शनिवार, 5 जून 2010

जाति आधारित जनगणना अनिवार्य : लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व

जाति आधारित जनगणना के विपक्ष में उठाए जा रहे सवालों पर सिलसिलेवार चर्चा करें-
जातीय गणना नेताआंे के लिए राजनीति का औजार बनेगी।
भारत एक लोकतांत्रिक राज्य हैए जहाँ बहुमत के आधार पर शासन-व्यवस्था चलती है। यदि किसी जाति विशेष के लोग आबादी में ज्यादा होने के बावजूद शासन-प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व नहीं रखते हंै और उनमंे से कोई उनका नेतृत्वकर्ता बनकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए पे्ररित करता हैए तो हर्ज ही क्या है घ् कम से कम यह उस व्यवस्था से तो अच्छी होगी जहाँ कुछेक जातियाँ समाज को भरमाकर उच्च-नीच जाति का मुहावरा गढ़ती हंै और लोगांे पर शासन करती हैं। ऐसे में बात-बात में लोकतंत्र का तकाजा देनेवाली शक्तियाँ ही अब संरव्या-बल से घबरा रही हैं और जाति-गणना का विरोध कर रही हैं । वस्तुतरू हमारे देश का सवर्ण- वर्ग अभी इतना उदार नहीं हुआ है कि अपनी हैसियत व कुर्सी की ओर बढ़ते किसी कदम का स्वागत करे । दलित-पिछडे़ वर्ग के लोगों का अपने अस्तित्व को लेकर जागरुक होना और सत्ता पर पहले से काबिज सवर्णों को धीरे-धीरे पदच्युत करना इन्हें सुहा नहीं रहा है। ऐसे में अब जाति-जनगणना में अपनी पोल खुलने के डर से ये इसमें राजनीति देख रहे हैं.

(जातिवार गणना के विरोध में उठाये गए हर सवाल का जवाब क्रमश: अगले खंड में)

3 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

जब तक जाति आधारित जनगणना खत्म नहीं होगी जातिवाद भी खत्म नहीं हो सकता.
जाति आधारित जनगणना कदापि नहीं होनी चाहिए.

माधव ने कहा…

caste based census is not healthy for the india in future. it will affect badly on the national integration. so i oppose the said saste based census.

moreover what is the need of this?

http://qsba.blogspot.com/

Ratnesh Kr. Maurya ने कहा…

बहुत सही लिखा आपने. जिन लोगों ने जाति की आड में सदियों तक शोषण किया, आज अपने हितों पर पड़ती चोट को देखकर बौखला गए हैं. जातिवाद के पोषक ही आज जाति आधारित जनगणना के आधार पर जातिवाद के बढ़ने का रोना रो रहे हैं. इस सारगर्भित लेख के लिए आपकी जितनी भी बड़ाई करूँ कम ही होगी. अपने तार्किक आधार पर जाति-गणना के पक्ष में सही तर्क व तथ्य पेश किये हैं..साधुवाद !!