मंगलवार, 16 जून 2009

गीता के तत्व-चिंतन का अमृत पिलाती ‘मानस गीता‘

श्रीमद्भगवद्गीता मानव धर्म का उद्घोषक आर्ष ग्रन्थ है। इसने भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य देशों के लोगों को भी प्रभावित किया है। इसी से कहा गया है कि-‘‘गीता सुगीता कर्तव्या, किमन्यत्शास्त्र विस्तरैः।‘‘ महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता देववाणी संस्कृत के विशालतम महाकाव्य ‘महाभारत‘ के अन्तर्गत आता है। कुरूक्षेत्र के कौरव-पाण्डव युद्ध में अर्जुन के विषाद एवं संशयग्रस्त मानस को योगश्वर श्रीकृष्ण ने दिव्य चक्षु प्रदान कर कर्तव्य-पालन के लिए प्रेरित किया है। प्रस्तुत प्रसंग महाभारत के भीष्मपर्व में अध्याय 23 से 40 तक व्याख्यायित है। गीता का कृष्ण-अर्जुन संवाद 710 श्लोकों में वर्णित तथा 18 अध्यायों में विभक्त है। वस्तुतः श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान-भक्ति-कर्म का समन्वित स्वरूप प्रस्तुत करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान आज भी मानवीय मूल्यों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि इसे अपनाने वालों की संख्या दिनां-ब-दिन बढ़ती जा रही है। तमाम विद्वानों ने गीता के सारतत्व को सामान्य भाषा में पहुँचाने हेतु अथक प्रयत्न किये हैं। इसी कड़ी में बंशलाल यादव ‘यदुवंशलाल‘ ने श्रीमद्भगवद्गीता का सरल-सुबोध-मानस शैली में भावानुवाद ‘‘मानस गीता‘‘ पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार कर्म, विकर्म और अकर्म की स्थिति में पहुँचा हुआ स्थितप्रज्ञ ही इस भौतिक जगत में निरपेक्ष ज्ञान का सुखदानुभव करता हुआ तटस्थ भाव से जीवन यापन करता है, उसी प्रकार यदुवंशलाल ने गीता की महिमा को न सिर्फ समझा बल्कि उसका सम्यक अनुशीलन करके मसनवी शैली (दोहा, चैपाई, छन्द) में लिखकर सर्वसाधारण के लिए सरल-सरस एवं गेय बनाया है। गीता में व्यक्त मानव जीवन की सनातन समस्याओं का जिस सहज एवं सरल रूप में समाधान प्रस्तुत किया गया है उसे सरल ग्रामीण अवधी में प्रस्तुत कर यदुवंशलाल ने और भी रोचक एवं जन-जन के करीब ला दिया। यह अनुवाद शाब्दिक होने के साथ ही मूल के अति निकट रखा गया है। 88 पृष्ठों की पुस्तक ‘मानस गीता‘ रचनाकार के 5 साल के श्रम का परिणाम है। यदुवंशलाल अपने समर्पण में स्वीकारते हैं-‘‘स्वप्रेरणा एवं उस अलौकिक शक्ति की अनुकम्पा से श्रीमद्भगवद्गीता जैसे अमृतोपम ग्रन्थ का भाव काव्य के माध्यम से इस पुस्तक में संप्रेषित करने का टिटिहिरी प्रयास किया है।

वागीश शास्त्री के आशीर्वचन, उपेन्द्र कुमार गंगवार की अनुशंसा, गदाधर प्रसाद विद्यार्थी के आमुख, डा0 शंकरनाथ शुक्ल के ग्रन्थ-परिचय एवं डा0 अखिलेश के पुरोवाक् ने पुस्तक को पे्ररणास्पद व सारगर्भित बना दिया है। राजकुमार अवस्थी ने बड़े मनोयोग से पुस्तक की प्रस्तुति में दो शब्द लिखकर पाठकों के मानस को भक्ति संगीत से झंकृत करने की ओर प्रवृत्त किया है। यदुवंशलाल कृत ‘‘मानस गीता‘‘ के आवरण पृष्ठ पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देने का खूबसूरत चित्र अंकित है, जो इसे आकर्षक बनाता है। गणेश शंकर विद्यार्थी की जन्मभूमि रहे नर्वल में अवस्थित डायट के प्रवक्ता एवं पुस्तक के लेखक वंशलाल यादव का पद्य रूप में प्रस्तुत परिचय उनकी अनंत प्रतिभा को प्रस्फुटित करता है। पुस्तक के अन्त में प्रस्तुत गीता तत्व एवं आरती उसे जनमानस के और करीब लाते हैं। निश्चिततः इस पुस्तक में प्रस्तुत भावानुवाद विद्वतजनों की ही नहीं बल्कि जन मानस की सहज जिज्ञासा की मनः शान्ति करेगा एवं ग्रामीण अंचल के लोगों को भी गीता के मर्म से परिचित करा सकेगा व उनमें भक्ति भावनाओं का संचार करने में सहायक सिद्ध होगा। गीता के तत्व-चिंतन का अमृत पिलाती ‘मानस गीता‘ रूपी लोक कल्याणकारी कार्य के लिए बंशलाल यादव 'यदुवंशलाल' साधुवाद के पात्र हैं।
पुस्तक-मानस गीता रचनाकार-बंशलाल यादव 'यदुवंशलाल'
प्रकाशक-अशोक प्रकाशन, किदवई नगर, कानपुर
प्रथम संस्करण- 1998, पृष्ठ- 88 मूल्य- 35 रूपये

9 टिप्‍पणियां:

बाजीगर ने कहा…

'यदुवंशलाल' जी ! आप तो भगवान कृष्ण के सच्चे अनुयायी निकले...उनके विचारों को सहज भाषा में जन-जन तक पहुँचाना कोई छोटा कार्य नहीं हैं...बधाई.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

यदुकुल पर जिस तरह से यदुवंशियों द्वारा किये जा रहे कार्यों को सम्यक स्थान दिया जा रहा है...काबिले-तारीफ है. मानस-गीता की सुन्दर समीक्षा प्रस्तुत की है आपने.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Rashmi Singh ने कहा…

गीता के तत्व-चिंतन का अमृत पिलाती ‘मानस गीता‘ रूपी लोक कल्याणकारी कार्य के लिए बंशलाल यादव 'यदुवंशलाल' साधुवाद के पात्र हैं।
..................................
हमारी तरफ से भी इस पवित्र कार्य के लिए बधाई.

Ratnesh ने कहा…

'यदुवंशलाल' जी को उत्तम पुस्तक व उत्तम विचारों हेतु बधाई.

Bhanwar Singh ने कहा…

कानपुर से प्रकाशित हो रही "यादव-साम्राज्य" पत्रिका के संपादक के रूप में आपका अभिनन्दन करता हूँ. 'यदुवंशलाल' जी ! आप चिरायु हों..स्वस्थ हों.

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

जानकर प्रस्संनता हुयी कि बंशलाल यादव अध्यापन के साथ-साथ लेखन में भी सक्रिय हैं. विद्यार्थियों के साथ-साथ समाज को भी गीता के भावानुवाद द्वारा नई राह दिखा रहे हैं. आपकी पुस्तक मानस-गीता को समाज के सामने प्रस्तुत करने के लिए "यदुकुल" का आभार.

Ghanshyam ने कहा…

यदुवंशलाल ने गीता की महिमा को न सिर्फ समझा बल्कि उसका सम्यक अनुशीलन करके मसनवी शैली (दोहा, चैपाई, छन्द) में लिखकर सर्वसाधारण के लिए सरल-सरस एवं गेय बनाया है। ........अरे आप तो छुपे रुस्तम निकले...किन पुस्तकों पर कार्य कर रहे हैं.

KK Yadav ने कहा…

Nice one.