राजेंद्र यादव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजेंद्र यादव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर राजेंद्र यादव का जाना

हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर राजेंद्र यादव का सोमवार, 28 अक्तूबर 2013 को  निधन हो गया । वह 84 वर्ष के थे।

उनका जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा ज़िले में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा भी आगरा में ही हुई.उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिंदी विषय से प्रथम श्रेणी में एमए की डिग्री हासिल की थी. उन्होंने विश्वविद्यालय में पहला स्थान हासिल किया था.

अपने लेखन में समाज के वंचित तबके और महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाले राजेंद्र यादव प्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचंद की ओर से शुरू की गई साहित्यिक पत्रिका  हंस का 1986 से संपादन कर रहे थे.अक्षर प्रकाशन के बैनर तले उन्होंने इसका पुर्नप्रकाशन प्रेमचंद की जयंती 31 जुलाई 1986 से शुरू किया था.

प्रेत बोलते हैं (सारा आकाश), उखड़े हुए लोग, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), अनदेखे अनजान पुल, शह और मात, मंत्रा विद्ध और कुल्टा उनके प्रमुख उपन्यास हैं.

इसके अलावा उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं. इनमें देवताओं की मृत्यु, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक और वहाँ पहुँचने की दौड़ प्रमुख हैं. इसके अलावा उन्होंने निबंध और समीक्षाएं भी लिखीं.

'आवाज़ तेरी' के नाम से राजेंद्र यादव का 1960 में एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ था. चेखव के साथ-साथ उन्होंने कई अन्य विदेशी साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद भी किया था.

उनकी रचना सारा आकाश पर इसी नाम से एक फ़िल्म भी बनी थी.

राजेंद्र यादव ने कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ मिलकर हिंदी साहित्य में नई कहानी की शुरुआत की थी.

लेखिका मन्नू भंडारी के साथ राजेंद्र यादव का विवाह हुआ था. उनकी एक बेटी हैं. उनका वैवाहिक जीवन बहुत लंबा नहीं रहा और बाद में उन्होंने अलग-अलग रहने का फ़ैसला किया था.

यादव 1999 से 2001 तक प्रसार भारती बोर्ड के नामांकित सदस्य भी रहे ।

साभार : BBC 
'यदुकुल'  की तरफ से हार्दिक श्रद्धांजलि !!

शनिवार, 23 मार्च 2013

साहित्यकार राजेन्द्र यादव एवं पहलवान द्वय मेवालाल यादव व नरसिंह यादव को भी मिला यश-भारती सम्मान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कला, साहित्य, रंगमंच, फिल्म व खेल जगत से जुड़े 15 विशिष्ट लोगों को राज्य सरकार के सर्वोच्च सम्मान यश भारती पुरस्कार प्रदान किए. यह पुरस्कार सामाजिक चिन्तक डॉ. राम मनोहर लोहिया की 103वीं जयंती पर उत्तर प्रदेश  की राजधानी लखनऊ में आयोजित एक समारोह में 23 मार्च 2013 को प्रदान किए गए. प्रत्येक पुरस्कार प्राप्तकर्ता को पुरस्कार स्वरूप 11 लाख रुपए का चेक, स्मृति चिह्न और अंग वस्त्र दिया गया.
  
पुरस्कार से सम्मानित व्यक्तियों की सूची निम्नलिखित है: 
• पदमभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र (गायक) 
• राजेन्द्र यादव (साहित्यकार) 
• प्रो. सत्यमित्र दुबे (साहित्यकार) 
• डा. रामकृष्ण राजपूत (साहित्यकार) 
• मस्तराम कपूर (साहित्यकार) 
• डा. सरिता शर्मा (कवियत्री) 
• वसीम बरेलवी (उर्दू शायर) 
• आमिर रजा हुसैन (रंगकर्मी) 
• अभिजीत भट्टाचार्य (पाश्र्व गायक) 
• जावेद अली (पाश्र्व गायक) 
• विवेक गुप्त (हाकी) 
• मेवालाल यादव (कुश्ती) 
• नरसिंह यादव (कुश्ती) 

• सुशी अंशु तोमर (कुश्ती) 
• सुरेश कुमार रैना (क्रिकेटर) 

क्रिकेटर सुरेश रैना का पुरस्कार उनके भाई दिनेश रैना तथा पाश्र्व गायक जावेद अली का पुरस्कार उनके पिता हामिद अली, साहित्यकार राजेन्द्र यादव का पुरस्कार उनकी पुत्री रचना यादव, पाश्र्व गायक अभिजीत भट्टाचार्य का पुरस्कार उनके पुत्र ध्रुव, साहित्यकार डा. मस्तराम का पुस्कार संस्कृति सचिव संजीव शरण ने प्राप्त किया.

विदित हो कि यश भारती पुरस्कार उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार द्वारा वर्ष 1994 में शुरू किया गया था. यह पुरस्कार उन लोगों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने कला और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दिया हो. परन्तु पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) की सरकार द्वारा यह पुरस्कार वर्ष 2007 में बंद कर दिया गया था.

गुरुवार, 21 मार्च 2013

साहित्यकार राजेंद्र यादव और कुश्ती पहलवान नरसिंह यादव भी यश भारती सम्मान की दौड़ में

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दिए जाने वाले सर्वोच्च नागरिक सम्मान, यश भारती पुरस्कार 23 मार्च को राम मनोहर लोहिया की जयंती के मौके पर दिया जाएगा। यह सम्मान पाने की दौड़ में सूबे के कई दिग्गज शामिल हैं। प्रदेश सरकार राज्य की खास शख्सियतों को आगामी 23 मार्च को लोहिया पार्क में आयोजित एक समारोह में यश भारती पुरस्कार से सम्मानित करेगी।

यश भारती के लिए फिलहाल 13 लोगों के नाम प्रस्तावित हैं। वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, यश भारती पुरस्कारों के लिए जिन संभावितत नामों की सूची बनाई गई है, उनमें उत्तर प्रदेश के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी सुरेश रैना, वाराणसी के सुप्रसिद्घ शास्त्रीय गायक छन्नू लाल मिश्र, पार्श्व गायक जावेद अली, वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद यादव के नाम शामिल हैं।

इनके अलावा कुश्ती पहलवान नरसिंह यादव, नाट्य विधा में अमीर रजा हुसैन, साहित्यकार सत्येंद्र दुबे, हॉकी खिलाड़ी विवेक गुप्ता और महिला पहलवान अंशू तोमर के नाम भी इस सूची में शामिल हैं। इसके अलावा भी कुछ नाम इस सूची में शामिल किए गए हैं। संस्कृति विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, मोटे तौर पर नामों की एक सूची तैयार की गई है, लेकिन अभी विचार-विमर्श चल रहा है और अंतिम समय में इन नामों में बदलाव भी किया जा सकता है।

सोमवार, 1 अगस्त 2011

‘हंस‘ के 25 साल और हिन्दी साहित्य के ‘द ग्रेट शो मैन‘ राजेन्द्र यादव

यदि भारत में आज हिन्दी साहित्य जगत की लब्धप्रतिष्ठित पत्रिकाओं का नाम लिया जाये तो उनमें शीर्ष पर है-हंस और यदि मूर्धन्य विद्वानों का नाम लिया जाय तो सर्वप्रथम राजेन्द्र यादव का नाम सामने आता है। साहित्य सम्राट प्रेमचंद की विरासत व मूल्यों को जब लोग भुला रहे थे, तब राजेन्द्र यादव ने प्रेमचंद द्वारा 1930 में प्रकाशित पत्रिका ‘हंस’ का पुर्नप्रकाशन आरम्भ करके साहित्यिक मूल्यों को एक नई दिशा दी।

अपने 25 साल पूरे कर चुकी यह पत्रिका अपने अन्दर कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, समीक्षा, लघुकथा, गजल इत्यादि सभी विधाओं को उत्कृष्टता के साथ समेटे हुए है। ‘‘मेरी-तेरी उसकी बात‘‘ के तहत प्रस्तुत राजेन्द्र यादव की सम्पादकीय सदैव एक नये विमर्श को खड़ा करती नजर आती है। यह अकेली ऐसी पत्रिका है जिसके सम्पादकीय पर तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाएं किसी न किसी रूप में बहस करती नजर आती हैं। समकालीन सृजन संदर्भ के अन्तर्गत भारत भारद्वाज द्वारा तमाम चर्चित पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं पर चर्चा, मुख्तसर के अन्तर्गत साहित्य-समाचार तो बात बोलेगी के अन्तर्गत कार्यकारी संपादक संजीव के शब्द पत्रिका को धार देते हैं। साहित्य में अनामंत्रित एवं जिन्होंने मुझे बिगाड़ा जैसे स्तम्भ पत्रिका को और भी लोकप्रियता प्रदान करते है।

कविता से लेखन की शुरूआत करने वाले हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने बड़ी बेबाकी से सामन्ती मूल्यों पर प्रहार किया और दलित व नारी विमर्श को हिन्दी साहित्य जगत में चर्चा का मुख्य विषय बनाने का श्रेय भी उनके खाते में है। निश्चिततः यह तत्व हंस पत्रिका में भी उभरकर सामने आता है। आज भी ‘हंस’ पत्रिका में छपना बड़े-बड़े साहित्यकारों की दिली तमन्ना रहती है। न जाने कितनी प्रतिभाओं को इस पत्रिका ने पहचाना, तराशा और सितारा बना दिया, तभी तो इसके संपादक राजेन्द्र यादव को हिन्दी साहित्य का ‘द ग्रेट शो मैन‘ कहा जाता है। निश्चिततः साहित्यिक क्षेत्र में हंस एवं इसके विलक्षण संपादक राजेन्द्र यादव का योगदान अप्रतिम है।

(राजेंद्र यादव के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए क्लिक करें- http://en.wikipedia.org/wiki/Rajendra_Yadav)
संपर्क-राजेन्द्र यादव, अक्षर प्रकाशन प्रा0 लि0, 2/36 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली

हंस के जरिये हिंदी का इतिहास बनाया राजेंद्र यादव ने - नामवर सिंह

हंसाक्षर ट्रस्‍ट और ऐवाने गालिब की ओर से 'हंस' पत्रिका के पचीस साल पूरे होने पर रविवार को आयोजित रजत जयंती समारोह में 'साहित्यिक पत्रकारिता और हंस' पर बोलते हुए हिंदी के वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि 'हंस' के जरिए इसके संपादक राजेंद्र यादव ने हिंदी के इतिहास को बनाने के साथ-साथ उसे पालने-पोसने का काम भी किया है. नामवर सिंह ने 'हंस' में अपनाए गए लोकतांत्रिक रुख की प्रशंसा करते हुए कहा कि हंस में निंदकों को भी उतनी ही जगह और स्‍वतंत्रता दी गई जितनी प्रशंसकों को. उन्‍होंने मुंशी प्रेमचंद के जमाने से 'हंस' के इतिहास को उजागर करते हुए कहा कि प्रेमचंद के 'हंस' के बाद 'हंस' का एक नया अर्द्धवार्षिक अंक निकला, लेकिन वह अंक भी पहला और आखिरी साबित हुआ. इसके बाद राजेंद्र यादव ने इसकी शुरुआत की, जो आज भी नियमित प्रकाशित हो रही है. 'हंस' के बारे में दूसरे संपादकों की टिप्‍पणियों का हवाला देते हुए सिंह ने कहा कि भविष्‍य में जब भी कोई हिंदी पत्रिकाओं का इतिहास टटोलेगा तो 'हंस' का नाम स्‍वर्ण अक्षरों में दर्ज मिलेगा. उन्‍होंने युवा पीढ़ी को राजेंद्र यादव से कहानी लिखने की शैली सीखने का आह्वान किया.

इस मौके पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार राजेंद्र यादव ने 'हंस' के पचीस साल के सफर में सहयोग देने वाले हर शख्‍स को धन्‍यवाद दिया और कहा कि उन्‍हें कई दफा ठोकरें लगीं और वे कई दफा घबराए भी लेकिन इतने लोगों के साथ ने उन्‍हें कभी निराश नहीं होने दिया. राजेंद्र यादव ने आश्‍वस्‍त किया कि 'हंस' का सफर आगे भी जारी रहेगा.

कार्यक्रम में संजीव, टीएम लालानी, गौतम नवलखा और अनिता वर्मा ने भी अपने विचार रखे. इस मौके पर 'पचीस साल पचीस कहानियां' और 'मुबारक पहला कदम' पुस्‍तकों का लोकार्पण भी किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत में 'हंस' को योगदान देने वालों में संजीव, हरिनारायण, गौतम नवलखा, अर्चना वर्मा, विभांशु दिव्‍याल, दुर्गा प्रसाद, किशन राय, टीएम लालानी और विनोद खन्‍ना को सम्‍मानित किया गया. कार्यक्रम में तसलीमा नसरीन भी मौजूद थीं. कार्यक्रम का संचालन अजय नावरिया ने किया !

चर्चित साहित्यकार राजेन्द्र यादव को शब्द साधक शिखर सम्मान

जे सी जोशी स्मृति साहित्य सम्मान के तहत दिया जाने वाला चौथा शब्द साधक शिखर सम्मान हिन्दी के प्रख्यात कथाकार और हंस के संपादक श्री राजेन्द्र यादव को देने का निर्णय हुआ है । श्री यादव को यह सम्मान आगामी 27 अगस्त को उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर पाखी महोत्सव में दिया जायेगा । इस सम्मान के तहत उन्हें 51 हजार रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा । इस मौके पर पाखी के श्री राजेन्द्र यादव पर केंद्रित अंक का लोकार्पण भी होना है । यह सूचना श्री अपूर्व जोशी ने दी, जो इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी के अध्यक्ष और दि संडे पोस्ट के संपादक हैं। गौरतलब है कि इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी पिछले दस साल से हिन्दी साहित्य का प्रकाशन तथा अन्य सामाजिक गतिविधियां कर रही है । जिसमें दस साल से लगातार हिन्दी साप्ताहिक अखबार दि संडे पोस्ट के प्रकाशन के अलावा तीन साल से हिन्दी पत्रिका पाखी का भी प्रकाशन कर रही है । इसके अलावा सोसायटी ने कई जाने माने लेखकों की पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं ।

श्री राजेन्द्र यादव के पहले यह सम्मान स्व. विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल और श्री नामवर सिंह को दिया जा चुका है । यह सम्मान उन्हें समग्र साहित्यिक अवदान के लिये दिया जा रहा है। नयी कहानी आंदोलन की त्रयी में से एक रहे राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा में हुआ। ‘सारा आकाश’, ‘उखड़े हुए लोग’, ‘शह और मात’ जैसे उपन्यास लिख चुके श्री राजेन्द्र यादव अगस्त 1986 से हंस मासिक साहित्यिक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं । इस पत्रिका ने दलित और स्त्री विमर्श को नयी जमीन दी । हंस ने इस साल 25 वर्ष पूरे कर रजत जयंती मनायी है ।

'यदुकुल' की तरफ से राजेंद्र यादव जी को कोटिश: बधाई !!

सोमवार, 26 जुलाई 2010

एक नॉन-पापा की बात : रचना यादव

'मैं वापस आऊँगा, जरूर आऊँगा, पहचान पाओगे मुझे' -राजेन्द्र यादव. ..1983 में पापा की टेबल पर रखे कुछ थीसिस के नोट्स में मैंने यह लाइन पढ़ी. ऐसा लगा कि यह लाइन एक ऐसे व्यक्ति के अंदर से फूटी है, जो कहीं भटक गया है, खो गया है या खत्म हो रहा है. पर अपने आपको फिर से खड़ा करने की चाह उतनी ही जीवित है और उम्मीद उतनी की प्रबल. और क्यों यह पंक्ति पापा द्वारा कही गई थी तो मेरे अनुमान से यह एक लेखक अपने पाठकों को संबोधित कर रहा था. मरते हुए लेखक की इस लाइन ने, पापा को पहली बार मेरे सामने एक लेखक के रूप में जीवित कर दिया.जानती तो थी ही कि वे लेखक हैं. जानती क्या, दिन-रात पापा को लिखते-पढ़ते देखती थी. पर इस पंक्ति में छिपी कुंठा ने मुझे अंदर तक इस हद तक छू लिया कि पहली बार मुझे पापा के लेखक होने का अर्थ समझ आया. केवल लेखक ही नहीं, एक सफल लेखक होना उनकी जिंदगी में कितनी अहमियत रखता है, इस बात का अहसास मुझे उस दिन पहली बार हुआ.

साल भर पहले गीताश्रीजी ने मुझे पापा के बारे में लिखने को कहा और मैं टालती गई. मैंने तो इतनी गहराई से कभी पापा का व्यक्ति-विश्लेषण किया ही नहीं. दिमाग में ही नहीं किया तो कागज पर क्या उतारूँ. वैसे भी मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह प्रसन्न दिखने वालों का कम और दुखी लोगों का विश्लेषण ज्यादा करता है. और जब पापा के बारे में सोचने बैठी तो इतना तो समझ आ ही गया कि इतने प्रसन्न, सहज-सरल दिखने वाले पापा, विश्लेषण के लिए एक जटिल विषय हैं.

जैसा मैंने कहा कि उस दिन पहली बार मुझे अहसास हुआ कि लेखन और लेखक होना, पापा की जिंदगी में कितना महत्व रखता है. उनकी समस्त जिंदगी और शायद जीने का कारण ही उनका लेखन है. पर क्योंकि अनेक लोगों ने, समीक्षकों ने उनकी रचनाओं पर और लेखक-राजेन्द्र यादव पर बहुत कुछ लिखा है, मैं कोशिश करूँगी कि अपने अनुभव के आधार पर, उनके पिता-रूप पर टिप्पणी करूँ.

मुझे नहीं याद कि पापा (जिनको मैं बचपन से ही पप्पू बुलाती हूँ) को मैंने कभी दुखी या अवसाद में देखा हो. कुछ किस्से मम्मी बताती हैं, जब वे बहुत रोए या दुखी हुए पर मैंने खुद कभी नहीं देखा. सारे समय हँसी-मजाक, मस्ती-मुझे तो बस यही याद है. 'बाबा मौज करेगा' ताली बजाते हुए, फकीरी अंदाज में वह इस तकिया-कलाम को बोलकर घर में कभी भी किसी भी चिंताजनक या तनाव के माहौल को क्षणभर में हलका कर देते.

मुझे यह भी याद नहीं कि उन्होंने मुझे कभी डाँटा हो या नाराज हुए हों. या कभी अच्छे बच्चे बनने के तौर-तरीकों पर लंबे भाषण पेले हों, जो अक्सर आम पिता अपने बच्चों के साथ करते हैं. या कभी पढ़ाई करने के लिए डॉक्टर-इंजीनियर बनने के लिए कोई जोर या दबाव डाला हो. इस सबको पढ़कर तो कोई भी बच्चा यह सोच सकता है कि वाह! ऐसे पापा सबको मिलें और कम ही लोग इतने अच्छे पापा बन पाते हैं.

पर असलियत तो यह है कि पापा बनना तो उन्हें कभी आया ही नहीं. फिर अच्छा पापा बनना तो दूर की बात है.

मेरे लिए तो माँ और पिता, इन दोनों की भूमिकाएँ मम्मी ने ही अदा कीं. मुझे नहीं लगता कि उन्हें कभी इस बात का अहसास हुआ कि उनकी एक बेटी है, जो उनकी जिम्मेदारी है.बचपन में मुझे कई बार बात खटकती थी कि मेरे पापा अन्य पापाओं से अलग क्यों हैं? वे दूसरे बच्चों के पापाओं की तरह मुझे बस-स्टाप पर छोड़ने क्यों नहीं आते? इंडिया-गेट और चिल्ड्रन म्यूजियम क्यों नहीं जाते? या टाई और सूट पहन, ब्रीफकेस लेकर, ऑफिस की गाड़ी में बैठे, ऑफिस क्यों नहीं जाते? आसपास के माहौल से प्रभावित जो मेरे दिमाग में उस समय एक 'पिता-छवि' थी, उसमें वे दूर-दूर तक कहीं फिट नहीं होते थे. बुरा भी लगता था और शायद अपनी सहेलियों के बीच कॉलेक्स भी होता था.पर आज सोचती हूँ तो लगता है कि यदि वह एक आम पिता की तरह यह सब करते तो मैं भी शायद आम लड़की की तरह एक सुघड़ गृहिणी होकर रह जाती. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर आम और अच्छे पिता के बच्चे साधारण ही निकलते हैं. मैं केवल अपने संदर्भ में यह बात कह रही हूँ.

हाँ, यह जरूर है कि इस नॉन-पापा की भूमिका को पापा ने इस हद तक अदा किया कि मेरे बहुत बीमार होने पर भी वे गायब. डॉक्टर के पास ले जाने की तो उनसे अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए थी. जिस व्यक्ति के अपने पिताजी यानी मेरे दादा साहेब ने, उनकी बीमारी के दिनों में महीनों उनके सिरहाने बैठकर उनकी देखभाल की वह व्यक्ति अपनी खुद की बेटी की बीमारी में ऐसा कर सकता है-यह विश्वास करना ही बहुत कठिन है, पर सुनती हूँ कि ऐसा ही हुआ. और मम्मी का इस बात पर बहुत-बहुत नाराज होना तो जायज ही था.

ऐसी कुछ और घटनाएं हैं, जिनको सुनकर मुझे पापा से बहुत नाराजगी होनी चाहिए. जिस पल सुनती हूँ उस क्षण गुस्सा भी आता है पर बाद में गुस्से से ज्यादा उनके लिए दुख होता है-'घर-बार', 'बाल-बच्चे' न वे इन सबके लिए बने हैं और न यह सब उनके लिए. कहाँ फँस गए बेचारे! और हाँ, यह खयाल मम्मी के लिए भी उतना ही आता है-किस आदमी के साथ फँस गईं बेचारी!इन दोनों 'बेचारे' माँ-बाप की इकलौती संतान होने के नाते, मुझे तो अति बेचारा होना चाहिए था. पर अपने बेचारेपन के बावजूद दोनों ने मुझे इतना मनोबल दिया कि मैंने अपने आप को कभी बेचारा महसूस ही नहीं किया. मेरे व्यक्तित्व को ढालने में मम्मी का तो बहुत बड़ा और सक्रिय योगदान है ही, पर यदि कभी उन पर लिखा तो इसकी चर्चा करूँगी. इस लेख को मैं पापा पर ही केंद्रित रखने की कोशिश करूँगी.

मम्मी कहती हैं कि मेरी शक्ल-सूरत भले ही उनसे मिलती हो, पर मेरा स्वभाव, मेरी आदतें अपने पिता से बहुत मिली हैं. अब इस बात को वह नाराजगी के क्षणों में कहती हैं या प्यार के, यह तो मैं आज तक नहीं समझ पाई. पर लगता है, इसमें कुछ सच्चाई अवश्य है.मेरी माँ और कुछ बहुत ही करीबी मित्र मेरी एक आदत से परेशान और कभी-कभी नाराज भी रहते हैं कि मैं अपने अंदर चलते विचारों को खुलकर कभी व्यक्त नहीं करती. कोई काम करने का विचार है तो उसे पहले न बताकर काम शुरू हो जाने के बाद सूचना देती हूँ. और यही आदत मैंने कई गुणा अधिक पापा में देखी हैं. आप कभी अंदाज ही नहीं लगा सकते हैं कि उनके भीतर क्या चल रहा है. किस काम को करने की कैसी योजना. ऐसी बातों को वे शायद ही किसी के साथ शेयर करते हों. और यदि कभी मजबूरी में करना भी पड़ा हो तो केवल उस स्थिति में, जब उनकी योजना में दूसरे व्यक्ति की साझेदारी अनिवार्य हो.अब ऐसे व्यक्ति के साथ रहना और रिश्ता निभाना कतई आसान नहीं है पर क्योंकि कुछ हद तक मैं भी ऐसी ही हूँ तो शायद एक स्तर पर समझ सकती हूँ और एक सीमा तक बिना गिला-शिकवे के स्वीकार भी कर सकती हूँ.

बात को बहुत देर तक छिपाए रखने के पीछे स्थिति अनुसार कारण तो अनेक हो सकते होंगे पर मेरे अनुमान से मोटा-मोटी दो कारण दिमाग में आते हैं-या तो वह बात, काम या विचार इतना गलत है कि उसे छिपाने में ही अपनी और सामने वाली की भलाई है. या फिर अपने अंदर आत्मविश्वास की कमी होना.

सोचे हुए काम को करने की क्षमता मुझमें न हुई तो? योजना असफल हो जाए तो? पहले से ही ढिंढ़ोरा पीट लिया तो कितनी खिल्ली उड़ेगी. बेहतर यही है कि पहले समझ लो, परख लो, करके देख लो. अगर सफल हो गए तो वाह! अपने आप ही बात बाहर आ जाएगी. और अगर नहीं बन पाया तो कम से कम इस शर्मनाक हार के बारे में किसी को पता तो नहीं चलेगा. मेरी क्षमता और काबिलियत पर प्रश्न तो नहीं उठेंगे.

यह विश्लेषण मेरी अपनी सोच है, मेरे निष्कर्ष. मेरे दृष्टिकोण से. हो सकता है कि यह सच्चाई से कोसों दूर हो, पर हर व्यक्ति का अपना एक नजरिया होता है, जिसके अनुसार वह अपनी धारणाएँ बना लेता है और उसके लिए वही सच है. उसका सच.


तो जहाँ तक मेरी समझ जाती है, मेरी यही धारणा है कि कहीं बहुत गहराई में छिपे इस आत्मविश्वास की कमी से मुक्त होने के लिए या उस पर विजय पाने की निरंतर और अटूट कोशिश ने पापा के चरित्र में एक और विशेषता को जन्म दिया. उनकी बेहिसाब और उदाहरणीय दृढ़ता. यदि एक बार किसी काम को करने का दृढ़ संकल्प कर लिया तो बस, उसके पीछे लग गए. पूरी एकाग्रता और तल्लीनता के साथ.

ऊपर से इतने मस्त और फक्कड़ दिखने वाले पापा इस हद तक आत्मप्रेरित और अनुशासित हैं कि जब वे किसी योजना में लगते हैं उनका यह अनुशासन उसमें किसी भी प्रकार की रुकावट या अड़चन डालने की अनुमति नहीं देता. अपने लिखने-पढ़ने का समय न वे किसी को दे सकते हैं, न ही किसी के साथ शेयर कर सकते हैं. फिर चाहे वह उनका कितना ही करीबी या प्रिय मित्र अथवा संबंधी ही क्यों न हो.


सुनने में भले ही यह एक सेल्फ-सेंटर्ड व्यक्ति का चित्र उभारता हो और पापा के लिए यह कहना गलत भी नहीं होगा. पर मैं समझती हूँ कि कुछ विशिष्ट पाने के लिए थोड़ा सेल्फ-सेंटर्ड होना ही पड़ता है.

अब चाहे यह सही हो या गलत, मैं तो अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझती हूँ, क्योंकि उनकी यह चरित्र-विशेषता मैंने उनसे विरासत में ली है. यदि आज मुझमें कुछ अलग करने की चाह है और मैं लगभग भूतियाभाव से उस काम के पीछे लग जाने की क्षमता रखती हूँ तो वह काफी हद तक पापा की ही देन है. बिना पैशन और जुनून के जिंदगी व्यर्थ है- यह मैंने पापा से ही सीखा है.

कहते हैं कि 'पीपुल हू हैव ए पैशन इन लाइफ आर ट्रली ब्लैंस्ड, एंड पीपुल हू स्पेंड देयर एंटायर लाइव्स विदाउट ए पैशन, मे ऐस वेल हैव नॉट लिव्ड' और इसे मैं पापा की अपने लिए सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण देन समझती हूँ. इसी से जुड़ा हुआ एक और पहलू है. एक और ऐसी शिक्षा जो मैंने पापा से ही ली. बचपन से ही मैंने अपने घर में कभी भी पूजा-पाठ होते नहीं देखा. मंदिर जाना, व्रत रखना या जागरण में जाना-इस सबका कोई सिलसिला नहीं था.

जागरण तो जरूर होते थे और उनमें मम्मी-पापा के करीबी मित्र भी शामिल होते थे, पर धार्मिक और सत्संगी भाव से एकदम विपरीत. हँसी-मजाक, एक दूसरे की टाँग खिंचाई और बौध्दिक बहसों में रातें गुजरती थीं. मम्मी फिर भी साल में एक बार दीपावली पर पूजा का माहौल बनाने का प्रयत्न करती थीं, पर पापा के होते वह भी अक्सर महज, मजाक या बनकर रह जाता था.

मुझे याद है कि एक दीपावली पर मैंने पापा से थोड़ा खीजकर कहा था- 'आप कभी तो भगवान की सीरियसली पूजा कर लिया कीजिए. साल में एक बार ही सही.'मजाक की मुद्रा में, दोनों हाथ फैलाकर पापा ने जवाब दिया, 'तो फिर हमें तो अपनी ही पूजा करनी चाहिए क्योंकि साक्षात भगवान हमारे अंदर ही तो बैठे हैं. हमें तो केवल अपने आप पर ही विश्वास हैं.' पापा को तो शायद याद भी नहीं होगा, पर सालों पहले मजाक में कही इस एक पंक्ति का मुझ पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उसने मेरी सोच को एक नया मोड़ दिया. मैं अपने आपको नास्तिक तो नहीं मानूँगी, पर हाँ इतना जरूर कहूँगी कि मुझे आज सबसे ज्यादा अपने आप पर और अपनी क्षमता पर भरोसा है. मेरा यह विश्वास है कि घंटे-दो-घंटे मंदिर में पूजा करने के बजाय यदि मैं उतने समय में कुछ सकारात्मक करूँ तो शायद ज्यादा हासिल कर पाऊँ. तो मैं भी पापा की तरह कुछ हद तक अपने आपको ही पूजने की वृत्ति रखती हूँ. कुछ न मिलने पर अपने आपको ही कोसती हूँ और कुछ पाने के लिए मेहनत करने पर अपने आप को ही मजबूर करती हूँ और हड़काती रहती हूँ.

अब इस सबसे हटकर एक और किस्सा मुझे याद आता है, जो पापा के पापा-पन या नॉन पापा-पन पर प्रकाश डालता है. जैसा कि हम सब जानते हैं कि हर अच्छे भारतीय पिता की अपनी बेटियों को लेकर जो सबसे बड़ी चिंता होती है, वह होती है उसकी शादी की. अच्छी नौकरी में लगा, कमाऊ लड़का ढूँढ़ने की. पर पापा ने तो शायद यह सब कभी सोचा ही नहीं था. मेरी पढ़ाई, पहली नौकरी इत्यादि हर चीज जैसे अपने आप होती चली गई, उन्हें शायद यह विश्वास था कि यह भी अपने आप ही हो जाएगा और बाबा मौज करता रहेगा.

दिनेश जब पहली बार हमारी शादी की बात करने और घर आने वाला था तब मम्मी दिल्ली से बाहर थीं. अब इस इंटरव्यू की सारी जिम्मेदारी पापा पर! जब दिनेश कमरे में घुसा (कुर्ता, दाढ़ी और कान में बालियाँ) तो पापा अपनी कुर्सी पर, पाइप लेकर एक सख्त और जिम्मेदार पिता का चोगा पहनकर बैठे थे. शायद अपने किसी मित्र से पूछ भी लिया होगा कि ऐसी स्थिति में, एक अच्छे और सतर्क पिता की भूमिका अदा करने के लिए क्या-क्या प्रश्न पूछने चाहिए.

सारी बात तो मुझे याद नहीं, पर जो दो प्रश्न उन्होंने दिनेश से पूछे, वे मुझे अच्छी तरह याद हैं-

पापा-तो आजकल क्या कर रहे हो?
दिनेश-फिलहाल तो कुछ नहीं.
पापा-तो अब क्या करने का विचार है?
दिनेश-अभी तो पता नहीं.

यह उत्तर सुनकर कौन पिता अपनी बेटी की शादी ऐसे लड़के से करना चाहेगा? पर पापा प्रसन्न-'यह तो बिलकुल हमारी तरह है.'

हाँ, उन्होंने इतना जरूर कहा कि लड़का कुछ क्रियेटिव टाइप का दिखता है. कितना स्टेबल होगा, यह तुम देख लो. और जितने प्रसन्न पापा दिनेश से थे, आज दिनेश भी उनसे उतना ही प्रसन्न हैं. वह अक्सर कहता है. 'आई एम लकी टु हैवप ए बोहीमियन फादर-इन-लॉ लाइक हिम. डोंट ईवर ट्राय एंड पुट हिम इन ए कन्वेंशनल फ्रेमवर्क. यू विल डिस्ट्रॉय हिम.'

तो ऐसे अजीबो गरीब पापा-फिगर के साथ मैं बड़ी हुई. एक ऐसे पापा जिनको इस बात की कभी चिंता नहीं हुई कि मैं क्या खा-पी रही हूं, किस क्लास में हूँ, मैं अच्छे बच्चों की तरह आज्ञाकारी बन रही हूँ या नहीं, समाज के बने हर नियम को भरसक निभा रही हूँ या नहीं. अगर मुझे लेकर उन्हें कभी कोई चिंता हुई होगी तो वह यही होगी कि कहीं मैं बिना कोई प्रश्न उठाए समाज के बने ढर्रे पर चलने वाली, हर नियम का पालन करने वाली, एक आम हँसती-खेलती भरी-पूरी जिंदगी को ही अपनी सफलता समझने वाली, उन लाखों-करोड़ों लड़कियों की तरह न बन जाऊँ जो आईं और बिना कोई छाप छोड़े चली गईं.

कहने को तो अभी भी कई बातें हैं, कई किस्से हैं, पर यहाँ अंत करते हुए यही कहूँगी कि 1983 में पढ़ी उस पंक्ति ने एक लेखक को तो मेरे सामने जीवित कर दिया पर ऐसा कोई भी किस्सा याद नहीं आता है, जिसने मुझे उनके एक कन्वेंशनल पिता होने का अहसास दिलाया हो. वह लेखक बनने में ही इतने व्यस्त रह गए कि पिता बनने तक की तो नौबत ही नहीं आई.

पर इस सबके बावजूद आज पापा और मेरे बीच इतना स्ट्रांग बॉडी है कि उसे केवल हम दोनों ही समझ सकते हैं. बिना पिता की भूमिका अदा किए हुए ही उन्होंने मुझे और मेरे व्यक्तित्व को इतना कुछ दे दिया है कि मुझे इस बात का बहुत गर्व है कि मैं राजेन्द्र यादव की बेटी हूँ।
(रचना यादव, चर्चित साहित्यकार व हंस के संपादक राजेंद्र यादव जी की पुत्री हैं. उनका यह आलेख किताबघर से गीताश्री के संपादन व संयोजन में प्रकाशित 'राजेंद्र यादव और तेइस लेखिकाएं' में शामिल है. इस किताब में राजेंद्र यादव से संबंधित आलेख, संस्मरण और साक्षात्कार हैं.)
साभार : रविवार

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

80 साल के हुए राजेंद्र यादव

यूँ तो व्यक्ति का जन्म एक ही दिन होता है। अतः उसका जन्मदिन भी साल में एक बार ही पड़ता है। इंसान बुलंदियों पर होता है तो उसका जन्मदिन उत्सव के रूप में कई-कई दिनों तक चलता रहता है। अब यही चर्चित साहित्यकार राजेंद्र यादव जी के साथ हो रहा है. साहित्याकाश के वह चमकते सितारे हैं। जिसकी कथा उन्होंने ’हंस‘ में छाप दी, वह भी रातोंरात स्टार बन जाता है। तो जनाब इसी शख्सियत का 80वां जन्मदिन आज 28 अगस्त (1929 में जन्म) को है लेकिन उनके चाहने वालों ने इस बार उनका जन्मदिनोंत्सव दो दिन मनाने का फैसला किया है। एक दिन का जिम्मा ख्यात साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने अपने कंधे पर उठा रखा है तो दूसरे दिन की जिम्मेदारी स्वयं राजेंद्र यादव की नृत्यांगना बिटिया रचना यादव पर है। अब बिटिया की बात तो समझ में आती है लेकिन अशोक वाजपेयी के ‘होस्ट‘ बनने का कारण क्या है? इस बारे में पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह की बातें हो रही हैं, लेकिन सुना यह भी जा रहा है कि जबसे एक मंच से नामवर सिंह ने राजेंद्र यादव की खिंचाई की है, अशोक वाजपेयी राजेंद्र यादव जी के और करीब सरक आए हैं। अब यह तो सभी जानते हैं कि नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी के साहित्य जगत में परस्पर रिश्ते कैसे हैं? इसलिए यह बताने की जरूरत भी नहीं कि अशोक वाजपेयी दावत क्यों दे रहे हैं....! खैर, हम तो यही कहेंगे हैप्पी बर्थ-डे टू राजेंद्र यादव जी. आप दीर्घायु हों...आपकी साहित्यिक उम्र दीर्घायु हो...आखिरकार आप साहित्य जगत के साथ-साथ यदुवंशियों के भी सिरमौर हैं.

शनिवार, 1 अगस्त 2009

मुड़ मुड़ के देखता हूँ- राजेंद्र यादव

मुड़ मुड़ के देखता हूँ....राजेंद्र यादव जी की ये आत्मकथा पढ़ने का मन हुआ मेरा मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक कहानी ये भी पढ़ने के बाद। चूँकि राजेंद्र यादव की आत्मकथा पहले लिखी गई थी और मन्नू जी की बाद में तो सोचा पहले इस की चर्चा कर लें। मगर ये भी सच है कि मन्नू भंडारी की आत्मकथा पढ़ने के बाद बड़ा मुश्किल था खुद को तटस्थ और पूर्वाग्रहों से अलग रख पाना। मगर फिर भी प्रयास यही किया है कि इस चर्चा में खुद को मन्नू भंडारी से मुक्त रख सकूँ और चर्चा सिर्फ और सिर्फ मुड़ मुड़ के देता हूँ पुस्तक की करूँ!

यह पुस्तक १० अध्यायों मे लिखी गई है। अध्याय को अध्याय नाम नही बल्कि सुंदर शीर्षकों से सजाया गया है। पहले अध्याय मुड़ मुड़ के देखता हूँ में ही राजेन्द्र यादव जी ने कहा कि इसे उनकी आत्मकथा नही बल्कि आत्मकथांश समझा जाये॥! शायद सही ही कहा। क्योंकि आगे चल के कई जिज्ञासाएं अधूरी ही रह जाती हैं, राजेंन्द्र जी को जानने से संबंधित।फिर दूसरा अध्याय भूमिका।तीसरा अध्याय हक़ीर कहो फक़ीर कहो में अपनी साठवीं वर्षगाँठ पर मित्रों के बीच राजेंद्र जी द्वारा आगरे में दिया गया वक्तव्य है।चौथा अध्याय है अंत से शुरुआत॥जो दुर्घटनाओं में भी बचा रहता है अर्थात संकल्प, जिसमें जिक्र किया है उन्होने दिल्ली से कानपुर गिरिराजकिशोर जी के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम मे जाते हुए हुई राजधानी ट्रेन दुर्घटना से सही सलामत आ जाने का।पाँचवा अध्याय ऐयार (इम्पोस्टर) से सावधान में अपने हम शक्लो की चर्चा के साथ अपने विभिन्न चेहरों (मुखौटों) के प्रति आगाह किया है।छठे अध्याय अपनी नज़र से में किसी प्रिय को संबोधित करते पत्र मे अपने विषय में टुकड़ों ड़ुकड़ों में लिखा है जहाँ कुछ कुछ देर के लिये कुछ लेखक मित्र मन्नू से विवाह उनसे मनोमालिन्यता और पिता की मृत्यु का भी जिक्र है।

सातवाँ अध्याय पुनः मुड़ मुड़ के देखता हूँ, जहाँ मुझे कुछ क्रम सा नज़र आता है,जिसमे शुरु से ही शुरु है :)। और मैने जब पुस्तक पढ़ी तो यहीं से पढ़ी। पीछे का कुछ तब समझ में आया जब इसे पढ़ लिया। अतः पिछले छः अध्याय मैने पुनः पढ़े या बाद में पढ़े। यहाँ राजेंद्र जी के बचपन का घर, उनका अपने चाचा जी के घर पढ़ने को जाना, वहाँ बच्चों के झगड़े में किसी बच्चे के हाकी मार देने से राजेंद्र जी के पैर में चोट आना, घर पर बात छुपा ले जाने के कारण चोट का बढ़ जाना और घुटने से टखने तक की हड्डी का गल जाना और आपरेशन द्वार निकाल दिये जाने से पैर में कुछ समस्या आ जाना तथा बैसाखी के सहारे चलना। यहीं उन्होने अपनी रचनात्मकता की शुरुआत को भी समझा। दिनभर बिस्तर पड़े होने से उनकी कल्पना शक्ति बढ़ी और कथाकारी करने लगी। यहाँ उन्होने अपनी विभिन्न किताबों के विषय में लिखा।

आठवें अध्याय मुड़ मुड़ के देखता हूँ भाग २ ये तुम्हारा स्वर मुझे खींचे लिये जाता.... में चर्चा की है अपने मित्रों की जिसमें विस्तार महिला मित्रों को ही मिला है। हेमलता नाम की उनकी किसी उद्योगपति घराने से संबंध रखने वाली प्रशंसिका, जिसे उन्होने बाद में दीदी कहना शुरू कर दिया, उनकी रचनाओं पर उन दीदी का प्रभाव इस कदर था कि मित्र उन्हे दीदीवादी लेखक भी कहने लगे बाद में कुछ आकर्षण..... जिसको बंधन आर्थिक विषमता के कारण नही मिल सका। कर्मयोगी के संपादक रामरखसिंह सहगल की मृत्यु के बाद बी०एड० करने आई उनकी पु्त्री से अति आकर्षण,जिसके आगे ना बढ़ पाने के लिये राजेन्द्र जी ने अपनी अपंगता को दोषी माना। फर्राट मीता जिससे परिचय उनका ट्यूशन के जरिये तभी हुआ जब वो १४-१५ वर्ष की ही थी और अब लगभग ५० वर्षो की जनपहचान हो चुकी है; जिसने विवाह प्रस्ताव कि यह कर टाल दिया कि हम मित्र है है और मित्र ही रहेंगे। राजेंन्द्र यादव ने जिसे पर लिखा कि "ये साफ साफ मेरा रिजेक्शन था। तुम सिर्फ कभी कभी मित्रता के लायक हो, साथ बँधने के नही।" बाद में उन्होने ये भी स्वीकार किया कि मन्नू जी से विवाहके पश्चात कई बार जब मीता और राजेंन्द्र जी ने शादी की तारीखें भी तय कर लीं तब पता नही किन कारणों से राजेन्द्र यादव ही पीछे हट गये। इस विश्वासघात के लिये उनका कहना है कि इसने उन्हे ही बार बार तोड़ा। इन सारे संबंधों से परे जहाँ किसी ने शारीरिक और किसी ने आर्थिक विषमताओं की आड़ ले कर राजेंद्र जी से, मित्रता की तो सारी मान्यताए निभाईं मगर जीवनबंधन में बँधने से परे रह गये; पर जब मन्नू जी ने उन्हे जस का तस स्वीकार किया तब भी वो ना जाने कौन से कारण थे जिन्होने उन दोनो को साथ नही रहने दिया। जबकि राजेंन्द्र जी स्वीकार करते हैं कि रिश्तेदारों और मित्रों के बीच मन्नू जी उनका अहम् बड़ी चतुराई से रख लेती थी। बच्ची, परिवार, समाज, राजेंन्द्र जी को जब जब जरूरत हुई तब तब सहयोग के बावजूद राजेंद्र जी घर गृहस्थी में न जम सके क्योंकि उनके अनुसार "बौद्धिक और व्यक्तिगत तौर पर वह सब मुझे असहज बनाता है जो जिंदगी को बने बनाये ढर्रे में कैद कर के सारी संभावनाओं को समाप्त कर देता है।" प्रभा खेतान का भी हल्का फुल्का जिक्र है। अनेकानेक स्त्रियो से संबंध मे वे दीदी, मीता और मन्नू का विशेष योगदान मानते हैं अपने जीवन में। मगर अब तीनो ही उनकी जिंदगी में नही है। जिंदगी किशन नाम के एक नौकर के सहारे ही चल रही है।अध्याय के अंत में कलकत्ते का एक रात घूमने का वर्णन है। नवें अध्याय हम ना मरै मरिहैं संसारा में अपनी मृत्यु की परिकल्पना का दृश्य

और अंत में एक आटोप्सी (शव परीक्षा) जिसे तोते की जान शीर्षक से लिखा है अर्चना वर्मा ने और मैं इसे पुस्तक की जान मानती हूँ। राजेंन्द्र जी के गुण और दोषों को जिस पारदर्शिता के साथ लिखा गया इस परिशिष्ट में वो काबिल-ए-तारीफ है। संपादक राजेंद्र जी के साथ के रोज के अनुभवो से ले कर मन्नू जी को खाँटी घरेलू औरत कहने पर तीक्ष्ण प्रतिक्रिया तक।

अंत में अपनी तरफ से ये कहूँगी कि कहना तो बहुत कुछ चाह रही थी मैं। मगर फिर ये लगता है कि किसी की कहानी पर कुछ कहो तो कहो किसी की जिंदगी पर क्या कहना? शायद सच ही कह रहे हो राजेंद्र जी कि " जो कुछ उन्होने किया, उसके सिवा वे और कुछ कर ही नही सकते थे। रफ़ हो या फेयर उनकी जिंदगी यही होती जो है...!" हाँ मगर कुछ चीजो को स्थान न देने की शिकायत तो कर ही सकती हूँ। बचपन में एक बड़ी दुर्घटना जिसने उनका जीवन बदल दिया उससे निकलने में कहीं न कहीं परिवार का, माता पिता का शायद बहुत बड़ा सहयोग रहा होगा। उसको उतना विस्तार नही मिला जितना मिलना चाहिये था। एक पाठक के मन में उनके और मोहन राकेश की मित्रता और विरक्ति के भी कारण जानने की जिज्ञासा बनती है और कमलेश्वर को तो खैर उतना भी स्थान नही मिला जितना मोहन राकेश को। क्या व्यक्तित्व निर्माण में सिर्फ विपरीतलिंगी मित्रों का ही हाथ होता है।

कुछ भी हो इस बात का अफसोस भी है कि चाहे वो जो भी कारण हो मगर इस मामले में मैं राजेंद्र जी को मैं भाग्यहीन मानती हूँ कि बहुत से निःस्वार्थ रिश्ते वो संभाल न सके। उन्होने इसका दोष अपनी कुंठा को दिया। वो कुंठा जो उन्होने बार बार बताया कि उनकी अपंगता के कारण आयी॥यहाँ तो शायद मै बोलने का अधिकार रखती ही हूँ कि ये जो दैवीय गाँठे हैं, उन्हे खोलने का एक ही तरीका है स्वार्थहीन स्नेह..! और अगर ये स्नेह भी ना खोल सके गाँठें तो क्षमा करें मगर आप कोई भी जीवन पाते कुंठा के शिकार ही रहते।यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन की सजिल्द पुस्तक है मूल्य है रु० १९५/-
(साभार-कंचन सिंह चौहान,हृदय गवाक्ष)

शनिवार, 2 मई 2009

हिन्दी साहित्य के ‘द ग्रेट शो मैन‘ राजेन्द्र यादव और ‘हंस‘

यदि भारत में आज हिन्दी साहित्य जगत की लब्धप्रतिष्ठित पत्रिकाओं का नाम लिया जाये तो उनमें शीर्ष पर है-हंस और यदि मूर्धन्य विद्वानों का नाम लिया जाय तो सर्वप्रथम राजेन्द्र यादव का नाम सामने आता है। साहित्य सम्राट प्रेमचंद की विरासत व मूल्यों को जब लोग भुला रहे थे, तब राजेन्द्र यादव ने प्रेमचंद द्वारा 1930 में प्रकाशित पत्रिका ‘हंस’ का पुर्नप्रकाशन आरम्भ करके साहित्यिक मूल्यों को एक नई दिशा दी।

आज 23वें वर्ष में प्रकाशित हो रही यह पत्रिका अपने अन्दर कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, समीक्षा, लघुकथा, गजल इत्यादि सभी विधाओं को उत्कृष्टता के साथ समेटे हुए है। ‘‘मेरी-तेरी उसकी बात‘‘ के तहत प्रस्तुत राजेन्द्र यादव की सम्पादकीय सदैव एक नये विमर्श को खड़ा करती नजर आती है। यह अकेली ऐसी पत्रिका है जिसके सम्पादकीय पर तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाएं किसी न किसी रूप में बहस करती नजर आती हैं। समकालीन सृजन संदर्भ के अन्तर्गत भारत भारद्वाज द्वारा तमाम चर्चित पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं पर चर्चा, मुख्तसर के अन्तर्गत साहित्य-समाचार तो बात बोलेगी के अन्तर्गत कार्यकारी संपादक संजीव के शब्द पत्रिका को धार देते हैं। साहित्य में अनामंत्रित एवं जिन्होंने मुझे बिगाड़ा जैसे स्तम्भ पत्रिका को और भी लोकप्रियता प्रदान करते है।

कविता से लेखन की शुरूआत करने वाले हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने बड़ी बेबाकी से सामन्ती मूल्यों पर प्रहार किया और दलित व नारी विमर्श को हिन्दी साहित्य जगत में चर्चा का मुख्य विषय बनाने का श्रेय भी उनके खाते में है। निश्चिततः यह तत्व हंस पत्रिका में भी उभरकर सामने आता है। आज भी ‘हंस’ पत्रिका में छपना बड़े-बड़े साहित्यकारों की दिली तमन्ना रहती है। न जाने कितनी प्रतिभाओं को इस पत्रिका ने पहचाना, तराशा और सितारा बना दिया, तभी तो इसके संपादक राजेन्द्र यादव को हिन्दी साहित्य का ‘द ग्रेट शो मैन‘ कहा जाता है। निश्चिततः साहित्यिक क्षेत्र में हंस एवं इसके विलक्षण संपादक राजेन्द्र यादव का योगदान अप्रतिम है।


(राजेंद्र यादव के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए क्लिक करें- http://en.wikipedia.org/wiki/Rajendra_Yadav)
संपर्क-राजेन्द्र यादव, अक्षर प्रकाशन प्रा0 लि0, 2/36 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली