गुरुवार, 9 सितंबर 2010

बिरहा गायन सम्राट राम कैलाश यादव का जाना....

बात हो हल्ले की नहीं है मगर फिर कुछ तो आहट होनी थी उसके जाने पर जो उसके काम को बाकी दुनिया की तरफ से सही आदर हो सकता था.,मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं. गाँव के ठेठपन को आभास कराता एक लोककलाविद हमारे बीच अपने सादेपन और लोक गायकी की खुशबू बिखेरता हुआ ही अचानक चल बसा और मीडिया जगत में आहट तक ना हुई.दिल तब अधिक दु;खता है जब देश का कोई सादगी संपन्न कलाकार ये जहां चुपचाप छोड़ जाता है. उसके मरने के बाद उसके काम को सभी रोते देखें हैं मगर इस बार यूं.पी.के बिरहा गायन को ना केवल ज़िंदा रखने बल्कि अपने और से उसे समृद्ध और संपन्न बनाने में कोइ कसर नहीं छोड़ने वाले उसी दिशा में अपना जीवन फूँक देने वाले राम कैलाश यादव जी को क्या मिला.वैसे जो भी उनके संपर्क में आया वो ही समझ सकता है कि वक्त के साथ बिरहा के कानफोडू होने और बिगड़ जाने की हद तक आने पर उनका काम कितना महत्वपूर्ण है.जो सदा याद आयेगा. देश की कलापरक संस्थाएं ये आभास आज भी करती हैं.खैर भौतिकतावादी इस युग में कलापरक बात करना बीन बजाना लगने लगा है. इनसे अच्छा तो कुछ संस्कृतिप्रेमी मित्रों के साथ एक बैठक कर उन्हें याद कर लें बेहतर लगता है.वो भी बिना प्रेस नोट जारी किए.क्योंकि इस तरह के प्रेस नोट छप जाना कम आश्चर्यजनक बात नहीं है.

हमारे अपने जीवन से ही कुछ प्रमुख और जरूरी मूल्यों की बात अपने संगीतपरक कार्यक्रम के ज़रिए करने वाले राम कैलाश यादव संगीत नाटक आकादेमी से सम्मानित आम आदमी के गायक थे.उनके साथ पिछले दिनों आई.आई.टी.कानपुर में स्पिक मैके के राष्ट्रीय अधिवेशन के तहत छ; दिन रहने का मौक़ा मिला.जहां उनकी सेवा और उनके साथ कुछ हद तक अनौपचारिक विचार-विमर्श के साथ ही वहीं उनके गाये-सिखाए लोक गीतों पर रियाज़ के दौर बहुत याद आते हैं . अब तो वे ज्यादा गहरी यादों के साथ हमारे बीच हैं,क्योंकि वे चल बसे.आदमी के चले जाने के बाद वो ज्यादा प्यारे हो जाते हैं.ये ज़माने की फितरत भी तो है.उसी ज़माने में खुद को अलग रख पाना बहुत मुश्किलाना काम है.गांवों-गलियों और पनघट के गीत गाने वाला एक मिट्टी का लाडला ह्रदय गति से जुडी बीमारी के कारण चल बसा.

वे अपने मृत्यु के अंतिम साल में भी हमेशा की तरह भारतीय संकृति पर यथासमय भारी लगने वाली अन्य संस्कृतियों के हमले से खासे नाराज़ नज़र आते थे. कानपुर में उनका कहा एक वाक्य आज भी कचोटता है कि आज के वक्त में खाना और गाना दोनों ही खराब हो गया है.ठेठ यूं.पी. की स्टाइल में कही जाने वाली उनकी बातें भले ही कई बार समझ में नहीं आती हों लेकिन उनका लहजा और उस पर भी भारी उनके चहरे पर आने वाली अदाएं असरदार होती है.धोती-कुर्ते के साथ उनके गले में एक गमछा सदैव देखा जा सकता था.उनके गाए गीतों में अधिकांशत; अपने मिट्टी की बात है या कुछ हद तक उन्होंने मानव समाझ से जुड़ी बुराइयों पर खुल कर गाया बजाया है.उनके कुछ वीडियो और ऑडियो गीत नेट पर मिल जायेंगे,मगर नहीं मिल पाएगा तो राम कैलाश यादव का मुकराता चेहरा.ज्यादातर उनके गायन की शुरुआत में ओ मोरे राम ,हाय मोरे बाबा,मोरे भोले रसिया कहते हैं.और उस पर भी भारी उनके पीछे टेर लगाकर गाते उनके साथी . आज उनके बगैर बहुर अधूरे लगते हैं.कोइ तो उनके साथ गाते बजाते बुढा हो तक गया है.

अपने सभी मिलने वालों में भगवान् के दर्शन करने वाले निरंकारी भाव वाले गुरूजी के कई संगीत एलबम निकाले हैं. जिनमें उन्नीस सौ पिच्चानवें से अठ्यानवें के बीच निकले सती सुलोचना,दहेज़,क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद,अभिमानी रावण ख़ास हैं.उन्होंने देशभर के लगभग सभी बड़े शहरों को अपने कार्यक्रम से नवाज़ा था.उनके साथ लोक वाध्य यंत्रों की एक पांच-छ; कलावृन्द की मंडली होती रही.वे खुद खड़े होकर अपनी प्रस्तुती देते थे. बीच-बीच में कुछ अंगरेजी डायलोग बोलना और मूछों पर हाथ फेरना उन पर फबता था.उनसे सिखा एक गीत आज भी याद है जो मैं गुनगुनाता हूँ. बिरहा का कजरी में गाया जाने वाला ये एक ठेठ रंग है.कि

हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा

आवे बदरा आवे बदरा ,हमरे ………….

जाईके बरस बदरा वांई धोबी घटवा

जहां धोबइन भीगोईके पछारे कपड़ा

हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा ……………..

जाईके बरस बदरा वांई रे कुंवनियाँ

जहां पनिहारिन निहुरिके भरत बा घघरा

हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा ……………..

जाईके बरस बदरा वांई रे महलियाँ

जहां बिरहिन निहारता पिया का डगरा

हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा ……………..


जाईके बरस बदरा वांई फूल बगियाँ

जहां मलिनिया बईठके गुहत बा गुजरा

हमरे नईहर से घुमरी घुमरी आवे बदरा ……………..

जाईके बरस बदरा धनवा के खेतवा

जहां जोहतबा किसानिन उठाईके नजारा

उनके नहीं रहने के पांच दिन बाद ये खबर मुझे कोटा,राजस्थान के संस्कृतिकर्मी और स्पिक मैके के राष्ट्रीय सलाहकार अशोक जैन और स्पिक मैके कार्यकर्ता वीनि कश्यप ने दी . मैं एक ही बात सोच रहा था कि इस ज़माने में कलाकार तो बहुत मिल जाते हैं मगर सही इंसान नहीं मिल पाते .आज के दिन एक कलाकार के साथ के रूप में याद रहने वाला दिलवाला इंसान हमारे बीच नहीं रहा.उनके पांचवें बेटे कृष्ण बहादुर से बातचीत पर जाना कि गुरूजी ने अपना अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम स्पिक मैके आन्दोलन की पुणे शाखा के लिए एक सितम्बर को ही दिया था.वैसे सन अठ्ठासी से हार्ट अटक के मरीज यादव अब तक इलाहबाद से इलाज ले रहे है थे. बीमारी के चलते अचानक तबियत नासाज हुई और तीन सितम्बर को उनके गाँव लमाही जो ठेठ यूं.पी. के हरिपुर तहसील में पड़ता है से पास के कस्बे ले जाते रास्ते में ही मृत्यु हो गई.अब उनके पीछे छ; बेटे हैं,बेटी कोइ नहीं है . मगर अचरज की बात हो या शोध की कि उनमें से एक भी बिरहा नहीं गाता है. हाँ उनके दो पोते जरुर इस काम को सीख कर आज रेडियो के ज़रिए बहुत अच्छा गा-बजा रहे हैं.प्रेमचंद और दिनेश कुमार जो पच्चीस-छब्बीस सालाना उम्र लिए युवा सृजनधर्मी हैं.मतलब राम कैलाश जी यात्रा के जारी रहने आसार हैं.

भले ही और लोगों ने बिरहा गायन को मनोरंजन के लिए खुला छोड़कर तार-तार कर दिया हो मगर गुरु राम कैलाश जी आज तक भी अपने दम पर सतत बने हुए थे. अगर उनके नहीं रहने के बाद भी उन्हें सही श्रृद्धांजली देनी है तो हमें अपनी रूचि में संगीत को परख कर सुनने की आदत डालनी चाहिए. राम कैलाश जी सबसे ज्यादा संगीत के इस बिगड़ते माहौल और लोक स्वरुप का बँटाधार करते इन कलाकारों से दु:खी थे.वैसे इस बिरहा गायन की परम्परा को देशभर में बहुत से अन्य कलाकार भी यथासम्भव आगे बढ़ा रहे हैं,मगर उनकी अपने सीमाएं और विचारधारा हैं.ऐसे में ज्ञान प्रकाश तिपानिया,बालेश्वर यादव,विजय लाल यादव भी इस क्षेत्र से जुड़े कुछ ख़ास नाम हैं.ये यात्रा तो आगे बढ़ेगी ही,मगर दिशा क्या होगी,भगवान् जाने.

सारांशत: कुछ भी कहो उस प्रखर सृजनधर्मी की गहन तपस्या का कोइ सानी नहीं है. एक बात गौरतलब है कि जितने बड़े तपस्वी गुजरे हैं.उनके बाद हुई खाली जगह ,यूं ही खाली पडी रही.बात चाहे उस्ताद बिस्मिलाह खान की हों या हबीब तनवीर की ,कोमल कोठारी की या फिर एम्.एस.सुब्बुलक्ष्मी की,बात सोला आना सच्ची है.

साभार : माणिक जी : जनोक्ति ( 9 सितम्बर, 2010 को प्रकाशित)

7 टिप्‍पणियां:

RAJARAM RAKESH ने कहा…

HAM YADUKUL KO DHANYABAD DETE HAI KI RATN JINHE MIDYA DEKH NAHI PAATI HAI USE YADUKUL SAHAJTA SE DEKHKAR SABKO DIKHA DETI HAI.

Ram Avtar Yadav ने कहा…

very sad.

KK Yadava ने कहा…

राम कैलाश यादव जी का जाना बिरहा युग की एक पीढ़ी की समाप्ति की ओर इशारा करता है. पिछले दिनों बालेश्वर यादव जी का भी देहांत हो गया ...दुखद..श्रद्धांजलि !!

Aavaj ने कहा…

'यदुकुल ब्लॉग' पर जो चिंता है वह वाजिब है पर इसकी फिकर किसे है -
डॉ.लाल रत्नाकर
(लोक से जुड़े कलाकार का अवसान लोक की चिंता का विषय है न की उच्च कुलीन सामंती सोच की, संभवतः हमारी पीड़ा उनकी पीड़ा नहीं होती और जहाँ 'यादव' लगा हो सो तो और 'भिखारी ठाकुर' जैसे महालोक नायक को लोग नहीं जानते, कला के सरोकारों से जातीय प्रतिबद्धताएं किस कदर जुडी है उसकी वास्तविक छवि 'उस्ताद विसिमिल्ला खान' के मृत्यु के उपरांत कुछ विवादों को लेकर सामने आयी थी, उस समय लगाने लगा था यह मुल्क कितना महान है. यहाँ महानता जातीय जड़ता की संगीनी बनाने में सर्वाधिक योगदान उन्ही का है जो इसी जातीयता की जड़ता से सर्वाधिक प्रताड़ित और उत्पीडित किये जाते हैं. यथा नीचे उल्लिखित चिंता के कोई मायने ही नहीं निकलते-)

Akshita (Pakhi) ने कहा…

यह तो बहुत दुःख की बात है....

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

जिन्हें कभी मन से सुनते थे, उनका जाना अखर गया. उनकी पुण्य आत्मा की इश्वर शांति दें.

Ramji Yadav ने कहा…

BAHUT DUKHAD HAI RAMKAILASH JI KA JANA. IS KHABAR NE BAHUT VYATHIT KIYA HAI. VE BIRHA KI LAGBHAG DHVAST KAR DI GAYEE MAHAN KALA KE AMAR GAYAK THE. UNHONE AVDHI AUR BHOJPURI DONON HI LABOLAHJE KI GAYAKI AUR AKHYANAKTA KO EK MAULIK PAHCHAN AUR UNCHAI DI. LOK KALAON KE NAAM PAR KARODON DAKAR JANE VALI SANSTHAON AUR KRITAGHN MEDIA KO SAMAY KABHI MAAF NAHIN KAREGA. RAMKAILASH JI SIRF YADAV JATI KE NAHIN BALKI POORVANCHAL KI SAMOOCHI DHARTI KE PRATINIDHI THE! MERI UNHEN VINAMRA SHRADHANJALI!