गुरुवार, 20 नवंबर 2014
इंदिरा मैराथन प्राइजमनी दौड़ में लालजी यादव बने विजेता
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014
सुर्खियों में क्रिकेटर कुलदीप यादव
उसे देखकर शेन वार्न का धोखा हो जाता है। दोनों का बॉलिंग एक्शन एक ही जैसा है। बस वार्न दाएं हाथ से लेग स्पिन करते हैं और कुलदीप यादव बाएं हाथ से चाइनामैन। वार्न उसके गुरु रहे हैं। अठारह साल के कुलदीप यादव की बॉलिंग के चर्चे क्रिकेट की दुनिया में होने लगे हैं।शारजाह में चल रहे अंडर-19 एशिया कप में भी वे खेल रहे हैं। अभी तक युवाओं के 18 वनडे इंटरनेशनल मैचों में उसने 34 विकेट लिए हैं। श्रीलंका अंडर-19 के खिलाफ दो टेस्ट मैचों में 14 विकेट और घरेलू क्रिकेट के इस सीजन में उत्तर प्रदेश की युवा टीम से खेलते हुए 6 मैचों में 53 विकेट।
हाल की आईपीएल नीलामी में कोलकाता नाइटराइडर्स ने उसकी बोली 40 लाख रुपए लगाई। पिछले सीजन में मुंबई इंडियंस ने रिजर्व खिलाडिय़ों में रखा था। लेकिन नेट प्रैक्टिस में उसकी गेंदों के सामने सचिन तेंदुलकर भी चकरा गए थे।
1960 में हैदराबाद से खेलने वाले मुमताज हुसैन देश के पहले चाइनामैन गेंदबाज थे। लेकिन वे केवल फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेले और दो साल बाद वे परंपरागत तरीके से बॉलिंग करने लगे। उसके बाद से कुलदीप पहले चाइनामैन हैं। हाल के सालों में दक्षिण अफ्रीका का पॉल एडम, ऑस्ट्रेलिया के ब्रैड हॉग और साइमन कैटिच ही चाइनामैन बॉलर्स हुए हैं। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के माइकल बीवन और वेस्ट इंडीज़ के गैरी सोबर्स भी चाइनामैन बॉलिंग ही करते थे।
क्या है चाइनामैन
जिस एक्शन से दाएं हाथ के गेंदबाज लेगस्पिन करते हैं उसी एक्शन से अगर बाएं हाथ का बॉलर करता है तो उसे चाइनामैन कहते हैं। इस तरह के पहले बॉलर वेस्ट इंडीज के एलिस एचांग थे जो दरअसल चीनी मूल के थे। इसीलिए इस बॉल को चाइनामैन डिलीवरी कहा गया।
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अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ‘चाइनामैन’ गेंदबाज यदा कदा ही नजर आते हैं तो ऐसे में भारतीय स्पिन गेंदबाजी की नयी सनसनी कानपुर के कुलदीप यादव ने इस अनूठी कला से पूरी दुनिया का ध्यान बरबस अपनी तरफ खींच लिया है। क्रिकेट में आफ स्पिनर, लेग स्पिनर और लेफट आर्म स्पिनर तो तमाम देशों में खेलते नजर आते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि इतिहास में नजर डाली जाये तो मुश्किल से आठ दस चाइनामैन गेंदबाज ही याद आ पायेंगे।
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014
भारत का पहला चाइनामैन गेंदबाज : कुलदीप यादव
मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013
Social message on bicycle without seat : Hiralal Yadav
सोमवार, 19 नवंबर 2012
इंदिरा मैराथन में अरविन्द यादव की हैट्रिक
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
निशा और रचना यादव ने एथलेटिक्स में बनाये नए रिकार्ड
'यदुकुल' की तरफ से भी दोनों बहनों को हार्दिक बधाइयाँ।
- राम शिव मूर्ति यादव, संयोजक- यदुकुल ब्लॉग (www.yadukul.blogspot.com)
सोमवार, 30 जुलाई 2012
यदुवंशी सुशील कुमार ने ध्वज वाहक बनकर किया लंदन ओलम्पिक-2012 में भारतीय दल का नेतृतव
भारतीय ओलम्पिक संघ द्वारा पहलवान सुशील कुमार को लंदन ओलम्पिक खेलों में भारतीय दल का ध्वज वाहक नियुक्त किया गया, जिसके क्रम में उन्होंने उद्घाटन समारोह में बखूबी अपनी भूमिका का निर्वाह किया. गौरतलब है कि यदुवंश से सम्बन्ध रखने वाले सुशील कुमार ने विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप 2010 में 66 किलो भारवर्ग की फ्रीस्टाइल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक तथा वर्ष 2008 में बीजिंग ओलम्पिक में पुरुष के 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था. यह बीजिंग ओलम्पिक में भारत का तीसरा पदक था. पहला पदक निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा ने 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में जीता जो कि ओलम्पिक इतिहास में भारत का पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक था. दूसरा विजेन्द्र कुमार ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीता. अपनी इन्हीं सब उपलब्धियों के चलते जुलाई 2009 में सुशील कुमार सोलंकी को भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरुस्कार प्रदान किया गया. यह भारत के लिए कुश्ती में दूसरा पदक था. इससे पहले वर्ष 1952 में हैलेसिंकी ओलम्पिक खेल में केडी जाधव (K D Jadhav) ने कांस्य पदक जीता था.--राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल
मंगलवार, 17 जनवरी 2012
रामसिंह यादव लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई
केवल तीन सेकेंड से बीजिंग ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने से चूकने वाले लंबी दूरी के धावक रामसिंह यादव लंदन ओलंपिक में जगह बनाने में सफल रहे। उन्होंने मुंबई मैराथन में एक मिनट से भी अधिक समय से ओलंपिक का बी क्वालीफाईंग स्तर हासिल किया।उत्तर प्रदेश में जन्में सेना के इस धावक ने दो घंटे 16 मिनट और 59 सेकेंड का निकाला जबकि 2102 ओलंपिक के लिए बी स्तर का क्वालीफाईंग समय दो घंटा 18 मिनट तय किया गया था। वह इस मैराथन में भारतीयों में पहले और कुल 12वें स्थान पर रहे।
रामसिंह यादव पुणे के सेना खेल संस्थान से संबद्ध हैं। उन्होंने जनवरी 2008 में दो घंटे, 18 मिनट 23 सेकेंड का समय निकाला था जबकि बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालीफाईंग समय दो घंटा, 18 मिनट और 20 सेकेंड तय किया गया था। यादव अपनी इस उपलब्धि से भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि चार साल पहले जब उन्हें संबंधित पक्षों विशेषकर भारतीय एथलेटिक महासंघ से कोई सहयोग नहीं मिला तो वे काफी आहत हुए थे।
उन्होंने कहा कि मैं 2004 से ओलंपिक में जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। जब 2008 में मुझे खास मदद नहीं मिली थी और मैं तीन सेकेंड से क्वालीफाई करने से रह गया था तो काफी आहत हुआ था। मैं अपने देश के लिए नहीं बल्कि अपने परिवार के लिए दौड़ रहा हूं।
-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल ब्लॉग
सोमवार, 31 जनवरी 2011
विश्व कप क्रिकेट 2011 के थीम गीत के गीतकार मनोज यादव
बॉलीवुड की संगीतकार जोड़ी शंकर, एहसान और लॉय ने क्रिकेट विश्व कप 2011 के लिए थीम सौंग तैयार किया. थीम सौंग के बोल ‘दे घुमा के..’ है. ‘दे घुमा के..’ के गीतकार मनोज यादव हैं. इस गीत को 1 जनवरी 2011 को लॉन्च किया गया.
राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिबली नोमानी और कैफी आजमी की धरती आजमगढ़ सदैव सुर्ख़ियों में रहती है, पर इस बार एक बेहद रचनात्मक और जोशीले वजह से। दरअसल देश में खेल से ज्यादा जुनून का दर्जा प्राप्त क्रिकेट के महाकुम्भ आईसीसी के थीम सांग लिखने का गौरव आजमगढ़ जिले के सपूत मनोज यादव को हासिल हुआ है।मनोज यादव के लिखे गीत को शंकर महादेवन ने गया है और संगीतबद्ध किया शंकर-एहसान-लाय ने। बरास्ता मनोज यादव, आजमगढ़वासी अपनी ओर अंगुली उठाने वालों को एक संदेश भी दे रहे हैं और कह रहे हैं......दे घुमा के.....!
‘दे घुमा के....आसमान में मार के डुबकी, उड़ा दे सूरज की झपकी, सर्र से चीर हवा का पर्दा बाँध ले पट्ठे जमके गर्दा.....‘ आजमगढ़ के वासी मनोज यादव के दिलो-दिमाग में जन्मा यह गीत देश को आज एक ऊर्जा, एक जोश दे रहा है। इससे आजमगढ़ की फिजां बदली-बदली सी नजर आ रही है। अब यहाँ सृजनात्मकता है, जोश है, देश की माथे की बिन्दी बनने का जज्बा है। जिले के सगड़ी तहसील के भरौली गाँव निवासी मनोज यादव की उपलब्धि पर पूरे जिले को नाज है।
बताए हैं कि मनोज यादव के पिता स्व0 हरिश्चन्द्र यादव जब मुम्बई गये थे तो उनकी आखों में तमाम सपने थे। दो पुत्रों मनोज व प्रमोद व एक पुत्री पुष्पा के पिता हरिश्चन्द्र रेमण्ड कम्पनी में सुपरवाइजर बनें। मनोज यादव ने पिता के सपनों को साकार करना सीखा और उतर गए फिल्मों-विज्ञापनों के लिए गीत व जिंगल लिखने में। गुलजार को प्रेरणा स्रोत मानने वाले मनोज की प्रतिभा को गायक शंकर महादेवन ने पहचाना और शंकर-एहसान-लाय के कहने पर ओ एण्ड एम कम्पनी ने आईसीसी वल्र्ड कप के थीम सांग को लिखने का जिम्मा सौंपा, जिसे मनोज ने बखूबी पूरा किया। गौरतलब है कि क्रिकेट विश्व कप 2011 का आयोजन भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 19 फरवरी 2011 से हो रहा है. इसलिए इस गीत को हिंदी, बांग्ला और सिंहली भाषाओं में तैयार किया गया.
'यदुकुल' की तरफ से मनोज यादव को इस सृजनात्मक उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
स्पोर्ट्स-एडवेंचर में नाम कमाते यदुवंशी
भारत के प्रथम व्यक्तिगत ओलंपिक मेडलिस्ट खाशबा दादा साहब जाधव एवं बीजिंग ओलंपिक (2008) में कुश्ती में कांस्य पदक विजेता सुशील कुमार यदुकुल की ही परम्परा के वारिस हैं। वर्ष 2010 में कुश्ती का विश्व चैंपियन खिताब अपने नाम करके सुशील कुमार ऐसा करने वाले प्रथम भारतीय पहलवान बन गए। वर्ष 2009 मंे सुशील कुमार को देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांँधी खेल रत्न से नवाजा गया तो गिरधारी लाल यादव (पाल नौकायन) को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी परंपरा में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में जहाँ सुशील कुमार ने कुश्ती में स्वर्ण पदक जीता, वहीं 74 किलोग्राम फ्री स्टाइल कुश्ती स्पर्धा में नरसिंह यादव पंचम (मूलतः चोलापुर, बनारस के, अब मुंबई में) ने भी स्वर्ण पदक जीता। गौरतलब है कि इससे पूर्व सीनियर एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में नरसिंह यादव ने देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर पूरे देश का नाम रोशन किया था। राष्ट्रमंडल खेलों की निशानेबाजी स्पर्धा में कविता यादव ने सुमा शिरूर के साथ कांस्य पदक जीतकर नाम गौरवान्वित किया। विश्व मुक्केबाजी (1994) में कांस्य पदक विजेता, ब्रिटेन में पाकेट डायनामो के नाम से मशहूर भारतीय फ्लाईवेट मुक्केबाज धर्मेन्द्र सिंह यादव ने देश में सबसे कम उम्र में ‘अर्जुन पुरस्कार’ प्राप्त कर कीर्तिमान बनाया। विकास यादव, मुक्केबाजी का चर्चित चेहरा है। आन्ध्र प्रदेश के बिलियर्डस व स्नूकर खिलाड़ी सिंहाचलम जो कि बिलियर्ड्स के अन्तर्राष्ट्रीय रेफरी भी हैं, बीजिंग ओलंपिक में निशानेबाजी के राष्ट्रीय प्रशिक्षक रहे श्याम सिंह यादव, कुश्ती में पन्ने लाल यादव, श्यामलाल यादव, गंगू यादव जैसे तमाम खिलाड़ी यादवों का नाम रोशन कर रहे हैं। बनारसी मुक्केबाज छोटेलाल यादव ने सैफ खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया। जानी-मानी पर्वतारोही संतोष यादव जिन्दगी में मुश्किलों के अनगिनत थपेड़ों की मार से भी विचलित नहीं हुईं और अपनी इस हिम्मत की बदौलत वह माउंट एवरेस्ट की दो बार चढाई करने वाली विश्व की पहली महिला बनीं। इसके अलावा वे कांगसुंग ;ज्ञंदहेीनदहद्ध की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला भी हैं। उन्हांेने पहले मई 1992 में और तत्पश्चात मई सन् 1993 में एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में सफलता प्राप्त कीे। इण्डियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश कालमाड़ी यदुवंश से ही हैं। अर्जुन पुरस्कार विजेता व महिला हाॅकी टीम की पूर्व कप्तान मधु यादव राष्ट्रीय महिला हाकी टीम की मैनेजर हैं। भारतीय भारोत्तोलन संघ के सचिव सहदेव यादव हंै।
We wholeheartedly appreciate their sincere efforts & endeavor for bringing glory to our great Country and family. Given is the list of players who won the individual Medals and was the part of winning team and who participated in the games.
1. Vikas Krishan Yadav - Gold Medal (Boxing) - 60 kg. Originally belongs to a village of Hissar district in Haryana and put up in Bhiwani. He is also the winner of Junior Olympics and a national champion. The teen sensation of Indian boxing, who has bagged several medals at this age, loves his gond ke ladoo. "He likes his food simple — roti and sabzi. But gond ke ladoo are his weakness, or call it his strength. These are prepared by mixing roasted gond and wheat flour in ghee along with dry fruits," said Darshna Devi, Vikas's mother. "I've already prepared around 10 kg ladoos for him," she added…J
2. Balraj Yadav- Silver Medal (Yachting/Sailing Match Racing) - He belongs to village Parkhotampur, District Rewari, Haryana, currently working as an officer in Indian Navy. There were two Yadavs out of this 5 members winning team.
3. Shekhar Yadav- Silver Medal (Yachting/Sailing Match Racing)- A native of village- Sanoda, District – Alwar, Rajasthan, proudly working as an officer in prestigious Indian Navy, comes from a middle class family.
4. Anup Yadav- Gold Medal- Kabbadi- A proud member of gold winning Kabbadi team, hails from same historical village (of Victoria Cross winner Rao Umrao Singh), Palra, District- Jhajjhar- Haryana. He has been an integral part of unbeatable Indian Kabbadi team.
5. Rajesh Yadav- Silver Medal (Rowing) – A key member of silver medal winning team, comes from a modest background of Village, Kanchanpur, District- Santkabir Nagar of UP.
Apart from these champions, other Yadavs were also part of playing Indian contingent. The list is as follows.
1. Kavita Yadav- The bronze medalist of shooting in CWG 2010 missed this time to win the medal. However her efforts are well appreciated.
2. Nar Singh Pancham Yadav- the Gold Medalist of wresting 75 kg. in CWG 2010, unfortunately couldn’t make it to a medal this time. His sincerity to bring glory to country is worth applauded.
3. Rao Aarti Singh- The proud daughter of former Minister (MOS) - Govt. of India and sitting MP of Gurgaon Sh. Rao Inderjeet Singh, missed to win the medal in Shooting. She has won several Medals in past for India and her eagerness to play and win for our country can be felt in her efforts.
4. Ram Singh Yadav- This man with never to say die attitude stood on 15th position in Men’s marathon. Hope he would carry on his attempts to win medals for us.
We can not neglect the contribution of those krishanvansaj’s who has helped these guys to win Medals. Here we can take out few such names.
Mr. Naresh Yadav- The coach of Silver Medal winning team has been an instrumental inspiration for the team and Mr. Balraj Yadav & Shekhar Yadav. He is also the Coach of Yachting Association of India.
Mr. Jagdish Yadav- The coach of boxing mine of India (Sports Authority of India, Bhiwani), He came into limelight when Bijender singh won the bronze in Olympics in 2008। He is the coach of Mr. Vikash Krishan Yadav,Bijender Singh, Akhil Kumar, Paramjeet Samota, Manoj Kumar etc. who have won several gold medals in CWG and various competition across the planet.
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
एशियाड में राम सिंह यादव ने दिखाया पुरुष मैराथन में जलवा
एशियाड में राजेश यादव ने झटका नौकायन में रजत
उत्तर प्रदेश में संतकबीर जिले के धनघटा थाना क्षेत्र के कंचनपुर गांव निवासी स्वर्गीय महातम यादव के पांच बेटों में राजेश कुमार यादव तीसरे नंबर का है। मांझा की माटी में पले, पढ़े राजेश यादव ने प्राथमिक विद्यालय गायघाट में प्राथमिक शिक्षा हासिल की। उसके बाद जय नारायन इंटर कालेज तिघरा मौर्य में कक्षा छह से लेकर इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की। बीए में पढ़ ही रहा था कि वर्ष २००४ में उसका चयन आर्मी में हो गया। गार्ड रेजीमेंट सेंटर नागपुर में उसकी टे्रनिंग हुई। टे्रनिंग के दौरान पूना से रोइंग की टीम आई थी, उसी में उसका चयन हो गया। २००६ में कोलकाता में स्प्रिंट नेशनल चैंपियनशिप में उसने पहली बार दो सिल्वर मेडल जीते। २००७ में ओपेन नेशनल चैंपियनशिप भोपाल में भी दो सिल्वर मेडल हासिल किया। उसी वर्ष नेशनल गेम असम में दो कांस्य पदक जीता। वर्ष ०९ में ओपेन नेशनल चैंपियनशिप पूना में एक कांस्य पदक प्राप्त किया। वर्ष ०९ में एशियन रोइंग चैंपियनशिप ताईवान में कांस्य पदक प्राप्त कर अपने दमखम और तकनीक का प्रदर्शन किया।
इस बार चीन में आयोजित १६वें एशियाड खेल में नौकायन में राजेश कुमार यादव को मौका मिला। इस स्पर्धा में छह देश क्रमश: जापान, भारत, हांगकांग, इंडोनेशिया, उत्तर कोरिया और थाईलैंड की टीमों ने हिस्सा लिया था। राजेश यादव के पिता महातम यादव चर्चित पहलवान थे। उनकी वर्ष २००५ के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बूथ पर गोली मार कर हत्या हो गई थी। राजेश के बड़े भाई जय प्रकाश ग्राम प्रधान हैं और दूसरे नंबर के भाई राकेश कुमार आर्मी में है। चौथे नंबर के भाई राम प्रवेश बीए में तथा पांचवें नंबर का भाई उमेश यादव ११वीं में पढ़ रहा है। चाचा ओंकार यादव ने बताया कि जैसे ही फोन पर सूचना आई कि राजेश ने एशियाड में नौकायन प्रतियोगिता में रजत पदक जीता है उनका सीना चौड़ा हो गया। वह जहां भतीजे की सफलता पर काफी उत्साहित थे वहीं राजेश की मां जनकराजी देवी, पत्नी सीमा खुशी का इजहार करते नहीं थक रही थीं।
राजेश यादव को इस शानदार उपलब्धि पर यदुकुल की तरफ से ढेरों बधाइयाँ !!
एशियाड खेल में पाल नौकायान में रजत पदक विजेता : शेखर यादव
एशियाड में जहाँ भारत का प्रदर्शन पहले की अपेक्षा बेहतर रहा वहीँ तमाम नए चेहरे सामने आए. इनमें तमाम यदुवंशी प्रतिभाएं भी हैं. एशियाड खेल में पाल नौकायान में रजत पदक जीतकर अलवर जिले के शेखर सिंह यादव ने यदुकुल का मान बढ़ाया है। अलवर जिले के कोटकासिम के साणौदा निवासी शेखर सिंह यादव वर्तमान में भारतीय नेवी पनडुब्बी पैटी ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। शेखर यादव, पाल नौकायान (सैली) टीम में सदस्य थे, जिसको 20 नवम्बर को सिल्वर मैडल मिला।गौरतलब है कि शेखर सिंह यादव इक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। इनके परिवार में 10 भाई-बहन हैं। इनके पिताजी मुंशीराम यादव व माताजी का नाम शांति देवी है। शेखर ने अपनी शिक्षा बीए तक अलवर के बाबू शोभाराम कला महाविद्यालय से की। करीब 20 साल की उम्र में शेखर का नेवी में चयन हो गया। 1995 में नेवी में भर्ती होने के बाद पहली बार अरावली की पहाडियों से निकल कर शेखर ने समन्दर की लहरों पर पांव रखा। नौकायन मे रूचि होने के कारण नेवी में रहते चार-पांच वर्ष तक नौकायन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद प्रोफेशनल प्रशिक्षण लिया। 2006 में नेवी के आईएनडब्ल्यू टीसी में सेलिंग क्लब में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वर्ष 2008 में चेन्नई में पहली बार नेशनल मेडल जीता। इसके बाद शेखर ने पाल नौकायन में कई और अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते। शेखर कहते हैं कि एशियाई खेलों में उन्होंने गोल्ड को फोकस किया था। मैच रेस इवेन्ट में प्रथम स्थान प्राप्त करने और टॉप फोर में आने के बाद अंत के तीन मैचों में लगातार जीत हासिल करने पर रजत पदक मिला।
इस शानदार उपलब्धि पर शेखर यादव को यदुकुल की तरफ से ढेरों बधाइयाँ !!
विकास यादव ने दिलाया एशियाई खेलों में 12 साल बाद भारत को मुक्केबाजी का स्वर्ण पदक
विकास कृष्णन यादव से एशियाई खेलों के फाइनल में करीब से हारने से भड़के चीनी मुक्केबाज क्विंग हू ने भारतीय मुक्केबाज विकास कृष्ण यादव को अच्छा अभिनेता ही करार दे दिया। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विकास कृष्णन यादव ने कहा कि इस बाउट के दौरान हू उन्हें बेल्ट के नीचे लगातार पंच मारते रहे। गत चैंपियन हू ने कहा कि मैं पहले राउंड में तीन अंक से आगे था और मुझे फाउल की सजा मिली, जो मैंने किया ही नहीं था। मैंने बेल्ट के नीचे हिट किया था, लेकिन यह इससे नीचे नहीं गया था। रेफरी ने उसे दो अंक दे दिए और इसके बाद मेरा प्रतिद्वंद्वी एक अच्छा अभिनेता बन गया। मुझे प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी ने नहीं हराया बल्कि मुझे रेफरी ने शिकस्त दी। हू ने कहा कि अंतिम राउंड में मेरा प्रतिद्वंद्वी बिलकुल फाइट नहीं कर रहा था, रेफरी को उसे चेतावनी देनी चाहिए थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। हू ने कहा, लेकिन मैं अपने प्रदर्शन से खुश हूं और मेरी नजर में मैं चैंपियन हूं। रेफरी के फैसले का विरोध करना बेकार है क्योंकि मैं अपने प्रदर्शन से खुश हूं। विकास कृष्णन यादव से जब हू के आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं मुक्केबाज हूं, अभिनेता नहीं। ....फ़िलहाल भारतीयों की जीत चीन को भला कैसे पच सकती है, सो अनर्गल प्रलाप तो वो करेंगे ही। हम तो इतना ही कहेंगे कि भारतीयों कि जीत प्रभावी है और यदुवंशी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
विकास कृष्णन यादव को इस शानदार उपलब्धि पर यदुकुल की तरफ से ढेरों बधाइयाँ !!
शुक्रवार, 28 मई 2010
महिला मुक्केबाज : सोनम यादव
महिला मुक्केबाज सोनम यादव ग्रामीण पृष्ठïभूमि से संबंध रखती हैं। 5 फीट 11 इंच लंबी मुक्केबाज सोनम यादव पाँच स्वर्ण पदक अर्जित कर चुकी है। सोनम ने सन 2006 व 2007 में हुई जूनियर राष्ट्रीय महिला मुक्केबाजी में लगातार दो बार स्वर्ण पदक जीते हैं। इसी तरह वर्ष 2008 व 2009 में आयोजित सीनियर महिला मुक्केबाजी में भी उन्होंने लगातार दो बार स्वर्ण पदक जीते हैं। इसके अलावा सोनम यादव ने फैडरेशन कप मुक्केबाजी नैनीताल में 75 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण जीता है।फ़िलहाल अपने लक्ष्य को मुकाम तक पहुंचाने के लिए सोनम यादव रोजाना जी तोड़ अभ्यास कर रही हैं। यदुकुल की तरफ से शुभकामनायें !!
रविवार, 16 मई 2010
क्रिकेट सिखाने के लिए यदुवंशी कोच
आजकल क्रिकेट की खूब धूम है। हर कोई इसमें हाथ आजमाना चाहता है। इस सम्बन्ध में गाइडेंस के लिए क्रिकेट में करियर नामक इस लेख पर जाएँ. यहीं हमको एक यदुवंशी कोच विजय यादव भी मिले. उनके बारे में भी जानें-
कोच : विजय यादव।
एक्सपीरियंस / प्रोफाइल : 1996 से क्रिकेट कोचिंग दे रहे हैं। भारत की टेस्ट और वन डे टीम में खेल चुके हैं। एनसीए से लेवल -1, 2 और 3 का कोर्स कर चुके हैं। बीसीसीआई की तरफ से विकेट कीपिंग एकेडमी का कोच नियुक्त किया गया है।
अकैडमी / क्लब : विजय यादव क्रिकेट अकैडमी.
पता : डॉ 0 कर्मवीर पब्लिक स्कूल , सेक्टर -11, फरीदाबाद.
फोन : 98117-79201, 93129-72012
गुरुवार, 13 मई 2010
नरसिंह यादव के बाद सुशील कुमार की 'स्वर्ण' कुश्ती
पेइचिंग ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता यदुवंशी पहलवान सुशील कुमार ने एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए 66 किग्रा वर्ग में पुरुषों की फ़्रीस्टाइल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता है। दिल्ली में चल रही सीनियर एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में 13 मई, 2010 को उन्होनें कोरिया के दाए सुंग को 4-0, 2-0 से हरा दिया. एक दिन पहले ही यदुवंशी नरसिंह यादव ने 74 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था.गौरतलब है कि राष्ट्रपति महोदया ने वर्ष 2009 के लिए सुशील कुमार को देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गाँधी खेल रत्न से सम्मानित किया था.बुधवार, 12 मई 2010
कुश्ती का जांबाज सितारा : नरसिंह यादव
सीनियर एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में मुंबई के पहलवान नरसिंह यादव ने देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर यदुवंश के साथ-साथ पूरे देश का नाम रोशन किया है। नरसिंह यादव ने 12 मई, 2010 को ईरान के पहलवान सईद रियाही को 74 किग्रा फ्री स्टाइल वर्ग में तकनीकी श्रेष्ठता के आधार पर हराकर स्वर्ण पदक जीता था।गौरतलब है कि ईरानी पहलवान काफी अच्छे माने जाते हैं। इस युवा पहलवान ने अपनी सफलता का श्रेय अपने मुंबई के कोच जगमाल सिंह और राष्ट्रीय कोच जगमिंदर सिंह को देते हुए कहा, एशियाई प्रतियोगिता एक बड़ी प्रतियोगिता है और इसमें स्वर्ण पदक जीतना मेरे लिए बड़ी बात है। मैं अपने इस स्वर्ण पदक को देश को समर्पित करता हूं। ईरानी प्रतिद्वंद्वी रियाही के बारे में नरसिंह ने कहा, मैंने उसके पिछले मुकाबलों में वीडियो देखे थे। उसके स्टाइल को भांपने की कोशिश की थी। नरसिंह के कोच साई सेंटर कांधीवली मुंबई के जगमाल सिंह ने अपने शिष्य की इस उपलब्धि पर कहा, जब नरसिंह 13 वर्ष का था, जब यह मेरे पास आया था। यह पिछले आठ वर्ष से मेरे पास अभ्यास कर रहा है।नरसिंह यादव एक गरीब परिवार से है। उनके पिता दूध का काम करते हैं और छोटी डेयरी चलाते हैं, लेकिन नरसिंह ने अपनी कामयाबियों से अपने परिवार की स्थिति सुधार दी है। कोच ने कहा, नरसिंह जब 13 वर्ष की उम्र में मेरे पास आया था, तभी मैंने भांप लिया था कि यह प्रतिभाशाली बच्चा है। उन्होंने स्कूली खेलों, सब जूनियर, जूनियर और जूनियर एशियाई चैम्पियनशिप में पदक जीतकर खुद को साबित कर दिया था और अब तो उन्होंने सीनियर एशियाई चैम्पियपशिप में स्वर्ण पदक जीत लिया है। जगमाल ने बताया कि नरसिंह ने इस वर्ष बेलारूस में विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में ओलंपिक कांस्य पदक विजेता को हराकर रजत जीता था। अब नरसिंह यादव को आगामी राष्ट्रमंडल तथा एशियाई खेलों में देश का नाम रोशन करना है।
नरसिंह यादव को इस गौरवमयी उपलब्धि पर यदुकुल की बधाई !!
सोमवार, 10 मई 2010
भारतीय क्रिकेट का नया चेहरा : उमेश यादव
क्रिकेट की शोहरत किसे नहीं भाती। दुनिया की छोड़िये खुद भारत में इसके इतने दीवाने हैं कि उनकी गिनती मुश्किल है. प्रतिभाशाली यदुवंशी हर क्षेत्र में अपना जौहर दिखा रहे हैं, पर क्रिकेट में इसकी कमी अक्सर खलती है. अभी तक क्रिकेट के क्षेत्र में शिवलाल यादव, ज्योति यादव और जे0 पी0 यादव के ही नाम उभरकर सामने आते है, पर शिवलाल यादव के अलावा अन्य किसी को बहुत आगे जाने का मौका नहीं मिला. पूर्व टेस्ट खिलाड़ी शिव लाल यादव के पुत्र अर्जुन यादव का चयन आई.पी.एल. थर्ड सीजन में डेक्कन चार्जस (हैदराबाद) में किया तो गया, पर उन्हें खेलने का मौका ही नहीं मिला. इसी प्रकार लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव का भी चयन आई.पी.एल. प्रथम सीजन में दिल्ली डेयर डेविल्स द्वारा किया गया था, पर उन्हें भी खेलने का मौका नहीं दिया गया था.ऐसे में उमेश यादव के रूप में एक लम्बे समय बाद भारतीय क्रिकेट टीम में किसी यदुवंशी का चयन हुआ है। बाईस वर्षीय तेज गेंदबाज उमेश यादव ने आई.पी.एल. थर्ड सीजन में दिल्ली डेयर डेविल्स की तरफ से खेलते हुए सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था. विदर्भ के तेज गेंदबाज उमेश यादव ने इसी दौरान अपनी तेज गेंदबाजी से सबको प्रभावित किया, जिसके फलस्वरूप वेस्टइंडीज में चल रही ट्वेंटी-20 विश्वकप में उन्हें प्रवीण कुमार की जगह लिया गया, जो कि जख्मी होने के कारण खेलने में संभव नहीं थे. प्रवीण के विकल्प के रूप में उमेश यादव नाम बल्लेबाज गौतम गंभीर ने सुझाया था। टीम के गेंदबाजी कोच एरिक सिमंस भी उमेश यादव कि गेंदबाजी से काफी प्रभावित थे. सबसे खास बात तो यह है कि उमेश यादव विश्व कप के लिए 30 प्रस्तावित खिलाडि़यों में से नहीं हैं। उन्हें तकनीकी सलाहकार समिति की सिफारिश पर भेजा जा रहा है।
उमेश यादव की कामयाबी की भी अपनी दिलचस्प दास्ताँ है। कल तक वह नागपुर (महाराष्ट्र )के नजदीक खापरखेड़ा की कोयला खदान के मजदूर का साधारण बेटा था। चार साल पहले वह अपने गाँव से नागपुर क्रिकेट मैच खेलने, 25 किमी की दूरी ट्रक से तय करके आए थे। तब उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि यह सफर उन्हें एक दिन इतना दूर ले जाएगा। पहली बार भारतीय क्रिकेट टीम में चयन की खबर पर उमेश यादव के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था। लेकिन उन्हें जानने वालों को इस प्रतिभा पर भरोसा था। वे कहते हैं कि उमेश यादव कुदरती गेंदबाजी करते हैं और अंतराष्ट्रीय क्रिकेट के मुताबिक तेज गेंदबाजी करने में सक्षमः हैं. उमेश यादव के माता-पिता भी उनकी इस उपलब्धि पर बहुत खुश हैं, लेकिन उन्हें घबराहट भी है। वे गांव के हैं और बाहरी दुनिया के बारे में उन्हें कोई ठोस जानकारी नहीं है। उमेश यादव की प्रतिभा के बारे में विदर्भ के पूर्व खिलाड़ी प्रीतम गाँधी बताते हैं कि, यह साल 2008 की बात है। मैदान में खेल रहे एक नौजवान लड़के की जबरदस्त गेंदबाजी मेरी आखों में बस गई। गेंदबाजी की अहम बात रफ्तार थी। उसका एक्शन अच्छा था। लेकिन रनअप में बदलाव जरूरी था। मैने उसे रणजी ट्राफी के नेट पर बुलाया। वह जल्द ही प्रथम श्रेणी क्रिकेट में खेलने लगा। पर उमेश यादव के परिवार के लोगों को उनके खेलने को लेकर उत्साह नहीं था। उनके पिता की खेल में कोई रूचि नहीं थी। सभी लोगों ने उन्हें यही सलाह दी कि कुछ ऐसा करो कि जिंदगी सुख चैन से बीत सके।
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
एवरेस्ट की चढ़ाई ने जीने का सलीका सिखाया : संतोष यादव
संतोष यादव भारत की जानी-मानी पर्वतारोही हैं। वह माउन्ट एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली विश्व की प्रथम महिला हैं। इसके अलावा वे कांगसुंग (Kangshung) की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला भी हैं।उन्होने पहले मई 1992 में और तत्पश्चात मई सन् 1993 में एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में सफलता प्राप्त की। संतोष यादव का जन्म सन 1969 में हरियाणा के रेवाड़ी जनपद के में हुआ था। उन्होने महारानी कालेज, जयपुर से शिक्षा प्राप्त की है। सम्प्रति वह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस में एक पुलिस अधिकारी हैं। उन्हें सन 2000 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है।संतोष यादव ने दो बार माउंट एवेरस्ट की दुर्गम चढ़ाई पर अपनी जीत दर्ज करते हुए तिरंगे का परचम लहराया है. ज़िन्दगी में मुश्किलों के अनगिनत थपेड़ों की मार से भी वह विचलित नहीं हुईं और अपनी इस हिम्मत की बदौलत माउंट एवरेस्ट की दो बार चढाई करने वाली विश्व की पहली महिला बनीं. उनके इस अदम्य साहस के लिए उन्हें साल २००० में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. हिमालय की चोटी पर पहुँचने का एहसास क्या होता है, इसे संतोष यादव ने दो बार जिया है. 'ऑन द टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड' जुमले का प्रयोग हम अक्सर करते हैं पर इसके सार को असल मायनो में संतोष ने समझा. वह भी आज से डेढ़ दशक पहले. अरावली की पहाड़ियों पर चढ़ते हुए कामगारों से प्रेरणा लेकर उन्होंने ऐसा करिश्मा कर दिखाया, जिसकी कल्पना खुद उन्होंने कभी नहीं की थी. हरियाणा के रेवाड़ी जिले के एक छोटे से गाँव से निकल कर, बर्फ से ढके हुए हिमालय के शिखर का आलिंगन करने के यादगार लम्हे तक का सफ़र संतोष यादव के लिए कितने उतार चढ़ाव भरा रहा, यह जानने की एक कोशिश (साभार-हिन्दीलोक) --
-जीवन के किस मोड़ पर आपने यह महसूस किया कि मैं माउंट एवरेस्ट जैसी दुर्गम चढ़ाई कर सकती हूँ?
यह बात साल १९९२ की है, जब हिमालय की चढ़ाई के लिए मेरा चयन हुआ। यह सोच कर अब भी मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. मेरा चयन होने मात्र से मेरे मन में ख्याल आया कि मैं भी एवरेस्ट की चढ़ाई कर सकती हूँ... मैं एक बहुत साधारण परिवार से हूँ. कभी ऐसा सोचा नहीं था कि इतना मुश्किल काम मैं कर पाऊँगी. खासकर माउंट एवरेस्ट की चढाई जैसा कठिन अभियान मेरे लिए सोच पाना भी उस वक़्त मुश्किल था. हालाँकि मेरे अन्दर बहुत आत्मविश्वास रहता है लेकिन मैं अति आत्मविश्वास खुद में कभी नहीं आने देती. चयन हुआ क्यूंकि उसके बारे में मैंने बहुत पढ़ा था और ट्रेनिंग भी ली थी उत्तरकाशी नेहरु माउंटइनीयारिंग महाविद्यालय से, जिसका निश्चित रूप से मुझे फायदा मिला. मुझे लोगों ने तब बहुत हतोत्साहित किया था. शुरुआत के कुछ दिनों में लोगों का नजरिया मुझे लेकर यह रहा कि 'ये भी ट्रेनिंग करेगी?' लेकिन मुझमे बहुत हिम्मत थी, मैं मानती हूँ. क्यूंकि चढ़ाई करने से पहले मुझे परिवार की ओर से भी खासी मुश्किलात थीं.
-आपके परिवार से विरोध के बावजूद जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा क्या रही?
परिवार से विरोध था इसलिए मैं अन्दर से बहुत टूटा हुआ महसूस करती थी। उस वक़्त सिर्फ मेरी हिम्मत मेरे साथ थी. खासकर माँ बाप जो आपको इतना प्यार करते हैं, उनका दिल भी नहीं दुखाना चाहती थी. मेरे माँ बाप भी मजबूर थे. जिस तरह से मेरे सामने एवरेस्ट का पहाड़ था, उनके सामने भी समाज का इतना बड़ा पहाड़ था. वह भी हरियाणा जैसे राज्य में मैं पली बढ़ी जहाँ लड़कियों को बंदिशों में रखा जाता है. आज की स्थिति थोड़ी अलग है. लेकिन जब मैं पढ़ रही थी, तब मेरे पिताजी को कहा जाता था 'राम सिंह तू बावडा हो गया है के... छोरी को इतना पढ़ा के, के करेगा.' मैं उन दिनों आईएएस की तैयारी कर रही थी. पिताजी को लोग बोलते थे "इतना पढ़ रही है छोरी, छोरा भी न मिलेगा पढ़ा लिखा." लाडली मैं बहुत थी घरवालों की. इसलिए मेरे अन्दर बहुत हिम्मत थी. और यह बात हर माँ-बाप से मैं कहूँगी कि जितना आप अपने बच्चों को प्यार करेंगे उतना उनके अन्दर हिम्मत और आत्मविश्वास बढ़ेगा.
-तकनीक और कौशल ही इंसान को ऊंचाई तक नहीं ले जा सकती। इसके लिए शिक्षा भी ज़रूरी है. इस बात से आप कितनी सहमत हैं ?
पढ़ाई और खेल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यदि आपकी शिक्षा अच्छी नहीं है तो आप किसी भी क्षेत्र में बेहतर नहीं कर पाएँगे. खेल को मैंने बहुत ही शिक्षात्मक ढ़ंग से लिया है. इसमें बहुत समय प्रबंधन की ज़रूरत है. मैं यह नहीं कहूँगी कि माउंटइनीयारिंग के कारण मैं पूरी तरह से आईएएस में चयनित नहीं हो पाई. बल्कि मुझे लगता है कि मेरी पढ़ाई ने मुझे बहुत फायदा पहुँचाया है. मैं बहुत ही लाड़ प्यार और नाजुकता से पली बढ़ी और स्पोर्ट्स पर्सन मैं शुरुआत से नहीं थी. मेरे अन्दर एक जिज्ञासा थी कि बर्फ से ढके पहाड़ और हिमालय कैसे लगते होंगे! इस सोच से मैं रोमांचित हो जाती थी. अपने इस सपने को साकार करने की चाह से मैंने एवरेस्ट की चढाई की. जब मैं वहां गई तो ऋषिकेश में हम सभी प्रशिक्षुओं का हमारे इंस्टिट्यूट वालों ने स्वागत किया. ट्रेनिंग के दौरान मेरा नंबर धूप में पड़ गया और मैं धूप में लाल हो गयी थी. मेरी पतली काया को देखकर प्रशिक्षकों ने मेरी ट्रेनिंग को लेकर शंका जताई. धीरे धीरे मैंने अपना प्रशिक्षण पूरा किया और समापन के समय मुझे भी यह देखकर आर्श्चय हुआ कि मेरा प्रदर्शन सबसे अच्छा आँका गया. मैं क्लिप ऑन क्लाइम्बिंग बड़ी ही फुर्ती से कर लेती थी और सब देखते थे कि आखिर ये इतनी जल्दी करती कैसे है. असल में मैं तकनीक को कार्य करने के साथ साथ बहुत अच्छे से समझती भी रहती थी. जल्दबाजी कभी नहीं करती थी. देखती थी, रास्ते को याद करती थी उसके बाद कोशिश करती थी. मैं खुद से यह सवाल भी करती रहती थी 'मैंने ये कर लिया, मैं यह कर गई?' फिर मुझे उसका जवाब मिलता था क्यूंकि मैंने इस तकनीक का इस्तेमाल इसमें किया.
-जिस ट्रेनिंग का आप हिस्सा रहीं, उसमे किन बातों पर ख़ास ध्यान रखना पड़ता था?
मानसिक और शारीरिक तौर पर सतर्क रहना पड़ता था। भोर सुबह उठना भी मेरे लिए फायदेमंद रहा. तीन बजे सवेरे हम उठ जाते थे और तैयार हो के साढ़े तीन बजे तक कैंप से निकल जाना होता था. क्यूंकि जितनी जल्दी हम चढ़ाई शुरू करेंगे उतना जीवन का खतरा कम है. माउंटइनीयारिंग में देरी जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है. ग्लेशिअर्स और बर्फ की दरारें इतनी चौड़ी होती हैं कि कभी कभी समझ में नहीं आता कि किस तरह से उसे पार किया जाए. कभी कभी नज़रंदाज़ भी करना होता है बर्फानी तूफानों को. हमे हर पल को बड़ी नाजुकता और संतुलित ढ़ंग से बिना आवाज़ किये आगे बढ़ना पड़ता था.
-उन्तीस हज़ार फीट की ऊंचाई पर अनेक बाधाएं आपके रास्ते में आई होंगी। कोई ऐसा वाक्या आपको याद है जिसने आपको अन्दर तक हिला दिया हो?
कई बार तो ऐसा हुआ कि मुझे उठा के बर्फानी तूफानों ने दूर तक फेंका है। कंचनजंघा की चढाई के वक़्त मुझे याद है कि बात लगभग तय हो चली थी कि मैं जिंदा नहीं बचूंगी. मैं नेपाल की तरफ लटक गयी थी क्यूंकि तूफ़ान ने मुझे पूरे वेग से उड़ा लिया था. मैं पेंडुलम की तरह लटकी हुई थी और उस समय मैंने अपने आप को मजबूती से रस्सी में बांधे रखा. साथ ही मेरे दो साथी जिसमे में एक फुदोर्जे थे, उन्हें भी तूफ़ान उड़ा ले गया था. यह देखकर मुझे थोड़ी घबराहट ज़रूर हुई लेकिन उस वक़्त मुझे मेरे मानसिक संतुलन ने बचाया. मैं हमेशा यह कहती हूँ कि जब भी इंसान परेशानी में आता है उसे अपने मानसिक संतुलन को नहीं खोना चाहिए. पहला हिम्मत और दूसरा मानसिक संतुलन ही आपका सबसे बड़ा हथियार है. इससे मुझे यह सीखने को मिला कि मानसिक संतुलन बड़ी ऊंची चीज़ है. अगर वो आप बनाये रखेंगे तो डर भय सब दूर हो जाते हैं और आप अच्छे से सोच के, दिमाग का इस्तेमाल करते हुए सही फैसला ले पाएँगे. मैं ऐसी परिस्थितियों से कई बार गुज़र चुकी हूँ.
-योजनाओं और सिद्धांतों को आप किस हद तक महत्वपूर्ण मानती हैं?
मैंने बचपन से लेकर अपना अभी तक का जीवन काल एक कुशल योजना के तहत बिताया है। यदि मैं ऐसा नहीं करती तो शायद यहाँ तक का सफ़र तय कर पाना मेरे लिए मुश्किल रहता. यह मैंने इसलिए समझ लिया था क्यूंकि मैं बहुत सुरक्षित क्लाइम्बर हूँ. बहुत ज़रूरी भी है क्यूंकि जब भी आप कोई रिस्क लेते हैं तो सुरक्षा का आपको पूरा ध्यान रखना होता है. मैं सिद्धांतों को बहुत मानती हूँ. चाहे वो जीवन के सिद्धांत हों या खेल के. यदि आप उसको सही रूप से निभाएँगे तो मेरे ख्याल से आप कभी मार नहीं खाएँगे. माउंटइनीयारिंग में अधिकतर आपकी सुरक्षा आपके ही हाथों में है. क्यूंकि बाहर मौसम ख़राब है तो आपने क्या फैसला लिया ऐसे में, किस वक़्त कहाँ जाना है, अचानक फंस भी गए तो आपके जो सिखाये हुए सिद्धांत हैं उसका पालन कीजिये. आपके मानसिक संतुलन को न खोएं. दूसरी बात है कि आप पूरी तैयारी से जाएँ. मैंने महसूस किया है कि तैयारी में कोताही जीवन के रिस्क का कारन बन सकती है. क्यूंकि माउंटइनीयारिंग के सिद्धांत के अनुसार आप सुबह में ही चढाई करें. बारह बजे के बाद यह उम्मीद मत कीजिये कि आपको मौसम अच्छा मिलेगा और आप सही सलामत अपने कैंप वापस पहुंचेंगे. बारह बजे के तुंरत बाद वापस आ जाएँ. दो बजे तक तो रिस्क लेने की बात है. अगर मौसम साफ़ रहे तो भी. क्यूंकि किस वक़्त मौसम ख़राब हो जाये ये मालूम नहीं.
-जिस जीवन मरण की स्थिति को आपने चढाई के दौरान जिया, उसे आप असल ज़िन्दगी में कैसे लागू करती हैं?
ये बहुत अच्छी बात आपने पूछी। इससे जीवन को जीने का बहुत अच्छा अनुभव आपको मिलता है. क्यूंकि जब भी आपके जीवन में परेशानी आती है तो उसको किस ढ़ंग से सँभालते हुए आगे बढ़ना है, उस परेशानी को किस तरीके से सुलझाना है, यह भी एक चुनौती है, जिसे सुलझाने की समझ मुझे अपने उन्ही अनुभवों से मिली.
-आपने एवरेस्ट की मुश्किल चढाई के साथ आईएएस की कठिन परीक्षा पर भी विजय पाई। इन दोनों अभियान के इतर घर परिवार की ज़िम्मेदारी को आप किस तरह निभाती हैं?
अपनी ज़िम्मेदारी को हर स्तर पे समझना ज़रूरी है। मुझे याद है कि मेरे स्नातक के समय में मैंने किसी से कहा था कि आपका जो व्यवहार है वही आपकी कसौटी है. हर जगह आपका व्यवहार उसके अनुरूप होना चाहिए. मैं दो बच्चों की माँ हूँ और मैं अपने दोनों बच्चों का पालन पोषण खुद करती हूँ. माँ बनना अपने आप में बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी की बात है. सही पालन पोषण और सही संस्कार देना, गलत चीज़ों से दूर रखना एक अभियान है. अति नहीं करनी चाहिए लेकिन सहज रूप से होना चाहिए ताकि बच्चे को पता भी न चले और उसका ख्याल भी रहे. यह बहुत ज़रूरी है. मेरी कोशिश रहेगी और इसकी मैं सरकार और कारपोरेट सेक्टर से अनुरोध करने वाली हूँ कि महिला कर्मचारियों को ख़ास तवज्जो दी जाये. राष्ट्र को अच्छा नागरिक देने वाली एक गर्भवती स्त्री/माँ को कुछ ज्यादा छुट्टियाँ होनी ही चाहिए. कम से कम तब तक जब तक बच्चा माँ पर आश्रित है. उससे बच्चे को बहुत सहारा मिलता है.
-आप अपनी इस ऊर्जा और अनुभवों की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानती हैं?
मुझे सबसे बड़ी चीज़ इससे 'इंसानियत' सीखने को मिली। इतने बड़े ब्रम्हांड में इतना छोटा है इंसान. यह बात महसूस होती थी कि हमें एक जीवन मिला है इंसान के रूप में. हम नहीं जानते कि अगला जीवन किस रूप में मिलेगा. इसलिए जो जीवन है उसे अच्छे से जीना चाहिए. हर एक के साथ अच्छा व्यवहार करके और मदद करके. व्यवहार सिर्फ इंसान के साथ नहीं होता. जीवन में हर एक के सामने हर तरह की कठिनाइयाँ आती हैं. उस समस्या का डट के और हिम्मत से मुकाबला करते हुए समाधान करना चाहिए. दूसरी बात, हम अक्सर यह कहते हैं कि हमारे किस्मत में यह नहीं. गलत है. बचपन से लेकर मैंने अभी तक के जीवन काल में देखा है कि मैंने शिक्षा हासिल की जिसके लिए मैंने बहुत संघर्ष किया. उसके बाद मेरी शादी दसवीं क्लास में हुई. मैं रोती रही और तब मैंने यह जिद्द की कि मुझे हॉस्टल जाना है क्यूंकि मैं जानती थी कि यहाँ रही तो मैं जीवन में शायद आगे न बढ़ पाऊं. हालाँकि मुझे बहुत तकलीफ हुई और माँ पिताजी की भी बहुत याद आती थी. लेकिन मैंने अपनी किस्मत का खुद निर्माण किया.
-एक महिला होने के नाते क्या इस अभियान में ख़ास परेशानियों से आपको दो चार होना पड़ा?
मुझे याद है साल १९९३ में मुझे चढाई से पहले हुए स्वास्थ जांच में फ़ेल कर दिया गया था। डॉक्टर को पता ही नहीं था कि मैं पहले ही एवरेस्ट की चढाई कर चुकी हूँ. मेरे फेंफडे बहुत छोटे बताये गए थे जांच में, इसलिए उन्होंने सलाह दी कि मेरा कैंप में न जाना ही अच्छा रहेगा. फिर मेरे एक साथी क्लाइम्बर ने डॉक्टर को मेरा परिचय दिया. मुझे टीम में रखने में हमेशा सुरक्षा के नज़रिए से सही माना गया. मैं सिर्फ एक महिला की हैसियत से नहीं बल्कि ज्यादातर महिला अभियान दल की लीडर की भूमिका में रही. मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि मैं ये काम इसलिए नहीं करुँगी क्यूंकि मैं महिला हूँ. दीवार फान्दनी होती थी, रस्सा चढ़ना, ऊपर से आग निकल रही होती थी और मैं नीचे से रेंगती हुई निकल जाती थी. इन सारे कामों को मैंने किया हुआ है. अन्दर से कुछ करने की इच्छा शक्ति मेरे अन्दर बहुत प्रबल थी. मैं मानती हूँ कि इंसान को हमेशा जिज्ञासु रहना चाहिए. यह बहुत ज़रूरी है. जानने की इच्छा से आपको बहुत कुछ सीखने को मिलता है.
-जीवन की इस चढाई में और किन योजनाओं को अंजाम देने की ख्वाहिश है?
फिलहाल तो माँ का रोल अदा कर रही हूँ. बच्चों को पालना भी बहुत महत्वपूर्ण और ज़िम्मेदारी भरा काम है. जीवन में बहुत सारे उद्देश्य हैं. डेस्टिनी और किस्मत दोनों एक दूसरे के बहुत करीब हैं लेकिन अलग हैं. यदि भाग्य में कोई चीज़ लिखी है लेकिन उसे पाने के लिए आप कर्म ही नहीं करेंगे तो उसका कोई मतलब नहीं. मैं पहाड़ी इलाके से नहीं आती हूँ. हमारे हरयाणा के लोग तो पहाड़ देख के बहुत डरते हैं. इतनी ऊंचाई में और ठंडे मौसम में मेरे लिए सांस ले पाना भी मुश्किल था लेकिन मैंने अपनी इच्छा शक्ति से उसे हासिल किया इसलिए ताजिंदगी खुद को पर्यावरण से जुड़ा हुआ देखना चाहती हूँ और इसके बचाव के लिए काम करती रहूंगी. क्यूंकि प्रकृति को मैंने भगवान् माना है और अगर आप इसकी इज्ज़त करेंगे तो ये आपकी इज्ज़त करेगी वरना तमाम सुरक्षा उपकरणों के साथ भी आप अपना बचाव नहीं कर पाएँगे.

