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मंगलवार, 29 मार्च 2016

राजनीति में सबसे बड़ा परिवार बना ''मुलायम'' परिवार

उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे शक्तिशाली यादव परिवार का एक और सदस्य अब सक्रिय राजनीति में दस्तक देने को तैयार है। समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादवको 2017 का यूपीविधानसभा चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी चल रही है। वे लखनऊ कैंट सीट से सपा प्रत्याशी होंगी। इसके चलते राजनीतिक परिवारों से अलग मुलायम का परिवार एक ही पार्टी में है यानि अपर्णा को मिलाकर सभी 16 सदस्य समाजवादी पार्टी का हिस्सा हैं जिसे 77 साल के मुलायम सिंह यादव ने खड़ा कर दिया है। मिलते है मुलायम सिंह की 16 सदस्यों से जो राजनीति में अपना रुतबा जमा रहे है।

मुलायम सिंह यादव
नेताजी के नाम फेमस मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के अगुआ और पार्टी संस्थापक हैं। उन्होंने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी का गठन किया था। अपने राजनीतिक करियर में वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। फिलहाल उनके बेटे अखिलेश यादव यूपी के सीएम हैं और वह केंद्र की राजनीति पर फोकस किए हुए हैं। मुलायम सिंह यादव ने राजनीति में परिवार के 20 सदस्यों की एंट्री करा दी है, जिसके आधार पर मुलायम परिवार देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार बना हुआ है।

शिवपाल सिंह यादव
जीती हुई सीट पर घरवालों को लड़ाने के इस खेल में सबसे पहले शिवपाल सिंह यादव शामिल हुए। हालांकि, सहकारिता आंदोलन के जरिए शिवपाल सिंह यादव ने राजनीति में अपनी पैठ बना ली थी। वे 1988 में पहली बार इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए। 1996 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपनी जसवंतनगर की सीट छोटे भाई शिवपाल के लिए खाली कर दी थी। साथ ही खुद मैनपुरी से लोकसभा का चुनाव लड़ा। इसके बाद से ही शिवपाल सिंह यादव का जसवंतनगर की विधानसभा सीट पर का कब्जा बरकरार है।

रामगोपाल सिंह यादव
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल यादव मौजूदा समय में भले की राज्यसभा से सांसद हो, लेकिन उन्होंने भी राजनीति में एंट्री इसी जुगाड़ से की थी। मुलायम सिंह ने 2004 में संभल सीट रामगोपाल के लिए छोड़ दी थी और खुद मैनपुरी से सांसद का चुनाव लड़ा था। रामगोपाल ने भी इस सीट से जीत हासिल करके संसद पहुंचे थे।

अखिलेश यादव
सपा मुखिया में अपने भाइयों को राजनीति में एंट्री कर दी थी। अब बारी बेटे अखिलेश यादव की थी। इसके लिए उन्होंने 1999 की लोकसभा चुनाव संभल और कन्नौज दोनों सीटों लड़ा और जीता। इसके बाद सीएम अखिलेश के लिए कन्नौज की सीट खाली कर दी। अखिलेश ने कन्नौज की सीट से चुनाव लड़ा और जीता। इसी के साथ उनकी भी राजनीति में एंट्री हो चुकी थी।

धर्मेंद्र यादव
अखिलेश के बाद यादव परिवार के दूसरी पीढ़ी से सबसे पहले धर्मेंद्र यादव का नंबर लगा। 2004 में सीएम रहते हुए मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से चुनाव लड़ा और जीता। बाद में यह सीट अपने भतीजे धर्मेंद्र यादव के लिए खाली कर दी। 25 साल के भतीजे ने भी अपने चाचा मुलायम को निराश नहीं किया और रिकॉर्ड वोटों से जीत हासिल की। उस वक्त उन्होंने 14वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र के सांसद बनने का रिकार्ड बनाया। इसी के साथ धर्मेंद्र का भी राजनीति में कैरियर शुरू हो गया।

डिंपल यादव
पिता द्वारा राजनीति पदार्पण करने के इस नायाब तरीके को बेटे अखिलेश यादव ने भी अाजमाया। 2009 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज और फिरोजाबाद से जीतकर फिरोजाबाद की सीट की अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए छोड़ दी, लेकिन इस बार पासा उलट पड़ गया और डिंपल को कांग्रेस उम्मीदवार राजबब्बर ने हारा दिया।
पहली बार में इस खेल में मात खाने बावजूद अखिलेश का भरोसा इस फार्मूले से नहीं टूटा। 2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने अपनी कन्नौज लोकसभा सीट एक बार फिर डिंपल के लिए खाली की। इसबार सूबे में सपा की लहर का आलम ये था कि किसी भी पार्टी की डिंपल के खिलाफ प्रत्याशी उतारने की हिम्मत नहीं हुई और वो निर्विरोध जीती।

तेज प्रताप यादव
तेजप्रताप यादव सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पोते हैं। वे मैनपुरी से सांसद हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी और आजमगढ़ दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था। इसके बाद उन्होंने अपनी पारंपरिक सीट मैनपुरी खाली कर दी थी। इस सीट पर उन्होंने अपने पोते तेज प्रताप यादव को चुनाव लड़ाया। तेजप्रताप ने भी अपने दादा को निराश नहीं किया और बंपर वोटों से चुनाव में जीत हासिल की। साथ ही इस राजनीति में धमाकेदार एंट्री की।

अक्षय यादव
अक्षय यादव मौजूदा समय में फिरोजाबाद से सपा सांसद हैं। अक्षय यादव भी पहली बार चुनाव जीतकर सक्रिया राजनीति में उतरे हैं। यह सीट यादव परिवार की पारंपरिक संसदीय सीट रही है। जब अखिलेश यादव ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था, उस समय फिरोजाबाद के चुनाव प्रबंधन की कमान अक्षय यादव ने संभाली थी। इसके बाद अखिलेश ने फिरोजाबाद सीट छोड़ दी और उपचुनाव में पत्नी डिंपल यादव को चुनाव लड़ाया। भाभी डिंपल का चुनाव प्रबंधन भी अक्षय ने संभाला था, लेकिन कांग्रेस नेता राज बब्बर ने डिंपल को हरा दिया था।

प्रेमलता यादव
मुलायम सिंह यादव के भाई राजपाल यादव की पत्नी हैं प्रेमलता यादव। 2005 में वह इटावा की जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई थीं।

सरला यादव
यूपी के कैबिनेट मिनिस्टर शिवपाल यादव की पत्नी हैं सरला यादव। 2007 में जिला सहकारी बैंक इटावा की राज्य प्रतिनिधि बनाया गया था।

अरविन्द यादव
2012 में वह छिबरामऊ से विधानसभा चुनाव जीते थे। इससे पहले भी वह इसी सीट से विधायक बने थे।

अक्षय यादव
रामगोपाल यादव का बड़े बेटे हैं अक्षय यादव। फिरोजाबाद से लोकसभा सांसद हैं अक्षय यादव। 


आदित्य यादव
शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव को जसवंत नगर लोकसभा सीट से एरिया इंचार्ज थे। मौजूदा समय में वह यूपीपीसीएफ के चेयरमैन हैं।

अंशुल यादव
राजपाल और प्रेमलता यादव के बड़े बेटे हैं अंशुल यादव। 2016 में इटावा से निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए हैं अंशुल यादव।

संध्या यादव
सपा सुप्रीमो की भतीजी और सांसद धर्मेंद्र यादव की बहन संध्या यादव ने जिला पंचायत अध्यक्ष के जरिए राजनीतिक एंट्री की है। उन्हें मैनपुरी से जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए निर्विरोध चुना गया है।








मंगलवार, 19 मई 2015

सांसद पप्पू यादव ने बनाया जनक्रांति अधिकार मोर्चा

राजद से निष्कासित मधेपुरा के सांसद राजेश रंजन ऊर्फ पप्पू यादव ने जनक्रांति अधिकार मोर्चा का गठन किया है. रविवार को इसकी घोषणा करते हुए श्री यादव ने दावा किया कि हमारा यह संगठन राजद विचारधारा का असली वारिस होगा. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर जीतन राम मांझी को वह अपने साथ लेंगे, तो ऐसी स्थिति में उनको भी पार्टी में शामिल कर सकते हैं. रविवार को पटना में युवा शक्ति के अलावा बुद्धिजीवियों, जिला पर्षद अध्यक्षों, मेयरों, मुखियाओं से परामर्श के बाद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि दो सप्ताह में यह तय हो जायेगा कि मोरचा आगे किस रूप में काम करेगा.इसके लिए राज्य स्तर पर कोर कमेटी का गठन किया गया है. कोर कमेटी ही निर्णय करेगी कि मोरचा का किसी दल में विलय होगा या राजनीतिक दल के रूप में काम करेगा या समान विचारधारा के किसी दल के साथ गंठबंधन करेगा.उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के गंठबंधन से किसी प्रकार का चुनावी तालमेल नहीं होगा. बिहार में हमारा मोरचा तीसरे विकल्प के रूप में काम करेगा.  

शुक्रवार, 28 जून 2013

मध्य प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव का निधन

मध्य प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव का बुधवार को लंबी बीमारी के चलते निधन हो गया। वे 67 वर्ष थे। राज्य में यादव के निधन पर शोक की लहर है। यादव लंबे अरसे से बीमार थे और उनका दिल्ली में इलाज चल रहा था। बुधवार की सुबह उनकी हालत बिगड़ी और निधन हो गया। यादव कांग्रेस की दिग्विजय सिंह की सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे हैं और उनकी पहचान सहकारिता आंदोलन के जनक की रही है। 

यादव के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि स्वर्गीय यादव ने जीवन-भर किसानों और गरीबों के हक में संघर्ष किया और उनकी बेहतरी के लिए प्रतिबद्धता से प्रयास किए। उनके निधन से राज्य ने एक जागरूक और प्रतिबद्ध नेता खो दिया है। चौहान ने कहा कि यादव ने प्रदेश में सहकारिता और कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। प्रदेश के विकास में यादव के योगदान को सदैव याद रखा जाएगा। 


सुभाष यादव का गुरुवार को नर्मदा नदी के तट पर पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया.यादव के छोटे पुत्र सचिन यादव ने उन्हें मुखाग्नि दी. उनका अंतिम संस्कार गायत्री मंत्रोच्चारण के बीच किया गया.


यादव का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कल निधन हो गया था. उनका शव बुधवार शाम विशेष विमान से इंदौर लाने के बाद उनके गृहग्राम बोरांवा लाया गया था.


मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सुभाष यादव के पुत्र सांसद अरुण यादव के दिल्ली स्थित लोधी एस्टेट निवास जाकर स्वर्गीय यादव की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। कांगेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा पूर्व प्रदेश कांगेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी इंदौर से बोरांवा पहुंचे और उन्होंने यादव को श्रद्धासुमन अर्पित किये. तीनों नेता कुछ समय रुकने के बाद वापस इंदौर के लिये रवाना हो गये.

'यदुकुल' की तरफ से  हार्दिक श्रद्धांजलि !!



शनिवार, 31 मार्च 2012

कन्नौज से चुनाव लड़ेंगी डिंपल यादव

कन्नौज संसदीय सीट से एक बार चुनावी मैदान में उतर सकती हैं उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बेटर हॉफ यानी कि डिंपल यादव। अखिलेश यादव के रूख से तो यही नजर आ रहा है। वह बार-बार यही दोहरा रहे हैं कि कन्नौज की जनता तय करेगी कि वहां से कौन चुनाव लड़े। जनता की तरफ से लगातार डिंपल को संसदीय चुनाव लड़ाने के लिए हो रही मांग पर उन्होंने कहा कि जनभावनाओं के अनुरूप ही पार्टी निर्णय लेगी।

दरअसल अखिलेश यादव कन्नौज से सांसद हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ेगी। इसीलिए अपनी पुश्तैनी सीट कन्नौज से डिंपल को लड़ाने की मांग ज्यादा हो रही है। यदि ऐसा होता है तो यह दूसरा अवसर होगा जब डिंपल अपने पति की छोड़ी गई सीट पर चुनाव लड़ेंगी। वो इससे पहले फिरोजाबाद से लोकसभा का उपचुनाव लड़ चुकी है।

हालांकि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था लेकिन तब के औऱ अब के हालात बिल्कुल अलग है इसलिए इस बार अगर डिंपल अगर चुनाव में उतरती हैं तो यह फैसला सपा के हक में आ सकता है। वैसे मुलायम सिंह यादव इस सीट पर अपने भाई शिवपाल को चुनाव लड़ाना चाहते थे लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। इससे भी डिंपल के लिए चुनाव की बात हो रही है।
-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

बुधवार, 21 मार्च 2012

जन आकांक्षाओं के रथी : अखिलेश यादव

अभूतपूर्व जनसमर्थन, हिलोरें मारती जनाकांक्षाओं और जबर्दस्त उत्साह के बीच अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ के साथ ही प्रदेश की बागडोर संभाल ली. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के वह सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं. इसी के साथ उनके राजनीतिक करियर में कई और कीर्तिमान जुड़ गये हैं. वर्ष 2009 में प्रदेश संगठन की कमान संभालने वाले इस युवा ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के मार्गदर्शन में पार्टी का चेहरा बदलने का जनता को एहसास कराया.

अंग्रेजी और कम्प्यूटर विरोध की पुरातन सोच से पार्टी को बाहर निकालकर अपने घोषणा पत्र में उन्होंने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वायदा कर नौजवानों को जोड़ा, जिसके चलते पार्टी को बहुमत की सरकार बनाने का यह यादगार मौका मिला. वैसे समाजवादी पार्टी अपने गठन के दो दशक के भीतर ही दो बार गठबंधन की सरकार बना चुकी है किंतु इस बार बहुमत के जनादेश का यह गौरव उन्हीं (अखिलेश) के हिस्से में गया है.

सबसे कम उम्र में संसद पहुंचने, प्रदेश संगठन की बागडोर संभालने और अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने की उपलब्धियां भी उनके खाते में जुड़ गई हैं. अब वह जनाकांक्षाओं के रथी बन गए हैं. चुनावी वादे उनके सामने यक्ष प्रश्न के रूप में हैं तो समय हिसाब लेने के लिए उत्सुकता के साथ सामने खड़ा है, जो उनके राजनीतिक भविष्य का इतिहास लिखेगा.

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह भी सबसे कम उम्र के विधायक थे. उस समय उनकी पहचान समाजवादी युवा चेहरे के रूप में थी. राजनीति के इस लंबे सफर में समाजवादी खेमे में कई ऐसे मोड़ आए. पार्टी टूटी, समाजवादी बिखरे और लामबंद हुए. उस दौर में समाजवादी पुरोधा भी उत्तर प्रदेश में अपने बलबूते बहुमत की सरकार की कल्पना नहीं करते थे.

राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच मुलायम सिंह ने बीसवीं सदी के अंतिम दशक (1992में) बिखरे समाजवादियों को पुन: गोलबंद कर पार्टी बनाई और समाजवादी राजनीति को आगे बढ़ाया, जिसकी परिणति आज प्रदेश में उनकी बहुमत की सरकार के रूप में सामने है. आज के इस यादगार क्षण ने समाजवादी राजनीति के इतिहास में एक नई कड़ी जोड़ दी है.

आज उत्सव का माहौल है. हमें अगस्त, 2003 का वह दिन याद आता है जब मायावती की सरकार के पतन के बाद मुलायम सिंह यादव ने प्रदेश की सत्ता संभाली थी. जनाकांक्षाएं ऐसे ही उस समय भी हिलोरें मार रही थीं. उस वक्त दिवाली मनाकर लोगों ने अपनी खुशी का इजहार किया था. आज भी कुछ वैसा ही नजारा है. उस समय भी कुशासन के खिलाफ जनसमर्थन था. आज भी मायावती की ‘भ्रष्ट’ सरकार के खिलाफ जनादेश है.

किन्तु इस बार सत्ता की कमान अखिलेश के हाथ है. वह कसौटी पर हैं. इतिहास उनके अगले कदम के इंतजार में है. यह अवसर इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह पीढ़ीगत बदलाव है. इसकी राजनीतिक पहल सपा सुप्रीमो ने की है. उन्होंने अकाली दल नेता प्रकाश सिंह बादल की तरह खुद राजनीतिक गद्दी संभालने की बजाय इस बार आखिलेश के रूप में अपना उत्तराधिकारी तैयार किया है. अपने इस राजनीतिक फैसले से उन्होंने अन्य पार्टियों के बड़े नेताओं को नए सिरे से सोचने के लिए विवश कर दिया है.

अब अखिलेश राजनीति में अपनी दूसरी भूमिका निभा रहे हैं, इसलिए उन्हें पूर्ववर्ती सरकार की खामियों को समझते हुए रणनीति बनानी होगी. आज जन समर्थन के साथ ही राजनीतिक अनुकूलता भी उनके पक्ष में है. केंद्र की यूपीए सरकार कमजोर स्थिति में आ गई है. उसकी प्रमुख सहयोगी पार्टी तृणमूल कांग्रेस उसे अस्थिर करने में लगी हुई है. रेल बजट के बाद ममता बनर्जी ने बढ़ा किराया वापस लेने को लेकर हंगामा मचा रखा है.

अपने कोटे के रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटाने की चिट्ठी प्रधानमंत्री को भेजकर उन्होंने सरकार को संकट में डाल दिया है. सरकार की छीछालेदर हो रही है. ऐसे में राष्ट्रीय क्षितिज पर सपा का राजनीतिक महत्व बढ़ गया है. कांग्रेस आशा भरी निगाह से उसकी तरफ देख रही है. उनके शपथग्रहण समारोह में कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा की शिरकत के भी राजनीतिक मायने हैं. इसलिए उन्हें इस नाजुक राजनीतिक समय में सोच-विचार कर रणनीति तय करने की जरूरत है.

तीसरे मोर्चे का गठन और मध्यावधि चुनाव अभी केवल संभावनाएं हैं. इसलिए उन्हें अनुकूल होते राजनीतिक अवसर का लाभ प्रदेश हित में उठाने से हिचकना नहीं चाहिए. उनकी यह राजनीतिक हैसियत उत्तर प्रदेश में मिली अभूतपूर्व सफलता से है. इसलिए केंद्र की मजबूरी का फायदा प्रदेश के विकास और चुनावी वादों को पूरा करने में उठाना चाहिए. पूर्व की एनडीए सरकार को समर्थन देकर चंद्रबाबू नायडू अपने प्रदेश के लिए ज्यादा धन और परियोजनाएं ले जाने में सफल हुए थे. इसलिए, युवा मुख्यमंत्री को ऐसी राजनीतिक संभावनाओं को तलाशने में हिचक नहीं करनी चाहिए.

हमें नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल में तृणमूल की भी बहुमत की सरकारें हैं. दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री विशेष आर्थिक पैकेज की मांग कर रहे हैं. ये दोनों राज्य गरीबी और भुखमरी से त्रस्त हैं. तृणमूल कांग्रेस के सांसद (यूपीए का सहयोगी दल) तो बृहस्पतिवार को आर्थिक पैकेज के लिए संसद परिसर में अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठे थे. इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र से धन न मिलने का रोना रो रहे हैं. इसी तरह मायावती भी केंद्र से लड़ती रहीं और विकास कार्य हुए ही नहीं. बुंदेलखंड में गरीबी और भुखमरी के चलते किसान आत्महत्या करते रहे और मायावती इससे निपटने के लिए केंद्र का ही मुंह ताकती रहीं.

जनता के लिए जरूरी आधारभूत ढांचे के निर्माण में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी और मायावती को जनता का कोपभाजन बनना पड़ा. सपा ने लोक-लुभावन वादे किये हैं. रोजगार कार्यालयों में पंजीयन के लिए उमड़ती भीड़, कर्जमाफी, मुफ्त बिजली तथा उपज के लिए लाभकारी मूल्य आदि वादों को लेकर नौजवान, किसान, बुनकर आदि सभी नवगठित सरकार की ओर हसरत भरी निगाह से देख रहे हैं.

इन वादों को पूरा करने के लिए लगभग 66 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी जबकि सरकार का खजाना खाली है. इतना पैसा कहां से आएगा, इस अबूझ गुत्थी को कूटनीतिक ढंग से ही सुलझाया जा सकता है. इतना ही नहीं, प्रदेश की नौकरशाही राजनीतिक धड़ों में बंटी हुई है. अफसरों की पहचान उनकी कार्यक्षमता और लगन की जगह नेताओं के खास होने के रूप में होने लगी है.

यह जातिवादी राजनीति का ही दुष्परिणाम है. यही कारण है कि नौकरशाह नेताओं को इस कदर घेर लेते हैं कि उनका फोकस जनता से हट जाता है. वर्ष 2008 में राज्य ने भीषण बाढ़ की आपदा झेली थी जिसमें 731 करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ था. इसके बाद भी प्रदेश सरकार ने अपनी तरफ से कोई प्रबंध नहीं किया और ऐन चुनाव के समय मई, 2011 में बाढ़ नियंतण्रपरियोजनाओं के लिए 15 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की मांग कर दी.

इतना ही नहीं, किसानों को बिचौलियों से बचाने के लिए वर्ष 2008 में दो हजार नई मंडियां खोलने का प्रस्ताव था. पंचायती राज विभाग और ग्राम विकास विभाग की खाली पड़ी जमीन पर मंडियां बननी थीं किंतु दो साल बाद भी इस प्रस्ताव पर अमल नहीं हो सका. यह नौकरशाही के मजबूत मकड़जाल का ही नतीजा है. ऐसे में अखिलेश को पार्टी और प्रशासन को नाथने की क्षमता दिखाने की भी चुनौती है.

-रणविजय सिंह
समूह सम्पादक, राष्ट्रीय सहारा हिन्दी दैनिक

सोमवार, 19 मार्च 2012

अखिलेश यादव : इतना आसान नहीं रहा सफ़र

बेदाग छवि, मृदुभाषी, प्रगतिशील सोच और युवा मन अखिलेश यादव की इन्हीं खासियत ने सपा की तस्वीर बदल कर रख दी है. कहने को तो अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी विरासत में मिली है लेकिन इसके पीछे जो मेहनत अखिलेश ने की है वह भी किसी से छुपी नहीं है. एक ऐसी पार्टी को जीत का सेहरा पहनाना जिसे एक साल पहले कोई उत्तर प्रदेश की जंग का हिस्सा भी नहीं मान रहा था वाकई गजब की बात है.

सबको उम्मीद है कि अखिलेश यादव के राज में सपाराज “गुण्डाराज” बनने से बचेगा और राज्य में खुशहाली आएगी. कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि अगर समीकरण और ठोस कार्यक्रम के साथ सही दिशा में अखिलेश ने कदम बढ़ाए तो विकास की लहर गुजरात और बिहार की तरह यूपी में भी बहेगी. हालांकि यह सिर्फ अनुमान है पर इस युवा नेता के लिए कुछ भी नामुमकिन कहना सही नहीं लगता.

उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के सीएम अखिलेश की उम्र 38 साल है. 15 मार्च को जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उनकी उम्र 38 साल आठ महीने और 14 दिन थी. अखिलेश यादव की जन्म तिथि एक जुलाई 1973 है. मायावती जब पहली बार उप्र की मुख्यमंत्री बनी थीं तो उनकी उम्र 39 साल चार महीने और 18 दिन थी.

अखिलेश यादव की साफ छवि के पीछे एक वजह उनका पारिवारिक होना भी माना जाता है. अपने पिता के सबसे करीब होने के अलावा अखिलेश एक अच्छे पति और पिता भी हैं. अखिलेश यादव की बीवी का नाम डिंपल है. दोनों की शादी को करीब 12 साल हो चुके हैं. आज दोनों के तीन बच्चे हैं – अदिति, टीना और अर्जुन.

इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके अखिलेश को उत्तरप्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी का प्रादेशिक अध्यक्ष बनाया गया. पार्टी की कमान संभालते ही उन्होंने तेज गति से अपने काम शुरू कर दिए.

आइए एक नजर डालें आखिर कैसे सफल हुए अखिलेश यादव:

यूथ आईकन: इस विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव यूथ आईकान बनकर उभरे. छात्रों को लैपटाप व टैबलेट देने के वादे ने छात्रों और युवाओं के बीच अखिलेश यादव को ‘हीरो’ बना दिया. युवाओं को अपने साथ मिलाने के लिए टेबलेट, लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ते जैसे लुभावने वादे घोषणापत्र में शामिल करने का विचार अखिलेश का ही था. अखिलेश ने 2007 में सपा की करारी हार से सबक लिया और चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले वे आधे उत्तरप्रदेश का दौरा कर चुके थे.

साफ और बेदाग छवि: यूं तो उत्तर प्रदेश की जनता को दागी और बाहुबली नेताओं की आदत है पर इनके बीच अखिलेश यादव जैसे साफ छवि के नेता ने अपना असर सबसे ज्यादा छोड़ा.

साफ-सुथरी छवि, सहज अंदाज और डीपी यादव जैसे माफियाओं को पार्टी में शामिल न करने जैसे कुछ फैसलों ने उन्हें जनता का हीरो बना दिया. ऊपर से पढ़े-लिखे लोगों को टिकट देकर उन्होंने नहले पर दहला खेला.

टीम का मिला सहयोग :अखिलेश यादव ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. वह अच्छी तरह जानते हैं कि अकेले काम करने से यूपी जैसे बड़े राज्य में कोई खास फायदा नहीं होगा इसीलिए उन्होंने एक बेहतरीन टीम चुनी जिसमें अधिकतर चेहरे उनकी तरह ही नए और युवा थे. रेडियो जॉकी से लेकर प्रोफेसर तक को अपनी कोर टीम में जगह देकर उन्होंने अपनी जीत को सुनिश्चित किया. आनंद भदौरिया, संजय लाठर, नावेद सिद्दीकी, अभिषेक मिश्र और सुनील यादव ‘साजन’ जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त और कर्मठ लोगों को अपने साथ मिलाकर उन्होंने जनता को अपने शासन में सुशासन लाने का पैगाम दिया जिसे जनता ने कबूल भी किया.

साभार : जागरण जंक्शन

शनिवार, 17 मार्च 2012

अखिलेश यादव : राजनीति के गलियारे तक का सफर

उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) को पहली बार मिले पूर्ण बहुमत के नायक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष युवा सांसद 38 वर्षीय अखिलेश यादव का सफर किसी परीकथा से कम नहीं है।

सियासी घराने की परम्पराओं और अनुशासनयुक्त संस्कारों की थाती लिये प्रदेश के नये यूथ आइकॉन अखिलेश के अपने पिता मुलायम सिंह यादव की सत्ताशीर्ष की विरासत इतनी जल्दी सम्भालने के बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा।

कभी राजनीति से दूर रहकर व्यवसाय करने का इरादा बनाने वाले पर्यावरण इंजीनियर अखिलेश का सियासी सफर किसी परीकथा की तरह है। चीजों को सियासत के चश्मे से नहीं देखने के आदी रहे इस 38 वर्षीय नेता ने बमुश्किल छह माह पहले प्रदेश की सियासी जलवायु में बदलाव के लिये अपनी समाजवादी क्रांतिरथ यात्रा कर प्रदेश को मथना शुरू किया।

इस दौरान अखिलेश एक ऐसे परिपक्व राजनेता के रूप में उभरे जिसने ठेठ गंवई सियासत की छवि वाली पार्टी को गांवों के चौबारों और बैठकों के साथ-साथ शहरों के ड्राइंगरूम तक भी पहुंचाया तथा अपनी पार्टी की चाल और चेहरे के साथ-साथ तकदीर भी बदल डाली।

बेहद सौम्य और संस्कारवान व्यक्ति की छवि वाले अखिलेश चुनावी समर से पहले और उसके दौरान एक मजबूत इरादे वाले दृढ़ राजनेता के तौर पर भी सामने आये। पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां की पैरवी के बावजूद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेता डी पी यादव को दल में शामिल नहीं करने के दृढ़ फैसले और चुनाव टिकट वितरण में मजबूत हस्तक्षेप से उनकी छवि और पक्की हो गयी।

विधानसभा चुनाव में सपा को पहली बार 224 सीटों के रूप में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद अखिलेश को 10 मार्च को पार्टी विधायक दल ने अपना नेता चुन लिया और 15 मार्च, 2012 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर उन्होंने प्रदेश के इतिहास में सबसे युवा वजीर-ए-आला बन नया इतिहास रच दिया।



अखिलेश का जन्म एक जुलाई 1973 को इटावा में हुआ था। उस वक्त उनके पिता मुलायम सिंह यादव प्रदेश की राजनीति में पैर जमा रहे थे। अनुशासन के पाबंद पिता मुलायम ने अखिलेश को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए राजस्थान के धौलपुर सैनिक स्कूल भेजा, जहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से पर्यावरणीय प्रौद्योगिकी में स्नातक और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से परास्नातक की उपाधि हासिल की।

युवा अखिलेश सिडनी से पढा़ई पूरी करके पहुंचे तो राजनीति उनकी प्रतीक्षा कर रही थी और वर्ष 2000 में उन्होंने पहली बार कन्नौज लोकसभा सीट से उपचुनाव जीत कर सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वह सीट पिता मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई थी जो 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में मैनपुरी और कन्नौज दोनों ही सीटों से चुने गये थे। उसके बाद से अखिलेश लगातार कन्नौज लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

बढ़ती उम्र और राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती व्यस्तता के बीच कुछ वर्षों पहले पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने पार्टी की प्रदेश इकाई के नेतृत्व की जिम्मेदारी नौजवान बेटे अखिलेश के कंधे पर डाल दी और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई।

राज्य की 16वीं विधानसभा के चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही अखिलेश ने कभी क्रांति रथ यात्रा तो कभी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल से युवकों और समर्थकों की यात्राएं निकाल कर पूरे प्रदेश को छान डाला।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, प्रदेश में पार्टी को जमाने और समाजवाद का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए अखिलेश ने दस हजार किलोमीटर की यात्रााएं की और 800 से अधिक रैलियों को संबोधित किया।

सिर पर पार्टी की लाल टोपी, सफेद कुर्ते पैजामे पर काले रंग की सदरी में संयत, विनम्र मगर दृढसंकल्प भाषणों के जरिये युवा अखिलेश ने देखते ही देखते स्वयं को प्रदेश की राजनीति का सबसे जाना पहचाना चेहरा बना लिया।

प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के करिश्मे की उम्मीदों के बीच अखिलेश समर्थकों के बीच एक नयी आशा के रूप में उभरे और जब छह मार्च को विधानसभा चुनाव के लिए मतों की गिनती शुरू हुई तो दिन चढ़ने के साथ पार्टी की स्थिति निरंतर मजबूत होती गयी और शाम ढलने तक 403 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी की 224 सीटों पर जीत के शानदार बहुमत के साथ प्रदेश के राजनीतिक आकाश में एक नये सूरज का उदय हो चुका था।

यदुकुल : राम शिव मूर्ति यादव

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

विमल यादव बने गुडग़ांव के पहले महापौर


गुडगाँव की गिनती आज देश के सर्वाधिक समृद्ध नगरों में होती है. हाल ही में 21 जून को हुए चुनाव में विमल यादव गुड़गांव नगर निगम के पहले महापौर निर्वाचित हुए। कहा जाता है कि राव इंद्रजीत समर्थक विमल यादव को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। उन्होंने 20 मत हासिल कर भाजपा प्रत्याशी सीमा पहेजा को हराया, जिन्हें केवल नौ मत मिले। विमल यादव के नाम का प्रस्ताव वार्ड 9 के पार्षद लखपत ने किया था जिसका अनुमोदन वार्ड नं0 35 के पार्षद सुन्दर ने किया। अपनी विजय के बाद विमल यादव ने कहा कि मिलेनियम सिटी में पेयजल तथा जलनिकासी की सुविधा बढ़ाना उनकी प्राथमिकता होगी। 'यदुकुल'' की तरफ से विमल यादव हो हार्दिक बधाई !!


(चित्र में : नव निर्वाचित मेयर विमल यादव (बीच में)

शनिवार, 27 मार्च 2010

यादव राजनेताओं का बहिष्कार ??

जाति या समुदाय किसी भी व्यक्ति की बड़ी ताकत होती है। जाति के पक्ष-विपक्ष में कहने वाले बहुत लोग मिलेंगे, पर इसकी सत्ता को कोई नक्कार नहीं सकता। यह एक आदर्श नहीं व्यवहारिकता है। यही कारन है कि जातीय-संगठन भी तेजी से उभरते हैं. सबसे ज्यादा संगठन आपको ब्राह्मणों और कायस्थों के दिखेंगें. ये संगठन जहाँ सामाजिक आधार प्रदान करते हैं, वहीँ कई बार राजनीति में भी अद्भुत गुल खिलाते हैं.

कभी लालू प्रसाद यादव का दायाँ हाथ माने जाने वाले रंजन प्रसाद यादव का जब लालू यादव से मनमुटाव हुआ तो उन्होंने सारा ध्यान "यादव जागरण मंच" को स्थापित करने में लगा दिया। इस मंच ने रंजन यादव को सामाजिक और राजनैतिक ताकत दी, जिसकी बदौलत अंतत: पिछले लोकसभा चुनाव में रंजन यादव जद (यू) के प्रत्याशी रूप में लालू यादव को पाटलिपुत्र से पराजित कर पहली बार लोकसभा पहुँचे. पर यहीं से रंजन यादव के लिए "यादव जागरण मंच" गौड़ हो गया। इस मंच के माध्यम से जब वे लोकसभा पहुँच गए तो इसकी उपेक्षा करने लगे. अंतत: हारकर मंच के लोगों ने रंजन प्रसाद यादव को मंच के संरक्षक पद से मुक्त करने, निलंबित करने और सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला किया. मंच के बिहार प्रदेश संयोजक और पूर्व विधायक धर्मेन्द्र प्रसाद जैसे तमाम लोग अब रंजन यादव से खफा हैं.

..दुर्भाग्यवश यादव समाज में यही हो रहा है. यदुवंशी नेता सत्ता में आते ही यादवों कि उपेक्षा करने लगते हैं. मुलायम सिंह ने अमर सिंह को तरजीह दी तो शरद यादव भाजपा के साथ खड़े हो गए. लालू यादव जमीनी हकीकत को भूलकर हवा-हवाई नेता बनने लगे. कभी परिवारवाद तो कभी यादवों की उपेक्षा...वाकई इन सबसे उबरने की जरुरत है. यादव महासभा स्वयं राजनीति का शिकार हो चुकी है. यदुवंशी बुद्धिजीवी और अधिकारियों का इससे कोई नाता नहीं है. सवाल पुन: वही है आखिरकार यदुवंश की उपेक्षा कर ये नेता कहाँ तक जा पाएंगे. जो यादव उन्हें ताकत देते हैं, उन्हें ही सत्ता के मद में चूर बड़े नेता पटकनी देने का प्रयास करते हैं. यदि यादव नेताओं को दीर्घकालीन राजनीति करनी है तो यादवों की गरिमा, अस्मिता को लेकर चलना होगा. यादव किसी की गठरी नहीं हैं कि जहाँ चाहा उपयोग कर लिया. आज कांग्रेस से लेकर बसपा तक अपने परंपरागत वोटबैंक को वापस लेन कि कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में यादव नेताओं को भी इस पर मंथन करने की जरुरत है...!!

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

अब डिम्पल यादव !!

अन्ततः मुलायम सिंह ने अपने परिवार से पहली बार किसी महिला को राजनीति में उतारने का मन बना ही लिया। अखिलेश यादव द्वारा छोड़ी गई फिरोजाबाद सीट पर हो रहे लोकसभा उपचुनाव में मुलायम सिंह की बहू एवं अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव सपा से चुनाव लड़ेंगी। राजपूत परिवार से ताल्लुक रखने वाली तथा दो बेटियों और एक बेटे की माँ डिम्पल यादव की शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में हुई है। गौरतलब है कि इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राजबब्बर के लड़ने की घोषणा पहले ही हो चुकी है। कभी राजबब्बर मुलायम सिंह के बहुत करीबी लोगों में शामिल थे, पर वक्त ने दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया। कांच की चूड़ियों के लिए मशहूर फिरोजाबाद में डिम्पल यादव की उम्मीदवारी घोषित होते ही लोगों की निगाहें इस सीट पर जम गईं हैं। न सिर्फ सपा बल्कि मुलायम सिंह व अखिलेश यादव की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा भी इस सीट से जुड़ी हुई है। यादव बाहुल्य फिरोजाबाद लोकसभा में 13,71,000 मतदाताओं में सर्वाधिक 3,62,000 यादव मतदाता हैं। फिलहाल हमारी शुभकामनायें डिम्पल यादव के साथ हैं और आशा है कि वे न सिर्फ युवाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी बल्कि उनके आने से युवा महिलाओं को भी तरजीह मिलेगी।

बुधवार, 2 सितंबर 2009

यादवी राजनीति बनाम मुलायम-लालू

पिछले महीने आगरा में समाजवादी पार्टी का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन तीन दिनों तक चला। खूब भाषण हुए। कांग्रेस और बसपा दोनों निशाने पर। लेकिन मीडिया का फोकस रहा समाजवादी चोले में रंगे कल्याण सिंह पर और फोटोग्राफरों ने सबसे ज्यादा फ्लैश चमकाया-सिनेस्टार व रामपुर से सांसद जयाप्रदा के चेहरे पर। इन सब के बीच जमीनी कार्यकर्ताओं की नजर उन बंबइया चेहरों केा तलाश रही थी जिन्हें पार्टी ने लोकसभा चुनाव में गाजे-बाजे के साथ टिकट दिया था। मसलन मुन्ना भाई यानी संजय दत्त। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं लेकिन राष्ट्रीय अधिवेशन में नजर नहीं आए। भोजपुरी स्टार एवं गोरखपुर से सांसदी का चुनाव लड़े मनोज तिवारी भी नदारद। पता किया गया तो मालूम चला कि दोनों शूटिंग में व्यस्त हैं। बचीं लखनऊ से प्रत्याशी बनाई गईं नफीसा अली, तो वह भी नहीं आईं। उनके बारे में तो लोग बोल रहे हैं कि कंाग्रेस से फिर रिश्ते जोड़ने में लगी हैं। पार्टी वाले नाहक नहीं पूछ रहे हैं कि इन मौसमी चेहरों को टिकट और पद से नवाजने का क्या फायदा। उधर अमर सिंह सिंगापुर में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं, पर भारतीय राजनीति उन्हें करवटें नहीं बदलने दे रही है। हर दिन प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रानिक चैनल पर उनके बयान आ रहे हैं। कई बार तो मीडिया ऐसे पेश आता है मानो अमर सिंह समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा हों और मुलायम सिंह पार्टी के महासचिव। इसे मीडिया की खुराफात कहें या मुलायम सिंह की मजबूरी। फिलहाल जो भी हो यादवों के नाम पर राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव लोकसभा चुनावों से कोई सबक लेने को तैयार नहीं दिखते। उधर उनके पुत्र अखिलेश यादव भी युवाओं पर कोई जादू करने में असफल रहे। विधान सभा उपचुनावों में करारी हार इसी का परिणाम है। सबसे रोचक तथ्य तो यह है कि उधर सपा का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा था, दूसरी तरफ विधानसभा चुनावों में वे शिकस्त का सामना कर रहे थे। निश्चिततः यह समय है मुलायम सिंह के आत्मविश्लेषण एवं चिंतन का। एक ऐसा चिंतन जो सतही न हो, चाटुकारों के बीच न हों एवं ग्लैमर की चासनी में सजा न हो।

लालू प्रसाद यादव का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। कभी लोकसभा में 22 सीटें लाने वाले लालू यादव इस बार केवल 4 सीटें ही जीत पाये। उन्हें कोई मंत्रालय भी नहीं मिला, जिसकी तड़प अब भी बरकरार है। पर लालू यादव के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे मीडिया-फेस हैं और गाहे-बगाहे चर्चा में बने रहते हैं। फिलहाल उनकी समस्या यह है कि उन्हें लोसभा में फ्रंट रो की सीट छोड़नी पड़ेगी और उनकी पाटी्र के आफिस के लिए फस्र्ट फ्लोर से हटाकर थर्ड फ्लोर पर जगह दिए जाने की संभावना है, क्योंकि लोकसभा का नियम है कि यदि 10 से कम सीटें किसी पार्टी की आती हैं तो उस पार्टी को कार्यालय के लिए जगह थर्ड फ्लोर पर ही मिलती है। फिलहाल लालू प्रसाद इस मुसीबत से बचने का जुगाड़ ढूढ़ने में लगे हुए हैं। काश ऐसी ही मेहनत वे जनता के बीच जाकर करते तो शायद यह दिन उन्हें न देखना पड़ता।

रविवार, 16 अगस्त 2009

राजनीति में यदुवंशी- अब तक 9 यादव मुख्यमंत्री

लोकतंत्र में राजनीति सत्ता को निर्धारित करती है। राजनीति में सशक्त भागीदारी ही अंतोगत्वा सत्ता में परिणिति होती है। भारत के संविधान निर्माण हेतु गठित संविधान सभा के सदस्य रूप में लक्ष्मी शंकर यादव ने अपनी भूमिका का निर्वाह किया। वे बाद में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री एवं उ0प्र0 कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे। भारत में यादवों का राजनीति में पदार्पण आजादी के बाद ही आरम्भ हो चुका था, जब शेर-ए-दिल्ली एवं मुगले-आजम के रूप में मशहूर चौधरीब्रह्म प्रकाश दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री बने थे। तब से अब तक भारत के विभिन्न राज्यों में 9 यादव मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो चुके हैं।
1952 में मात्र 34 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री पद पर पदस्थ चौधरी ब्रह्म प्रकाश 1955 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। हरियाणा में 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व करने वाले राव तुलाराम के वंशज राव वीरेन्द्र सिंह हरियाणा के द्वितीय मुख्यमंत्री (1967) रहे। उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव (23 जून 1977-5 फरवरी 1979) व मुलायम सिंह यादव, बिहार में बी0पी0मण्डल (1 फरवरी 1968-22 मार्च 1968), दरोगा प्रसाद राय (16 फरवरी 1970-22 सितम्बर 1970), लालू प्रसाद यादव (10 मार्च 1990-31 मार्च 1995 एवं 4 अप्रैल 1995-25 जुलाई 1997), राबड़ी देवी (25 जुलाई 1997-12 फरवरी 1999, 9 मार्च 1999-1 मार्च 2000 एवं 11 मार्च 2000-22 मई 2005) एवं मध्य प्रदेश में बाबू लाल गौर ने मुख्यमंत्री पद को सुशोभित कर यादव समाज को गौरवान्वित किया। सुभाष यादव मध्य प्रदेश के तो सिद्धरमैया कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री रहे।
चौधरी ब्रह्म प्रकाश, राव वीरेन्द्र सिंह, देवनंदन प्रसाद यादव, चन्द्रजीत यादव, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, बलराम सिंह यादव, राम लखन सिंह यादव, सुरेश कलमाड़ी, सत्यपाल सिंह यादव, कांती सिंह, जय प्रकाश यादव, राव इन्द्रजीत सिंह, अरूण यादव इत्यादि तमाम यदुवंशी राजनेताओं ने केन्द्रीय मंत्रिपरिषद का समय-समय पर मान बढ़ाया है। वर्तमान में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव एवं शरद यादव क्रमशः राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी तथा जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तो मुलायम सिंह के सुपुत्र अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में सपा अध्यक्ष का पद सम्भाले हुए हैं। अरुण यादव केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री हैं। वर्तमान 15वीं लोकसभा में कुल 20 यादव सांसद हैं।

सोमवार, 18 मई 2009

543 में मात्र 19 यादव सांसद ??

पूरे देश में संपन्न चुनावों में 543 लोक सभा सीटों में से मात्र 19 यादव सांसद चुने गये हैं। उत्तर प्रदेश अकेले लोकसभा में सर्वाधिक 80 सांसद भेजता है। उत्तर प्रदेश को यादवी राजनीति के गढ़ के रूप में देखा जाता है, वहाँ इस लोकसभा चुनाव में निर्वाचित यादव सांसदों की संख्या मात्र 05 है। इनमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी), उनके पुत्र अखिलेश यादव (कन्नौज एवं फिरोजाबाद), उनके भतीजे धर्मेन्द्र यादव (बदायूँ), रामकिशुन यादव (चन्दौली) एवं सपा से बगावत कर भाजपा का आजमगढ़ में पहली बार खाता खोलने वाले रमाकान्त यादव हैं।

बिहार भी यादवी राजनीति का गढ़ माना जाता है। वहाँ से लालू प्रसाद यादव स्वयं पाटलिपुत्र की सीट अपने पुराने मित्र रंजन प्रसाद यादव (जद यू) से हार चुके हैं तो सारण सीट ने उनका वरण किया है। शरद यादव मधोपुरा से सांसद निर्वाचित हुए हैं। इसके अलावा दिनेश चन्द्र यादव (जद यू, खगड़िया) और ओम प्रकाश यादव (निर्दलीय, सिवान), हुकुम देव यादव (भाजपा, मधुबनी), अर्जुन राय(जद यू,सीतामढ़ी)सहित 07 यादव सांसद बिहार में निर्वाचित हुए हैं। छत्तीसगढ़ में मधुसूदन यादव (भाजपा, राजनांदगांव), महाराष्ट्र में एच0 जी0 अहीर (भाजपा, चन्द्रपुर), सुरेश कलमाड़ी (कांग्रेस, पुणे), गुजरात में वी0 ए0 अहीर (कांग्रेस, जामनगर), मध्य प्रदेश में अरूण सुभाष चन्द्र यादव (कांग्रेस, खंडवा),हरियाणा में राव इन्द्रजीत सिंह (कांग्रेस, गुडगाँव), एवं आंध्र प्रदेश में अंजन कुमार यादव (कांग्रेस, सिकन्दराबाद) यादव प्रत्याशियों के रूप में निर्वाचित हुए हैं।

जिस यदुकुल की अच्छी-खासी जनसंख्या हो और उसके राजनेता भारत ही नहीं अन्य पडोसी देशों में प्रभावशाली पदों पर हों, वहां 543 में 19 सासदों की संख्या संतोषजनक नहीं कही जा सकती। जरुरत है कि यादव राजनेताओं के साथ-साथ यदुवंशी भी इस और ध्यान दें !!

(नोट-यदि किसी यादव सांसद का नाम भूलवश छूट गया हो तो अवश्य सूचित करने का कष्ट करें)

रविवार, 17 मई 2009

कहाँ जा रही है यादवी राजनीति ??

उत्तर प्रदेश भारत का न सिर्फ सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है बल्कि राजनैतिक तौर पर भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाला यह राज्य इस समय राजनैतिक तौर पर संक्रमण काल से गुजर रहा है। जहाँ अन्य राज्यों में लड़ाई दो दलों के बीच होती है, वहीं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, भाजपा, सपा एवं बसपा सहित चार दलों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलती है। इन सब के बीच उत्तर प्रदेश लोकसभा में सर्वाधिक 80 सांसद भेजता है। राजनैतिक समीकरणों के साथ-साथ जातीय समीकरण भी यहाँ काफी महत्व रखते हैं। जिस उत्तर प्रदेश को कभी यादवी राजनीति के गढ़ के रूप में देखा जाता था, वहाँ इस लोकसभा चुनाव में निर्वाचित यादव सांसदों की संख्या मात्र 05 है। इनमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी), उनके पुत्र अखिलेश यादव (कन्नौज एवं फिरोजाबाद), उनके भतीजे धर्मेन्द्र यादव (बदायूँ), रामकिशुन यादव (चन्दौली) एवं सपा से बगावत कर भाजपा का आजमगढ़ में पहली बार खाता खोलने वाले रमाकान्त यादव हैं। इतने ही प्रत्याशियों ने निकटतम प्रतिद्वंद्वी के रूप में दूसरा स्थान प्राप्त किया-डी0 पी0 यादव (बसपा, बदायूं), मित्रसेन यादव (बसपा, फैजाबाद), संग्राम सिंह यादव (बसपा, बलिया), पारसनाथ यादव (सपा, जौनपुर) एवं कैलाश नाथ यादव (बसपा, चन्दौली)।

बिहार भी यादवी राजनीति का गढ़ माना जाता है। वहाँ से लालू प्रसाद यादव स्वयं पाटलिपुत्र की सीट अपने पुराने मित्र रंजन प्रसाद यादव से हार चुके हैं तो सारण सीट ने उनका वरण किया है। शरद यादव मधोपुरा से सांसद निर्वाचित हुए हैं। भारतीय राजनीति में यह जुमला लम्बे समय से दोहराया जाता था कि यदि मुलायम और लालू आपस में मिलकर राजनीति करें तो यादवों की पौ बारह होगी। दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ नहीं हुआ। यादवों के नाम पर राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी एवं राष्ट्रीय जनता दल के लिए यह अन्तःविश्लेषण का समय है कि आखिरकार उनकी इतनी दुर्गति क्यों हुई। यदि वक्त रहते वह निष्पक्षता से इसका उत्तर नहीं ढूंढ़ पाये तो आगामी पीढ़ियों को एक गलत संदेश जाएगा!!