शनिवार, 22 नवंबर 2008

अमर उजाला और साहित्य शिल्पी में आकांक्षा यादव

19 नवम्बर 2008 को रानी लक्ष्मीबाई की जयंती पर युवा लेखिका आकांक्षा यादव का एक लेख अंतर्जाल पत्रिका "साहित्य शिल्पी" पर "खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी" शीर्षक से प्रकाशित हुआ-(http://www.sahityashilpi.com/2008/11/blog-post_19.html ) यह लेख इतना सारगर्भित था कि अगले दिन 20 नवम्बर को हिंदी दैनिक 'अमर उजाला' ने अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'ब्लॉग कोना' में इस लेख को स्थान दिया. इस पर आज 21 नवम्बर को 'साहित्य शिल्पी' ने "अमर उजाला" में साहित्य शिल्पी (विशेष) शीर्षक से एक टिपण्णी प्रकाशित की- "हमारे लिये यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि साहित्य शिल्पी पर प्रकाशित माननीय आकांक्षा यादव जी के आलेख (खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी) को लोकप्रिय दैनिक समाचार-पत्र अमर-उजाला ने प्रकाशित कर हमारा मान बढ़ाया है। इसके लिये हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं।" साथ ही आकांक्षा जी और उन जैसे अन्य सभी साहित्य-शिल्पियों के भी हम शुक्रगुज़ार हैं जो अपनी उच्चस्तरीय रचनायें हमें भेजकर साहित्य शिल्पी के स्तर को उत्तरोत्तर ऊँचा उठाने में हमारी मदद करते हैं (http://www.sahityashilpi.com/2008/11/blog-post_2172.html)
इस अवसर पर यदुकुल की तरफ से भी आकांक्षा यादव को हार्दिक बधाई और शुभकामना कि वे यूँ ही उत्तरोत्तर प्रगति की सीढियाँ चढ़ती रहें......!!!

9 टिप्‍पणियां:

mauryark ने कहा…

Amar Ujala akhbar men blog ke kone men Akanksha ji ke is lekh ko padhkar achha laga.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

अमर उजाला में सम्पादकीय पृष्ठ पर ब्लॉग कोना में यह अदभुत लेख पढना रोचक लगा. वाकई आकांक्षा यादव जी का यह लेख अलग हटकर है, बधाई स्वीकारें.

Rashmi Singh ने कहा…

आकांक्षा जी और सहित्यशिल्पी को बधाई कि रानी लक्ष्मीबाई पर लिखे इस लेख को लीडिंग हिंदी समाचार पत्र अमर उजाला में ब्लॉग कोना में प्रस्तुत किया गया है.

kkyadav_ssp ने कहा…

आकांक्षा जी की सुन्दर लेखनी से एक और अतिसुन्दर एवं सारगर्भित प्रस्तुति.

kkyadav ने कहा…

Adbhut...Sahitya Shilpi aur Akanksha ji ko badhai.Bas yun hi kadam badhate rahen, karvan judta jayega !!

kkyadav ने कहा…

बुंदेलखण्ड की वादियों में आज भी दूर-दूर तक लोक -लय सुनाई देती है- खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दईं, गोला चलाए असमानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी......छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी। माना जाता है कि इसी से प्रेरित होकर ‘झाँसी की रानी’ नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चौहान ने 1857 की उनकी वीरता का बखान किया हैं*****************इसी बहाने एक रहस्य से पर्दा तो उठा. वाकई लोक चेतना में अमर शहीदों को जिस तरह याद किया गया है, स्तुत्य है.

Amit Kumar ने कहा…

आकांक्षा यादव को हार्दिक बधाई .

डाकिया बाबू ने कहा…

इस ब्लॉग पर आकर प्रसन्नता का अनुभव हुआ. कभी आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें !!

Bhanwar Singh ने कहा…

Yun badho ki nabh ko chhu lo.