गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

सुबाचन यादव के शीर्षकहीन चित्र

राजनीति-प्रशासन से परे तमाम यदुवंशी साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। इनमें से एक हैं सुबाचन यादव। सुबाचन यादव जिद की हद तक डटे रहने वाले कलाकारों में से हैं। वह पिछले दो दशकों से टैक्सचर में काम कर रहे हैं, उसमें भी श्याम-श्वेत उनके प्रिय रंग हैं, जिनसे वे आकार का निर्माण करतें हैं। उनके आकारों में जो बिंब उभरता है उसमें एक स्त्री का चेहरा रहता है। कुछ चित्र आकारहीनता का अहसास कराते हैं, तो कुछ ब्रह्मांड की रचना करते प्रतीत होते हैं। एक चित्र को देखकर तो लगता है मानो वृक्ष ने अपने पत्ते बिखरा दिये हों। इसी क्रम में उनके द्वारा चित्र अलौकिकता के करीब पहँुच जाते हैं। फिर भी चित्रों को देखकर उनकी तकनीकी सर्वोपरिता का अहसास हो जाता है। यह शायद उनकी व्यवसायिक सक्रियता के चलते लगता है।

श्याम-श्वेत रंग के ही इस्तेमाल पर वह कहते हैं-’सफेद रंग सादगी का प्रतीक है और काले रंग में सभी को अपने भीतर समाहित करने की ताकत है और यह भी सच है कि दोनों का एक दूसरे के बगैर अस्तित्व ही नहीं है।‘ इनके समायोजन से जो कला उभरती है वह गंभीर बहस की माँग करती है। सुबाचन आगे कहते हैं-’बेशक दो रंगों में काम करना कटिन है, और टैक्सचर में यह कठिनाई बढ़ जाती है, लेकिन काम आनंद भाव से किया जाय तो फिर आसान जान पड़ता है, यही वहज है कि सुबाचन के काम में एक ठहराव भी दिखाई पड़ता है। अपने चित्रों को सुबाचन कोई शीर्षक नहीं देते। वह कहते है-’शब्द में इतनी ताकत नहीं है कि वह किसी पेंटिंग को संपूर्णता में आंक सके। वैसे भी एक ही पेंटिग से हर व्यक्ति अपने-अपने अर्थ ग्रहण करता है। फिर कैसे किसी कृति को शीर्षक दिया जा सकता है? कलाकार-कवि अपनी सुविधा के लिए कृति को शाीर्षक दे सकता है, अन्यथा शीर्षक का कोई अर्थ नहीं है। वह शीर्षकहीनता को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का नाम देते हैं। सुबाचन स्वीकारते हैं कि पेटिंग प्रारम्भ करते समय कोई विशेष आकार दिमाग नहीं होता, जैसे-जैसे रंगों का समायोजन होना शुरू होता है, आकार उभरने लगते हैं। कभी-कभी तो ऐसे आकार सामने आते हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं करते। ऐसे आकारों में हर कोई सामंजस्य नहीं बैठा सकता। सुबाचन मानते हैं कि जो कलाकार सच्चाई के करीब होगा, उसका काम स्वतः ऐसा होना शुरू हो जाता है। अध्यात्मिकता शायद इसका चरम बिन्दु है। (साभारः आजकल,मार्च 2009 में कलानिधि द्वारा प्रस्तुत)

4 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी30 अप्रैल, 2009

    आप इस ब्लॉग के माध्यम से तमाम जाने-अनजाने साहित्यकारों और कलाकारों से परिचय करा रहे हैं....हमें आप पर नाज़ है.

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  2. बेनामी30 अप्रैल, 2009

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  3. चलिए आपके माध्यम से सुबाचन यादव की कला से रूबरू हुए...

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