रविवार, 27 अगस्त 2017
नन्ही ब्लॉगर अक्षिता यादव (पाखी) की पेंटिंग
मंगलवार, 13 नवंबर 2012
अरुण कुमार यादव बने 'डूडल फार गूगल' कांटेस्ट के विजेता
इस साल के कंपीटीशन का थीम एकता में अनेकता था जिसमें दो लाख के करीब एंट्रीज मिली थी। कंपनी ने गुगल लोगो पर 5 से 16 साल के बच्चों को डुडलिंग के जरिए अपनी सृजन क्षमता दिखाने के लिए आमंत्रित किया था। प्रतियोगिता को तीन अलग -अलग कैटेगरीज में बांटा गया था। पहली कैटेगरी पहली से तीसरी क्लास , दूसरी में चौथी से छठी क्लास के और तीसरी कैटेगरी में 7वीं से 10वीं कक्षा के बच्चों को शामिल किया गया था। यादव के अलावा पहली से तीसरी क्लास की कैटेगरी में श्री अरबिंदो स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन की सौभाग्य कालिया शामिल है। जबकि गुडग़ांव की अदिति तिवारी को चौथी से छठी क्लास वाली कैटेगरी में अंतिम तेरह में शामिल किया गया है। 'यदुकुल' की तरफ से अरुण कुमार यादव को हार्दिक बधाइयाँ !!
More than 100 million people across India will have a look at his doodle on the search engine's homepage on Children's Day (November 14)
-Ram Shiv Murti Yadav @ www.yadukul.blogspot.com
रविवार, 25 मार्च 2012
नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) यादव को जन्मदिन पर बधाई
तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार !!
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नाम-अक्षिता (पाखी)
जन्म- 25 मार्च, 2007 (कानपुर)
मूल निवास - तहबरपुर, आजमगढ़ (यू.पी.)
मम्मी-पापा - श्रीमती आकांक्षा – श्री कृष्ण कुमार यादव
अध्ययनरत - के. जी.-II,
रुचियाँ- ड्राइंग, डांसिंग, प्लेयिंग.
प्रकाशन- इंटरनेट पर ब्लागोत्सव-2010, बाल-दुनिया, नन्हा-मन, सरस पायस, ताऊजी डाट काम, युवा-मन इत्यादि एवं चकमक, टाबर टोली, अनंता, सांवली इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में ड्राइंग/रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रकाशन.
प्रसारण- आकाशवाणी पोर्टब्लेयर से ‘बाल-जगत’ कार्यक्रम में प्रसारण.
ब्लॉग :‘पाखी की दुनिया’ का 24 जून, 2009 को आरंभ. इसमें अक्षिता (पाखी) की ड्राइंग, क्रिएटिविटी, फोटो, परिवार और स्कूल की बातें, घूमना-फिरना, बाल-गीत सहित बहुत कुछ शामिल है. 82 से ज्यादा देशों में अब तक देखे/पढ़े जाने वाली ‘पाखी की दुनिया’ का 200 से ज्यादा लोग अनुसरण करते हैं. 235 से ज्यादा प्रविष्टियों से सुसज्जित इस ब्लॉग को 36,500 से ज्यादा लोगों ने पढ़ा/देखा है. दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के अनुसार-‘अक्षिता की उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लागिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता का ब्लाग बेहद पापुलर है और फिलहाल हिन्दी के टाॅप 100 ब्लॉगों में से एक है।'
विशेष -राजस्थान के वरिष्ठ बाल-साहित्यकार दीन दयाल शर्मा द्वारा अपनी पुस्तक ‘चूं-चूं’ के कवर-पेज पर अक्षिता (पाखी) की फोटो का अंकन. दीन दयाल शर्मा, रावेन्द्र कुमार ‘रवि’, डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, एस. आर. भारती, डा. दुर्गाचरण मिश्र, द्वारा अक्षिता (पाखी) पर केन्द्रित बाल-गीतों/कविता की रचना.
सम्मान- ब्लागोत्सव -2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर “वर्ष की श्रेष्ठ नन्ही ब्लागर ” के रूप में सम्मानित. हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित अन्तराष्ट्रीय ब्लाॅगर्स सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लाॅगर हेतु उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डा0 रमेश पोखरियाल ”निशंक” द्वारा ”हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” अवार्ड.
बाल दिवस, 14 नवम्बर, 2011 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में महिला और बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा राष्ट्रीय बाल पुरस्कार-2011 से पुरस्कृत किया. अक्षिता इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभा है. यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया.
पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा-दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, शुक्रवार, टाबर टोली, नेशनल एक्सप्रेस, नवोदित स्वर, बाल साहित्य समीक्षा, बुलंद इण्डिया, शुभ्र ज्योत्स्ना, सांवली, सत्य चक्र, इसमासो, हिंद क्रांति, दि मारल, अयोध्या संवाद, अंडमान-निकोबार द्वीप समाचार, The Indian Express, The Echo of India, The Daily Telegrams, Andaman Sheekha, Andaman Express, Aspect इत्यादि तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अक्षिता और ब्लॉग ‘पाखी की दुनिया’ की चर्चा.
अंतर्जाल पर चर्चा- हिंदी मीडिया.इन, स्वतंत्र आवाज़.काम, परिकल्पना, स्वर्गविभा, क्रिएटिव मंच-Creative Manch, बचपन, सरस पायस, बाल-दुनिया, बचपन, शब्द-साहित्य, रैन बसेरा, यदुकुल, Journalist Today, Akhtar Khan Akela इत्यादि तमाम वेब-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर चर्चा.
संपर्क - पुत्री- श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद-211001
ई-मेल- akshita_06@rediffmail.com
ब्लॉग- http://www.pakhi-akshita.blogspot.com/ (पाखी की दुनिया)
गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
बिरहा से मोह रहे मन : डाॅ0 मन्नू यादव
सबसे बड़ी बाधा : ईर्ष्या करने वाले लोग हैं जो दूसरों को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते।
सबसे बड़ी ताकतः खुद पर भरोसा रखना, जिससे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है.
जिंदगी का सबसे अहम क्षणः सन् 1857 की क्रांति के 150 वर्ष पूरे होने पर लालकिले से जब राष्ट्रपति की उपस्थिति में उन्होने बिरहा गायन किया.
गुरुवार, 28 मई 2009
जीवन और कला का सामंजस्य बिठाते डा0 लाल रत्नाकर
पेंटिंग के क्षेत्र में डा0 लाल रत्नाकर का नाम जाना-पहचाना है 12 अगस्त 1957 को जौनपुर (उ0प्र0) में जन्में डा0 रत्नाकर ने 1978 में कानपुर विश्वविद्यालय से ड्राइंग और पेण्टिंग में परास्नातक उपाधि प्राप्त की और तत्पश्चात 1985 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से ‘"पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक कला"
विषय पर पी0एच0डी0 पूरा किया। देश के लगभग हर प्रमुख शहर में अपनी पेण्टिंग-प्रदर्शनी लगाकर शोहरत हासिल करने वाले डा0 रत्नाकर प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'हंस' के लिए भी रेखांकन का कार्य करते हैं। जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण व्यापक है। सामाजिक-साहित्यिक आयोजनों में भी आप बेहद सक्रियता के साथ भाग लेते हैं। फिलहाल आप एम0एम0एच0 (पी0जी0) कालेज, गाजियाबाद में ड्राइंग और पेण्टिंग (फाइन आर्ट) विभाग में रीडर हैं।बचपन में कला दीर्घाओं के नाम पर पत्थर के कोल्हू की दीवारें, असवारी और मटके के चित्र, मिसिराइन के भित्ति चित्र डा0 रत्नाकर को आकर्षित ही नहीं, सृजन के लिए प्रेरित भी करते थे। गांव की लिपी-पुती दीवारों पर गेरू या कोयले के टुकड़े से कुछ आकार देकर आपको जो आनंद मिलता था, वह सुख कैनवास पर काम करने से कहीं ज्यादा था। स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ रेखाएं ज्यादा सकून देती रहीं और यहीं से निकली कलात्मक अनुभूति की अभिव्यक्ति, जो अक्षरों से ज्यादा सहज प्रतीत होने लगी. एक तरफ विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की जटिलता वहीं दूसरी ओर चित्रकारी की सरलता, ऐसे में डा0 रत्नाकर द्वारा सहज था चित्रकला का वरण.
ग्रे
जुएशन के लिए आपने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और गोरखपुर विश्वविद्यालय में आवेदन दिया और दोनों जगह चयन भी हो गया. अंतत: गोरखपुर विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग में प्रवेश लिया और यहीं मिले आपको कलागुरू श्री जितेन्द्र कुमार. कला को जानने-समझने की शुरुवात यहीं से हुई। फिर कानपुर से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कलाकुल पद्मश्री राय कृष्ण दास का सानिध्य, श्री आनन्द कृष्ण जी के निर्देशन में पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक कला पर शोध, फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में कला प्रदर्शनियों का आयोजन... कला के विद्यार्थी के रुप में आपकी यह यात्रा आज भी जारी है। बतौर डा0 रत्नाकर-‘‘कला के विविध अछूते विषयों को जानने और उन पर काम करने की जो उर्जा मेरे अंदर बनी और बची हुई है, उनमें वह सब शामिल है, जिन्हें अपने बचपन में देखते हुए मैं इस संसार में दाखिल हुआ.''डा0 रत्नाकर स्त्री सशक्तीकरण के बहुत बड़े हिमायती हैं। यही कारण है कि आपने स्त्रियों पर काफी काम किया है। आपकी पूरी एक श्रृंखला आधी दुनिया स्त्रियों पर केंद्रित है, पर ये स्त्रियां भद्र लो
क की नहीं हैं, बल्कि खेतों खलिहानों में अपने पुरूषों के साथ काम करने वाली स्त्रियां हैं. ऐसा डा0 रत्नाकर की ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण है पर इसका मतलब यह नहीं है कि वे किसी दूसरे विषय का वरण अपनी सृजन प्रक्रिया के लिये नहीं कर सकते थे, पर उनके ग्रामीण परिवेश ने उन्हें पकड़े रखा. समकालीन दुनिया में हो रहे बदलावों के प्रति भी डा0 रत्नाकर की तूलिका संजीदा है। उनका मानना है कि- "समकालीन दुनिया के बदलते परिवेश के चलते आज बाजार वह सामग्री परोस रहा है, जो उस क्षेत्र तो क्या उस पूरे परिवेश तक की वस्तु नही है. इसका मतलब यह नही हुआ कि मैं विकास का विरोधी हूं लेकिन जिन प्रतीकों से मेरा रचना संसार समृध्द होता है, उसमें यह बाज़ार आमूल चूल परिवर्तन करके एक अलग दुनिया रचेगा जिसमें उस परिवेश विशेष की निजता के लोप होने का खतरा नजर आता है."जीवन का अनुभव संसार डा0 रत्नाकर के लिए, कला के अनुभव संसार का उत्स है. उनकी मानें तो-"अंतत: हरेक रचना के मूल में जीवन संसार ही तो है. जीवन के जिस पहलू को मैं अपनी कला में पिरोने का प्रयास करता हूँ, दरअसल वही संसार मेरी कला में उपस्थित रहता है. कला की रचना प्रक्रिया की अपनी सुविधाएं और असुविधाएं हैं, जिससे जीवन और कला का सामंजस्य बैठाने के प्रयास में गतिरोध आवश्यक हिस्सा बनता रहता है. यदि यह कहें कि लोक और उन्नत समाज में कला दृष्टि की भिन्न धारा है तो मुझे लगता है, मेरी कला उनके मध्य सेतु का काम कर सकती है."
( डा0 लाल रत्नाकर के बारे में विस्तृत जानकारी हेतु उनकी वेबसाइट पर जायें- http://www.ratnakarsart.com/)
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
सुबाचन यादव के शीर्षकहीन चित्र
श्याम-श्वेत रंग के ही इस्तेमाल पर वह कहते हैं-’सफेद रंग सादगी का प्रतीक है और काले रंग में सभी को अपने भीतर समाहित करने की ताकत है और यह भी सच है कि दोनों का एक दूसरे के बगैर अस्तित्व ही नहीं है।‘ इनके समायोजन से जो कला उभरती है वह गंभीर बहस की माँग करती है। सुबाचन आगे कहते हैं-’बेशक दो रंगों में काम करना कटिन है, और टैक्सचर में यह कठिनाई बढ़ जाती है, लेकिन काम आनंद भाव से किया जाय तो फिर आसान जान पड़ता है, यही वहज है कि सुबाचन के काम में एक ठहराव भी दिखाई पड़ता है। अपने चित्रों को सुबाचन कोई शीर्षक नहीं देते। वह कहते है-’शब्द में इतनी ताकत नहीं है कि वह किसी पेंटिंग को संपूर्णता में आंक सके। वैसे भी एक ही पेंटिग से हर व्यक्ति अपने-अपने अर्थ ग्रहण करता है। फिर कैसे किसी कृति को शीर्षक दिया जा सकता है? कलाकार-कवि अपनी सुविधा के लिए कृति को शाीर्षक दे सकता है, अन्यथा शीर्षक का कोई अर्थ नहीं है। वह शीर्षकहीनता को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का नाम देते हैं। सुबाचन स्वीकारते हैं कि पेटिंग प्रारम्भ करते समय कोई विशेष आकार दिमाग नहीं होता, जैसे-जैसे रंगों का समायोजन होना शुरू होता है, आकार उभरने लगते हैं। कभी-कभी तो ऐसे आकार सामने आते हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं करते। ऐसे आकारों में हर कोई सामंजस्य नहीं बैठा सकता। सुबाचन मानते हैं कि जो कलाकार सच्चाई के करीब होगा, उसका काम स्वतः ऐसा होना शुरू हो जाता है। अध्यात्मिकता शायद इसका चरम बिन्दु है। (साभारः आजकल,मार्च 2009 में कलानिधि द्वारा प्रस्तुत)

