बुधवार, 10 दिसंबर 2008

अभिलाषा: जागरूक संवेदना की कविताएं

यदुकुल हेतु युवा प्रशासक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव जी की चार पुस्तकें प्राप्त हुयी हैं। इन्हें सहर्ष स्वीकार किया जाता है. इनमें प्रथम पुस्तक कृष्ण कुमार यादव के प्रथम काव्य-संकलन ''अभिलाषा'' की प्रति है. शैवाल प्रकाशन, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित इस संकलन में १४४ पृष्ठों में जीवन के विभिन्न आयामों व अनुभूतियों को सहज भाषा में समेटे 12 खण्डों में विभक्त कुल 88 मुक्त छंद में रचित कविताएं हैं। कवि ने अपनी कविताओं में माँ, बचपन, नारी, प्रेयसी, प्रकृति, एकाकीपन, द़तर, ईश्वर व सम्बन्धों सभी को संजोया है। इस पुस्तक के आरंभ में पद्मभूषण श्री गोपाल दास नीरज जी के शब्द गौर करने लायक हैं- ‘श्री कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। वे यद्यपि छन्दमुक्त कविता से जुड़े हुये हैं लेकिन उनके समकालीनों में जो अत्यधिक बौद्धिकता एवं दुरुहता दिखाई पड़ती है, उससे वे सर्वथा अलग हैं। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। उनकी रचनायें जहाँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं, वहीं हृदय को भी रसाद्र करती हैं। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’’
युवा कवि एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘‘अभिलाषा’’ में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलंबनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयत्न किया है। श्अभिलाषाश् का संज्ञक संकलन संस्कारवान कवि का इन्हीं विशेषताओं से युक्त कवि कर्म है, जिसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं और विषमताओं तथा जीवन मूल्यों के साथ हो रहे पीढ़ियों के अतीत और वर्तमान के टकरावों और प्रकृति के साथ पर्यावरणीय विक्षोभों का खुलकर भावात्मक अर्थ शब्दों में अनुगंुजित हुआ है। परा और अपरा जीवन दर्शन, विश्व बोध तथा विद्वान बोध से उपजी अनुभूतियों ने भी कवि को अनेक रूपों में उद्वेलित किया है। इन उद्वेलनों में जीवन सौन्दर्य के सार्थक और सजीव चित्र शब्दों में अर्थ पा सके हैं। इस संग्रह की कविताएं एक नए पथ का निर्माण करती हैं, जहाँ अत्यधिक उपमानों, भौतिकता, व दुरूहता की बजाय स्वाभाविकता, समाजनिष्ठा एवं जागरूक संवेदना है।

7 टिप्‍पणियां:

Rashmi Singh ने कहा…

के.के. जी की कवितायेँ पढ़ती रहती हूँ. उनके संग्रह के बारे में पढ़कर अच्छा लगा.

बाजीगर ने कहा…

कृष्ण कुमार यादव ने ‘‘अभिलाषा’’ में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलंबनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयत्न किया है।.........यही तो सच्चे कवि की पहचान है.

Akanksha ने कहा…

पद्मभूषण श्री गोपाल दास नीरज जी के शब्द गौर करने लायक हैं- ‘श्री कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है।
**************ये पंक्तियाँ संग्रह की खूबसूरती को दर्शाती हैं.

Amit Kumar ने कहा…

इस संग्रह की कविताएं एक नए पथ का निर्माण करती हैं, जहाँ अत्यधिक उपमानों, भौतिकता, व दुरूहता की बजाय स्वाभाविकता, समाजनिष्ठा एवं जागरूक संवेदना है..Badhai.

डाकिया बाबू ने कहा…

परा और अपरा जीवन दर्शन, विश्व बोध तथा विद्वान बोध से उपजी अनुभूतियों ने भी कवि को अनेक रूपों में उद्वेलित किया है।
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तभी तो कहा गया है-जहाँ न पहुँचे रवि,वहाँ पहुँचे कवि.

Ratnesh ने कहा…

अनुपम पुस्तक-अनुपम प्रस्तुति.

Ratnesh ने कहा…

इस पुस्तक की समीक्षा यहाँ भी पढ़ी, बधाई--http://rachanakar.blogspot.com/2008/05/blog-post_172.html