ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं को जन-साधारण के सामने ला कर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाधान करने का प्रयास करेंगे।...Great..Salute !!

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

फोटोग्राफी तो मुझे भी बहुत अच्छी लगती है...