बुधवार, 2 मार्च 2011

आकांक्षा यादव को 'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान'

युवा कवयित्री एवँ साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संस्था न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फ़िलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।

आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।

गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

अश्विनी कुमार यादव को बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड

अश्विनी कुमार यादव को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2009-2010 के लिए बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड प्राप्त हुआ है। यह अवार्ड उन्हें जूनागढ़ के जिलाधिकारी के कार्यकाल हेतु दिया गया है. इस हेतु अश्विनी कुमार को 51,000 रूपये का नकद इनाम और जूनागढ़ जिले के लिए 20 लाख रूपये का इनाम दिया गया है. गौरतलब है कि अश्विनी कुमार को वर्ष 2007-08 के लिए भी पूर्व में बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड दिया जा चूका है और उससे पूर्व वर्ष 2002-03 के लिए बेस्ट जिला विकास अधिकारी का अवार्ड भी प्राप्त हो चुका है.

आई. आई. टी. कानपुर से बी.टेक पश्चात् 1997 बीच के IAS अधिकारी रूप में चयनित अश्विनी कुमार कि गिनती तेज-तर्रार अधिकारीयों में होती है. स्वाभाव से नम्र और संवेदनशील अश्विनी कुमार मूलत: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के सैदपुर क्षेत्र के निवासी हैं. उनके पिताश्री श्री राजेंद्र प्रसाद और माताश्री श्रीमती सावित्री देवी सैदपुर में नगर पंचायत अध्यक्ष का पद सुशोभित कर चुके हैं. अश्विनी कुमार के भाई समीर सौरभ उत्तर प्रदेश पुलिस में उप पुलिस अधीक्षक तो बड़े भाई पीयूष कुमार बहुराष्ट्रीय कंपनी में उप महाप्रबंधक हैं. अश्विनी कुमार चर्चित ब्लागर और लेखिका आकांक्षा यादव के बड़े भ्राता हैं.
अश्विनी कुमार जी को इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें...!!

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

भ्रष्टाचारियों को सबक सिखा रहा है एक नौकरशाह : संतोष यादव


उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर जिले के जिलाधिकारी संतोष यादव की गिनती ईमानदार अधिकारियों में होती है. आजकल वह भ्रष्टाचारियों को सबक सिखा रहे हैं. इस पर 'जनसत्ता' अख़बार में प्रस्तुत रिपोर्ट यहाँ साभार प्रस्तुत है. संतोष यादव जैसे युवा जज्बे वाले अधिकारियों की बदौलत ही समाज प्रगति कर पता है. संतोष यादव को इस जज्बे के लिए बधाइयाँ !!

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

हिन्दी में न्यायादेश लिखने वाले पटना हाईकोर्ट के प्रथम न्यायाधीश न्यायमूर्ति : राजेश्वर प्रसाद मंडल

बहुमुखी प्रतिभा के धनी और हिन्दी में न्यायादेश लिखने वाले पटना उच्च न्यायालय के प्रथम न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश्वर प्रसाद मंडल ‘मणिराज’ यदुवंश की ही पैदाइश थे.उनका जन्म मधेपुरा जिला के गढिया में २० फरवरी १९२० को हुआ था. आपके दादा रासबिहारी मंडल सुख्यात जमींदार एवं बिहार के अग्रणी कांग्रेसी थे.रासबिहारी मंडल के तीन पुत्र भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल, कमलेश्वरी प्रसाद मंडल तथा बिन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल राजनीति में सक्रिय थे.राजेश्वर पिता भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल और माता सुमित्रा देवी के ज्येष्ठ पुत्र थे.टीएनबी कॉलेज भागलपुर से अर्थशाश्त्र में स्नातक और पटना वि०वि० से एम०ए० करने के बाद इन्होने १९४१ में पटना विधि महाविद्यालय से वकालत की डिग्री हासिल की.१९४० में आपके विवाह पटना में भाग्यमणी देवी से हुआ.

राजेश्वर प्रसाद मंडल १९४२ में वकालत पेशे से जुड़े.१९४६ तक मधेपुरा में वकालत करने के बाद ये १९४७ में मुंसिफ के पद पर गया में नियुक्त हुए.१९६६ में ये पटना हाई कोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार बनाये गए तथा १९६९ में दुमका में एडीजे बने.१९७३ में हजारीबाग के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में पदस्थापित हुए और फिर १९७९ में पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे उत्कर्ष पद पर.१९८२ में अवकाश ग्रहण करने के पूर्व वे समस्तीपुर जेल फायरिंग जांच समिति के चेयरमैन नियुक्त हुए.१९९० में ये राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य तथा १९९० में ही पटना उच्च न्यायालय में सलाहकार परिषद के सदस्य जज मनोनीत हुए.१० अक्टूबर १९९२ को इनके जीवन यात्रा का समापन पटना में ही हो गया.

बहुत सी महत्वपूर्ण उपलब्धियों से सजा था उनका जीवन.बहुत अच्छे खिलाड़ी ही नही,बहुत अच्छे इंसान भी थे वे.हिन्दी में न्यायादेश लिखने वाले पटना उच्च न्यायलय के प्रथम न्यायाधीश थे वे.उन्होंने हजार पृष्ठ से भी अधिक विस्तार में साहित्य-सर्जना की,जिनमे सभ्यता की कहानी,धर्म,देवता और परमात्मा, भारत वर्ष हिंदुओं का देश,ब्राह्मणों की धरती आदि ग्रंथों में वंचितों के प्रति अपनी पक्षधरता द्वारा यह प्रमाणित किया किया है.’जहाँ सुख और शान्ति मिलती है’ जैसे रोचक उपन्यास में उन्होंने पाश्चात्य की तुलना में भारतीय संस्कृति का औचित्य प्रतिपादित किया है तो ‘सतयुग और पॉकेटमारी’ कहानी संग्रह में अपनी व्यंग दक्षता का प्रमाण दिया है.’अँधेरा और उजाला’ के द्वारा उनके नाटककार व्यक्तित्व का परिचय मिलता है तो ‘चमचा विज्ञान’ से कवि प्रतिभा का.

सार रूप में कहें तो राजेश्वर प्रसाद मंडल मानवता के पुजारी,रूढियों के भंजक,प्रगतिकामी,सामाजिक परिवर्तन के शब्द-साधक मसीहा और सर्वोपरि एक नेक इंसान थे.स्व० राजेश्वर प्रसाद मंडल के दो अनुज क्रमश: श्री सुरेश चन्द्र यादव,पूर्व विधायक तथा श्री रमेश चन्द्र यादव (अधिवक्ता) थे.चार अत्मजों में क्रमश: डा० अरूण कुमार मंडल (अवकाश प्राप्त असैन्य शल्य चिकित्सक), सुधीर कुमार मंडल एवं शेखर मंडल (अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करके वहीं के अधिवासी) तथा किशोर कुमार मंडल(पटना उच्च न्यायालय में माननीय न्यायमूर्ति) हैं. पौत्रों में डा० मनीष कुमार मंडल (सर्जन,आईजीआईएमएस), आशीष मंडल(दिल्ली में अपना व्यवसाय), जय मंडल(विदेश में क़ानून विद्) हैं और ऋषि मंडल अभी स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं.अनुवंश परंपरा के रूप में आर० पी० मंडल हमारे बीच अभी भी मौजूद हैं.

20 फरवरी को स्व० राजेश्वर प्रसाद मंडल जी की जयंती पर श्रद्धा-सुमन !!

साभार : मधेपुरा टाइम्स

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर कार्यरत हैं.

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं।

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।
गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिंदवाडा 103, कावेरी नगर छिंदवाडा, मध्यप्रदेश

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

देवगिरि का यादव वंश

यादव वंश भारतीय इतिहास में बहुत प्राचीन है, और वह अपना सम्बन्ध प्राचीन यदुवंशी क्षत्रियों से मानता था। राष्टकूटों और चालुक्यों के उत्कर्ष काल में यादव वंश के राजा अधीनस्थ सामन्त राजाओं की स्थिति रखते थे। पर जब चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई तो वे स्वतंत्र हो गए, और वर्त्तमान हैदराबाद के क्षेत्र में स्थित देवगिरि (दौलताबाद) को केन्द्र बनाकर उन्होंने अपने उत्कर्ष का प्रारम्भ किया।

1187 ई. में यादव राजा भिल्लम ने अन्तिम चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर भी अधिकार कर लिया। इसमें सन्देह नहीं, कि भिल्लम एक अत्यन्त प्रतापी राजा था, और उसी के कर्त्तृत्व के कारण यादवों के उत्कर्ष का प्रारम्भ हुआ था। पर शीघ्र ही भिल्लम को एक नए शत्रु का सामना करना पड़ा। द्वारसमुद्र (मैसूर) में यादव क्षत्रियों के एक अन्य वंश का शासन था, जो होयसाल कहलाते थे। चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर दक्षिणापथ में जो स्थिति उत्पन्न हो गई थी, होयसालों ने भी उससे लाभ उठाया, और उनके राजा वीर बल्लाल द्वितीय ने उत्तर की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए भिल्लम के राज्य पर भी आक्रमण किया। वीर बल्लाल के साथ युद्ध करते हुए भिल्लम ने वीरगति प्राप्त की, और उसके राज्य पर जिसमें कल्याणी का प्रदेश भी शामिल था, होयसालों का अधिकार हो गया। इस प्रकार 1191 ई. में भिल्लम द्वारा स्थापित यादव राज्य का अन्त हुआ।

पर इस पराजय से यावद वंश की शक्ति का मूलोच्छेद नहीं हो गया। भिल्लम का उत्तराधिकारी जैत्रपाल प्रथम था, जिसने अनेक युद्धों के द्वारा अपने वंश के गौरव का पुनरुद्धार किया। होयसालों ने कल्याणी और देवगिरि पर स्थायी रूप से शासन का प्रयत्न नहीं किया था, इसलिए जैत्रपाल को फिर से अपने राज्य के उत्कर्ष का अवसर मिल गया। उसका शासन काल 1191 से 1210तक था। अपने पड़ोसी राज्यों से निरन्तर युद्ध करते हुए जैत्रपाल प्रथम ने यादव राज्य की शक्ति को भली-भाँति स्थापित कर लिया।

जैत्रपाल प्रथम का पुत्र सिंघण (1210-1247) था। वह इस वंश का सबसे शक्तिशाली प्रतापी राजा हुआ है। 37 वर्ष के अपने शासन काल में उसने चारों दिशाओं में बहुत से युद्ध किए, और देवगिरि के यादव राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दिया। होयसाल राजा वीर बल्लाल ने उसके पितामह भिल्लम को युद्ध में मारा था, और यादव राज्य को बुरी तरह से आक्रान्त किया था। अपने कुल के इस अपमान का प्रतिशोध करने के लिए उसने द्वारसमुद्र के होयसाल राज्य पर आक्रमण किया, और वहाँ के राजा वीर बल्लाल द्वितीय को परास्त कर उसके अनेक प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। होयसाल राजा कि विजय के बाद सिंघण ने उत्तर दिशा में विजय यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गुजरात पर उसने कई बार आक्रमण किए, और मालवा को अपने अधिकार में लाकर काशी और मथुरा तक विजय यात्रा की। इतना ही नहीं, उसने कलचुरी राज्य को परास्त कर अफ़ग़ान शासकों के साथ भी युद्ध किए, जो उस समय उत्तरी भारत के बड़े भाग को अपने स्वत्व में ला चुके थे।
कोल्हापुर के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब और पांड्य देश के राजाओं को भी सिंघण ने आक्रान्त किया, और अपनी इन दिग्विजयों के उपलक्ष्य में कावेरी नदी के तट पर एक विजयस्तम्भ की स्थापना की। इसमें सन्देह नहीं, कि यादव राज सिंघण एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करने में सफल हुआ था, और न केवल सम्पूर्ण दक्षिणापथ अपितु कावेरी तक का दक्षिणी भारत और विंध्याचल के उत्तर के भी कतिपय प्रदेश उसकी अधीनता में आ गए थे। सिंघण न केवल अनुपम विजेता था, अपितु साथ ही विद्वानों का आश्रयदाता और विद्याप्रेमी भी था। संगीतरत्नाकर का रचयिता सारंगधर उसी के आश्रय में रहता था। प्रसिद्ध ज्योतिषी चांगदेव भी उसकी राजसभा का एक उज्जवल रत्न था। भास्कराचार्य द्वारा रचित सिद्धांतशिरोमणि तथा ज्योतिष सम्बन्धी अन्य ग्रंथों के अध्ययन के लिए उसने एक शिक्षाकेन्द्र की स्थापना भी की थी।

सिंघण के बाद उसके पोते कृष्ण (1247-1260) ने और फिर कृष्ण के भाई महादेव (1260-1271) ने देवगिरि के राजसिंहासन को सुशोभित किया। इन राजाओं के समय में भी गुजरात और शिलाहार राज्य के साथ यादवों के युद्ध जारी रहे। महादेव के बाद रामचन्द्र (1271-1309) यादवों का राजा बना। उसके समय में 1294 ई. में [[दिल्ली] के प्रसिद्ध अफ़ग़ान विजेता अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी भारत में विजय यात्रा की। इस समय देवगिरि का यादव राज्य दक्षिणापथ की प्रधान शक्ति था। अतः स्वाभाविक रूप से अलाउद्दीन ख़िलज़ी का मुख्य संघर्ष यादव राजा रामचन्द्र के साथ ही हुआ। अलाउद्दीन जानता था, कि सम्मुख युद्ध में रामचन्द्र को परास्त कर सकना सुगम नहीं है। अतः उसने छल का प्रयोग किया, और यादव राज के प्रति मैत्रीभाव प्रदर्शित कर उसका आतिथ्य ग्रहण किया। इस प्रकार जब रामचन्द्र असावधान हो गया, तो अलाउद्दीन ने उस पर अचानक हमला कर दिया। इस स्थिति में यादवों के लिए अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखना असम्भव हो गया, और रामचन्द्र ने विवश होकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी के साथ सन्धि कर ली। इस सन्धि के परिणामस्वरूप जो अपार सम्पत्ति अफ़ग़ान विजेता ने प्राप्त की, उसमें 600 मन मोती, 200 मन रत्न, 1000 मन चाँदी, 4000 रेशमी वस्त्र और उसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य उपहार सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त रामचन्द्र ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी को वार्षिक कर भी देना स्वीकृत किया। यद्यपि रामचन्द्र परास्त हो गया था, पर उसमें अभी स्वतंत्रता की भावना अवशिष्ट थी। उसने ख़िलज़ी के आधिपत्य का जुआ उतार फैंकने के विचार से वार्षिक कर देना बन्द कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को उस पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफ़ूर का सामना करने में रामचन्द्र असमर्थ रहा, और उसे गिरफ़्तार करके दिल्ली भेज दिया गया। वहाँ पर ख़िलज़ी सुल्तान ने उसका स्वागत किया, और उसे रायरायाओ की उपाधि से विभूषित किया। अलाउद्दीन रामचन्द्र की शक्ति से भली-भाँति परिचित था, और इसीलिए उसे अपना अधीनस्थ राजा बनाकर ही संतुष्ट हो गया। पर यादवों में अपनी स्वतंत्रता की भावना अभी तक भी विद्यमान थी।

रामचन्द्र के बाद उसके पुत्र शंकर ने ख़िलज़ी के विरुद्ध विद्रोह किया। एक बार फिर मलिक काफ़ूद देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए गया, और उससे लड़ते-लड़ते शंकर ने 1312 ई. में वीरगति प्राप्त की। 1316 में जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई, तो रामचन्द्र के जामाता हरपाल के नेतृत्व में यादवों ने एक बार फिर स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। हरपाल को गिरफ़्तार कर लिया गया, और अपना रोष प्रकट करने के लिए सुल्तान मुबारक ख़ाँ ने उसकी जीते-जी उसकी ख़ाल खिंचवा दी। इस प्रकार देवगिरि के यादव वंश की सत्ता का अन्त हुआ, और उनका प्रदेश दिल्ली के अफ़ग़ान साम्राज्य के अंतर्गत आ गया।

साभार : भारत कोश

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

आई.ए.एस. राजेश यादव को राष्ट्रीय पुरस्कार

राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने नई दिल्ली में 25 जनवरी को भारत के निर्वाचन आयोग के डॉयमण्ड जुबली समापन समारोह में राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विशिष्ट सचिव और अजमेर के पूर्व जिला कलक्टर राजेश यादव को निर्वाचन कार्यो में सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से नवाचारों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। पुरस्कार में उन्हें एक लाख रूपये नकद एक ट्राफी और प्रमाण पत्र दिया गया.

राजेश यादव को यह पुरस्कार जिला निर्वाचन अधिकारी अजमेर के पद पर सेवायें देते हुए चुनावी तंत्र में सुधार के लिए ऑन लाईन भुगतान सिस्टम विकसित कर उसे लागू करवाने का प्रयोग करने के लिए दिया गया है। इसके लिए उन्होंने गत लोकसभा चुनाव कार्य में लगाये गये अजमेर जिले के सभी 9211 अधिकारियों और कर्मचारियों के एकाउण्ट्स लेकर उनके टी.ए.डी.ए. बिल की राशि को उनके व्यक्तिगत खातों में एडवांस में ऑन लाईन भुगतान जमा करवाया। उन्होंने यह कार्य जिले की नॉडल बैंक के माध्यम से 32 बैको की 221 ऑन लाईन और 59 ऑफ लाईन शाखाओं के माध्यम से किया। इसी प्रकार जिला परिषद एवं पंचायतों के चुनाव तथा नगर निगम के चुनाव में ब्लॉक लेवल अधिकारियों से एस.एम.एम. पर मतदान प्रतिशत और मतगणना की जानकारी हासिल कर उसका ऑन लाईन प्रसारण करवाने जैसे प्रयोग किए। इस प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से उन्होंने चुनावी तंत्र में सुधार के लिए अभिनव प्रयोग किए जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय चुनाव आयोग ने अपने हीरक जंयती समापन समारोह और बेहतर चुनाव पद्धति पर आयोजित दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ चुनाव पद्धति ईजाद करने वाले अधिकारी के रूप में राजस्थान के आई.ए.एस. अधिकारी राजेश यादव को पूरे देश से राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना।

उल्लेखनीय है कि भारत के निर्वाचन आयोग ने देश के सभी राज्यों और केन्द्रीय शासित राज्यों को पांच भागों में बांट कर इन सभी जोन से श्रेष्ठ चुनाव पद्धति पर प्रस्तुतीकरण करवाये थे। जिसमें नॉर्थ जोन से राजस्थान के राजेश यादव को सभी जोन्स में प्रथम चुना गया और उन्हें एक लाख रूपये के नकद राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की गई। समारोह में पुरूस्कृत किये गये अन्य क्षेत्रीय जोन्स के सात अधिकारियों को 25-25 हजार रूपये का नकद पुरस्कार और ट्रॅाफी प्रदान की गई। उल्लेखनीय है कि यादव को अजमेर जिला कलक्टर महानरेगा के क्रियान्वयन का श्रेष्ठ कार्य करने के लिए गत वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिल चुका है। यादव ने पिछले दिनों दिल्ली में मतदान दल कर्मियों के लिए ऑनलाईन भुगतान पद्धति का प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने इस पद्धति का सोर्स कोड भी भारत के निर्वाचन आयोग को सौंपा है, ताकि चुनावी तंत्र में सुधार के लिए ऑन लाईन भुगतान की इस पद्धति को देशभर में लागू किए जाने की कवायद हो सके।

समारोह में राष्ट्रपति के पति देवीसिंह पाटिल, केंद्रीय मंत्री विधि एवं न्यायमंत्री एम.वीरप्पा मोइली, सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती अम्बिका सोनी, साख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री डॉ. एम.एस. गिल और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगोडा के साथ ही भारत के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. एस.वाय. कुरेशी और देश-विदेश के जनप्रतिनिधि एवं अधिकारीगण मौजूद थे।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

न्यायिक और साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय : डा0 रामलखन सिंह यादव


यदुवंश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. यत्र-तत्र बिखरे यदुवंशियों की प्रतिभा को एक जगह पर लाने के लिए ही 'यदुकुल' ब्लॉग आरंभ किया गया था. ऐसे ही एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं- डा0 रामलखन सिंह यादव, जो न सिर्फ न्यायिक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं, बल्कि एक संवेदनशील साहित्यकार के रूप में भी समाज को राह दिखा रहे हैं. स्व. रामबिलास यादव और स्व. लाची देवी के सुपुत्र रूप में 2 मार्च 1956 को अपने ननिहाल पड़री बजार, भटनी, देवरिया (उ.प्र.) में जन्मे रामलखन यादव छात्र जीवन में अव्वल दर्जा के विद्यार्थी रहे और उन्होंने एम.ए.(मनोविज्ञान), पी.एच.डी., एल.एल.बी., पी.जी.डी.एच.आर. की उपाधियाँ ग्रहण कीं. जीवन के एक मोड़ पर डा. कुसुम लखन से मई 21, 1985 को बछउर देवरिया में उनका विवाह संपन्न हुआ. आपकी पत्नी सात्विक विचारों की हैं और आपको सदैव प्रोत्साहित भी करती रहती हैं. आपकी तीन संतान हैं- प्राची, मेधा एवं स्वर्ण सिंह।

डा0 रामलखन सिंह यादव की कई कृतियाँ अब तक प्रकाशित हो चुकीं हैं, जिन्हें काफी सराहना भी मिली है. इनमें दो शोध-प्रबंध (अंग्रेजी में, 2000 एवं 2005), लाजवन्ती के फूल (2005) काव्य-संग्रह,कटघरे में श्रीराम (2006) काव्य-संग्रह,टू स्वामी रामदेव (2006) काव्य-संग्रह (अंग्रेजी), उठो सिद्धार्थ (2007) काव्य-संग्रह, बिका हुआ फैसला (2008) कहानी-संग्रह,आ रही सुनामी (2009) काव्य-संग्रह,पूरी धरती अधूरे लोग (2010) संस्मरण-रिपोर्ताज का नाम प्रमुख है. इसके अलावा आपकी शीघ्र प्रकाश्य कृतियों में हमें चाहिए लाल किला (उपन्यास) और हनुमान आ गये हैं (महाकाव्य) शामिल हैं. आप कविताएं, कहानियाँ, लेख, समीक्षाएँ इत्यादि लगभग सभी विधाओं में बखूबी लिख रहे हैं. आपकी रचनाएँ देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं-आज (पटना), हिंदुस्तान (पटना), आर्यावर्त (पटना), चंपारण-विचार (मोतीहारी), अक्षरगंधा (समस्तीपुर), कंचनलता (खेंतड़ीनगर, झुंझुनू), संसार (2007), अंतर्राष्ट्रीय काव्य-संग्रह, मथुरा, मंथन, स्मृतियों के सुमन, कवर्धा (छ.ग.) इत्यादि.

डा0 रामलखन सिंह यादव की साहित्यिक प्रतिभा के मद्देनजर तमाम प्रतिष्ठित संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित और अलंकृत भी किया है. इन्में लाला जगत ज्योति प्रसाद स्मृति-सम्मान, मुंगेर, 2006, स्व. हरि ठाकुर स्मृति-सम्मान, कवर्धा, छत्तीसगढ़, 2006, विद्यासागर (डी. लिट्.) की मानद उपाधि, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, ईशीपुर, भागलपुर (बिहार), 2007, राष्ट्रीय शिखर साहित्य-सम्मान, 2008,भारतीय साहित्यकार संसद, समस्तीपुर, बिहार, राष्ट्रभाषा आचार्य, 2007 ई. राष्ट्रीय सम्मान के लिए चयनित, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनंदन समिति, बिहारीपुरा, मथुरा, उत्तर प्रदेश,काव्य-भूषण, 2008, पुष्पगंधा प्रकाशन, कवर्धा, छत्तीसगढ़, हिंदी का होमर, 2008, अ. भा. सा. अभिनंदन समिति, मथुरा, उत्तर प्रदेश जैसे तमाम सम्मान और मानद उपाधियाँ शामिल हैं।

स्थायी पता -डा0 रामलखन सिंह यादव, ग्रा. चकउर फकीर, पो. पिपरा दीक्षित, वाया-भटनी, जिला-देवरिया (उ.प्र.) पिन-274701

संपर्क/ संप्रतिः अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-9,सिविल कोर्ट, पटना-800004 (बिहार)

सोमवार, 31 जनवरी 2011

विश्व कप क्रिकेट 2011 के थीम गीत के गीतकार मनोज यादव

एक और उभरता हुआ यदुवंशी अपना जौहर दिखने को तैयार है. ये हैं मनोज यादव. गौरतलब है कि
बॉलीवुड की संगीतकार जोड़ी शंकर, एहसान और लॉय ने क्रिकेट विश्व कप 2011 के लिए थीम सौंग तैयार किया. थीम सौंग के बोल ‘दे घुमा के..’ है. ‘दे घुमा के..’ के गीतकार मनोज यादव हैं. इस गीत को 1 जनवरी 2011 को लॉन्च किया गया.

राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिबली नोमानी और कैफी आजमी की धरती आजमगढ़ सदैव सुर्ख़ियों में रहती है, पर इस बार एक बेहद रचनात्मक और जोशीले वजह से। दरअसल देश में खेल से ज्यादा जुनून का दर्जा प्राप्त क्रिकेट के महाकुम्भ आईसीसी के थीम सांग लिखने का गौरव आजमगढ़ जिले के सपूत मनोज यादव को हासिल हुआ है।मनोज यादव के लिखे गीत को शंकर महादेवन ने गया है और संगीतबद्ध किया शंकर-एहसान-लाय ने। बरास्ता मनोज यादव, आजमगढ़वासी अपनी ओर अंगुली उठाने वालों को एक संदेश भी दे रहे हैं और कह रहे हैं......दे घुमा के.....!

‘दे घुमा के....आसमान में मार के डुबकी, उड़ा दे सूरज की झपकी, सर्र से चीर हवा का पर्दा बाँध ले पट्ठे जमके गर्दा.....‘ आजमगढ़ के वासी मनोज यादव के दिलो-दिमाग में जन्मा यह गीत देश को आज एक ऊर्जा, एक जोश दे रहा है। इससे आजमगढ़ की फिजां बदली-बदली सी नजर आ रही है। अब यहाँ सृजनात्मकता है, जोश है, देश की माथे की बिन्दी बनने का जज्बा है। जिले के सगड़ी तहसील के भरौली गाँव निवासी मनोज यादव की उपलब्धि पर पूरे जिले को नाज है।

बताए हैं कि मनोज यादव के पिता स्व0 हरिश्चन्द्र यादव जब मुम्बई गये थे तो उनकी आखों में तमाम सपने थे। दो पुत्रों मनोज व प्रमोद व एक पुत्री पुष्पा के पिता हरिश्चन्द्र रेमण्ड कम्पनी में सुपरवाइजर बनें। मनोज यादव ने पिता के सपनों को साकार करना सीखा और उतर गए फिल्मों-विज्ञापनों के लिए गीत व जिंगल लिखने में। गुलजार को प्रेरणा स्रोत मानने वाले मनोज की प्रतिभा को गायक शंकर महादेवन ने पहचाना और शंकर-एहसान-लाय के कहने पर ओ एण्ड एम कम्पनी ने आईसीसी वल्र्ड कप के थीम सांग को लिखने का जिम्मा सौंपा, जिसे मनोज ने बखूबी पूरा किया। गौरतलब है कि क्रिकेट विश्व कप 2011 का आयोजन भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 19 फरवरी 2011 से हो रहा है. इसलिए इस गीत को हिंदी, बांग्ला और सिंहली भाषाओं में तैयार किया गया.

'यदुकुल' की तरफ से मनोज यादव को इस सृजनात्मक उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

ओमवीर यादव ने बनाया विमान

कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। इस कहावत को राजस्थान के सोरवा गांव के ओमवीर यादव ने एक वायुयान बना कर सही साबित कर दिया है। छोटे से गांव व साधारण किसान परिवार में जन्में 21 वर्षीय ओमवीर यादव ने कबाड़ से जुगाड़ वाली तकनीक अपनाकर यह विमान तैयार किया है। विमान को तैयार करने में उसे एक साल का समय लगा है। ओमवीर यादव ने उक्त विमान का प्रदर्शन गांव नसीबपुर स्थित राव तुलाराम शहीदी स्मारक पर किया। विमान को देखने के लिए भारी संख्या में लोग आए हुए थे। विमान में फिलहाल चालक व एक अन्य व्यक्ति बैठ सकता है।

ओमवीर यादव के नाना व साहित्यकार जसवंत प्रभाकर ने बताया कि ओमवीर का चयन 2008 में आईआईटी में हो गया था। उसकी रूचि कुछ नया करने की थी, जिसके कारण उसने गहन अध्यन व प्रयोग कर कम लागत से विमान तैयार किया है। ओमवीर ने बताया कि इस विमान में चालक के अलावा एक अन्य व्यक्ति बैठ सकता हैं। इसका वजन कुल 280 किलोग्राम है। उन्होंने यह जेट एक साल में तैयार किया है और उनको दसवीं बार में यह विमान तैयार करने में सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि उसके प्रयोग में अभी तक करीब 20 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। वहीं इस विमान के निर्माण में 50 हजार रुपये का खर्चा आया है। ओमवीर यादव के अनुसार जेट में मारुति जिप्सी का एक हजार सीसी का इंजन लगा हुआ है। जिसकी क्षमता 46 होर्स पावर है। ओमवीर ने दावा किया कि उसका जेट दो हजार मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकता है। वहीं उसकी गति 150 किलोमीटर प्रति घंटा है। उसने बताया कि इसका प्रयोग विशाल भू-भाग के कृषि क्षेत्रों में कीटनाशक दवाओं के छिड़काव को अल्प समय में तथा प्राकृतिक आपदाओं में संकट के समय जीव रक्षा व राहत सामग्री पहुंचाने में कर सकते हैं। उसने बताया कि उनका लक्ष्य अब छह व आठ सीट वाला विमान बनाने का है। वहीं उसे बोइंग विमान कंपनी से जॉब का भी आफर मिल चुका है।

इस अद्भुत कार्य के लिए ओमवीर यादव को 'यदुकुल' की तरफ से हार्दिक बधाइयाँ !!

(फेसबुक पर हितेंद्र सिंह यादव द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी..)

बुधवार, 26 जनवरी 2011

!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!


!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

बलिराम भगत : स्वतंत्रा सेनानी, पत्रकार, लेखक और राजनेता

भारतीय राजनीति ने फिर अपना एक गौरव पुत्र खो दिया है. । देश रत्न श्री बलिराम भगत पर भारत को गर्व था । देश रत्न श्री बलिराम भगत एक मेधावी छात्र , स्वतंत्रा सेनानी, पत्रकार , लेखक, राज्यपाल, विदेश मंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, आदि आदि थे ।

बिहार के समस्तीपुर के मूल निवासी देश रत्न श्री बलिराम भगत का जन्म ०७-१०-१९२२ को हुआ । पटना कॉलेज से स्नातक और पटना विश्वविध्यालय से ही अर्थशास्त्र में परास्नातक किया। उस वक्त परास्नातक करना बहुत बड़ी बात थी। १९३९ में मात्र १७ वर्ष के नाबालिग उम्र में स्वतंत्रा संग्राम की लड़ाई लड़ने भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल हो गए । १९४२ में भारत छोडो आन्दोलन में शामिल होने कॉलेज त्याग दिया। जबकि श्री भगत पटना विश्वविध्यालय के मेधावी छात्र थे। देश रत्न श्री बलिराम भगत १९४६ में कांग्रेस के महासचिव बनाये गए । श्री भगत १९४७ में पटना से राष्ट्र दूत नमक हिंदी पत्रिका शुरू किया। समाचार पत्रों में आर्थिक, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मामलो पर नियमित रूप से लिखते रहे। देश रत्न श्री बलिराम भगत ने अंतराष्ट्रीय विषयों पर कई पुस्तक लिखे। उनके लेखन से तत्कालीन कई राजनेता लेखक प्रभावित थे। देश रत्न श्री बलिराम भगत की प्रतिभा का उपयोग कांग्रेस ने जमकर किया। श्री भगत अंतराष्ट्रीय मामलो के कुशल जानकार थे। वे जितने बेहतर लेखक थे उतने ही बेहतर वक्ता भी थे। श्री भगत विभिन्न अंतराष्ट्रीय मंचो पर भारतीय संसद का प्रतिनिधित्व करते रहे । इन्स्ताबुल,लन्दन,कोलोम्बो और जापान में श्री भगत ने अपने कुशल भाषण से सभी को प्रभावित किया था।

देश रत्न श्री बलिराम भगत पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की सरकार में भारत सरकार में विदेश मंत्री रहे । श्री भगत हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के राज्यपाल के रूप में देश के सेवा करते रहे । पांचवी लोकसभा के अध्यक्ष बन उन्होंने साबित किया योग्यता की परिभाषा क्या होती है। श्री भगत की योग्यता का लोहा पूर्व प्रधानमंत्री नेहरु, इंदिरा भी मानती थी। देश रत्न श्री भगत हम सब को छोड़कर ०२ जनवरी २०११ में चले गए । पर एक ऐसी नजीर गढ़ गए जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-पुंज बनी रहेगी !!

वंदना यादव

सोमवार, 24 जनवरी 2011

बलिराम भगत का जाना...

राजनीति में तमाम यदुवंशी प्रखरता से काम कर रहे हैं. यही कारण है कि अब तक यदुवंश से 9 मुख्यमंत्री हो चुके हैं. पर अब तक मात्र दो लोगों को राज्यपाल बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है- गुजरात में महिपाल शास्त्री (2 मई 1990- 21 दिसंबर 1990) एवं हिमाचल प्रदेश व राजस्थान में बलिराम भगत (क्रमशः 11 फरवरी 1993-29 जून 1993 व 20 जून 1993-1 मई 1998). यह बताना इसलिए प्रासंगिक हो गया क्योंकि लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष और हिमाचल एवं राजस्थान के पूर्व राज्यपाल बलिराम भगत (89) का इस साल के आरंभ में ही 2 जनवरी, 2011 को निधन हो गया। गौरतलब है कि भगत जी का निधन शरीर के कई अंगों के काम बंद कर देने के कारण हुआ। वे कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और अपोलो अस्पताल में उनका देहावसान हुआ.

बलिराम भगत का जन्म सात अक्टूबर 1922 को पटना (बिहार) में हुआ। पटना से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद भगत ने पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। भगत 17 वर्ष की आयु में एक छात्र के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए। स्वतंत्रता के बाद वह प्रथम लोकसभा के लिए चुने गए। वह लोकसभा में सात बार चुनकर आए।वह पहली कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री के संसदीय सचिव के रूप में सेवा दी और उन्हें वर्ष 1956 में उप वित्त मंत्री बनाया गया। वर्ष 1969 में केंद्रीय मंत्री बनाए जाने से पहले उन्होंने योजना, रक्षा और विदेश राज्य मंत्री के रूप में काम किया। भगत 5 जनवरी 1976 को आपातकाल में लोकसभा अध्यक्ष चुने गए थे। वे इस पद पर एक साल तक रहे। वह वर्ष 1993 में थोड़े समय के लिए हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल और वर्ष 1993 से 1998 तक राजस्थान के राज्यपाल रहे। उनके परिवार में पत्नी विद्या भगत, एक बेटा और एक बेटी हैं।

बलिराम भगत के निधन पर अपने शोक संदेश में प्रधानमंत्री ने उन्हें, "एक स्वतंत्रता सेनानी, महान देशभक्त और लोगों के लिए समर्पित एक वरिष्ठ राजनेता बताया।" प्रधानमंत्री ने कहा, "मैंने अपना एक बहुत ही करीबी मित्र और महत्वपूर्ण सहयोगी खो दिया।" लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कहा कि भगत के निधन से उन्हें 'अत्यंत दुख' पहुंचा है। उन्होंने कहा, "भगत स्वतंत्र भारत के उन नेताओं में से थे जिन्होंने आजादी के बाद देश का मार्गदर्शन किया और अपनी राजनीतिक भागीदारी से लोकतंत्र को सशक्त बनाया।" लोकसभा अध्यक्ष ने कहा, "भगत के निधन से हमने भारत के एक योग्य पुत्र को खो दिया।
यदुकुल की तरफ से बलिराम भगत जी को श्रद्धांजलि और नमन !!

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

न्याय के क्षेत्र में विश्व कीर्तिमान : न्यायमूर्ति रवीन्द्र सिंह

न्याय सिर्फ होता नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए। इसके लिए जरूरी है न्यायिक प्रक्रिया की समझ, त्वरित निर्णय की क्षमता एवं संवेदनशीलता। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री रवीन्द्र सिंह ऐसी ही प्रतिभा के व्यक्तित्व हैं। आरंभ से ही मेधावी रहे श्री सिंह हमेशा चीजों को मानवीय पहलू से देखते हैं और उनके निर्णय वाकई मील का पत्थर होते हैं। तभी तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह ने अपने निर्णयों के मामले में ख्याति ही नहीं अर्जित की बल्कि विश्व में कीर्तिमान भी स्थापित किया है। यहाँ तक कि उनकी इस उपलब्धि का गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी इसका उल्लेख है। न्यायमूर्ति सिंह ने तो लगभग 1 लाख मुकदमों का निस्तारण किया है पर जुलाई 2009 से जुलाई 2010 तक एक साल की अवधि में उन्होंने 29,395 मुकदमें निस्तारित किये हैं जो कि अपने आप में विश्व रिकार्ड है। इस उपलब्धि के लिए जहां तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस रिबेरो ने उन्हें बधाई दी बल्कि उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज होने के लिए संस्तुति भी किया, जो कि अंतत: फलीभूत भी हुआ.

वर्ष 2005 में न्यायमूर्ति का पद सँभालने वाले रवींद्र सिंह का जन्म 2 जुलाई 1953 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद में मेदेपुर गाँव में श्री संकट बिहारिया यादव के पुत्र रूप में हुआ. साधारण किसान परिवार में जन्मे न्यायमूर्ति यादव की प्रारंभिक शिक्षा ग्राम मेदेपुर, जीआईसी मैनपुरी, एनडी कालेज शिकोहाबाद और उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई।श्री सिंह 1978 में बार काउंसिल आॅफ उत्तर प्रदेश में अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत हुए और 24 अगस्त 1994 से 1995 तक शासकीय अधिवक्ता रहे. बाद में उन्हें 19 सितंबर 2003 को अपर महाधिवक्ता तथा 24 सितंबर 2004 को एडिशनल जज के रूप में नियुक्ति मिली और 18 अगस्त 2005 को वह परमानेंट हो गये।

यदुवंश परिवार में जन्म लेकर न सिर्फ श्री रवींद्र सिंह ने देश के सबसे बड़े उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति का पद संभाला बल्कि न्यायिक क्षेत्र में ऐसा विशिष्ट कीर्तिमान स्थापित किया की आज भी दुनिया उनका लोहा मानती है. 'यदुकुल' की तरफ से न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह को बधाइयाँ और आशा की जानी चाहिए कि वे इसी तरह समाज में प्रेरणा-स्रोत बने रहेंगें !!

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

स्मृति शेष 'बालेश्वर यादव' ...बस यादें रह गईं

* निक लागे तिकुलिया गोरखपुर के
* मनुआ मरदुआ सीमा पे सोये, मौगा मरद ससुरारी मे.
* कजरा काहें न देहलू
* फुलौड़ी बिना चटनी कइसे बनी
* सात सहेलिया खड़ी खड़ी
* रोज रोज ससुरा दारु पियत है
* कटहर के कोवा तू खइलऽ त ई मोटकी मुगरिया के खाई.

अगर आपो लोगन में से केहू ई गाना के ऊपर मस्ती से झुमल होखे या ई गाना कै शौक़ीन रहल होये तै अब ई आवाज अब कबहू न सुनाई देई. काहें से की ई मशहूर गाना कै गवैया बालेश्वर यादव जी अब ई दुनिया से जा चुकल बटे.

रविवार ०९ जनवरी २०११ को इन्होने लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में आखिरी साँस ली, जहाँ ये कुछ समय से इलाज के लिये भर्ती थे। १ जनवरी १९४२ को आजमगढ़ - मऊ क्षेत्र के मधुबन कस्बे के पास चरईपार गाँव में जन्मे, बालेश्वर यादव भोजपुरी के मशहूर बिरहा और लोकगायक थे.

अई...रई... रई...रई... रे, के विशेष टोन से गीतों को शुरू करने वाले बालेश्वर ने अपने बिरहा और लोकगीतों के माध्यम से यू. पी.- बिहार समेत पूरे भोजपुरिया समाज के दिलों पर वर्षों तक राज किया. वे जन जन के ये सही अर्थों में गायक थे. इनके गीत " निक लागे तिकुलिया गोरखपुर के " ने एक समय पुरे पूर्वांचल में काफी धूम मचाई थी.जन जन में अपनी गायकी का लोहा मनवाने वाले इस गायक पर मार्कंडेय जी और कल्पनाथ राय जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों की नज़र पड़ी तो तो यह गायक गाँव- गाँव की गलियों से निकलकर शहरों में धूम मचाने लगा और कल्पनाथ राय ने अपने राजनितिक मंचों से लोकगीत गवाकर इन्हें खूब सोहरत दिलवाई. बालेश्वर यादव २००४ में देवरिया के पडरौना लोकसभा सीट से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीतकर लोकसभा में भी पहुंचे. इनके गाये गानों पर नयी पीढ़ी के गायक गाते हुए आज मुंबई में हीरो बन प्रसिद्धि पा गये, मगर ये लोकगायक इन सबसे दूर एक आम आदमी का जीवन जीता रहा. ये आम लोंगों के गायक थे और उनके मन में बसे थे. अभी हाल में ही आजमगढ़ के रामाशीष बागी ने महुआ चैनल के सुर संग्राम में इनके गाये गीतों पर धूम मचा दी थी.

भोजपुरी के उत्थान और प्रचार -प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान है. इनके गीत न केवल अपने देश में ही प्रसिद्ध हुए बल्कि जहाँ भी भोजपुरिया माटी के लो जाकर बस गए , वहाँ भी इन्हें गाने के लिये बुलाया जाता रहा. इन्होने अपने भोजपुरी गीतों का डंका सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, मारीशस, फिजी, हौलैंड इत्यादि देशो में भी बजाया . सन १९९५ में बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु 'यश भारती सम्मान 'से सम्मानित किया था.
इनके गाये कुछ और भोजपुरी लोकगीत इस लिकं पर क्लिक करके सुने जा सकते है
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आज जबकि भोजपुरी लोक-संगीत अपनी अस्मिता की लड़ाई में संघर्षरत है,वैसे में बालेश्वर यादव जैसे लोक-गायक के असमय निधन से भोजपुरी अंचल और इसके लोकसंगीत को अपूरणीय क्षति हुई है.बालेश्वर यादव भोजपुरी समाज और भाषा के महेंद्र मिश्र वाली परंपरा के लोक कलाकार थे.श्री यादव लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में कुछ समय से इलाज़ हेतु भर्ती थे.बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने 'उनके लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु 'यश भारती सम्मान'से नवाज़ा था.इतना ही नहीं बालेश्वर पुरस्कारों की सरकारी लिस्ट के गायक नहीं बल्कि सही मायनों में जनगायक थे,उन्होंने भोजपुरी के प्रसार के अगुआ के तौर पर देश-विदेश में पहचाने गए.ब्रिटिश गुयाना,त्रिनिदाद,मारीशस,फिजी,सूरीनाम,हौलैंड इत्यादि देशो में मशहूर बालेश्वर यादव जी के मौत भरत शर्मा,मदन राय,प्रो.शारदा सिन्हा, आनंद मोहन,गोपाल राय जैसे गायकों को भोजपुरी अस्मिता में उनका साथ देने वाले एक स्तम्भ के गिरने जैसा है.ईश्वर बालेश्वर यादव जी की आत्मा को शांति दे और भोजपुरी गीत संगीत से बलात्कार करने वाले सड़कछाप गायकों को सद्बुद्धि दे !!
चित्र साभार : भोजपुरिया. com

बुधवार, 5 जनवरी 2011

जब शिव गये श्रीकृष्ण की शरण में

ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड में शिव के अंहकार को भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा चूर किये जाने की कथा विस्तार से दिया गया है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्येक लीला से शिक्षा मिलती है। जरूरत है श्रीकृष्ण के प्रत्येक कार्य पर विचार करने का जो मानव समाज के लिये आॅक्सीजन का काम करता है। मेरे निजि विचार से श्रीकृष्ण के कार्य को समझने की शक्ति आज के परिवेश में भी केवल प्रकाण्ड विद्वान और सकारात्मक सोच रखने वालों में ही होता है।

भगवान श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधारानी के पूछे जाने पर बतलाते हैं ब्रह्माण्डों में जिन लोगों को अपनी शक्ति पर अंहकार होता है उस पर में शासन कर अंहकार को ध्वस्त कर देता हूँ। एक समय की बात है वृक नामक दैत्य ने शिव के केदारतीर्थ में एक वर्ष तक दिन-रात कठोर तपस्या कर वर माँगा कि प्रभो मैं जिसके माथे पर हाथ रख दूँ वह जलकर भस्म हो। शिव न वर दे दिया। वृक शिव के ही माथे पर हाथ रखने को भागा। मृत्युंजय नाम से चर्चित शिव भी मृत्यु के डर से भागने लगे। शिव के हाथ से डमरू गिर पडा़। शिव ने जो ण्याघ्रचर्म पहना हुआ था वह भी गिर गया। शिव को लगने लगा मृत्यु निश्चित है। भागत-भागते शिव के कण्ठ, ओठ और तालु भी सुख गये। शिव भय से हे कृष्ण रक्षा करो, रक्षा करो बोलते भाग रहे थे। शिव मेरे ही शरण में आये। तभी दैत्य भी पहुँचा मैंने उस दैत्य से कहा वृक ये जो तुम्हें वरदान शिव ने दिया है इसको परख तो लो। अपने ही सिर पर हाथ रखकर परख लो। वृक ने ऐसा ही किया और शिव की रक्षा हो गयी।

शिव इस घटना के बाद बहुत ही लज्जित हो गयें शिव का अंहकार बुरी तरह चूर-चूर हो गया। मैंने शिव को समझाया। एक बार फिर शिव अंहकार से भरे हुए भयानक असुर त्रिपुर का वध करने के लिए गये। शिव मन ही मन यह समझ रहे थे कि वे संहारक है।

शिव युद्व भूमि में चले तो गये पर मेरे ही द्वारा दिये गये त्रिशुल और कृष्ण-कवच साथ नहीं ले गये। भयानक युद्व हुआ और दैत्यराज ने शिव को उठाकर जमीन पर दे मारा। भय के कारण शिव ने एक बार फिर हे कृष्ण मेरी रक्षा करो पुकारने लगे तब मैंने शिव की रक्षा कर उन्हें त्रिशुल और कृष्ण-कवच दिया जिससे दैत्य का वध हो सका। इसके बाद शिव लज्जापूर्वक मेरी स्तुती किया। इस घटना के बाद शिव भी अंहकार का परित्याग कर दिया।

इस प्रकार शिव का अंहकार समाप्त हुआ। अंहकार और लापरवाही से ही शिव को भी मृत्यु सामने नजर आने लगा। शिव ने भी भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा और उनकी रक्षा हो गई। इस कहानी से हमें भी सीख लेनी चाहिए कि हम अंहकार का परित्याग करें। शिव यह भी बतला रहे हैं किनके शरण में जाकर हम पूर्णतः सुरक्षित है। अतः श्रीकृष्ण के ही शरण में रहिये।

-राजाराम राकेश,कार्यालय सहायक, अधीक्षक डाकघर टिहरी उत्तराखण्ड

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नूतन वर्ष-2011 की शुभकामनायें


नव वर्ष में आपकी साधना को, आपके सृजन को उत्तरोत्तर आयाम प्राप्त हों, यदुकुल की ओर से सभी को यही आत्मिक शुभकामनाएं !!

*****आप सभी को नूतन वर्ष-2011 की ढेरों शुभकामनायें *****

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

आज हम भी अपना जन्म-दिन मना रहे हैं...


आज हम भी अपना जन्म-दिन मना रहे हैं. 1943 से लेकर जीवन का एक लम्बा पड़ाव पूरा हो चुका है, जहाँ बड़े सुकून से अपनी जिंदगी प्रवाहमान है. गुलाम भारत में जन्म लिए, पर आजाद भारत में सांसें ले रहे हैं, यही क्या कम है. अतीत के पन्ने पलटता हूँ तो लगता है पूरी एक किताब ही लिख डालूँ. सरकारी नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद परिवार का हर पल साथ और अध्ययन, लेखन और समाज सेवा में बड़ा सुकून मिलता है. बेटे-बहू, बेटी-दामाद सब जीवन में सेटल होकर अच्छी पोस्टों पर विराजमान हैं, बस छोटा बेटा अभी कैरियर की जद्दोजहद में है, सो वह भी अपनी लाइन पकड़ लेगा।
ईश्वर की कृपा से जीवन ने बहुत कुछ दिया है. आज भी कुछ नया सीखने की लालसा बनी रहती है और पत्र-पत्रिकाओं, किताबों को अनवरत पलटता रहता हूँ, नहीं तो दोस्तों के साथ गपबाजी तो है ही. आजकल अपने प्रकाशित लेखों को पुस्तकाकार रूप में लाने की सोच रहा हूँ. देखिये, शायद अगले जन्मदिन तक यह भी हो जाय. फ़िलहाल आज तो प्रकृति के उस अद्भुत पल को महसूस करने का दिन है, जब इस धरा पर अंकुरण हुआ था।
हिंदी ब्लागरों के जन्मदिन पर भी पाबला जी और अन्य ब्लागरों ने बधाई प्रेषित की है. ऑरकुट, फेसबुक और ई-मेल पर भी जन्मदिन की बधाइयाँ मिली हैं. आप सभी की शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभार !!

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

स्पोर्ट्स-एडवेंचर में नाम कमाते यदुवंशी

खेल एवं एडवेंचर की दुनिया में भी यदुवंश के तमाम खिलाड़ी अपना डंका बजा रहे हैं। क्रिकेट के क्षेत्र में एन० शिवलाल यादव, हेमू लाल यादव, विजय यादव, ज्योति यादव, जे0पी0 यादव और उमेश यादव ने देश को गौरवान्वित किया तो आज हरियाणा की अण्डर-19 किक्रेट टीम के कोच विजय यादव, उ0प्र0 की अण्डर-16 किक्रेट टीम के कोच विकास यादव जैसे तमाम नए नाम उभर रहे हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष एन० शिव लाल यादव, दक्षिण ज़ोन का प्रतिनिधित्व करते हैं और सीनियर टूर्नामेंट कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। दक्षिण ज़ोन की महिला समिति में विद्या यादव भी शामिल हंै ज़ो कि आई०सी०सी० महिला टी-20 विश्व कप क्रिकेट की टीम मैनेजर भी रहीं। भारत की टेस्ट और वन डे टीम में खेल चुके विजय यादव 1996 से क्रिकेट कोचिंग दे रहे हैं। उन्हें बीसीसीआई की तरफ से विकेट कीपिंग एकेडमी का कोच भी नियुक्त किया गया है। आई0पी0एल0 के विभिन्न सत्रों में भी विभिन्न यादव क्रिकेट हेतु चयनित हुए। लालू यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव का चयन अण्डर-19 किक्रेट टीम हेतु किया गया एवं आई0पी0एल0-20 कप के प्रथम सत्र में डेयर डेविल्स (दिल्ली) टीम में चयनित किया गया, दुर्भाग्यवश उन्हें खेलने का मौका नहीं मिला। इसी प्रकार पूर्व टेस्ट खिलाड़ी एन० शिव लाल यादव के पुत्र एवं हैदराबाद रणजी कप्तान अर्जुन यादव का चयन डेक्कन चार्जस (हैदराबाद) में किया गया। आई0पी0एल0 के तीसरे सत्र में केदार जाधव व उमेश यादव (दिल्ली डेयरडेविल्स) एवं अर्जुन यादव (हैदराबाद डेक्कन चार्जर्स) का चयन किया गया। आई0पी0एल0 मैचों के दौरान ही नागपुर (महाराष्ट्र) के नजदीक खापरखेड़ा की कोयला खदान के मजदूर के बेटे उमेश यादव (दिल्ली डेयरडेविल्स) एक शानदार गेंदबाज के रूप में उभरे एवं उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम में भी खेलने का मौका मिला। उत्तर प्रदेश रणजी क्रिकेट टीम में आशीष यादव नया चेहरा है। बॉलीवुड के जाने माने-हास्य कलाकार राजपाल यादव टी-10 गली क्रिकेट सीजन-2 के लिए कानपुर गली क्रिकेट टीम के मालिक बन गए हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश क्रिकेट की अण्डर-19 महिला टीम में आगरा की पूनम यादव को कप्तानी सौंपी गई है। नेशनल क्रिकेट अकादमी बंगलौर में इंडिया क्रिकेट टीम के फिजिकल ट्रेनर के रूप में किशन सिंह यादव बखूबी दायित्वों का निर्वाह करते रहे हैं।

भारत के प्रथम व्यक्तिगत ओलंपिक मेडलिस्ट खाशबा दादा साहब जाधव एवं बीजिंग ओलंपिक (2008) में कुश्ती में कांस्य पदक विजेता सुशील कुमार यदुकुल की ही परम्परा के वारिस हैं। वर्ष 2010 में कुश्ती का विश्व चैंपियन खिताब अपने नाम करके सुशील कुमार ऐसा करने वाले प्रथम भारतीय पहलवान बन गए। वर्ष 2009 मंे सुशील कुमार को देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांँधी खेल रत्न से नवाजा गया तो गिरधारी लाल यादव (पाल नौकायन) को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी परंपरा में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में जहाँ सुशील कुमार ने कुश्ती में स्वर्ण पदक जीता, वहीं 74 किलोग्राम फ्री स्टाइल कुश्ती स्पर्धा में नरसिंह यादव पंचम (मूलतः चोलापुर, बनारस के, अब मुंबई में) ने भी स्वर्ण पदक जीता। गौरतलब है कि इससे पूर्व सीनियर एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में नरसिंह यादव ने देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर पूरे देश का नाम रोशन किया था। राष्ट्रमंडल खेलों की निशानेबाजी स्पर्धा में कविता यादव ने सुमा शिरूर के साथ कांस्य पदक जीतकर नाम गौरवान्वित किया। विश्व मुक्केबाजी (1994) में कांस्य पदक विजेता, ब्रिटेन में पाकेट डायनामो के नाम से मशहूर भारतीय फ्लाईवेट मुक्केबाज धर्मेन्द्र सिंह यादव ने देश में सबसे कम उम्र में ‘अर्जुन पुरस्कार’ प्राप्त कर कीर्तिमान बनाया। विकास यादव, मुक्केबाजी का चर्चित चेहरा है। आन्ध्र प्रदेश के बिलियर्डस व स्नूकर खिलाड़ी सिंहाचलम जो कि बिलियर्ड्स के अन्तर्राष्ट्रीय रेफरी भी हैं, बीजिंग ओलंपिक में निशानेबाजी के राष्ट्रीय प्रशिक्षक रहे श्याम सिंह यादव, कुश्ती में पन्ने लाल यादव, श्यामलाल यादव, गंगू यादव जैसे तमाम खिलाड़ी यादवों का नाम रोशन कर रहे हैं। बनारसी मुक्केबाज छोटेलाल यादव ने सैफ खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया। जानी-मानी पर्वतारोही संतोष यादव जिन्दगी में मुश्किलों के अनगिनत थपेड़ों की मार से भी विचलित नहीं हुईं और अपनी इस हिम्मत की बदौलत वह माउंट एवरेस्ट की दो बार चढाई करने वाली विश्व की पहली महिला बनीं। इसके अलावा वे कांगसुंग ;ज्ञंदहेीनदहद्ध की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला भी हैं। उन्हांेने पहले मई 1992 में और तत्पश्चात मई सन् 1993 में एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में सफलता प्राप्त कीे। इण्डियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश कालमाड़ी यदुवंश से ही हैं। अर्जुन पुरस्कार विजेता व महिला हाॅकी टीम की पूर्व कप्तान मधु यादव राष्ट्रीय महिला हाकी टीम की मैनेजर हैं। भारतीय भारोत्तोलन संघ के सचिव सहदेव यादव हंै।
महिला मुक्केबाजी में सोनम यादव (75 कि०ग्रा०) का नाम अपरिचित नहीं रहा। बैंकाक में एशियाई ग्रा0प्रि0 में युवा धावक नरेश यादव ने 1500 मीटर की दौड़ 3।51 सेकण्ड में पूरा कर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता। 27वीं राष्ट्रीय ताइक्वाण्डो प्रतियोगिता में हरियाणा की सरिता यादव ने रजत व पूनम यादव ने कांस्य पदक प्राप्त किया। बैंकाक में एशियाई गंापी तीरंदाजी चैम्पियनशिप में महिला रिवर्स स्पर्धा में नमिता यादव (झारखण्ड) ने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत कर देश का गौरव बढ़ाया। स्वप्नावली यादव (मुंबई) ने महज 8 साल की उम्र में यूनान स्थित 30 किमी0 लम्बी मेसिनिकोस की खाड़ी मात्र 11 घण्टे 10 मिनट में पार करने का विश्व रिकार्ड कायम कर लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया। अगस्त 2009 में सम्पन्न उ0प्र0 की सीनियर तैराकी चैम्पियनशिप में कुशीनगर की प्रियंका यादव ने 5 स्वर्ण जीतकर नया कीर्तिमान बनाया। यहीं पर गोताखोरी प्रतियोगिता में डी0एल0डब्ल्यू0 के गोताखोर नवीन यादव व्यक्तिगत चैंपियन बने। रानी यादव (बनारस) एथलेटिक्स में उभरता हुआ नाम है। कहना गलत नहीं होगा कि यदुवंशियों को यदि उचित परिवेश और प्रोत्साहन मिले तो स्पोर्ट्स-गेम और एडवेन्चर के क्षेत्र में वे भारत का नाम वैश्विक स्तर पर रोशन कर सकते हैं।
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It is a matter of pride for all Yadavs that in recently concluded Asian games (2010) in Guangzhou (China), the players from Supreme & Matchless clan of Yaduvansh made their presence count on global level and won the accolades across the globe for their winning, undying & down to earth attitude and performance.
We wholeheartedly appreciate their sincere efforts & endeavor for bringing glory to our great Country and family. Given is the list of players who won the individual Medals and was the part of winning team and who participated in the games.
1. Vikas Krishan Yadav - Gold Medal (Boxing) - 60 kg. Originally belongs to a village of Hissar district in Haryana and put up in Bhiwani. He is also the winner of Junior Olympics and a national champion. The teen sensation of Indian boxing, who has bagged several medals at this age, loves his gond ke ladoo. "He likes his food simple — roti and sabzi. But gond ke ladoo are his weakness, or call it his strength. These are prepared by mixing roasted gond and wheat flour in ghee along with dry fruits," said Darshna Devi, Vikas's mother. "I've already prepared around 10 kg ladoos for him," she added…J
2. Balraj Yadav- Silver Medal (Yachting/Sailing Match Racing) - He belongs to village Parkhotampur, District Rewari, Haryana, currently working as an officer in Indian Navy. There were two Yadavs out of this 5 members winning team.
3. Shekhar Yadav- Silver Medal (Yachting/Sailing Match Racing)- A native of village- Sanoda, District – Alwar, Rajasthan, proudly working as an officer in prestigious Indian Navy, comes from a middle class family.
4. Anup Yadav- Gold Medal- Kabbadi- A proud member of gold winning Kabbadi team, hails from same historical village (of Victoria Cross winner Rao Umrao Singh), Palra, District- Jhajjhar- Haryana. He has been an integral part of unbeatable Indian Kabbadi team.
5. Rajesh Yadav- Silver Medal (Rowing) – A key member of silver medal winning team, comes from a modest background of Village, Kanchanpur, District- Santkabir Nagar of UP.
Apart from these champions, other Yadavs were also part of playing Indian contingent. The list is as follows.
1. Kavita Yadav- The bronze medalist of shooting in CWG 2010 missed this time to win the medal. However her efforts are well appreciated.
2. Nar Singh Pancham Yadav- the Gold Medalist of wresting 75 kg. in CWG 2010, unfortunately couldn’t make it to a medal this time. His sincerity to bring glory to country is worth applauded.
3. Rao Aarti Singh- The proud daughter of former Minister (MOS) - Govt. of India and sitting MP of Gurgaon Sh. Rao Inderjeet Singh, missed to win the medal in Shooting. She has won several Medals in past for India and her eagerness to play and win for our country can be felt in her efforts.
4. Ram Singh Yadav- This man with never to say die attitude stood on 15th position in Men’s marathon. Hope he would carry on his attempts to win medals for us.
We can not neglect the contribution of those krishanvansaj’s who has helped these guys to win Medals. Here we can take out few such names.
Mr. Naresh Yadav- The coach of Silver Medal winning team has been an instrumental inspiration for the team and Mr. Balraj Yadav & Shekhar Yadav. He is also the Coach of Yachting Association of India.
Mr. Jagdish Yadav- The coach of boxing mine of India (Sports Authority of India, Bhiwani), He came into limelight when Bijender singh won the bronze in Olympics in 2008। He is the coach of Mr. Vikash Krishan Yadav,Bijender Singh, Akhil Kumar, Paramjeet Samota, Manoj Kumar etc. who have won several gold medals in CWG and various competition across the planet.


गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

फिल्म व ग्लैमर की दुनिया में यदुवंशी

ग्लैमर की दुनिया की बात ही निराली है। भगवान कृष्ण के वंशजों ने अभी तक तमाम क्षेत्रों में झण्डे गाड़े हैं पर अब फिल्मों और सौंदर्य के क्षेत्र में भी तमाम यदुवंशी दिख जाते हैं। फिलहाल हिंदी और भोजपुरी सिनेमा में तमाम यदुवंशी अपना जौहर दिखा रहे हैं। ग्लैमर की दुनिया अब यादवों के लिए अछूती नहीं रही। बॉलीवुड के जाने-माने हास्य कलाकार राजपाल यादव व रघुवीर यादव पहले से ही अभिनय के क्षेत्र में हैं। करीब डेढ़ सौ फिल्मों में शानदार अभिनय के दम पर 39 वर्षीय राजपाल यादव आज हिंदी सिनेमा की जानी-मानी शख्सियत हैं। रंगमंच पर अभिनय की ठोस बुनियाद के सहारे फिल्मी मनोरंजन दुनिया के सफर पर उत्तर प्रदेश के शाहजहांँपुर से निकले राजपाल यादव लगभग हर तरह के किरदार में फिट नजर आते हैं। पहले खलनायकी में सफलता हासिल करने के बाद कॉमेडी में राजपाल यादव अपना लोहा मनवा चुके हैं। छोटा कद, हंसमुख व्यक्तित्व और जबरदस्त अभिनय राजपाल यादव की पहचान है। कॉमेडी के जरिए वे लोगों के दिलों पर राज कर रहे है। उनके लीड रोल्स की भी खासी चर्चा हुई है। गाँव से निकलकर मायानगरी मुंबई में अपनी सफलता का सिक्का जमाने वाले राजपाल यादव युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। 1985 में फिल्म मैसी साहब के लिए दो अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पाने वाले अभिनेता और लगान, दिल्ली 6, फिराक, डरना मना है, पीपली लाइव फिल्म जैसी फिल्मों में काम कर चुके जाने-माने बॉलीवुड अभिनेता और थिएटर कलाकार रघुबीर यादव बँंधी-बंँधाई जिंदगी से इत्तेफाक नहीं रखने वालों में से हैं और इसी कारण विभिन्न तरह की भूमिकाएं निभाते हैं। अब इस कड़ी में रंगमंच की दुनिया से फिल्मों में प्रवेश करने वाले गुड़गांँव के राजकुमार यादव का नाम भी जुड़ गया ह,ै जिन्होंने ’लव, सैक्स और धोखा’ नामक फिल्म के माध्यम से पदार्पण किया है।

अभिनय से परे भी तमाम यदुवंशी अपनी प्रतिभा का परचम फहरा रहे हैं। बालीवुड में बहुचर्चित सेक्स स्कैंडल में फंँसी मिस जम्मू अनारा गुप्ता के स्कैंडल और विवादित जीवन पर के।के. फिल्म्स क्रिएशन तले निर्माता-निर्देशक कृष्ण कुमार यादव ने मिस अनारा फिल्म बनाकर चर्चा बटोरी थी। पहले ’शब्द’ और फिर महानायक अमिताभ बच्चन और ऑस्कर विजेता अभिनेता बेन किंग्सले को लेकर निर्मित फिल्म ’तीन’ पत्ती की निर्देशक लीना यादव से लेकर संगीता अहीर (प्रोड्यूसर-अपने, वाह लाइफ हो तो ऐसी) तक फिल्मों का सफल निर्माण और निर्देशन कर रही हैं। ‘नन्हंे जैसलमेर‘ फिल्म में बाबी देओल के साथ 10 वर्षीय बाल अभिनेता द्विज यादव ने अपनी भूमिका से लोगों का ध्यान खींचा। यदुवंशियों का दबदबा दक्षिण भारत की फिल्मों में भी दिखता है। इनमें प्रमुख रूप से कासी (तमिल अभिनेता), पारूल यादव (तमिल अभिनेत्री), माधवी (अभिनेत्री), रमेश यादव (कन्नड़ फिल्म प्रोड्यूसर), नरसिंह यादव (तेलगू अभिनेता), अर्जुन सारजा (अभिनेता, निर्देशक-निर्माता), विजय यादव (तेलगू टी.वी.अभिनेता) जैसे तमाम चर्चित नाम दिखते हैं। पारुल यादव फिलहाल भाग्यविधाता और बाहुबलि जैसे हिन्दी धारावाहिकों में भी अभिनय कर रही हंै। इसके अलावा भी तमाम यदुवंशी विभिन्न धारावाहिकों में कार्य कर रहे हैं।

भोजपुरी फिल्मों में आजकल तमाम यदुवंशी सामने आने लगे हैं। भोजपुरी के जुबली स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ चार साल में 50 लाख रू. की प्राइज वाले जुबली स्टार हैं। उनकी अब तक रिलीज 22 फिल्मों में से 2 गोल्डन जुबली, 4 सिल्वर जुबली, 13 सुपर हिट, 2 औसत और मात्र एक फ्लॉप रहीं। बचपन से फिल्मों के दीवाने रहे दिनेश लाल यादव रात को तीन किमी दूर वीडियो पर फिल्म देखने जाते थे, कुछ साल गायकी में संघर्ष करने के बाद 2003 में टी सीरीज के ‘निरहुआ सटल रहे‘ ने उन्हें लोकप्रियता की बुलंदियों पर पहुंचा दिया और ’निरहुआ’ उनके नाम के साथ चिपक गया। 2005 में फिल्म ‘हमका अहइसा वइसा न समझा‘ में उन्हें बतौर हीरो मौका मिला और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिनेश लाल यादव ‘निरूहा‘ ने भोजपुरी फिल्मों को विदेशों तक फैलाकर भारतीय संस्कृति का डंका दुनिया में बजाया है। बिरहा गायकी में अपना सिक्का जमा चुके विजय लाल यादव ने भी अभिनय के क्षेत्र में कदम रखते हुए कई फिल्मांे में काम किया है, बतौर मुख्य अभिनेता उनकी पहली ‘फिल्म बियाह-द फुल इंटरटेनमेंट‘ रही है। इस कड़ी में अब फिल्म ‘दिल तोहरे प्यार में पागल हो गइल‘ के माध्यम से एक नए अभिनेता सोम यादव (भदोही) का आगाज हुआ है। जी नाइन इंटरटेनमेंट के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक भी यदुवंश के ही कमलेश यादव और राजनारायण यादव हैं। इस फिल्म में सोम यादव के साथ नायिका रूप में हैं, अनारा गुप्ता जिसे फिल्म निर्माता के.के. यादव ने अपनी फिल्म अनारा के माध्यम से कास्ट किया था। इसी प्रकार भोजपुरी फिल्म ‘कबहू छूटे ना ई साथ‘ में अनिल यादव मुख्य भूमिका में हंै। ‘सुन सजना सुन’ में दिनेश अहीर स्पेशल भूमिका में हैं तो इस फिल्म के सह-निर्माता मुन्ना यादव हैं। ईधर दिल्ली में सेक्स रैकेट चलाने वाले बाबा शिवमूर्ति द्विवेदी पर बन रही फिल्म ‘सुहागन की कोख’ के निर्देशक राधेश्याम यादव हैं। गीतकार प्यारेलाल यादव भी तेजी से अपने कदम बढ़ा रहे हैं। पहली बार यदुवंश से मिस इण्डिया चुनी गई एकता चैधरी ने एक नजीर गढ़ी है। गौरतलब है कि वर्ष 2009 में मिस इंडिया यूनिवर्स चुनी गयी एकता चैधरी यदुवंशी हैं। यह पहला मौका था जब ग्लैमर की दुनिया में यदुवंश से कोई इस मुकाम पर पहुंचा। एकता चैधरी दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चैधरी ब्रह्म प्रकाश की पौत्री और सिद्धार्थ चैधरी की सुपुत्री हैं। इसी प्रतियोगिता में फाइनल में स्थान पाकर आकांक्षा यादव भी चर्चा में रहीं और ‘मिस बोल्ड‘ के खिताब से नवाजी गईं। इससे पूर्व वर्ष 2008 में मनीषा यादव मिस इंडिया की चर्चित प्रतिभागी रही हैं। ज़ी.टी.वी. पर आयोजित सारेगामापा प्रतियोगिता में स्थान पाकर लखनऊ की पूनम यादव भी चर्चा में रहीं।

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

चार यादव विभूतियों पर जारी हुए डाक टिकट

राष्ट्र को अप्रतिम योगदान के मद्देनजर डाक विभाग विभिन्न विभूतियों पर स्मारक डाक टिकट जारी करता है। अब तक चार यादव विभूतियों को यह गौरव प्राप्त हुआ है। इनमें राम सेवक यादव (2 जुलाई 1997), बी0पी0 मण्डल (1 जून, 2001), चै0 ब्रह्म प्रकाश (11 अगस्त, 2001) एवं राव तुलाराम (23 सितम्बर, 2001) शामिल हैं।
जिस प्रथम यदुवंशी के ऊपर सर्वप्रथम डाक टिकट जारी हुआ, वे हैं राम सेवक यादव। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद में जन्मे राम सेवक यादव ने छोटी आयु में ही राजनैतिक-सामाजिक मामलों में रूचि लेनी आरम्भ कर दी थी। लगातार दूसरी, तीसरी और चैथी लोकसभा के सदस्य रहे राम सेवक यादव लोक लेखा समिति के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता एवं उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य भी रहे। समाज के पिछड़े वर्ग के उद्धार के लिए प्रतिबद्ध राम सेवक यादव का मानना था कि कोई भी आर्थिक सुधार यथार्थ रूप तभी ले सकता है जब उससे भारत के गाँवों के खेतिहर मजदूरों की जीवन दशा में सुधार परिलक्षित हो। इस समाजवादी राजनेता के अप्रतिम योगदान के मद्देनजर उनके सम्मान में 2 जुलाई 1997 को स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।

वर्ष 2001 में तीन यादव विभूतियों पर डाक टिकट जारी किये गये। इनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं मण्डल कमीशन के अध्यक्ष बी0पी0 मण्डल का नाम सर्वप्रमुख है। स्वतन्त्रता पश्चात यादव कुल के जिन लोगों ने प्रतिष्ठित कार्य किये, उनमें बी0पी0 मंडल का नाम प्रमुख है। बिहार के मधेपुरा जिले के मुरहो गाँव में पैदा हुए बी0पी0 मंडल 1968 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1978 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रूप में 31 दिसम्बर 1980 को मंडल कमीशन के अध्यक्ष रूप में इसके प्रस्तावों को राष्ट्र के समक्ष उन्होंने पेश किया। यद्यपि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने में एक दशक का समय लग गया पर इसकी सिफारिशों ने देश के समाजिक व राजनैतिक वातावरण में काफी दूरगामी परिवर्तन किए। कहना गलत न होगा कि मंडल कमीशन ने देश की भावी राजनीति के समीकरणांे की नींव रख दी। बहुत कम ही लोगों को पता होगा कि बी0 पी0 मंडल के पिता रास बिहारी मंडल जो कि मुरहो एस्टेट के जमींदार व कांग्रेसी थे, ने ‘‘अखिल भारतीय गोप जाति महासभा’’ की स्थापना की और सर्वप्रथम माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड समिति के सामने 1917 में यादवों को प्रशासनिक सेवा में आरक्षण देने की माँग की। यद्यपि मंडल परिवार रईस किस्म का था और जब बी0पी0 मंडल का प्रवेश दरभंगा महाराज (उस वक्त दरभंगा महाराज देश के सबसे बडे़ जमींदार माने जाते थे) हाई स्कूल में कराया गया तो उनके साथ हाॅस्टल में दो रसोईये व एक खवास (नौकर) को भी भेजा गया। पर इसके बावजूद मंडल परिवार ने सदैव सामाजिक न्याय की पैरोकारी की, जिसके चलते अपने हलवाहे किराय मुसहर को इस परिवार ने पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में यादव बहुल मधेपुरा से सांसद बनाकर भेजा। राष्ट्र के प्रति बी0पी0 मंडल के अप्रतिम योगदान पर 1 जून 2001 को उनके सम्मान में स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।एक अन्य प्रमुख यादव विभूति, जिनपर डाक टिकट जारी किया गया, वे हैं दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री- चै0 ब्रह्म प्रकाश। 1952 में मात्र 34 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री पद पर पदस्थ चैधरी ब्रह्म प्रकाश 1955 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। बाद में वे संसद हेतु निर्वाचित हुए एवं खाद्य एवं केन्द्रीय खाद्य, कृषि, सिंचाई और सहकारिता मंत्री के रूप में उल्लेखनीय कार्य किये। 1977 में उन्होंने पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों व अल्पसंख्यकों का एक राष्ट्रीय संघ बनाया ताकि समाज के इन कमजोर वर्गों की भलाई के लिए कार्य किया जा सके। राष्ट्र को अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 11 अगस्त 2001 को चैधरी ब्रह्म प्रकाश के सम्मान में स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया।

1857 की क्रान्ति में हरियाणा का नेतृत्व करने वाले रेवाड़ी के शासक यदुवंशी राव तुलाराव के नाम से भला कौन वाकिफ नहीं होगा। 1857 की क्रान्ति के दौरान राव तुलाराम ने कालपी में नाना साहब, तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई के साथ मंत्रणा की और फैसला हुआ कि अंग्रेजों को पराजित करने के लिए विदेशों से भी मदद ली जाये। एतदर्थ सबकी राय हुई कि राव तुलाराम विदेशी सहायता प्रबंध करने ईरान जायंे। राव साहब अपने मित्रों के साथ अहमदाबाद होते हुए बम्बई चले गये। वहां से वे लोग छिपकर ईरान पहुंचे। वहां के शाह ने उनका खुले दिल से स्वागत किया। वहां राव तुलाराम ने रूस के राजदूत से बातचीत की । वे काबुल के शाह से मिलना चाहते थे। एतदर्थ वे ईरान से काबुल गये जहां उनका शानदार स्वागत किया गया। काबुल के अमीर ने उन्हें सम्मान सहित वहां रखा। लेकिन रूस के साथ सम्पर्क कर विदेशी सहायता का प्रबंध किया जाता तब तक सूचना मिली कि अंग्रेजांे ने उस विद्रोह को बुरी तरह से कुचल दिया है और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को पकड़-पकड़कर फांसी दी जा रही है। अब राव तुलाराम का स्वास्थ्य भी इस लम्बी भागदौड के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ था। वे अपने प्रयास में सफल होकर कोई दूसरी तैयारी करते तब तक उनका स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो गया था। वे काबुल में रहकर ही स्वास्थ्य लाभ कर कुछ दूसरा उपाय करने की सोचने लगे। उस समय तुरंत भारत लौटना उचित भी नहीं था। उनका काबुल में रहने का प्रबंध वहां के अमीर ने कर तो दिया पर उनका स्वास्थ्य नहीं संभला और दिन पर दिन गिरता ही गया। अंततः 2 सितम्बर 1863 को उस अप्रतिम वीर का देहंात काबुल में ही हो गया। वीर-शिरोमणि यदुवंशी राव तुलाराम के काबुल में देहान्त के बाद वहीं उनकी समाधि बनी जिस पर आज भी काबुल जाने वाले भारतीय यात्री बडी श्रद्वा से सिर झुकाते हैं और उनके प्रति आदर व्यक्त करते हैं। राव तुलाराम की वीरता एवं अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 23 सितम्बर, 2001 को उनके सम्मान में स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

एशियाड में राम सिंह यादव ने दिखाया पुरुष मैराथन में जलवा

एशियाड में राम सिंह यादव पुरुष मैराथन में 15वें स्थान पर रहे जो कि एशियन गेम्स की अंतिम एथलेटिक्स स्पर्धा थी। राम सिंह यादव ने दो घंटे 39 मिनट और 23 सेकंड का समय लिया जो गोल्ड जीतने वाले कोरिया के जी योगंजुन से 28 मिनट और 12 सेकंड अधिक था। गौरतलब है कि योंगजुन ने दो घंटे 11 मिनट और 11 सेकंड का समय लिया। जापान के किटोएका युकिहारो ने दो घंटे 12 मिनट 46 सेकंड के साथ सिल्वर मेडल जीता जबकि गत चैम्पियन कतर के शामी मुबारक :दो घंटे 12 मिनट 53 सेकंड: को ब्रॉन्ज मिला। आशा कि जानी चाहिए कि राम सिंह यादव अपना यह हौसला बरकरार रखेंगे और आगामी आयोजनों में सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन करेंगें !!

एशियाड में राजेश यादव ने झटका नौकायन में रजत

ग्रामीण भारत वाकई बहुत प्रतिभाशाली है, तभी तो यहाँ के लाल विदेशों में अपना डंका बजा रहे हैं. संतकबीरनगर जनपद के राजेश यादव ने एशियाड में नौकायन में रजत पदक झटक कर यदुकुल ही नहीं पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है। राजेश यादव के परिवार और क्षेत्र के किसी भी व्यक्ति ने सपने भी नहीं सोचा था कि इक दिन राजेश चीन में भारत का तिरंगा फहराएगा। पर कभी गर्मी के दिनों में लंगोट पहन कर सरयू की लहरों पर फर्राटा भरने वाले इस खिलंदड़ नौजवान ने एशियाड मेंनौकायन में रजत पदक झटक कर यदुकुल ही नहीं पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है। पुरुषों की आठ रोइंग स्पर्धा में भारतीय खिलाड़ियों ने रजत पदक जीता। रजत पदक जीतने वाली इस टीम में अनिल कुमार, गिरराज सिंह, साजी थामस, लोकेश कुमार, मंजीत सिंह, रंजीत सिंह, सतीश जोशी और जेनिल कृष्णन के साथ यदुवंश के राजेश कुमार यादव भी शामिल थे। गौरतलब है कि भारतीय दल ने 2,000 मीटर की रेस पांच मिनट 49.50 सेकंड में पूरी की।

उत्तर प्रदेश में संतकबीर जिले के धनघटा थाना क्षेत्र के कंचनपुर गांव निवासी स्वर्गीय महातम यादव के पांच बेटों में राजेश कुमार यादव तीसरे नंबर का है। मांझा की माटी में पले, पढ़े राजेश यादव ने प्राथमिक विद्यालय गायघाट में प्राथमिक शिक्षा हासिल की। उसके बाद जय नारायन इंटर कालेज तिघरा मौर्य में कक्षा छह से लेकर इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की। बीए में पढ़ ही रहा था कि वर्ष २००४ में उसका चयन आर्मी में हो गया। गार्ड रेजीमेंट सेंटर नागपुर में उसकी टे्रनिंग हुई। टे्रनिंग के दौरान पूना से रोइंग की टीम आई थी, उसी में उसका चयन हो गया। २००६ में कोलकाता में स्प्रिंट नेशनल चैंपियनशिप में उसने पहली बार दो सिल्वर मेडल जीते। २००७ में ओपेन नेशनल चैंपियनशिप भोपाल में भी दो सिल्वर मेडल हासिल किया। उसी वर्ष नेशनल गेम असम में दो कांस्य पदक जीता। वर्ष ०९ में ओपेन नेशनल चैंपियनशिप पूना में एक कांस्य पदक प्राप्त किया। वर्ष ०९ में एशियन रोइंग चैंपियनशिप ताईवान में कांस्य पदक प्राप्त कर अपने दमखम और तकनीक का प्रदर्शन किया।

इस बार चीन में आयोजित १६वें एशियाड खेल में नौकायन में राजेश कुमार यादव को मौका मिला। इस स्पर्धा में छह देश क्रमश: जापान, भारत, हांगकांग, इंडोनेशिया, उत्तर कोरिया और थाईलैंड की टीमों ने हिस्सा लिया था। राजेश यादव के पिता महातम यादव चर्चित पहलवान थे। उनकी वर्ष २००५ के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बूथ पर गोली मार कर हत्या हो गई थी। राजेश के बड़े भाई जय प्रकाश ग्राम प्रधान हैं और दूसरे नंबर के भाई राकेश कुमार आर्मी में है। चौथे नंबर के भाई राम प्रवेश बीए में तथा पांचवें नंबर का भाई उमेश यादव ११वीं में पढ़ रहा है। चाचा ओंकार यादव ने बताया कि जैसे ही फोन पर सूचना आई कि राजेश ने एशियाड में नौकायन प्रतियोगिता में रजत पदक जीता है उनका सीना चौड़ा हो गया। वह जहां भतीजे की सफलता पर काफी उत्साहित थे वहीं राजेश की मां जनकराजी देवी, पत्नी सीमा खुशी का इजहार करते नहीं थक रही थीं।

राजेश यादव को इस शानदार उपलब्धि पर यदुकुल की तरफ से ढेरों बधाइयाँ !!

एशियाड खेल में पाल नौकायान में रजत पदक विजेता : शेखर यादव

एशियाड में जहाँ भारत का प्रदर्शन पहले की अपेक्षा बेहतर रहा वहीँ तमाम नए चेहरे सामने आए. इनमें तमाम यदुवंशी प्रतिभाएं भी हैं. एशियाड खेल में पाल नौकायान में रजत पदक जीतकर अलवर जिले के शेखर सिंह यादव ने यदुकुल का मान बढ़ाया है। अलवर जिले के कोटकासिम के साणौदा निवासी शेखर सिंह यादव वर्तमान में भारतीय नेवी पनडुब्बी पैटी ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। शेखर यादव, पाल नौकायान (सैली) टीम में सदस्य थे, जिसको 20 नवम्बर को सिल्वर मैडल मिला।

गौरतलब है कि शेखर सिंह यादव इक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। इनके परिवार में 10 भाई-बहन हैं। इनके पिताजी मुंशीराम यादव व माताजी का नाम शांति देवी है। शेखर ने अपनी शिक्षा बीए तक अलवर के बाबू शोभाराम कला महाविद्यालय से की। करीब 20 साल की उम्र में शेखर का नेवी में चयन हो गया। 1995 में नेवी में भर्ती होने के बाद पहली बार अरावली की पहाडियों से निकल कर शेखर ने समन्दर की लहरों पर पांव रखा। नौकायन मे रूचि होने के कारण नेवी में रहते चार-पांच वर्ष तक नौकायन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद प्रोफेशनल प्रशिक्षण लिया। 2006 में नेवी के आईएनडब्ल्यू टीसी में सेलिंग क्लब में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वर्ष 2008 में चेन्नई में पहली बार नेशनल मेडल जीता। इसके बाद शेखर ने पाल नौकायन में कई और अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते। शेखर कहते हैं कि एशियाई खेलों में उन्होंने गोल्ड को फोकस किया था। मैच रेस इवेन्ट में प्रथम स्थान प्राप्त करने और टॉप फोर में आने के बाद अंत के तीन मैचों में लगातार जीत हासिल करने पर रजत पदक मिला।

इस शानदार उपलब्धि पर शेखर यादव को यदुकुल की तरफ से ढेरों बधाइयाँ !!

विकास यादव ने दिलाया एशियाई खेलों में 12 साल बाद भारत को मुक्केबाजी का स्वर्ण पदक

चीन के ग्वांग्झू में संपन्न एशियाई खेलों में यदुवंशियों ने भी शानदार प्रदर्शन किया। एशियाई खेलों में दो यदुवंशी मुक्केबाजों ने अपना जौहर दिखाया. छोटलाल यादव (56 किग्रा), विकास कृष्णन यादव (60 किग्रा). छोटेलाल यादव दक्षिण एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता और मौजूदा राष्ट्रीय चैंपियन हैं. 25 नवम्बर, 2010 को विकास कृष्ण यादव ने मुक्केबाजी के 60किलोग्राम वर्ग में पहला स्वर्ण हासिल किया।18 वर्षीय विकास यादव इसी वर्ष अगस्त में सिंगापुर में आयोजित विश्व युवा ओलम्पिक में कांस्य पदक जीत चुके हैं। विकास कृष्णन यादव वैश्य कॉलेज भिवानी, हरियाणा के प्रथम वर्ष के छात्र हैं. गौरतलब है कि युवा मुक्केबाज विकास कृष्णन यादव ने एशियाई खेलों में 12 साल बाद भारत को मुक्केबाजी का स्वर्ण पदक दिलाया। भारत ने 1998 में डिंको सिंह के स्वर्ण पदक के बाद से एशियाई खेलों में सोने का तमगा नहीं जीता था। आखिर यह सिलसिला हरियाणा के कम मशहूर मुक्केबाज विकास ने तोड़ा। अठारह वर्षीय विकास ने पुरुषों के 60 किग्रा (लाइटवेट) भार वर्ग में पिछले चैंपियन चीनी मुक्केबाजी क्विंग हू को 5-4 से हराया। विश्व युवा चैंपियन और युवा ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता भारतीय मुक्केबाज ने रक्षात्मक रवैया अपनाया। तीन मिनट के पहले राउंड के बाद स्कोर 1-1 से बराबरी पर था। हू दूसरे राउंड में तनाव में दिखे और उन्होंने विकास को धक्का दे दिया। जिसके कारण चीनी मुक्केबाज को चेतावनी दी गई और उन्हें दो महत्वपूर्ण अंक गंवाने पड़े।आखिर में यही चेतावनी निर्णायक साबित हुई। दोनों मुक्केबाज तीसरे और अंतिम राउंड में केवल एक-एक अंक बना पाए, जो विकास के लिए डिंको की उपलब्धि की बराबरी करने के लिए पर्याप्त था।

विकास कृष्णन यादव से एशियाई खेलों के फाइनल में करीब से हारने से भड़के चीनी मुक्केबाज क्विंग हू ने भारतीय मुक्केबाज विकास कृष्ण यादव को अच्छा अभिनेता ही करार दे दिया। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विकास कृष्णन यादव ने कहा कि इस बाउट के दौरान हू उन्हें बेल्ट के नीचे लगातार पंच मारते रहे। गत चैंपियन हू ने कहा कि मैं पहले राउंड में तीन अंक से आगे था और मुझे फाउल की सजा मिली, जो मैंने किया ही नहीं था। मैंने बेल्ट के नीचे हिट किया था, लेकिन यह इससे नीचे नहीं गया था। रेफरी ने उसे दो अंक दे दिए और इसके बाद मेरा प्रतिद्वंद्वी एक अच्छा अभिनेता बन गया। मुझे प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी ने नहीं हराया बल्कि मुझे रेफरी ने शिकस्त दी। हू ने कहा कि अंतिम राउंड में मेरा प्रतिद्वंद्वी बिलकुल फाइट नहीं कर रहा था, रेफरी को उसे चेतावनी देनी चाहिए थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। हू ने कहा, लेकिन मैं अपने प्रदर्शन से खुश हूं और मेरी नजर में मैं चैंपियन हूं। रेफरी के फैसले का विरोध करना बेकार है क्योंकि मैं अपने प्रदर्शन से खुश हूं। विकास कृष्णन यादव से जब हू के आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं मुक्केबाज हूं, अभिनेता नहीं। ....फ़िलहाल भारतीयों की जीत चीन को भला कैसे पच सकती है, सो अनर्गल प्रलाप तो वो करेंगे ही। हम तो इतना ही कहेंगे कि भारतीयों कि जीत प्रभावी है और यदुवंशी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

विकास कृष्णन यादव को इस शानदार उपलब्धि पर यदुकुल की तरफ से ढेरों बधाइयाँ !!