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बुधवार, 7 सितंबर 2016

श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कही बातों को कॉरपोरेट जगत भी अपना रहा - कृष्ण कुमार यादव

श्रीकृष्ण सिर्फ एक भगवान या अवतार भर नहीं थे।  इन सबसे आगे वह एक ऐसे पथ-प्रदर्शक और मार्गदर्शक थे, जिनकी सार्थकता  हर युग में बनी रहेगी।  उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नहीं, एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता-ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। उक्त विचार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ  एवं चर्चित साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव ने यादव समाज, जोधपुर द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र, जोधपुर में 25 अगस्त, 2016  को आयोजित जन्माष्टमी  स्नेह मिलन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस बात पर जोर दिया कि आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकों को यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। यही कारण है कि भगवान श्री कृष्ण की स्तुति लगभग सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में की जाती है। यहाँ तक कि वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, वे भी निश्चित रूप से भगवदगीता से प्रभावित हैं। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहे गए उपदेशों का हर एक वाक्य हमें कर्म करने और जीने की कला सिखाता है। अब तो कॉरपोरेट जगत भी मैनेजमेंट के सिद्धांतों को गीता से जोड़कर प्रतिपादित कर रहा है।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे रेलवे वर्कशॉप जोधपुर में उप मुख्य यांत्रिक इंजीनियर श्री सत्यवीर सिंह यादव ने कहा कि भगवान् श्री कृष्ण  के चरित्र में सर्वत्र समदर्शिता प्रकट होती है।  रिटायर्ड अतिरिक्त रजिस्ट्रार, सहकारी समिति जोधपुर संभाग श्री योगेन्द्र सिंह यादव ने श्री कृष्ण के विचारों को सदैव प्रासंगिक बताते हुए उनके  जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यादव समाज, जोधपुर के अध्यक्ष डॉ. शैलेष यादव ने कहा कि कृष्ण की सभी लीलाएँ कुछ न कुछ सन्देश देती हैं। उन लीलाओं को उनके आध्यात्मिक स्वरूप में ही समझा जा सकता है। यूथ हॉस्टल, जोधपुर के प्रबंधक ले. कर्नल (सेनि) प्रकाश चन्द्र यादव ने भी विचार व्यक्त किये।



कार्यक्रम में मुख्य अतिथि  निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने राजस्थान न्यायिक सेवा में चयनित (14 वीं रैंक) पूर्णिमा यादव सहित विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित भी किया। 

इस अवसर पर  प्रविंद्र यादव, डॉ. राम रतन यादव, मदन सिंह यादव, अरुण यादव, आनंद यादव, राजकुमार यादव सहित तमाम लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन नंदकिशोर यादव ने किया।
-राम शिव मूर्ति यादव @ यदुकुल ब्लॉग : http://yadukul.blogspot.com/

शनिवार, 5 सितंबर 2015

यादव समाज की स्मारिका का डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने किया लोकार्पण

 श्रीकृष्ण सिर्फ एक भगवान या अवतार भर नहीं थे।  इन सबसे आगे वह एक ऐसे पथ-प्रदर्शक और मार्गदर्शक थे, जिनकी सार्थकता  हर युग में बनी रहेगी।  उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नहीं, एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता-ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। उक्त विचार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ  एवं चर्चित साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव ने यादव समाज, जोधपुर द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र, जोधपुर में 5 सितंबर को आयोजित जन्माष्टमी  स्नेह मिलन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये।

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस बात पर जोर दिया कि आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकों को यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। यही कारण है कि भगवान श्री कृष्ण की स्तुति लगभग सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में की जाती है। यहाँ तक कि वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, वे भी निश्चित रूप से भगवदगीता से प्रभावित हैं। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहे गए उपदेशों का हर एक वाक्य हमें कर्म करने और जीने की कला सिखाता है। अब तो कॉरपोरेट जगत भी मैनेजमेंट के सिद्धांतों को गीता से जोड़कर प्रतिपादित कर रहा है।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में अतिरिक्त रजिस्ट्रार, सहकारी समिति जोधपुर संभाग योगेन्द्र सिंह यादव ने कहा कि हमारे अध्यात्म के विराट आकाश में श्रीकृष्ण ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊंचाइयों पर जाकर भी गंभीर या उदास नहीं हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यादव समाज, जोधपुर के अध्यक्ष डॉ. शैलेष यादव ने कहा कि कृष्ण की सभी लीलाएँ कुछ न कुछ सन्देश देती हैं। उन लीलाओं को उनके आध्यात्मिक स्वरूप में ही समझा जा सकता है। यूथ हॉस्टल, जोधपुर के प्रबंधक ले. कर्नल (सेनि) प्रकाश चन्द्र यादव ने श्री कृष्ण के विचारों को सदैव प्रासंगिक बताते हुए उनके  जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि  निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने यादव समाज द्वारा जारी स्मारिका का विमोचन भी किया।  इस अवसर पर उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित भी किया। इस अवसर पर  मदन सिंह यादव, अरुण यादव, आनंद यादव, राजकुमार यादव सहित तमाम लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन नंदकिशोर यादव ने किया।

-डॉ. शैलेष यादव
अध्यक्ष - यादव समाज जोधपुर 

बुधवार, 6 जनवरी 2010

सोलह कलाओं के अवतार : श्री कृष्ण

यद्‌यपि प्रत्‍येक पुराण में अनेक देवी देवताओं का वर्णन हुआ है तथा प्रत्‍येक पुराण में अनेक विषयों का समाहार है तथापि शिव पुराण, भविष्‍य पुराण, मार्कण्‍डेय पुराण, लिंग पुराण, वाराह पुराण, स्‍कन्‍द पुराण, कूर्म पुराण, वामन पुराण, ब्रह्माण्‍ड पुराण एवं मत्‍स्‍य पुराण आदि में ‘शिव' को; विष्‍णु पुराण, नारदीय पुराण, गरुड़ पुराण एवं भागवत पुराण आदि में ‘विष्‍णु' को; ब्रह्म पुराण एवं पद्‌म पुराण में ‘ब्रह्मा' को तथा ब्रह्म वैवर्त पुराण में ‘सूर्य' को अन्‍य देवताओं का स्रष्‍टा माना गया है।

पुराणों के गहन अध्‍ययन से स्‍पष्‍ट होता है कि पहले शिव की उपासना का विशेष महत्‍व था किन्‍तु तद्‌नन्‍तर विष्‍णु की भक्‍ति एवं उपासना का विकास एवं महत्‍व उत्‍तरोत्‍तर बढ़़ता गया। वासुदेव, नारायण, राम एवं कृष्‍ण आदि विष्‍णु के ही अवतार स्‍वीकार किए गए। 14 वीं शताब्‍दी तक आते आते राम एवं कृष्‍ण ही इष्‍टदेवों में सर्वाधिक मान्‍य एवं प्रतिष्‍ठित हो गए। अलग अलग कालखंडों में विष्‍णु, नारायण, वासुदेव, दामोदर, केशव, गोविन्‍द, हरि, सात्‍वत एवं कृष्‍ण एक ही शक्‍ति के वाचक भिन्‍न नामों के रूप में मान्‍य हुए। महाभारत के शान्‍ति पर्व में वर्णित है -

‘‘ मैं रुद्र नारायण स्‍वरूप ही हूँ। अखिल विश्‍व का आत्‍मा मैं हूँ और मेरा आत्‍मा रुद्र है। मैं पहले रुद्र की पूजा करता हूँ। आप अर्थात्‌ शरीर को ही नारा कहते हैं। सब प्राणियों का शरीर मेरा ‘अयन' अर्थात्‌ निवास स्‍थान है, इसलिए मुझे ‘नारायण' कहते हैं। सारा विश्‍व मुझमें स्‍थित है, इसी से मुझे ‘वासुदेव' कहते हैं। सारे विश्‍व को मैं व्‍याप लेता हूँ, इस कारण मुझे ‘विष्‍णु' कहते हैं। पृथ्‍वी, स्‍वर्ग एवं अंतरिक्ष सबकी चेतना का अन्‍तर्भाग मैं ही हूँ, इस कारण मुझे ‘दामोदर' कहते हैं। मेरे बाल सूर्य, चन्‍द्र एवं अग्‍नि की किरणें हैं, इस कारण मुझे ‘केशव' कहते हैं। गो अर्थात्‌ पृथ्‍वी को मैं ऊपर ले गया इसी से मुझे ‘गोविन्‍द' कहते हैं। यज्ञ का हविर्भाग मैं हरण करता हूँ, इस कारण मुझे ‘ हरि' कहते हैं। सत्‍वगुणी होने के कारण मुझे ‘सात्‍वत' कहते हैं। लोहे का काला फाल होकर मैं जमीन जोतता हूँ और मेरा रंग काला है, इस कारण मुझे ‘कृष्‍ण' कहते हैं। ''

भगवान कृष्‍ण के अनेकानेक रूप हैं। उनको सोलह कलाओं का अवतार माना जाता है। श्री कृष्‍ण के अतन्‍त प्रकार के रूप हैं। जो रूप सर्वातीत, अव्‍यक्‍त, निरंजन, नित्‍य आनन्‍दमय है उसका वर्णन करना सम्‍भव ही नहीं है क्‍योंकि अनन्‍त सौन्‍दर्य के चैतन्‍यमय आधार को भाषा में व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता। महाभारत, शास्‍त्रों एवं पुराणों में जो वर्णित है उस दृष्‍टि से श्री कृष्‍ण के तीन रूप प्रमुख हैं -

1 ़ महाभारत के कृष्‍ण
2 ़ गीता के कृष्‍ण
3 ़ भागवत तथा उसके आधार पर काव्‍य में वर्णित कृष्‍ण

महाभारत के कृष्‍ण
महाभारत में ‘नारद प्रसंग' में श्री कृष्‍ण के विश्‍व रूप का वर्णन मिलता है किन्‍तु यहाँ प्रधानता कृष्‍ण के मानवीय रूप की ही है। महाभारत में कृष्‍ण के कुशल राजनीति वेत्‍ता, कूटनीति विशारद एवं वीरत्‍व विधायक स्‍वरूप का निदर्शन है।

गीता के कृष्‍ण
गीता में श्री कृष्‍ण के विश्‍व व्‍यापी स्‍वरूप एवं परब्रह्म स्‍वरूप का प्रतिपादन है। श्री कृष्‍ण स्‍वयं अपना विश्‍व रूप अर्जुन को दिखाते हैं। गीता में श्री कृष्‍ण को प्रकृति और पुरुष से परे एक सर्व व्‍यापक, अव्‍यक्‍त एवं अमृत तत्‍व माना गया है और उसे परम पुरुष की संज्ञा से अभिहित किया गया है।

भागवत तथा उसके आधार पर काव्‍य में वर्णित कृष्‍ण
भागवत में यद्‌यपि अनेक अवतारों का वर्णन है किन्‍तु प्रधानता की दृष्‍टि से कृष्‍ण को पूर्ण ब्रह्म मानकर कृष्‍ण भक्‍ति की श्रेष्‍ठता प्रतिपादित है। भागवत में यद्‌यपि कृष्‍ण के 1 ़ असुर संहारक 2 ़ राजनीति वेत्‍ता एवं कूटनीति विशारद 3 ़ योगेश्‍वर 4 ़ परब्रह्म स्‍वरूप 5 ़ बालकृष्‍ण 6 ़ गोपी विहारी आदि सभी रूपों का वर्णन एवं विवेचन हुआ है किन्‍तु प्रधान रूप से कृष्‍ण के रसिकेश्‍वर स्‍वरूप की सरस अभिव्‍यंजना है। भागवत के पारायण से प्रेमाभिभूत भक्‍तों को गोकुल, ब्रज एवं वृन्‍दावन में विहार करने वाले नन्‍द नन्‍दन रसिक शिरोमणि गोपाल कृष्‍ण की लीलाओं से सहज रूप से परमानन्‍द की प्राप्‍ति होती है।

श्रीमद्‌भागवतकार जहाँ अलौकिकता एवं भक्‍ति से पुष्‍ट परमानन्‍द के रस से निमज्‍जित करता है वहीं परवर्ती आचार्यों एवं साहित्‍यकारों ने गोपीवल्‍लभ एवं राधावल्‍लभ कृष्‍ण के प्रेम की शास्‍त्रीय मीमांसा एवं काव्‍यात्‍मक अभिव्‍यंजना की है। सूरदास जैसे कवियों ने यशोदा माता के वात्‍सल्‍य का सहज एवं सरस चित्रांकन भी किया है।

रामानुजाचार्य ने भक्‍ति को नारायण, लक्ष्‍मी, भू और लीला तक ही सीमित रखा। निम्‍बार्काचार्य ने दक्षिण भारत से वृन्‍दावन में आकर उत्‍तर भारत में कृष्‍ण और सखियों द्वारा परिवेष्‍ठित राधा को महत्‍व दिया। निम्‍बार्क की भक्‍ति परम्‍परा में तथा विष्‍णु स्‍वामी से प्रभावित होकर उत्‍तर भारत में राधा कृष्‍ण की भक्‍ति का प्रचार प्रसार करने वाले आचार्यों में सर्वाधिक महत्‍व वल्‍लभाचार्य एवं चैतन्‍य महाप्रभु का है।

वल्‍लभाचार्य ने अपनी भक्‍ति में ‘प्रपत्‍ति'/‘शरणागति' को विशेष स्‍थान दिया। आपने गोपाल कृष्‍ण की लीलाओं को अलौकिकता प्रदान की। आपकी स्‍थापना है कि लीला पुरुषोत्‍तम श्रीकृष्‍ण राधिका के साथ जिस लोक में विहार करते हैं वह विष्‍णु और नारायण के बैकुंठ से भी ऊँचा है। इस स्‍थापना के कारण इन्‍होंने ‘गोलोक' को बैकुंठ से भी अधिक महत्‍व प्रदान किया।

चैतन्‍य महाप्रभु ने श्रीकृष्‍ण संकीर्तन के महत्‍व का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार यह चित्‍तरूपी दर्पण के मैल को मार्जित करता है, संसाररूपी महादावग्‍नि को शान्‍त करता है, प्राणियों को मंगलदायिनी कैरव चंद्रिका वितरित करता है। यह विद्‌यारूपी वधू का जीवन स्‍वरूप है। यह आनन्‍दस्‍वरूप को प्रतिदिन बढ़ाता है।

जयदेव, विद्‌यापति, चंडीदास एवं सूरदास जैसे अष्‍टछाप के कवियों ने गोपियों के कृष्‍णानुराग एवं ‘युगल उपासना' से प्रेरित राधा कृष्‍ण के उस प्रेम की सहज भावाभिव्‍यंजना की है जहाँ राधा श्‍याम के रंग में रंग जाती हैं तथा श्‍याम राधा के रंग में रंग जाते हैं।

कुछ विद्वानों नें श्रीमद्‌भागवत तथा उससे प्रेरित काव्‍य ग्रन्‍थों में वर्णित गोपियों के कृष्‍णानुराग एवं ‘युगल उपासना' से प्रेरित राधा कृष्‍ण के प्रेम प्रसंगों को भगवान श्रीकृष्‍ण के चरित पर लगाए गए असत्‍य, निर्मूल एवं निराधार लांछन माना है।

भक्‍ति परम्‍परा के परिप्रेक्ष्‍य में लीला प्रसंगों के आध्‍यात्‍मिक निहितार्थ हैं। लोक में जो जितना अश्‍लील एवं गर्हित है वह गोलोक में उतना ही पावन एवं मंगलकारी है। प्रत्‍येक लीला के आध्‍यात्‍मिक अर्थों की गहन एवं विशद व्‍याख्‍याएँ सुलभ हैं। उनकी पुनुरुक्‍ति की कोई प्रयोजनसिद्‌धता नहीं है। सम्‍प्रति हम केवल यह संकेत करना चाहते हैं कि लोक की दृष्‍टि से लोक में परकीया प्रेम गर्हित एवं अपराध है किन्‍तु भक्‍ति में गोपियाँ कुल मर्यादा का अतिक्रमण कर कामरूपा प्रीति करती हैं। लोक में जो श्रृंगार प्रेम है भक्‍ति में वह मधुर भक्‍ति रस है, माधुर्य भाव की भक्‍ति है। लौकिक प्रेम के जितने स्‍वरूप हो सकते हैं, वे सभी मधुर भक्‍ति में आ जाते हैं। कृष्‍ण में लीन होने के कारण गोपियों की कामरूपा प्रीति भी निष्‍काम है तथा सोलह हज़ार गोपियों के साथ ‘रास' रचाने वाले कृष्‍ण तत्‍वतः ‘योगेश्‍वर' है।

प्रेम के इस धरातल पर दैहिक सीमा से उद्‌भूत प्रेम उन सीमाओं का अतिक्रमण कर चेतना के स्‍तर पर प्रतिष्‍ठित हो जाता है। कृष्‍ण लीलाओं में प्रेम के जिस उन्‍मुक्‍त स्‍वरूप की यमुना तट और वृन्‍दावन के करील कुंजों में रासलीलाओं की धवल चॉदनी छिटकी है उसे आत्‍मसात करने के लिए भारत की तंत्र साधना को समझना होगा। ‘ हिन्‍दी निर्गुण भक्‍ति काव्‍य परम्‍परा' शीर्षक आलेख में लेखक ने विस्‍तार के साथ प्रतिपादित किया है कि भक्‍ति काल के साहित्‍य की रस-साधना में जो भक्‍ति है वह तत्‍वतः आत्‍मस्‍वरूपा शक्‍ति ही है। भक्‍ति की उपासना वास्‍तव में आत्‍मस्‍वरूपा शक्‍ति की ही उपासना है। सभी संतो का लक्ष्‍य भाव से प्रेम की ओर अग्रसर होना है। प्रेम का आविर्भाव होने पर ‘भाव' शांत हो जाता है। भक्‍त महाप्रेम में अपने स्‍वरूप में प्रतिष्‍ठित हो जाता है।

उदाहरण के लिए कबीर ने जीवन की साधना के बल पर जाना था कि ‘ मानस' यदि विकारों से मुक्‍त होकर ‘निर्मल' हो जाता है तो उसमें ‘अलख निरंजन' का प्रतिबिंब अनायास प्रतिफलित हो जाता है। ‘ प्‍यंजर प्रेम प्रकासिया, अन्‍तरि भया उजास'। हम यह कहने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहे हैं कि सूफियों ने भी भाव के केन्‍द्र को भौतिक न मानकर चिन्‍मय रूप में स्‍वीकार किया है तथा कृष्‍ण भक्‍तों की भाव साधना में भी भाव ही ‘महाभाव' में रूपान्‍तरित हो जाता है। कृष्‍ण भक्‍त कवियों के काव्‍य में भी राधा-भाव आत्‍म-शक्‍ति के अतिरिक्‍त अन्‍य नहीं है। अभी तक भक्‍ति काव्‍य को शंकराचार्य के अद्वैतवाद एवं वैष्‍णव मतवाद के आलोक में ही समझने का प्रयास होता रहा है। हमारी मान्‍यता है कि भक्‍ति काव्‍य को शांकर अद्वैतवाद के परिप्रेक्ष्‍य में मीमांसित करना उपयुक्‍त नहीं हैं।शांकर अद्वैतवाद में भक्‍ति को साधन के रूप में स्‍वीकार किया गया है, किन्‍तु उसे साध्‍य नहीं माना गया है। भक्‍तों ने भक्‍ति को साध्‍य माना है।

शांकर अद्वैतवाद में मुक्‍ति के प्रत्‍यक्ष साधन के रूप में ‘ज्ञान' को ग्रहण किया गया है। वहाँ मुक्‍ति के लिए भक्‍ति का ग्रहण अपरिहार्य नहीं है। वहाँ भक्‍ति के महत्‍व की सीमा प्रतिपादित है। वहाँ भक्‍ति का महत्‍व केवल इस दृष्‍टि से है कि वह अन्‍तःकरण के मालिन्‍य का प्रक्षालन करने में समर्थ सिद्ध होती है। भक्‍ति आत्‍म-साक्षात्‍कार नहीं करा सकती, वह केवल आत्‍म साक्षात्‍कार के लिए उचित भूमिका का निर्माण कर सकती है। भक्‍तों ने अपना चरम लक्ष्‍य भगवद्‌-दर्शन /प्रेम भक्‍ति माना है तथा भक्‍ति के ग्रहण को अपरिहार्य रूप में स्‍वीकार किया है। भक्‍तों की दृष्‍टि में भक्‍ति केवल अन्‍तःकरण के मालिन्‍य का प्रक्षालन करने वाली ‘वृत्‍ति' न होकर ‘आत्‍म शक्‍ति' ही है।

शांकर अद्वैतवाद में अद्वैत-ज्ञान की उपलब्‍धि के अनन्‍तर ‘भक्‍ति' की सत्‍ता अनावश्‍यक ही नहीं अपितु असम्‍भव है। भक्‍तों में अद्वैतज्ञान के बाद भी ‘ज्ञानोत्‍तरा भक्‍ति' की स्‍थिति है। इसका कारण हम बता चुके है कि भक्‍ति काल के साहित्‍य की रस-साधना में जो भक्‍ति है वह तत्‍वतः आत्‍मस्‍वरूपा शक्‍ति ही है। अंत में, मैं इस सम्‍बन्‍ध में यह भी निवेदन करना चाहता हूँ कि श्री कृष्‍ण के इन लीला प्रसंगों को इतिहास के प्रतिमानों के आधार पर नहीं परखा जा सकता। यह इतिहास का नहीं अपितु भक्‍ति का विषय है। इसी के साथ मैं यह भी जोर देकर कहना चाहता हूँ कि इसे मानवीय प्रेम की दृष्‍टि से भी जाँचा जा सकता है।

रसिक शिरोमणि गोपाल कृष्‍ण की लीलाओं से प्रेमासक्‍त भक्‍तों को जहाँ सहज परमानन्‍द प्राप्‍त होता है वहीं सहृदय पाठक को इनके पारायण से उमंग एवं उल्‍लास की प्रतीति होती है। श्री कृष्‍ण के इन लीला प्रसंगों में मानवीय प्रेम भी अपने सहज रूप में अभिव्‍यक्‍त है - इस बोध के साथ कि प्रेम में पुरुष और नारी के बीच विभाजक रेखायें खींचना अतार्किक एवं बेमानी हैं। इसी भारत में श्री कृष्‍ण के इन लीला प्रसंगों की काव्‍य रचना के पूर्व मिथुन युग्‍मों का शिल्‍पांकन न केवल खजुराहो अपितु कोणार्क, भुवनेश्‍वर एवं पुरी आदि अनेक देव मन्‍दिरों में हो चुका था। दाम्‍पत्‍य जीवन की युगल रूप में मैथुनी लौकिक चेष्‍टाओं एवं भावाद्रेकों को शरीर के सहज एवं अनिवार्य धर्म के रूप में स्‍वीकृति एवं मान्‍यता प्राप्‍त हो चुकी थी।

भारतीय तंत्र साधना की चरम परिणति एवं उत्‍कर्ष के काल में साधक सम्‍पूर्ण सृष्‍टि की आनन्‍दमयी विश्‍व वासना से प्रेरित, संवेदित एवं उल्‍लसित रूप में प्रतीति एवं अनुभूति कर चुका था । यह वह काल था जिसमें ‘ काम ' को हेय दृष्‍टि से नहीं देखा जाता था अपितु इसे जीवन के लिए उपादेय एवं श्रेयस्‍कर माना जाता था। समर्पण भाव से अभिभूत एकीभूत आलिंगन के फलीभूत पृथकता के द्वैत भाव को मेटकर तन - मन की एकचित्‍तता, मग्‍नता एवं एकात्‍मता में अस्‍तित्‍व के हेतु भोग से प्राप्‍त ‘ कामानन्‍द ' की स्‍थितियों को पाषाण खंडों में उत्‍कीर्ण करने वाले नर - नारी युग्‍मों के कलात्‍मक शिल्‍प वैभव को चरम मानसिक आनन्‍द प्राप्‍त करने का हेतु माना गया था। इस काल में इसी कारण इन्‍द्रिय दमन, ब्रह्मचर्य, नारी के प्रति तिरस्‍कार की भावना आदि बातें करना बेमानी थीं।

इस पृष्‍ठभूमि में श्री कृष्‍ण के लीला प्रसंगों को समझने का प्रयास होना चाहिए। इन लीलाओं का जीवन दर्शन यह है कि जीवन जीने के लिए है, पलायन करने के लिए नहीं है। वैराग्‍य भावना से जंगल में जाकर तपस्‍या तो की जा सकती है किन्‍तु उत्‍साह, उछाह, उमंग, उल्‍लास, कर्मण्‍यता, जीवंतता, प्रेरणा, रागात्‍मकता एवं सक्रियता के साथ गृहस्‍थ जीवन नहीं जिया जा सकता। गार्हस्‍थ जीवन का विधान है जिसमें पुरुष एवं स्‍त्री के बीच प्रजनन के उद्‌देश्‍य से मर्यादित काम का प्रेम में पर्यवसान होता है।
प्रेम प्रसंगों के गति पथ की सीमा शरीर पर आकर रुक नहीं जाती, शरीर के धरातल पर ही निःशेष नहीं हो जाती अपितु प्रेममूलक एर्न्‍द्रिय संवेगों की भावों में परिणति और भावों का विचारों में पर्यवसान तथा विचारों एवं प्रत्‍ययों का पुनः भावों एवं संवेगों में रूपान्‍तरण - यह चक्र चलता रहता है। काम ऐन्‍द्रिय सीमाओं से ऊपर उठकर अतीन्‍द्रिय उन्‍नयन की ओर उन्‍मुख होता है। प्रेम शरीर में जन्‍म लेता है लेकिन वह ऊर्ध्‍व गति धारण कर प्रेमी प्रेमिका के मन के आकाश की ओर उड्‌डीयमान होता है। इस पृष्‍ठभूमि में जब हम श्रीमद्‌भागवत तथा इससे अनुप्राणित परवर्ती कृष्‍ण काव्‍य का अनुशीलन करते हैं तो पाते हैं कि यह ऐसी जीवन धारा है जिसमें मानवीय प्रेम अपनी सम्‍पूर्णता में बिना किसी लाग लपेट के सहज भाव से अवगाहन करता है। प्रेम की इस सहज राग साधना में गृहस्‍थ जीवन एवं सांसारिक जीवन पूरे उल्‍लास के प्रमुदित होता है।
प्रोफेसर महावीर सरन जैन, सेवानिवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान,
123- हरिएन्‍कलेव, चांदपुर रोड, बुलन्‍दशहर

बुधवार, 5 अगस्त 2009

गीता में भी है रक्षाबंधन का जिक्र

रक्षाबन्धन भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख त्यौहार है जो कि श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिए भाई को राखी बाँधती है। भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। पहले रक्षा बन्धन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’- अर्थात ‘सूत्र’ अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। गीता में ही लिखा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योर्तिलिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं।

राखी का सर्वप्रथम उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है जिसके अनुसार असुरों के हाथ देवताओं की पराजय पश्चात अपनी रक्षा के निमित्त सभी देवता इंद्र के नेतृत्व में गुरू वृहस्पति के पास पहुँचे तो इन्द्र ने दुखी होकर कहा- ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुनकर गुरू वृहस्पति के दिशा-निर्देश पर रक्षा-विधान हेतु इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित समस्त देवताओं की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और अंततः इंद्र ने युद्ध में विजय पाई। एक अन्य कथानुसार राजा बालि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बालि के राज्य की रक्षा के लिये चले गये । तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बालि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो बालि ने देवी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बालि ने भगवान इन्द्र से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की। त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुँची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बाँध दिया और कहा कि- ‘‘भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटनेवालों से तुम बदला ले सकोगे।’’ इसी प्रकार महाभारत काल में भगवान कृष्ण के हाथ में एक बार चोट लगने व फिर खून की धारा फूट पड़ने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी कंचुकी का किनारा फाड़कर भगवान कृष्ण के घाव पर बाँध दिया। कालांतर में दुःशासन द्वारा द्रौपदी-हरण के प्रयास को विफल कर उन्होंने इस रक्षा-सूत्र की लाज बचायी। द्वापर युग में ही एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘‘राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा।’’
साभार: कृष्ण कुमार यादव द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री पर आधारित

मंगलवार, 16 जून 2009

गीता के तत्व-चिंतन का अमृत पिलाती ‘मानस गीता‘

श्रीमद्भगवद्गीता मानव धर्म का उद्घोषक आर्ष ग्रन्थ है। इसने भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य देशों के लोगों को भी प्रभावित किया है। इसी से कहा गया है कि-‘‘गीता सुगीता कर्तव्या, किमन्यत्शास्त्र विस्तरैः।‘‘ महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता देववाणी संस्कृत के विशालतम महाकाव्य ‘महाभारत‘ के अन्तर्गत आता है। कुरूक्षेत्र के कौरव-पाण्डव युद्ध में अर्जुन के विषाद एवं संशयग्रस्त मानस को योगश्वर श्रीकृष्ण ने दिव्य चक्षु प्रदान कर कर्तव्य-पालन के लिए प्रेरित किया है। प्रस्तुत प्रसंग महाभारत के भीष्मपर्व में अध्याय 23 से 40 तक व्याख्यायित है। गीता का कृष्ण-अर्जुन संवाद 710 श्लोकों में वर्णित तथा 18 अध्यायों में विभक्त है। वस्तुतः श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान-भक्ति-कर्म का समन्वित स्वरूप प्रस्तुत करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान आज भी मानवीय मूल्यों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि इसे अपनाने वालों की संख्या दिनां-ब-दिन बढ़ती जा रही है। तमाम विद्वानों ने गीता के सारतत्व को सामान्य भाषा में पहुँचाने हेतु अथक प्रयत्न किये हैं। इसी कड़ी में बंशलाल यादव ‘यदुवंशलाल‘ ने श्रीमद्भगवद्गीता का सरल-सुबोध-मानस शैली में भावानुवाद ‘‘मानस गीता‘‘ पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार कर्म, विकर्म और अकर्म की स्थिति में पहुँचा हुआ स्थितप्रज्ञ ही इस भौतिक जगत में निरपेक्ष ज्ञान का सुखदानुभव करता हुआ तटस्थ भाव से जीवन यापन करता है, उसी प्रकार यदुवंशलाल ने गीता की महिमा को न सिर्फ समझा बल्कि उसका सम्यक अनुशीलन करके मसनवी शैली (दोहा, चैपाई, छन्द) में लिखकर सर्वसाधारण के लिए सरल-सरस एवं गेय बनाया है। गीता में व्यक्त मानव जीवन की सनातन समस्याओं का जिस सहज एवं सरल रूप में समाधान प्रस्तुत किया गया है उसे सरल ग्रामीण अवधी में प्रस्तुत कर यदुवंशलाल ने और भी रोचक एवं जन-जन के करीब ला दिया। यह अनुवाद शाब्दिक होने के साथ ही मूल के अति निकट रखा गया है। 88 पृष्ठों की पुस्तक ‘मानस गीता‘ रचनाकार के 5 साल के श्रम का परिणाम है। यदुवंशलाल अपने समर्पण में स्वीकारते हैं-‘‘स्वप्रेरणा एवं उस अलौकिक शक्ति की अनुकम्पा से श्रीमद्भगवद्गीता जैसे अमृतोपम ग्रन्थ का भाव काव्य के माध्यम से इस पुस्तक में संप्रेषित करने का टिटिहिरी प्रयास किया है।

वागीश शास्त्री के आशीर्वचन, उपेन्द्र कुमार गंगवार की अनुशंसा, गदाधर प्रसाद विद्यार्थी के आमुख, डा0 शंकरनाथ शुक्ल के ग्रन्थ-परिचय एवं डा0 अखिलेश के पुरोवाक् ने पुस्तक को पे्ररणास्पद व सारगर्भित बना दिया है। राजकुमार अवस्थी ने बड़े मनोयोग से पुस्तक की प्रस्तुति में दो शब्द लिखकर पाठकों के मानस को भक्ति संगीत से झंकृत करने की ओर प्रवृत्त किया है। यदुवंशलाल कृत ‘‘मानस गीता‘‘ के आवरण पृष्ठ पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देने का खूबसूरत चित्र अंकित है, जो इसे आकर्षक बनाता है। गणेश शंकर विद्यार्थी की जन्मभूमि रहे नर्वल में अवस्थित डायट के प्रवक्ता एवं पुस्तक के लेखक वंशलाल यादव का पद्य रूप में प्रस्तुत परिचय उनकी अनंत प्रतिभा को प्रस्फुटित करता है। पुस्तक के अन्त में प्रस्तुत गीता तत्व एवं आरती उसे जनमानस के और करीब लाते हैं। निश्चिततः इस पुस्तक में प्रस्तुत भावानुवाद विद्वतजनों की ही नहीं बल्कि जन मानस की सहज जिज्ञासा की मनः शान्ति करेगा एवं ग्रामीण अंचल के लोगों को भी गीता के मर्म से परिचित करा सकेगा व उनमें भक्ति भावनाओं का संचार करने में सहायक सिद्ध होगा। गीता के तत्व-चिंतन का अमृत पिलाती ‘मानस गीता‘ रूपी लोक कल्याणकारी कार्य के लिए बंशलाल यादव 'यदुवंशलाल' साधुवाद के पात्र हैं।
पुस्तक-मानस गीता रचनाकार-बंशलाल यादव 'यदुवंशलाल'
प्रकाशक-अशोक प्रकाशन, किदवई नगर, कानपुर
प्रथम संस्करण- 1998, पृष्ठ- 88 मूल्य- 35 रूपये

शुक्रवार, 1 मई 2009

अब 24 कैरेट सोने में भगवदगीता

भगवदगीता भला किसे नहीं प्रिय होगी। कारपोरेट संस्कृति के इस दौर से भगवदगीता भी अछूती नहीं रही। प्रसिद्ध ज्वैलरी कम्पनी तनिष्क ने 24 कैरेट खरे सोने से निर्मित 1 वर्ग से0मी0 आकार के पेंडेंट में गीता के 18 अध्याय समेटने का करिश्मा कर दिखाया है। तनिष्क द्वारा प्रस्तुत इस पेंडेट में गीता के उपदेशों को 20 गुना माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है और उन्हें पढ़ने के लिए 200 गुना माइक्रोप की जरूरत होगी। नैनो तकनीक से तैयार यह पेंडेट 6 अलग डिजाइनों में उपलब्ध होगा। ....तो यदि आपको भगवदगीता में आस्था है एवं आपकी पाकेट अनुमति देती है तो निःसंकोच आप 24 कैरेट खरे सोने से निर्मित पेंडेट में इसे साथ लेकर चल सकते हैं।

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

अमेरिका के सेटन हाल विश्वविद्यालय में गीता का ज्ञान अनिवार्य

महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना कर्म करने का उपदेश दिया, जो कि भगवद्गीता में वर्णित है। आज भारत की शिक्षा पद्धति में भले ही वैदिक पाठयक्रम का विरोध होता हो, लेकिन अमेरिका के सेटन हाॅल विश्वविद्यालय में सभी छात्रों के लिए गीता का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया है। न्यूजर्सी में 1856 में स्थापित स्वायत्त कैथोलिक सेटन हाॅल विश्वविद्यालय में अनिवार्य पाठयक्रम के तहत गीता के अध्ययन को शामिल करने का फैसला किया गया है। निःसन्देह यह अपनी तरह का दुनिया में पहला निर्णय है। उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के 10,800 छात्रों में से एक-तिहाई से ज्यादा गैर-ईसाई हैं और इनमें भारतीय छात्रों की संख्या भी प्रभावी है। इस विश्वविद्यालय में कोर कोर्स के तहत सभी छात्रों के लिए अनिवार्य पाठयक्रम होता है, जिसका अध्ययन सभी विषयों के छात्रों को करना होता है। वर्ष 2001 में विश्वविद्यालय ने विश्व में अपनी अलग पहचान कायम करने के लिए कोर कोर्स की शुरूआत की थी। इसमें छात्रों को सामाजिक जीवन से जुड़े सरोकारों और दायित्वबोध से अवगत कराया जाता है, जिससे युवा वर्ग को सामाजिक व्यवस्था से सीधे तौर पर जोड़ा जा सके। विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार इस मामले में गीता का ज्ञान सर्वोत्तम साधन है और इसकी महत्ता को समझते हुए विश्वविद्यालय ने सभी छात्रों के लिए इस ग्रंथ का अध्ययन अनिवार्य करने का फैसला किया।........ तो योग के बाद अब ज्ञान-कर्म-भक्ति की त्रिवेणी ‘गीता‘ में अमेरिकी भी डुबकी लगायेंगे और जिस दौर में उनकी अर्थव्यवस्था भहरा रही हो, गीता का ज्ञान उन्हें कर्म की तरफ आकृष्ट करेगा। आखिर यूँ ही भारत को जगदगुरु नहीं कहा जाता।