बुधवार, 29 अगस्त 2012

यदुकुल के गौरव : कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव को मिला 'दशक के श्रेष्ठ ब्लागर दंपत्ति' का सम्मान

जीवन में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। हिन्दी-ब्लागिंग के क्षेत्र में ऐसा ही रास्ता अखि़्तयार किया कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा यादव ने। 2008 में अपना ब्लागिंग-सफर आरंभ करने वाले इस दम्पत्ति को परिकल्पना समूह द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ’’दशक के श्रेष्ठ दम्पत्ति ब्लागर’’ के रूप में सम्मानित किया गया है। इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं पद पर पदासीन कृष्ण कुमार यादव हिन्दी-साहित्य में एक सुपरिचित नाम हैं, जिनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनके जीवन पर एक पुस्तक ’बढ़ते चरण शिखर की ओर’ भी प्रकाशित हो चुकी है। आकांक्षा यादव भी नारी-सशक्तीकरण को लेकर प्रखरता से लिखती हैं । साहित्य के साथ-साथ ब्लागिंग में भी हमजोली यादव दम्पत्ति को 27 अगस्त, 2012 को लखनऊ में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लागर सम्मेलन में 'दशक के श्रेष्ठ ब्लागर दम्पत्ति’ का अवार्ड दिया गया। मुख्य अतिथि श्री श्री प्रकाश जायसवाल केन्द्रीय कोयला मंत्री की अनुपस्थिति में यह सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार उदभ्रांत, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक शैलेन्द्र सागर आदि ने संयुक्त रूप से दिया।

गौरतलब है कि हिंदी ब्लागिंग का आरंभ वर्ष 2003 में हुआ और इस पूरे एक दशक में तमाम ब्लागरों ने अपनी
अभिव्यक्तियों को विस्तार दिया। पर कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव ने वर्ष 2008 में ब्लाग जगत में कदम रखा और 5 साल के भीतर ही सपरिवार विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लागिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लागिंग को भी नये आयाम दिये। कृष्ण कुमार यादव जहाँ 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं, वहीँ आकांक्षा यादव 'शब्द-शिखर' ब्लॉग के माध्यम से. इसके अलावा इस युगल-दंपत्ति द्वारा सप्तरंगी प्रेम, बाल-दुनिया और उत्सव के रंग ब्लॉगों का भी युगल सञ्चालन किया जाता है. उपरोक्त सम्मान की घोषणा करते हुए संयोजकों ने लिखा कि- ''कृष्ण कुमार यादव ने 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से डाक विभाग की सुखद अनुभूतियों से पाठकों को रूबरू कराने का बीड़ा उठाया तो आकांक्षा यादव ने 'शब्द-शिखर' के माध्यम से साहित्य के विभिन्न आयामों से रूबरू कराने का। एक स्वर है तो दूसरी साधना। हिन्दी ब्लोगजगत में जूनून की हद तक सक्रिय इस ब्लॉगर दंपति ने हिंदी ब्लागिंग को कई नए आयाम दिए हैं.'' इन दम्पत्ति के ब्लागों को सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भरपूर सराहना मिली। कृष्ण कुमार यादव के ब्लाग ’डाकिया डाक लाया’ को 94 देशों, ’शब्द सृजन की ओर’ को 70 देशों, आकांक्षा यादव के ब्लाग ’शब्द शिखर’ को 66 देशों और इस ब्लागर दम्पत्ति की सुपुत्री एवं पिछले वर्ष ब्लागिंग हेतु भारत सरकार द्वारा ’’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’’ से सम्मानित अक्षिता (पाखी) के ब्लाग ’पाखी की दुनिया’ को 94 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है।

गौरतलब है कि यादव दम्पति की सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को पिछले साल हिंदी भवन, नई दिल्ली में 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर' सम्मान से सम्मानित किया गया था तो 14 नवम्बर, 2012 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत सरकार द्वारा अक्षिता को आर्ट और ब्लागिंग के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' भी प्रदान किया गया. मात्र साढ़े चार साल की उम्र में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता ने जहाँ भारत की सबसे कम उम्र की बाल पुरस्कार विजेता होने का सौभाग्य प्राप्त किया, वहीँ पहली बार भारत सरकार द्वारा किसी ब्लागर को कोई राजकीय सम्मान दिया गया. फ़िलहाल अक्षिता गर्ल्स हाई स्कूल, इलाहाबाद में प्रेप में पढ़ती है.

उमानाथ बाली प्रेक्षागृह, कैसर बाग, लखनऊ में आयोजित इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में न्यू मीडिया की संभावना एवं चुनौतियों को लेकर तमाम सेमिनार हुये। ’न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार’ विषय आधारित सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में कृष्ण कुमार यादव ने ब्लागिंग को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की बात कही और एक माध्यम के बजाय इसके विधागत विकास पर जोर दिया।

इस दम्पत्ति को सम्मानित किये जाने के अवसर पर देश-विदेश के तमाम ब्लागर, साहित्यकार, पत्रकार व प्रशासक उपस्थित थे। प्रमुख लोगों में मुद्रा राक्षस, वीरेन्द्र यादव, पूर्णिमा वर्मन, रवि रतलामी, रवीन्द्र प्रभात , जाकिर अली ’रजनीश’, शिखा वार्ष्णेय, सुभाष राय इत्यादि प्रमुख थे।






सोमवार, 30 जुलाई 2012

यदुवंशी सुशील कुमार ने ध्वज वाहक बनकर किया लंदन ओलम्पिक-2012 में भारतीय दल का नेतृतव

भारतीय ओलम्पिक संघ द्वारा पहलवान सुशील कुमार को लंदन ओलम्पिक खेलों में भारतीय दल का ध्वज वाहक नियुक्त किया गया, जिसके क्रम में उन्होंने उद्घाटन समारोह में बखूबी अपनी भूमिका का निर्वाह किया. गौरतलब है कि यदुवंश से सम्बन्ध रखने वाले सुशील कुमार ने विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप 2010 में 66 किलो भारवर्ग की फ्रीस्टाइल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक तथा वर्ष 2008 में बीजिंग ओलम्पिक में पुरुष के 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था. यह बीजिंग ओलम्पिक में भारत का तीसरा पदक था. पहला पदक निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा ने 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में जीता जो कि ओलम्पिक इतिहास में भारत का पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक था. दूसरा विजेन्द्र कुमार ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीता. अपनी इन्हीं सब उपलब्धियों के चलते जुलाई 2009 में सुशील कुमार सोलंकी को भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरुस्कार प्रदान किया गया. यह भारत के लिए कुश्ती में दूसरा पदक था. इससे पहले वर्ष 1952 में हैलेसिंकी ओलम्पिक खेल में केडी जाधव (K D Jadhav) ने कांस्य पदक जीता था.

--राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

बुधवार, 25 जुलाई 2012

चौधरी हरमोहन सिंह यादव : ग्राम सभा से राज्य सभा तक का सफ़र ख़त्म

शौर्य चक्र से सम्मानित वरिष्ठ सपा नेता चौधरी हरमोहन सिंह यादव का 24 जुलाई , 2012 दिन मंगलवार देर रात मेहरबान सिंह का पुरवा स्थित आवास पर हृदय गति रुकने से निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। गुरुवार को घर के पास स्थित समाधि स्थल में उनका अंतिम संस्कार हुआ, जहाँ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव सहित तमाम दिग्गज लोग अंतिम संस्कार में शामिल हुए.

18 अक्तूबर 1921 को कानपुर में चौधरी धनीराम सिंह के सुपुत्र रूप में जन्मे हरमोहन सिंह ने वक़्त के माथे पर एक लम्बी इबारत लिखी. मात्र हायर सेकेंडरी पास इस जुनूनी व्यक्तित्व ने छह दशक की राजनीति में ग्राम सभा से लेकर राज्य सभा के सफर में अपनी अलग पहचान बनायी। मुलायम सिंह यादव का हर कदम पर साथ देकर कभी मिनी मुख्यमंत्री तो कभी छोटे साहब कहलाये। हरमोहन सिंह को उनके बड़े भाई स्व. रामगोपाल सिंह यादव राजनीति में लाये थे। वह 31 की उम्र में गुजैनी ग्रामसभा के निर्विरोध प्रधान बने तब किसी ने सोचा न होगा कि एक दिन यही हरमोहन सिंह कानपुर में समाजवाद का मजबूत स्तंभ बनेंगे। ग्राम प्रधान से शुरू उनकी राजनीतिक यात्रा का सिलसिला आगे बढ़ता गया। वह नगर महापालिका में पार्षद बने और लगातार 42 वर्ष तक महापालिका, फिर नगर निगम के पदेन सदस्य रहे। उन्हें जिला सहकारी बैंक के प्रथम अध्यक्ष होने का गौरव भी हासिल हुआ। वर्ष 70 में वह एमएलसी बने और वर्ष 90 तक इस सफर में तीन बार एमएलसी रहे। 80 के दशक मेंअखिल भारतीय यादव महासभा के अध्यक्ष बने। इसी दशक में चौधरी चरण सिंह का उत्तराधिकार उनके पुत्र अजीत सिंह को मिलने के कारण मुलायम सिंह की उनसे खटपट हो गयी। मुलायम कमजोर पड़ रहे थे, तभी भरी सभा में हरमोहन सिंह ने कहा कि मुलायम सिंह यादव चाहे हीरो रहें या जीरो, हम तो मुलायम सिंह का ही साथ देंगे। उनके इस ऐलान के बाद मुलायम सिंह लोकदल से अलग हो गये तथा हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ लोकदल (ब) गठित किया। तभी से हरमोहन सिंह, मुलायम सिंह के पारिवारिक सदस्य हो गये। चौधरी साहब ने 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद रतनलाल नगर में 4 -5 घंटे बेटे चौधरी सुखराम सिंह यादव के साथ दंगाइयों पर हवाई फायरिंग करके सिख भाइयों की रक्षा की थी। इस वजह से 1991 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया था।

1989 में मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनने पर हरमोहन सिंह का प्रभाव ऐसा बढ़ा कि लोग उन्हें मिनी मुख्यमंत्री कहने लगे। उनके आवास को साकेत धाम कहा गया तथा सत्ता की राजनीति में चौधरी हरमोहन सिंह कानपुर क्षेत्र का केंद्र बन गये थे। सपा के दायरे में तब से आज तक यही माना गया कि मुलायम सिंह यादव कभी चौधरी हरमोहन सिंह यादव की बात को टालते नहीं है। मुलायम सिंह ने नब्बे के दशक में चौधरी हरमोहन सिंह को दो बार राज्यसभा सदस्य बनाया। मुलायम सिंह उनको छोटे साहब कहकर बुलाते थे। चौधरी हरमोहन 18 वर्ष तक विधान परिषद और 12 वर्ष तक राज्यसभा में रहे। चौधरी हरमोहन सिंह के प्रभाव का ही कमाल रहा जो उनके पुत्र सुखराम सिंह एमएलसी और फिर विधान परिषद के सभापति बने। दूसरे पुत्र जगराम सिंह दो बार विधायक बने, स्व. हरनाम सिंह व अभिराम सिंह को भी पद दिलाये। कई नेताओं को विधान सभा व लोकसभा के लिये टिकट तथा अन्य पद दिलाये। यादव समाज के लिये गाजियाबाद में श्रीकृष्ण भवन बनवाया। मेहरबान सिंह पुरवा पर उनकी मेहरबानियां हमेशा बरसती रहीं। उनकी बदौलत वहां पर प्राइमरी से लेकर डिग्री विधि महाविद्यालय और पैरा मेडिकल कालेज स्थापित हो चुके हैं। हर तरफ से आने वाली रोड व नालियां चकाचक हैं और मनोरंजन एकता पार्क भी है। उम्र का बंधन उनकी राजनीतिक उमंग को कम नहीं कर पाया। वर्ष 2003 में राज्यसभा सांसद पद खत्म हो गया तो वह मेहरबान सिंह पुरवा में ही अपना आवास बना कर सपाइयों का हौसला बढ़ाते रहे। अभी दस दिन पहले उनके बुलावे पर मेहरबान सिंह पुरवा आये मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खुले मंच से कहा था कि चौधरी हरमोहन सिंह के बताये हर काम होंगे। उनसे हमारे परिवार का रिश्ता कभी कम न होगा और उसी रिश्ते को निभाने के लिये मुख्यमंत्री फिर से मेहरबान सिंह पुरवा आकर छोटे साहब को अंतिम सलामी देंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा था कि कानपुर का सौंदर्यीकरण करा दो, उसके पहले ड्रेनेज सिस्टम सुधारा जाये। इस इच्छा को पूर्ण देखे बिना वह चले तो गये लेकिन उनका ग्राम सभा से लेकर राज्यसभा का सफर इतिहास बन गया।
-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

नाम -चौधरी हरमोहन सिंह यादव/
जन्म - 18 अक्टूबर, 1921, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर नगर/
पिता -चौधरी धनीराम सिंह यादव/
वैवाहिक स्थति - विवाह, श्रीमती गयाकुमारी जी के साथ। आपके पाँच पुत्र एवं एक पुत्री है/
शिक्षा -हायर सेकेण्डरी/
राष्ट्रीय अध्यक्षः
अखिल भारतीय यादव महासभा, सन् 1980 (मथुरा)/
अखिल भारतीय यादव महासभा, सन् 1993 (हैदराबाद)/
अखिल भारतीय यादव सभा, सन् 1994 /
अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा के का0 अध्यक्ष 2007 तक/
संस्थापकः
श्रीकृष्ण भवन, वैशाली, गाजियाबाद/
कैलाश विद्यालोक इण्टर काॅलेज/
चौधरी रामगोपाल सिंह विधि महाविद्यालय, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर/
मनोरंजन एकता पार्क, कानपुर/
गयाकुमार इण्टर काॅलेज एवं छात्रावास, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर/
मोहन मंदिर, मेहरबान सिंह का पुरवा, कानपुर/
राजनैतिक :
प्रधान (निर्विरोध), लगातार दो बार, ग्रामसभा गुजैनी, सन् 1952/
सदस्य, (निर्विरोध), अंतरिम जिलापरिषद/
सभासद, कानपुर महापालिका सन् 1959, दूसरी बार, 1967/
पदेन सदस्य, कानपुर नगर निगम, लगभग 42 वर्ष/
जिला सहकारी बैंक के प्रथम अध्यक्ष/
उत्तर प्रदेश भूमि विकास बैंक के उपाध्यक्ष (निर्विरोध)/
दिनांक 06 मई, 1970 को प्रथम बार कानपुर-फर्रूखाबाद स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित। आपका कार्यकाल 05 मई, 1976 तक रहा।/
द्वितीय बार दिनांक 06 मई, 1976 को कानपुर-फर्रूखाबाद स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित। आपका कार्यकाल 05 मई, 1982 तक रहा। /
तृतीय बार दिनांक 06 मई, 1984 से जनता दल समाजवादी के टिकट पर विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित। आपका कार्यकाल 05 मई, 1990 तक रहा।/
सभापति (दो बार) उत्तर प्रदेश विधान परिषद की आश्वासन समिति के। /
संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य रहे।/
पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, लोकदल।/
पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय कार्यकारिणी, लोकदल एवं जनता दल।/
सदस्य, राज्य सभा सन् 1990 से 1996 तक।/
सदस्य राज्यसभा सन् 1997 से 2003/
महामहिम राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत।/
रुचिः समाजसेवा, ग्रामीण विकास एवं किसानों के हितों की रक्षा में। /
अन्यः सन् 1984 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद रतन लाल नगर, कानपुर के सिख भाइयों की लगभग 4-5 घण्टे अपने सुपुत्र चौधरी सुखराम सिंह यादव (सभापति, विधान परिषद उत्तर प्रदेश) के साथ हवाई फायरिंग करके दंगाइयों से रक्षा करने के कारण सन् 1991 में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।/
स्थायी पताः ग्राम मेहरबान सिंह का पुरवा, तहसील व जिला-कानपुर, उ0प्र0।
देहावसान : 24 जुलाई , 2012

-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

सोमवार, 2 जुलाई 2012

सुरों का महासंग्राम के विजेता बने अरूणदेव यादव

भोजपुरी चैनल महुआ टीवी के लोकप्रिय शो ‘सुरों का महासंग्राम’ के विजेता के ताज झारखण्ड के अरूणदेव यादव का माथे चढ़ल जे बिहार के प्रतीक राज के आठ हजार वोट से हरा दिहलें. पटना के बी.एम.पी. ग्राउण्ड से लाइव कार्यक्रम के ग्रैण्ड फिनाले में यु.पी. के कल्पना तिसरका जगहा रहली.

पचास हजार लोग का मौजुदगी में भइल एह फिनाले में मनोज तिवारी, निरहुआ, पाखी हेगड़े, संभावना सेठ, प्रवेशलाल, शुभी शर्मा, उत्तम तिवारी, संगीतकार धनंजय मिश्रा, सतीश, अजय, गायक मोहन राठौर, ममता रावत आ आलोक कुमार रंगारंग कार्यक्रम पेश कइलें.

साभार : CinemaBhojpuri.in

रविवार, 1 जुलाई 2012

सादगी से मनाया गया युवराज-मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जन्मदिन

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का 39वां जन्मदिन बड़ी सादगी से बिना किसी खर्चीले समारोह के मनाया गया. उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में कहीं बधाइयों के बैनर-होर्डिग नहीं दिख रहे हैं. सरकारी और गैर सरकारी किसी भी आयोजन की सुगबुगाहट भी नहीं है. अगर बताया न जाए तो शायद आम जनता को पता भी नहीं चलेगा कि एक जुलाई को सूबे के मुख्यमंत्री का 39 वां जन्मदिन है.

शनिवार को समाजवादी पार्टी के कार्यालय में आने वाले सैकड़ों कार्यकर्ताओं में यह जानने की उत्सुकता दिखायी दे रही थी कि मुख्यमंत्री के रूप में अपना पहला जन्मदिन अखिलेश किस रूप में मनाएंगे. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी सब को एक ही जवाब दे रहे थे कि वह जन्मदिन मनाते कहां हैं, जो यह बताऊं कि कैसे मनाएंगे.

सत्ता के केन्द्र कालिदास मार्ग और विक्रमादित्य मार्ग पर शनिवार को रोज की तरह ही चहल-पहल थी. कालिदास मार्ग पर मुख्यमंत्री का सरकारी आवास है और विक्रमादित्य मार्ग पर उनका व उनके पिता का गैर सरकारी आवास और समाजवादी पार्टी का प्रदेश मुख्यालय है.

विक्रमादित्य मार्ग से ले कर कालिदास मार्ग तक कहीं भी अखिलेश यादव के जन्मदिन से संबंधित कोई होर्डिंग नहीं लगी है और न कोई बैनर या पोस्टर. जबकि कालिदास मार्ग और उसके आसपास के सारे इलाके पिछले पांच साल के दौरान प्रदेश की पूर्व मुखिया के जन्मदिन पर होर्डिगों, बैनरों व पोस्टरों से पट जाते थे और पूरी राजधानी पर नीला रंग छा जाता था.

भव्य आयोजनों की तैयारियां महीने भर पहले से की जाने लगती थीं. जन्मदिन तो बहाना होता था अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाने और जनता का दिल जीतने के लिए घोषणाएं करने का लेकिन अखिलेश ने अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने के लिए जन्मदिन का सहारा नहीं लिया. हालांकि मात्र एक सौ आठ दिन के कार्यकाल में उपलब्धियों के रूप में गिनाने के लिए उनके पास बहुत कुछ है.

सूबे की कमान सम्भालने के बाद अपनी कार्यशैली से उन्होंने ऐसा माहौल दिया कि नौकरशाही ने भी तनावमुक्त होकर उनके दिशानिर्देशन में प्रदेश के विकास का खाका तैयार किया और उस पर काम शुरू हो गया. जनता दर्शन के माध्यम से जनता का उनसे सीधा जुड़ाव सम्भव हो सका. वर्षों से लटकी योजनाओं और जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अनेक योजनाओं को धरातल पर लाने का काम चल रहा है.

राज्य की 20 करोड़ की आबादी को इस बात का सुकून है कि सचिवालय से लेकर सरकारी दफ्तरों तक उसकी आवाज सुनी जा रही है. जनप्रतिनिधि सदन में जनता की आवाज बन रहे हैं. फिर भी अखिलेश ने जन्मदिन के मौके का फायदा नहीं उठाया. किसी खर्चीले समारोह का आयोजन न किया जाना, उनकी सादगी और सरलता का परिचायक है.

प्रदेश के नये मुखिया ने शपथ ग्रहण के बाद से अब तक कई बार सादगी का संदेश दिया है. उन्होंने कालिदास मार्ग के सारे बैरियर हटवा कर एक बार फिर यह रास्ता आम लोगों के लिए खोल दिया.

अपने काफिले में 40 कारों की संख्या घटा कर केवल 8 कर दी. मुख्यमंत्री के गुजरने वाले रास्तों पर आधे घण्टे पूर्व से यातायात पर लगने वाले प्रतिबंध को समाप्त कर यह एहसास कराया कि वह भी आम आदमी से अलग नहीं हैं.

ताहिर अब्बास : सहारा न्यूज ब्यूरो

चिरंजीवी भव अखिलेश यादव : जीवन यात्रा के 40 वें वर्ष में प्रवेश

आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जन्मदिन है. उन्होंने अपने जीवन यात्रा के 39 साल पूरे कर 40 वें वर्ष में प्रवेश किया है. आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जन्म 1 जुलाई 1973 को प्रदेश के इटावा जिले के सैफेई गाँव में हुआ था उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव रविवार को अपना 39वां जन्मदिन सादगीपूर्ण तरीके से मना रहे हैं और उन्होनें ज्यादातर समय अपने परिवार के लिए रखा है। इस अवसर पर कोई सरकारी आयोजन नहीं किया गया है। गौरतलब है कि देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गत 15 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव व उनकी पहली पत्नी मालती देवी की एक मात्र संतान अखिलेश ने राजस्थान के धौलपुर स्थित मिलेट्री स्कूल से अपनी शिक्षा पूरी की जिसके बाद उन्होंने मैसूर के एस०जे० कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से इंजीनियरिंग में स्नातक किया और आस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से पर्यावरण अभियान्त्रिकी में स्नातकोत्तर कर राजनीति की दुनिया में अपने हाथ अजमाए

विदेश से इंजीनियरिंग की पढाई करके लौटे अखिलेश यादव ने 1999 में डिम्पल यादव से शादी करने के बाद वर्ष 2000 में कन्नौज लोकसभा से उप चुनाव लड़कर अपना राजनैतिक करियर शुरू किया कन्नौज से सांसद बने अखिलेश के विषय में राजनैतिक विशेषज्ञों की शुरूआती राय कुछ अच्छी नहीं थी, जिसका नतीजा था कि अखिलेश की पहली जीत का श्रेय उनके पिता मुलायम सिंह यादव को चला गया जिसके बाद 2004 व 2009 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने कन्नौज सीट पर अपना दबदबा कायम रखते हुए राजनीति के पंडितों की राय को गलत साबित कर दिया, लेकिन चुनावी दांवपेंचों में कमज़ोर अखिलेश यादव 2009 के चुनाव में फिरोजाबाद सीट से डिम्पल को जिता पाने में नाकाम साबित हुए

पत्नी डिम्पल की हार ने बदला अखिलेश का राजनैतिक नजरिया -

2009 के लोकसभा चुनाव में पत्नी डिम्पल की हार के बाद सजग हुए अखिलेश यादव ने वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की हार की समीक्षा की और पार्टी कार्यकारिणी में फेर बदल करना शुरू किया पार्टी में मौजूद पुराने दिग्गजों के बीच एक नई और युवा सोच लेकर आगे बढे अखिलेश ने 2012 के विधानसभा से पहले ही अपनी रणनीति तैयार कर चुनावी संचालन की बागडोर अपने हाथ लेली

अपनों से भी ली बुराई -

अखिलेश के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में उतरने वाली समाजवादी पार्टी के दिग्गज अखिलेश को लेकर विश्वस्त नहीं थे सूत्रों की माने तो कई मौकों पर सीनियर नेताओं ने पार्टी मुखिया मुलायम सिंह से मिलकर अपना विरोध भी दर्ज करवाया, लेकिन चुनावी नतीजों ने साबित कर दिया कि अखिलेश यादव में अपने पिता वाली नेतृत्व क्षमता है

युवाओं की पसंद बने अखिलेश -

इंजीनियरिंग की पढाई कर राजनीति में उतरे अखिलेश फुटबाल और क्रिकेट देखना व खेलना पसंद करते है इसके साथ ही युवा विचारधारा से मेल खाती उनकी सोच और आधुनिक सूचना तकनिकी के जानकार मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश आज प्रदेश ही नहीं देशभर के युवाओं की प्रेरणा है

एक जिम्मेदार पुत्र, पति और पिता -

मुलायम सिंह यादव के पुत्र होने की जिम्मेदारी बखूबी निभाने वाले अखिलेश एक अच्छे पति और पिता के रूप में भी पहचाने जाते हैं अखिलेश दो बेटियों अदिति, टीना और बेटे अर्जुन के पिता हैं

एक मुख्यमंत्री के रूप में-

महज 38 वर्ष की उम्र में मुख्यमंत्री के तख़्त तक पहुँचने वाले उत्तर प्रदेश के पहले युवा अखिलेश के नेत्रित्व वाली सरकार ने 22 जून, 2012 को अपने 100 दिन पूरे किये अखिलेश सरकार ने जनविकास के कई महत्वपूर्ण फैसले लिए अल्प समय में ही उन्होंने अपनी अच्छी छाप छोड़ी है.

अखिलेश यादव के 39 वें जन्मदिन पर हम शुभकामनाये देते हैं इसके साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वह उन्हें वो शक्तियां दे जिससे वह प्रदेश की जनता की उम्मीदों को पूरा करने में कामयाब हों कर प्रदेश के सफल मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाएँ

सोमवार, 25 जून 2012

श्री कृष्ण की तपोभूमि रही है टिहरी गढ़वाल

देवभूमि उत्तराखण्ड में मंदिरों की कोई कमी नहीं है। उत्तराखण्ड में ही विश्व प्रसिद्ध श्री बदरी नाथ धाम है। जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इसके अलावा गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ और सेम-मुखेम है। गंगोत्री से गंगा और यमनोत्री से यमुना निकलती है। केदारनाथ शिव को समर्पित है। सेम-मुखेम भगवान श्रीकृष्ण के तपोभूमि का गवाह है। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने टिहरी गढ़वाल के सेम-मुखेम नामक जगह पर कठोर तपस्या की थी। आज भी लाखों की संख्या में लोग सेम-मुखेम पहुंचते हैं।

ऐसी मान्यता है कि द्वारिका से भगवान श्रीकृष्ण तपस्या करने हेतु हिमालय की ओर चले। वे सबसे पहले उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल पहंुचे जहां उन्होंने कुछ दिन बिताये। फिर उन्होंने स्थानीय लोगों से बताने को कहा कि कोई ऐसी जगह बताओ जो मेरे तपस्या करने योग्य हो। जहां मैं शांति से तपस्या कर सकंु। पौड़ी गढ़वाल के लोगों ने भगवान श्रीकृष्ण को बताया कि हिमालय की गोद में सेम-मुखेम जो जगह है वह आपके लिए सर्वाधिक उपर्युक्त है। भगवान श्रीकृष्ण पौड़ी गढ़वाल से सेम-मुखेम की ओर प्रस्थान कर गये। सेम-मुखेम पहंुचने पर श्रीकृष्ण ने स्थानीय राजा गंगू रमोला से दो गज जमीन की मांग की। श्रीकृष्ण ने गंगू रमोला से कहा कि उन्हें केवल दो गज जमीन चाहिए जहां वे बैठकर आराम से तपस्या कर सकें। श्रीकृष्ण साधारण वेश में थे इसलिए गंगू रमोला भगवान को पहचान नहीं सका। और जमीन देने से इन्कार कर दिया।

गंगू रमोला के पास कई भैंसे थी। जिनमें से अधिकांश दूध नहीं देती थी। इस कारण गंगू रमोला परेशान रहता था। भगवान श्रीकृष्ण के बार-बार आग्रह किये जाने पर टालने के उद्देश्य से गंगू रमोला ने कहा- मैं तुम्हें जमीन जरूर दुंगा लेकिन मेरी एक शर्त है। शर्त है कि मेरी जितनी भैंसे दूध नहीं देती हैं अगर वे दूध देना प्रारम्भ कर दें तो मैं तुम्हे जमीन उपलब्ध करवा दंूगा। श्रीकृष्ण ने कहा कि यह तो बहुत ही आसान है जाओ गौशाला में पता करो कि तुम्हारी कौन सी भैंस अब दूध नहीं देती हैं। गंगू रमोला बारी-बारी से सभी भैंस के पास जाकर जांच किया। गंगू रमोला ने पाया की अब उसकी सभी भैंसे दूध देने लग गई। गंगू रमोला ने प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा आप जहां चाहें तपस्या कर लें। आज से आप मेरे परम मित्र हैं और मेरी इस रियासत पर आपका भी अधिकार है।

जिस जगह पर भगवान श्रीकृष्ण ने तपस्या किया था आज वहां पर भव्य मंदिर है। मंदिर के भीतर एक बहुत बड़ी शीला है जिसे लोग भगवान श्रीकृष्ण का प्रतीक मानते हैं। कुछ ही दूरी पर पत्थरों पर गाय, भैंस और भगवान श्रीकृष्ण के घोड़े के पैर के निशान भी हैं। मंदिर के पास ही एक बहुत बड़ा पत्थर है जो केवल एक अंगूली लगाने से हिलता है। लेकिन अगर आप बलपूर्बक उस पत्थर को हिलाने का प्रयास करेंगे वह पत्थर नहीं हिलेगा। उपरोक्त लिखी बातें आज भी प्रत्यक्ष हैं। जिसे कोई भी जाकर देख सकता है।

Way to Sem-Mukhem

1.Haridwar-Rishikesh-New Tehri-Lambgaon-SemMukhem

-- राजाराम राकेश, टिहरी गढ़वाल

रविवार, 17 जून 2012

पुत्र द्वारा एक पोस्ट पिता के लिए...

(आज फादर्स-डे है. इसी बहाने मैंने अपने पिता जी से जुडी बातों को सहेजने का प्रयास किया है. पिता जी उत्तर प्रदेश सरकार में वर्ष 2003 में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात सम्प्रति रचनात्मक लेखन व अध्ययन, बौद्धिक विमर्श एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी में प्रवृत्त हैं. मुझे इस मुकाम तक पहुँचाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है.)

बचपन में पिता जी के साथ न रहने की कसक-

किसी भी व्यक्ति के जीवन में पिता का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है. माँ की ममता और पिता की नसीहत..दोनों ही जीवन को एक दिशा देते हैं. मेरा अधिकतर बचपन ननिहाल में गुजरा, बमुश्किल चार साल मैंने अपने पिताजी के साथ लगातार गुजारे होंगें. मेरे जन्म के बाद पिता जी का स्थानांतरण प्रतापगढ़ के लिए हो गया, तो हम मम्मी के साथ ननिहाल में रहे. पुन: पिता जी का स्थानान्तरण आजमगढ़ हुआ तो हम ननिहाल से पिता जी के पास लौट कर आए. कक्षा 2 से कक्षा 5 तक हम पिता जी के साथ रहे, फिर नवोदय विद्यालय में चयन हो गया तो वहां चले गए. कक्षा 6 से 12 तक जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर, आजमगढ़ के हास्टल में रहे और फिर इलाहाबाद. इलाहाबाद से ही सिविल-सर्विसेज में सफलता प्राप्त हुई, फिर तो वो दिन ही नहीं आए कि कभी पिता जी के साथ कई दिन गुजारने का अवसर मिला हो...हम घर जाते या पिता जी हमारे पास आते..दसेक दिन रहते, फिर अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त और मस्त. फोन पर लगभग हमेशा संवाद बना रहता है. पर मुझे आज भी कसक होती है कि मैं उन भाग्यशाली लोगों में नहीं रहा , जिन्होंने अपनी पिता जी के साथ लम्बा समय गुजारा हो.

लेखनी पर पिता जी का प्रभाव-

मैंने पिता जी को बचपन से ही किताबों और पत्र-पत्रिकाओं में तल्लीन देखा. वो पत्र-पत्रिकाओं से कुछ कटिंग करते और फिर उनमें से तथ्य और विचार लेकर कुछ लिखते. पर यह लिखना सदैव उनकी डायरी तक ही सीमित रहा. पिता जो को लिखते देखकर मुझे यह लगता था कि मैं भी उनकी तरह कुछ न कुछ लिखूंगा. छुट्टियों में घर आने पर पिताजी की नजरें चुराकर उनके बुकशेल्फ से किताबें और पत्र-पत्रिकायें निकालकर मैं मनोयोग से पढता था. पिताजी के आदर्शमय जीवन, ईमानदारी व उदात्त व्यक्तित्व का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा और मेरे चरित्र निर्माण में पिताजी की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही। अध्ययन और लेखन के क्षेत्र में भी मुझ पर पिताजी का प्रभाव पड़ा। पिताजी के अध्ययन प्रेमी स्वभाव एवम् लेखन के प्रति झुकाव को सरकारी सेवा की आचरण संहिताओं व समुचित वातावरण के अभाव में मैंने डायरी में ही कैद होते देखा है। वर्ष 1990 में पिताजी ने आर0 एस0 ‘अनजाने‘ नाम से एक पुस्तक ‘‘सामाजिक व्यवस्था और आरक्षण‘‘ लिखी, पर सरकारी सेवा की आचरण संहिताओं के भय के चलते खुलकर इसका प्रसार नहीं हो सका। फिलहाल पिताजी के सेवानिवृत्त होने के पश्चात उनके लेख देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा रहे हैं, पर किशोरावस्था में जब भी मैं पिताजी को नियमित रूप से अखबार की कतरनें काटते देखते और फिर कुछ समय बाद उन्हें पढ़कर जब वे फेंक देते, तो आप काफी उद्वेलित होता थे। ‘अखबार की कतरनें’ नामक अपनी कविता में इस भाव को मैंने बखूबी अभिव्यक्त किया है- ”मैं चोरी-चोरी पापा की फाइलों से/उन कतरनों को लेकर पढ़ता/पर पापा का एक समय बाद/उन कतरनों को फाड़कर फेंक देना/मुझमें कहीं भर देता था एक गुस्सा/ऐसा लगता मानो मेरा कोई खिलौना/तोड़कर फेंक दिया गया हो/उन चिंदियों को जोड़कर मैं/उनके मजमून को समझने की कोशिश करता/शायद कहीं कुछ मुझे उद्वेलित करता था।” जो भी हो पिताजी के चलते ही मेरे मन में यह भाव पैदा हुआ कि भविष्य में मैं रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हूँगा और अपने विचारों व भावनाओं को डायरी में कैद करने की बजाय किताब के रूप में प्रकाशित कर रचना संसार में अपनी सशक्त उपस्थित दर्ज कराऊंगा.

पिता जी की सीख बनी सिविल- सर्विसेज में सफलता का आधार
वर्ष 1994 में मैं जवाहर नवोदय विद्यालय जीयनपुर, आजमगढ़ से प्रथम श्रेणी में 12वीं की परीक्षा उतीर्ण हुआ एवम् अन्य मित्रों की भांति आगे की पढ़ाई हेतु इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने का निर्णय लिया। जैसा कि 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कैरियर बनाने की जद्दोजहद आरम्भ होती है, मैंने भी अपने मित्रों के साथ सी0बी0एस0ई0 मेडिकल की परीक्षा दी और पिताजी से डाॅक्टर बनने की इच्छा जाहिर की। पिताजी स्वयं स्वास्थ्य विभाग में थे, पर उन्होंने मुझे सिविल सर्विसेज परीक्षा उत्तीर्ण कर आई0 ए0 एस0 इत्यादि हेतु प्रयत्न करने को कहा। इस पर मैंने कहा कि- ‘‘पिताजी! यह तो बहुत कठिन परीक्षा होती है और मुझे नहीं लगता कि मैं इसमें सफल हो पाऊँगा।’’ पिताजी ने धीर गम्भीर स्वर में कहा-‘‘बेटा! इस दुनिया में जो कुछ भी करता है, मनुष्य ही करता है। कोई आसमान से नहीं पैदा होता।’’ पिताजी के इस सूत्र वाक्य को गांठकर मैंने वर्ष 1994 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कला संकाय में प्रवेश ले लिया और दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र व प्राचीन इतिहास विषय लेकर मनोयोग से अध्ययन में जुट गया । चूँकि छात्रावासों के माहौल से मैं पूर्व परिचित था, सो किराए पर कमरा लेकर ही रहना उचित समझा और ममफोर्डगंज में रहने लगा। जहाँ अन्य मित्र मेडिकल व इंजीनियरिंग की कोचिंग में व्यस्त थे, वहीं मैं अर्जुन की भांति सीधे आई0ए0एस0-पी0सी0एस0 रूपी कैरियर को चिडि़या की आँख की तरह देख रहा था. कभी-कभी दोस्त व्यंग्य भी कसते कि-‘‘क्या अभी से सिविल सर्विसेज की रट लगा रखी है? यहाँ पर जब किसी का कहीं चयन नहीं होता तो वह सिविल सर्विसेज की परीक्षा अपने घर वालों को धोखे में रखने व शादी के लिए देता है।’’ इन सबसे बेपरवाह मैं मनोयोग से अध्ययन में जुटा रहा. पिताजी ने कभी पैसे व सुविधाओं की कमी नहीं होने दी और मैंने कभी उनका सर नीचे नहीं होने दिया और अपने प्रथम प्रयास में ही सिविल- सर्विसेज की परीक्षा में चयनित हुआ !!

मेरी यह सफलता इस रूप में भी अभूतपूर्व रही कि नवोदय विद्यालय संस्था से आई0ए0एस0 व एलाइड सेवाओं में चयनित मैं प्रथम विद्यार्थी था और यही नहीं अपने पैतृक स्थान सरांवा, जौनपुर व तहबरपुर, आजमगढ़ जैसे क्षेत्र से भी इस सेवा में चयनित मैं प्रथम व्यक्ति था । मेरा चयन पिता जी के लिए भी काफी महत्वपूर्ण था क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश की राजकीय सेवाओं में सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 58 वर्ष थी और पिताजी वर्ष 2001 में ही सेवानिवृत्त होने वाले थे। पर यह सुखद संयोग रहा कि मेरे चयन पश्चात ही उत्तर प्रदेश सरकार ने सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष कर दी और पिताजी को इसके चलते दो साल का सेवा विस्तार मिल गया।

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पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी का संक्षिप्त परिचय :

20 दिसम्बर 1943 को सरांवा, जौनपुर (उ0प्र0) में जन्म। काशी विद्यापीठ, वाराणसी (उ0प्र0) से 1964 में समाज शास्त्र में एम.ए.। वर्ष 1967में खण्ड प्रसार शिक्षक (कालांतर में ‘स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी’ पदनाम परिवर्तित) के पद पर चयन। आरंभ से ही अध्ययन-लेखन में अभिरुचि। उत्तर प्रदेश सरकार में वर्ष 2003 में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात सम्प्रति रचनात्मक लेखन व अध्ययन, बौद्धिक विमर्श एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी। सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण (1990) नामक पुस्तक प्रकाशित। लेखों का एक अन्य संग्रह प्रेस में। भारतीय विचारक, नई सहस्राब्दि का महिला सशक्तीकरणः अवधारणा, चिंतन एवं सरोकार, नई सहस्राब्दि का दलित आंदोलनः मिथक एवं यथार्थ सहित कई चर्चित पुस्तकों में लेख संकलित।

देश की शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं: युगतेवर, समकालीन सोच, संवदिया, रचना उत्सव, नव निकष, गोलकोण्डा दर्पण, समय के साखी, सोच विचार, इंडिया न्यूज, सेवा चेतना, प्रतिश्रुति, झंकृति, हरसिंगार, शोध प्रभांजलि, शब्द, साहित्य क्रान्ति, साहित्य परिवार, साहित्य अभियान, सृजन से, प्राची प्रतिभा, संवदिया, अनीश, सांवली, द वेक, सामथ्र्य, सामान्यजन संदेश, समाज प्रवाह, जर्जर कश्ती, प्रगतिशील उद्भव, प्रेरणा अंशु, यू0एस0एम0 पत्रिका, नारायणीयम, तुलसी प्रभा, राष्ट्र सेतु, पगडंडी, आगम सोची, शुभ्र ज्योत्स्ना, दृष्टिकोण, बुलंद प्रभा, सौगात, हम सब साथ-साथ, जीवन मूल्य संरक्षक न्यूज, श्रुतिपथ, मंथन, पंखुड़ी, सुखदा, सबलोग, बाबू जी का भारत मित्र, बुलंद इण्डिया, टर्निंग इण्डिया, इसमासो, नारी अस्मिता, अनंता, उत्तरा, अहल्या, कर्मश्री, अरावली उद्घोष, युद्धरत आम आदमी, अपेक्षा, बयान, आश्वस्त, अम्बेडकर इन इण्डिया, अम्बेडकर टुडे, दलित साहित्य वार्षिकी, दलित टुडे, बहुरि नहीं आवना, हाशिये की आवाज, आधुनिक विप्लव, मूक वक्ता, सोशल ब्रेनवाश, आपका आइना, कमेरी दुनिया, आदिवासी सत्ता, बहुजन ब्यूरो, वैचारिक उदबोध, प्रियंत टाइम्स, शिक्षक प्रभा, विश्व स्नेह समाज, विवेक शक्ति, हिन्द क्रान्ति, नवोदित स्वर, ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन, पब्लिक की आवाज, समाचार सफर, सत्य चक्र, दहलीज, दि माॅरल, अयोध्या संवाद, जीरो टाइम्स, तख्तोताज, दिनहुआ, यादव ज्योति, यादव कुल दीपिका, यादव साम्राज्य, यादव शक्ति, यादव निर्देशिका सह पत्रिका, इत्यादि में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित।

इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं: सृजनगाथा, रचनाकार, साहित्य कुंज, साहित्य शिल्पी, हिन्दीनेस्ट, हमारी वाणी, परिकल्पना ब्लाॅगोत्सव, स्वतंत्र आवाज डाॅट काम, नवभारत टाइम्स, वांग्मय पत्रिका, समय दर्पण, युगमानस इत्यादि पर लेखों का प्रकाशन।

”यदुकुल” ब्लॉग (http://www.yadukul.blogspot..in/) का 10 नवम्बर 2008 से सतत् संचालन।

सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’ (2006), भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा ‘ज्योतिबा फुले फेलोशिप सम्मान‘ (2007) व डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान (2011), आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘बृज गौरव‘ (2007), समग्रता शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी, म0प्र0 द्वारा ‘भारत-भूषण‘ (2010), रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया द्वारा ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित।
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( पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी, माँ श्रीमती बिमला यादव जी, कृष्ण कुमार यादव, पत्नी श्रीमती आकांक्षा और बेटियाँ अक्षिता और अपूर्वा)
(पिता जी और मम्मी जी)

(बहन किरन यादव के शुभ-विवाह पर आशीर्वाद देते पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी, श्वसुर श्री राजेंद्र प्रसाद जी, MLC श्री कमला प्रसाद यादव जी और श्री समीर सौरभ जी (उप पुलिस अधीक्षक)
(बहन किरन यादव की शादी के दौरान रस्म निभाते मम्मी-पापा)
(पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी और वरिष्ठ बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु जी)
(पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी)
(पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी, नाना स्वर्गीय श्री दलजीत यादव जी, श्री वैदेही यादव जी)
-कृष्ण कुमार यादव : शब्द-सृजन की ओर

(पुत्र कृष्ण कुमार यादव द्वारा फादर्स-डे पर पोस्ट की गई एक पोस्ट)

सोमवार, 11 जून 2012

अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रशिक्षक संदेश यादव सम्मानित

गुड़गांव के कराटे खिलाड़ी व अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रशिक्षक सेंसई संदेश यादव मध्यप्रदेश के देवास जिले में सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक के सम्मान से सम्मानित हुए हैं। यह अवार्ड उनकी कराटे में उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार में पाठय पुस्तक निगम के चेयरमैन राय सिंह सैंधव द्वारा एक समारोह के दौरान दिया गया। देश के कराटे प्रशिक्षक के रुप में संदेश यादव राजीव गांधी एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित हो चुके हैं। इसके पूर्व संदेश यादव को वर्ष 2009 में भारत में सबसे कम उम्र का युवा प्रतिनिधि का गौरव अंतर्राष्ट्रीय कराटे विश्वविद्यालय कनाडा द्वारा सदस्यता देने के साथ प्राप्त हुआ।
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शनिवार, 9 जून 2012

डिम्पल यादव ने रचा इतिहास : निर्विरोध बनीं सांसद

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) की प्रत्याशी डिम्पल यादव आज शनिवार को आखिरकार निर्विरोध सांसद चुन ली गईं।

कन्नौज की जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे ने शनिवार को ठीक तीन बजे डिम्पल के निर्विरोध निर्वाचित होने की घोषणा की। जीत की घोषणा के साथ ही सपा में खुशी की लहर दौड़ गयी। डिम्पल के निर्विरोध निर्वाचित होने की आधिकारिक घोषणा होने के बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने इसे जनता की जीत करार दिया। मुलायम ने कहा कि यह जनता की जीत है। डिम्पल ने इतिहास कायम किया है। अब पूरी लगन के साथ वह अपने क्षेत्र की सेवा करेंगी।

डिम्पल यादव के खिलाफ नामांकन पत्र दाखिल करने वाले मात्र दो उम्मीदवारों निर्दलीय संजू कटियार और संयुक्त समाजवादी दल के उम्मीदवार दशरथ शंखवार ने शुक्रवार को ही अपना नामांकन वापस ले लिया था। कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी जहां इस सीट से अपने उम्मीदवार नहीं उतारने का निर्णय लिया था जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अंतिम समय में अपने उम्मीदवार जगदेव सिंह यादव के नाम की घोषणा की थी लेकिन समय सीमा समाप्त हो जाने की वजह से वह अपना नामांकन दाखिल नहीं कर पाए थे।

गौरतलब है कि वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में डिम्पल फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ी थीं लेकिन इस चुनाव में उन्हें बॉलीवुड अभिनेता और कांग्रेस के उम्मीदवार राज बब्बर से शिकस्त खानी पडी थी।

डिम्पल यादव ने बनाया रिकार्ड :

डिंपल यादव प्रदेश की पहली ऐसी महिला हैं जिनके खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। संयोग भी एक रिकार्ड के रूप में ही देखा जाएगा कि डिंपल जिस लोकसभा के लिए चुनाव हारीं, उसी में निर्विरोध जीतकर पहुंचेंगी। यह तथ्य भी विशिष्टता लिए हुए हैं कि वह ऐसी सांसद हैं जिनके पति मुख्यमंत्री हैं। लोकसभा में उनके साथ श्वसुर व देवर भी होंगे।

यूपी में साठ साल बाद आया यह मौका:-

टिहरी में जीते मानवेंद्र शाह को यदि उत्तराखंड में मान लिया जाए तो प्रदेश मे 60 साल बाद यह अवसर आया है जबकि लोकसभा का चुनाव कोई उम्मीदवार निर्विरोध जीता है। एक संयोग ही है कि इससे पहले 1952 में पीडी टंडन भी उप चुनाव में ही जीते थे। डिंपल की जीत भी उप चुनाव में ही हुई है। देश में उप चुनाव के दौरान निर्विरोध जीतने वाले लोगों की संख्या डिंपल को मिलाकर 9 है। 22 उम्मीदवार सामान्य चुनावों में जीते हैं।

दो दशक बाद कोई निर्विरोध:-

यह 31 वां अवसर है जबकि लोकसभा चुनाव में कोई उम्मीदवार निर्विरोध जीता है। इससे पहले 1989 नेशनल कांफ्रेस के मो. शफी बट श्रीनगर से निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। लगभग दो दशक बाद देश में कोई निर्विरोध चुना गया है। आजादी के बाद 1951 में हुए देश के पहले चुनाव में पांच प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए थे। इसके बाद 1952 में हुए उप चुनाव में इलाहाबाद पश्चिम में कांग्रेस के पुरुषोत्तम दास टंडन निर्विरोध जीते। 1962 में टिहरी गढ़वाल से वहां के राजा मानवेंद्र शाह ने जब चुनाव लड़ने का फैसला किया तो उनके मुकाबले कोई प्रत्याशी आगे नहीं आया। इस चुनाव में जनसंघ के रंगीलाल ने परचा भरा था लेकिन वापस ले लिया था। इससे पहले हुए चुनाव में बीकानेर के पूर्व महाराजा और निशानेबाज करणी सिंह भी निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। 1962 में ही उड़ीसा में पूर्व मुख्यमंत्री हरेकृष्ण मेहताब को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया था।

डिम्पल यादव को यदुकुल की तरफ से हार्दिक बधाइयाँ !!


-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

शुक्रवार, 8 जून 2012

यू पी बोर्ड हाई स्कूल के रिजल्ट में पूजा यादव और अन्ना यादव बने टापर

उत्तर प्रदेश हाई स्कूल [कक्षा 10] का परिणाम शुक्रवार,8 जून, 2012 को घोषित हुआ। पूजा यादव और आकांक्षा सिंह ने सर्वाधिक 96.57फीसद अंक हासिल कर प्रदेश में अव्वल स्थान हासिल किया। दोनों लड़कियां बाराबंकी के महारानी लक्ष्मी बाई इंटर कॉलेज की छात्राएं हैं।

लड़कों में अन्ना यादव ने 96.50 बाजी मारी। अन्ना औरैया के सरस्वती विद्या मंदिर का छात्र है।

कुल परिणाम 83.75 प्रतिशत रहा। इसमें छात्राओं का प्रतिशत 88.95 और लड़कों का 76.91 रहा। हाईस्कूल में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन प्रणाली [सीसीई] लागू होने के कारण हाईस्कूल के अंकपत्र पर अंकों और डिवीजन के बजाय ग्रेड का उल्लेख होगा।

सभी को यदुकुल की तरफ से बधाइयाँ !!

-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

बुधवार, 30 मई 2012

अखिलेश यादव से मिले बिल गेट्स

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य की स्वास्थ्य एवं कृषि सेवाओं में सुधार के लिए मिलकर काम करने का फैसला किया है.बिल गेट्स मुख्यमंत्री यादव से मिलने के लिए 30 मई को लखनऊ आए थे.

उत्तर प्रदेश सरकार की एक विज्ञप्ति में बताया गया है कि राज्य सरकार और बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन दो महीने के भीतर एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे.विज्ञप्ति के अनुसार गेट्स फाउंडेशन जच्चा- बच्चा के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं, टीकाकरण और खेती के कार्यक्रमों में राज्य सरकार को तकनीकी, डिजाइन और प्रबंधकीय सुविधाएँ देगा.स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन के अनुसार मुलाक़ात के दौरान मुख्यमंत्री श्री यादव ने बिल गेट्स से कहा कि उत्तर प्रदेश को वित्तीय सहायता के बजाय तकनीकी और प्रबंधन की सुविधाएँ चाहिए.राज्य सरकार ने गेट्स फाउंडेशन से सूचना तकनीक और टेली मेडिसिन के क्षेत्र में भी मदद की अपेक्षा की है.

साभार : BBC

पंकज यादव बने बाबा जय गुरुदेव के उत्तराधिकारी

गत 18 मई को ब्रह्मलीन हुए बाबा जय गुरुदेव के उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी गई। बाबा के बेहद करीबी रहे पंकज यादव को उनका उत्तराधिकारी बताया है। इस तरह बाबा जगगुरुदेव आश्रम की लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति पर भी पंकज यादव का ही अधिकार होगा। पंकज यादव ने ही बाबा जयगुरुदेव को मुखाग्नि दी थी।

बाबा जय गुरुदेव के त्रयोदशी संस्कार के मौके पर मथुरा में पंकज यादव को बाबा जय गुरुदेव का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. जय गुरुदेव के फैसले का हवाला देते हुए उन्‍हें ट्रस्ट का अध्यक्ष घोषित कर दिया गया है. बाबा के भक्त फूल सिंह ने सार्वजनिक रूप से एक पत्र पढ़कर सुनाया, जो बाबा द्वारा लिखा बताया गया। पत्र के अनुसार 20 जुलाई 2010 को बाबा ने इटावा की सिविल अदालत में लिखित में दिया था कि उनके बाद पंकज को उत्तराधिकारी बनाया जाए। फूल सिंह ने ट्रस्ट प्रबंधक संतराम चौधरी, रामकृष्ण यादव दददू, चरन सिंह एडवोकेट सहित तमाम पदाधिकारियों की मौजूदगी में यह पत्र पढ़ा।
- राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल

मंगलवार, 29 मई 2012

बिहटा की नव्या यादव मैट्रिक में लहराया परचम

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित मैट्रिक परीक्षा 2012 का रिजल्ट 29 मई की शाम शिक्षा मंत्री प्रशांत कुमार शाही ने जारी किया। टॉप टेन में एक बार फिर बेटियों का दबदबा कायम रहा। घोषित परिणाम में टॉप टेन में 18 परीक्षार्थियों को जगह मिली जिनमें 10 छात्राएं शामिल हैं। इनमें से अधिकांश ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखती हैं। नव्या यादव ने ९३ प्रतिशत अंक के साथ मैट्रिक में सर्वाधिक अक प्राप्त किये हैं.

इस वर्ष आयोजित परीक्षा में 12,52,069 परीक्षार्थी शामिल हुए जिसमें 8,89,358 सफल हुए।बोर्ड परीक्षा में पास प्रतिशत 71.03प्रतिशत रहा। प्रथम श्रेणी से पास करने वाले परीक्षार्थियों की संख्या 2,20,357(17.59 प्रतिशत) रहा। जबकि द्वितीय श्रेणी से 4,64,139(37.06 प्रतिशत) छात्र और तृतीय श्रेणी से 2,04,860(16.36 प्रतिशत) छात्र उत्तीर्ण हुए। 9935 छात्र परीक्षा में अनुपस्थित रहे और 1703 को परीक्षा में कदाचार के आरोप में निष्कासित किया गया था। बताते चलें कि परीक्षा में 3,57,807(28.97 प्रतिशत)परीक्षार्थी असफल घोषित हुए।

बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट छात्रों के लिए सुखद नहीं रहा। पिछले वर्ष की तुलना में छात्रों के पास प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई जबकि छात्राओं का पास प्रतिशत बढ़ा है। पिछले वर्ष छात्राओं का पास प्रतिशत 42.87 प्रतिशत था जो बढ़कर 44.87 प्रतिशत हो गया। दूसरी तरफ छात्रों का पास प्रतिशत 57.12 प्रतिशत से घटकर 55.13 प्रतिशत रह गया। परीक्षा में 6,90,282 छात्र में से 3,80,552 और 5,61,787 छात्राओं में से 2,52,074 को सफलता हाथ लगी।

मुलायम सिंह यादव को इंटरनेशनल ज्यूरिसिस्ट पुरस्कार

समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को वर्ष 2012 के सम्मानित इंटरनेशनल ज्यूरिसिस्ट पुरस्कार से नवाजा गया। पूर्व रक्षा मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री यादव को बार और पीठ की बेहतरी के लिए उनके द्वारा किए गए साहसिक योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया है। मंगलवार, मई 28, 2012 की रात इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑफ ज्यूरिस्ट ऑन रूल ऑफ लॉ में एक वक्तव्य में कहा गया, विधि के क्षेत्र में उनका योगदान दुनिया में अद्वितीय है। हालांकि मुलायम सिंह यादव पुरस्कार लेने के लिए वहां मौजूद नहीं थे।

मंगलवार, 22 मई 2012

द्वारिका-धाम की यात्रा...

भगवान श्री कृष्ण से सम्बंधित तमाम धार्मिक स्थल देश-विदेश में प्रसिद्द हैं. गुजरात में द्वारिका का नाम जग-जाहिर है. कुछ प्रमुख धार्मिक स्थलों की सैर करते हैं-

द्वारका
गुजरात के पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित द्वारका हिंदुओं के चार सबसे पवित्रतम तीर्थस्थलों (चार धाम) में से एक है और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी हुई अधिकतर विंâवदंतियों में इसका जिक्र होता है। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण वंâस का वध करने के बाद मथुरा छोड़कर पूरे यादव वंश के साथ सौराष्ट्र समुद्र तट पर पहुंचे और स्वर्णद्वारका नामक नगर का निर्माण किया, फिर यहीं से उन्होंने अपने साम्राज्य पर शासन किया। ऐसी कथा है कि भगवान श्री कृष्ण ने स्वर्गारोहण के समय अपने परिजनों और भक्तों से स्वर्णद्वारका छोड़ने और उसके एक दिन डूबने की बात कही थी । आज तक यह समुद्र में डूबी हुई है। खुदाई से इसकी पुष्टि हुई है।

द्वारकाधीश मंदिर

मान्यता है कि मूल द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के पौत्र वङ्कानाभ ने उनके (हरि-गृह) आवास के ऊपर करवाया था। इसे जगत मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। यह मंदिर २५०० साल पुराना है। यह ऊंची मीनार और हाल से युक्त है। यहां का ७२ स्तंभों पर निर्मित ७८.३ मीटर ऊंचा द्वारकाधीश मंदिर (जगत मंदिर) पांच मंजिलों वाला भव्य मंदिर, गोमती और अरब सागर के संगम पर स्थित है। मंदिर के गुंबद से सूर्य और चंद्रमा से सुसज्जित ८४ मीटर लंबा बहुरंगी ध्वज लहराता रहता है।
मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं, उत्तर में स्थित मुख्य द्वार 'मोक्ष द्वार' कहलाता है। दक्षिण का प्रवेश द्वारा 'स्वर्ग द्वार' कहलाता है। इसके बाहर ५६ डग भर कर गोमती नदी तक पहुंचते हैं।

रुक्मिणी देवी मंदिर :
द्वारका के इतिहास में विभिन्न अवधियों का प्रतिनिधित्व करते अनेकानेक मंदिर हैं, लेकिन तीर्थयात्रियों के बीच आकर्षण का एक और मुख्य वेंâद्र भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का मंदिर है। रुक्मिणी को धन और सौंदर्य की देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। यह छोटा-सा मंदिर नगर से १.५ किमी उत्तर में स्थित है। मंदिर की दीवारें खूबसूरत पेंटिंग्स से सजी हुई हैं। इनमें रुक्मिणी को श्रीकृष्ण के साथ दिखाया गया है।

गोमती घाट मंदिर :
चक्रघाट पर गोमती नदी अरब सागर में मिलती है। यहीं पर गोमती घाट मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि यहां पर स्नान करने से मुक्ति मिलती है। द्वारकाधीश मंदिर के पिछले प्रवेश द्वार से गोमती नदी दिखायी देती है। गोमती और समुद्र के संगम पर ही भव्य समुद्र नारायण मंदिर (संगम नारायण मंदिर) भी है।

इन मंदिरों के अलावा नागेश्वर महादेव मंदिर, गोपी तालाब भी तीर्थयात्रियों के लिए आकर्षण का वेंâद्र है। यह द्वारका से २० किमी उत्तर में स्थित है। नागेश्वर महादेव मंदिर शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

भाल्का तीर्थ :
कहा जाता है कि इसी स्थान पर हिरण चर्म को धारण कर सो रहे कृष्ण को हिरण समझकर मारा गया तीर जाकर लगा और इस तरह उनकी इहलीला समाप्त हुई थी। कृष्ण का त्रिवेणी घाट पर दाह-संस्कार किया गया था।
इसी के पास सोम (चंद्र) द्वारा स्थापित सोमनाथ मंदिर है। कहा जाता है कि मूल मंदिर सोने का था। इसके गिरने के बाद रावण ने चांदी के मंदिर का निर्माण किया। इसके ढहने के बाद श्रीकृष्ण ने लकड़ी के मंदिर का निर्माण किया। बाद में भीमदेव ने पाषाण मंदिर का निर्माण किया। सोमनाथ में एक सूर्य मंदिर भी है।

मेला और त्यौहार :
अगस्त और सितंबर के महीने में द्वारका में जन्माष्टमी धूमधाम से मनायी जाती है।
वैâसे पहुंचें : हवाई, रेल और सड़क तीनों मार्गों से द्वारका पहुंचा जा सकता है। द्वारका से सबसे करीब का एअरपोर्ट है, १३५ किमी दूर स्थित जामनगर एअरपोर्ट। द्वारका में रेलवे स्टेशन है। सरकारी और निजी बस सेवाओं के अलावा टैक्सी से भी द्वारका पहुंचा जा सकता है।

रविवार, 20 मई 2012

मथुरा-धाम की यात्रा...

भगवान श्री कृष्ण से सम्बंधित तमाम धार्मिक स्थल देश-विदेश में प्रसिद्द हैं. उत्तर प्रदेश में मथुरा का नाम जग-जाहिर है. कुछ प्रमुख धार्मिक स्थलों की सैर करते हैं-

मथुरा
मथुरा यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है। भागवत पुराण में मथुरा में श्री कृष्ण और गोपियों की रासलीलाओं का जिक्र है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित है। मथुरा आज आध्यात्मिक और धार्मिक पर्यटन का प्रमुख वेंâद्र बन गया है। देश–विदेश से बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं।

राधारमण मंदिर
राधारमण का मतलब राधा को आनंदित करनेवाला यानी भगवान श्रीकृष्ण। इस मंदिर की स्थापना १५४२ ई. में हुई थी।

जुगल किशोर मंदिर
यह सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इसकी स्थापना १६२७ ई. में हुई थी। मुगल बादशाह अकबर ने १५७० में वृंदावन की यात्रा की थी, तब चार मंदिरों की स्थापना की अनुमति दी थी।

केसी घाट मंदिर
भगवान श्रीकृष्ण ने इसी स्थान पर महाकाय घोड़े के रूप में प्रगट हुए दानव को मारा था। इसके बाद केसी घाट पर स्नान किया था। इस घाट पर लोग बड़ी संख्या में स्नान करते हैं। हर शाम को यहां आरती उतारी जाती है।

रंगजी मंदिर
इस मंदिर का निर्माण एक धनी सेठ परिवार ने १८५१ई. में करवाया था। यह भगवान श्री रंगनाथ को समर्पित है। इसमें भगवान विष्णु शेषनाग पर लेटे हुए हैं। पारंपरिक दक्षिण भारतीय गोपुरम शैली में है और चारों तरफ दीवारों से घिरा हुआ है।

द्वारकाधीश मंदिर
इस मंदिर का निर्माण १८१४ ई. में किया गया था। नगर के बीचोंबीच स्थित यह काफी लोकप्रिय मंदिर है। मथुरा में सबसे ज्यादा दर्शनीय मंदिर हैं जो यमुना नदी के पास स्थित हैं।

मंदिरों के अलावा फाल्गुन (फरवरी-मार्च) महीने में मनायी जानेवाली ब्रज (बरसाना, नंदग्राम. दौजी) की होली काफी प्रसिद्ध हौ
वैâसे पहुंचे: मथुरा दिल्ली से १४१ किमी दक्षिण-पूर्व में और आगरा से ४७ किमी उत्तर पश्चिम में स्थित है। मथुरा से दिल्ली और आगरा के लिए बस सेवा उपलब्ध है। मथुरा रेलवे स्टेशन भी है। आगरा, भरतपुर, सवाई माधोपुर और कोटा से मथुरा ट्रेन से भलीभांति जुड़ा हुआ है।

वृंदावन
वृंदावन मथुरा से १५ किमी दूर है। यमुना के किनारे स्थित यह तीर्थस्थल आध्यात्मिक पर्यटकों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा से इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पर हर साल ५ लाख से ज्यादा पर्यटक पहुंचते हैं। नये और प्राचीन अनगिनत मंदिरों के लिए जाना जाता हैं। भगवान कृष्ण ने अपने बचपन के दिन यहीं पर बिताये। कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर ने वृंदावन के आध्यात्मिक महत्व को स्वीकार किया था। यहां पर उसने पांच मंदिरों - गोविंद देव, मदन मोहन, गोपीनाथ और जुगल किशोर नामक मंदिरों के निर्माण की अनुमति दी थी। भारतीय जनमानस में वृंदावन के छाये होने की सबसे बड़ी वजह भगवान श्रीकृष्ण के बारें में यहां से जुड़ी विंâवदंतियां और पौराणिक कथायें हैं।

बांके बिहारी मंदिर:
बांके बिहारी की मूल रूप से निधिवन में पूजा होती थी। सन् १८६४ में मंदिर के निर्माण के बाद यहां प्रतिष्ठित कर दिया गया। खासकर सावन में झूला यात्रा के समय वृंदावन में यह सबसे लोकप्रिय मंदिर बन जाता है। साल में एक बार मंगल आरती होती है।
इस्कान मंदिर:
देश भर में 'हरे राम हरे कृष्ण' के अनुयायियों द्वारा निर्मित अनेक मंदिरों में से एक मंदिर यहां पर है। इसका मकसद भागवत गीता और भारत के अन्य वैदिक ग्रंथों के संदेशों के माध्यम से जनकल्याण करना है। हर साल अक्टूबर-नवंबर में इस्कॉन ब्रज मंडल परिक्रमा का आयोजन करता है। इसके अंतर्गत एक माह तक वृंदावन के १२ जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है।

कृष्ण बलराम मंदिर : यह एक खूबसूरत मंदिर है। इसमें गौरा निताई, कृष्ण बलराम और राधा श्याम सुंदर की मूर्तियां हैं ।

शनिवार, 19 मई 2012

यदुकुल शिरोमणि मशहूर संत बाबा जय गुरुदेव का निधन

दुनिया को गुरु का महत्‍व समझाने वाले देश के मशहूर संत यदुकुल शिरोमणि बाबा जय गुरुदेव का शुक्रवार को निधन हो गया. करीब 10 दिनों से बीमार चल रहे 116 साल के जय गुरुदेव का गुड़गांव में इलाज चल रहा था, लेकिन शुक्रवार,18 मई, 2012 को अस्पताल से छुट्टी मिलने के कुछ घंटों बाद ही मथुरा के आश्रम में उन्‍होंने रात 10:30 बजे अंतिम सांस ली.

जय गुरुदेव के देश-विदेश में लाखों भक्त हैं. उनके भक्त खासकर गांव में रहने वाले लोग हैं. वे अपना प्रचार दीवारों पर लिखवा कर किया करते थे.

कौन थे जय गुरुदेव?
बहुत कम लोगों को मालूम है कि जय गुरुदेव का असली नाम तुलसी दास जी महाराज था. इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के खिटोरा गांव में हुआ था. वह 116 वर्ष के थे। जय गुरुदेव के देश-विदेश में करोड़ों भक्त हैं. इनके अनुयायियों में अनपढ़ किसान से लेकर पढ़े-लिखे लोग शामिल हैं. अपने अनुयायियों को जय गुरुदेव हमेशा गुरु का महत्व समझाते थे.

गुरुदेव का बचपन

दरअसल, छोटी उम्र में ही तुलसीदास के माता-पिता चल बसे, जिसके बाद वे सत्य की खोज में निकल पड़े. इसी दौरान उनकी मुलाकात संत घूरेलाल जी से हुई और उन्‍होंने जीवन भर के लिए इन्हें अपना गुरु मान लिया. संत घूरेलाल की मौत के बाद जय गुरुदेव ने मथुरा जिले में आगरा दिल्ली राजमार्ग पर अपने गुरु की याद में चिरौली संत आश्रम की स्थापना की और समाजसेवा में जुट गए.

समाजसेवा और जय गुरुदेव
जय गुरुदेव अपने आश्रम और ट्रस्टों के जरिए हमेशा गरीबों की मदद किया करते थे, जिसमें निशुल्क शिक्षा, निशुल्क चिकित्सा और दहेज बिना सामूहिक शादियां करवाना जैसी चीजें शामिल हैं. उन्‍होंने समाज में वैचारिक चेतना लाने के लिए दूरदर्शी पार्टी की भी स्थापना की थी. गुरुदेव शराब के सख्त खिलाफ थे और लोगों को हमेशा शाकाहारी भोजन के लिए प्रेरित करते थे.

ब्रज का सबसे ऊंचा मंदिर
जय गुरुदेव ने अपने गुरु घूरेलाल जी की याद में 160 फुट ऊंचे योग साधना मंदिर का निर्माण किया, जो सफेद संगममर का बना है. ये मंदिर पूरे ब्रज का सबसे ऊंचा और अनोखा मंदिर है. मंदिर में 200 फुट लंबा और 100 फुट चौड़ा सत्संग हॉल है, जिसमें लगभग 60,000 लोग एक साथ बैठ सकते हैं.

शोकाकुल अनुयायी

बाबा के निधन की खबर सुनकर उनके लाखों अनुयायी शोकाकुल हो गए। यहां आश्रम में बहुत से तो फूट-फूटकर रो रहे थे। देशभर से हजारों अनुयायियों के आश्रम में कॉल आ रहे हैं। वह किसी भी तरह बाबा की पूरी जानकारी लेना चाहते हैं, इससे आश्रम की सारी लाइनें ठप हो गयी हैं।

रात 10.30 बजे आश्रम में घोषणा की गयी कि बाबा अपने धाम को चले गए। उनका पार्थिव शरीर आश्रम में ही भक्तों के दर्शनों को सुबह रख दिया जाएगा। वैसे रात में भी उनके भक्तों का तांता उनके आश्रम स्थित कक्ष में दर्शनों को लगा रहा। आश्रम समिति उनके अंतिम संस्कार का शनिवार को फैसला लेगी।

पिछले काफी समय से बाबा अस्वस्थ चल रहे थे। चिकित्सकों के अनुसार बाबा जय गुरुदेव को कफ, फेफड़े में पानी भरने और हार्ट संबंधी दिक्कतें थीं। छह मई को उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ गई थी। चिकित्सकीय सलाह पर बाबा आठ मई को गुड़गांव स्थित मेदांता अस्पताल में भर्ती कराये गये थे। आश्रम पर उपस्थित अनुयायियों के अनुसार, बाबा की इच्छा और डॉक्टरों की सलाह पर वह मेदांता अस्पताल की आइसीयू एंबुलेंस से शुक्रवार दोपहर आश्रम लाए गए थे। यहां उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। दिल्ली और गुड़गांव के कई विशेषज्ञ डॉक्टर उन पर गहन निगरानी रख रहे थे।

शुक्रवार शाम बाबा का नियमित परीक्षण करने वालों में शामिल मथुरा के डॉ. आरसीएस परिहार ने बताया था कि बाबा की हालत बेहद नाजुक है। उन्हें जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे रखा जा रहा है। बाबा के प्रमुख अनुयायियों में से एक संतराम चौधरी के अनुसार, संक्रमण के लिहाज से चिकित्सकों की टीम ने यहां आने के बाद बाबा के पास किसी की भी आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया था। वैसे सोलह मई को बाबा ने मेदांता में उपस्थित अपने अनुयायियों से बात की थी। इस दौरान उन्होंने उनसे अपने आश्रम पर ले चलने को भी कहा था।
--राम शिव मूर्ति यादव: यदुकुल

शुक्रवार, 18 मई 2012

भगवान कृष्ण को समर्पित नाथद्वारा मंदिर

भगवान श्री कृष्ण से सम्बंधित तमाम धार्मिक स्थल देश-विदेश में प्रसिद्द हैं. राजस्थान में नाथद्वारा मंदिर का नाम जग-जाहिर है.नाथद्वारा राजस्थान में उदयपुर से 48 किमी दूर है। भगवान श्रीनाथजी (भगवान कृष्ण) को समर्पित यह एक महान वैष्णव मंदिर है, जिसका निर्माण 17वीं शताब्दी में किया गया था। दंतकथा है कि वृंदावन स्थित श्रीनाथजी के मंदिर को मुगल बादशाह के सैनिक तोड़ना चाहते थे। उनसे बचाने के लिए उनकी मूर्ति को बैलगाड़ी से सुरक्षित जगह ले जाया जा रहा था। आज नाथद्वारा में जहां उनका मंदिर है, वहां पहुंचने पर बैलगाड़ी का पहिया कीचड़ में धंस गया और बहुत कोशिशों को बावजूद निकाला नहीं जा सका, तो पुजारियों ने समझा कि भगवान श्रीकृष्ण इससे आगे नहीं जाना चाहते, इसलिए उन्होंने इसी स्थल पर उनकी मूर्ति स्थापित कर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। यह आज एक लोकप्रिय तीर्थस्थल का रूप धारण कर चुका है। यहां पर भारतीयों के साथ-साथ बड़ी संख्या में विदेशी भी अपनी आस्था जताने और मानसिक शांति प्राप्त करने आ रहे हैं।


वैâसे पहुंचें: नाथद्वारा उदयपुर से बस या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। यहां का हवाई अड्डा उदयपुर शहर से 24 किमी दूर है

बुधवार, 16 मई 2012

श्रीकृष्ण और उनकी पत्नियाँ

भगवान श्री कृष्ण न सिर्फ यदुकुल बल्कि सर्व-संसार के आराध्य माने जाते हैं. उन्होंने पत्नी के रूप में कई नारियों को अपनाया और उन्हें सम्मानजनक स्थान दिया. कृष्ण की प्रथम पत्नी थी रुक्मिणी उनका अपहरण करके विवाह किया था यह अपहरण रुक्मिणी के कहने पर ही हुआ था रुक्मिणी; राजा भीष्मक और शुध्दम्बी की कन्या थी कृष्ण की दूसरी पत्नी ;निशाधराज जाम्बवान की पुत्री जाम्बवती थी कृष्ण की तीसरी पत्नी सत्राजित की पुत्री सत्यभामा थी सत्राजित को शक्तिसेन के नाम से भी जानते हैं कृष्ण की चौथी पत्नी अवन्ती की राजकुमारी मित्रविन्दा थी कौशल की पुत्री सत्या ;कृष्ण की पांचवी पत्नी थी मद्र कन्या वृहत्सेना की पुत्री लक्ष्मणा ;कृष्ण की छठी पत्नी थी केकय कन्या भद्रा कृष्ण की सातवीं पत्नी थी कृष्ण की आठवी पत्नी कालिंदी थी ये खांडव वन की रहने वाली थी यही पर पांडवों का इंद्रप्रस्थ बना था नरकासुर के द्वारा बंदी बनायीं गयी सोलह सहस्र स्त्रियों को कृष्ण ने मुक्त कराया और उनसे विवाह किया

कृष्ण और रुक्मिणी के प्रथम पुत्र प्रदुम्न का उसके जन्म के छठवें दिन ही असुर शंबरासुर ने अपहरण कर लिया था उसकी पत्नी मायावती ने उसे आसुरी प्रवृतियों के साथ पाला था प्रदुम्न को जब अपने माता-पिता के बारे में पता चला तो उसने शंबरासुर का वध कर दिया और द्वारका आ गया कृष्ण और रुक्मिणी के दूसरे पुत्र का नाम चारुदेष्ण था सत्यभामा के पुत्र का नाम भानु था जाम्बवती के पुत्र का नाम साम्ब था यही पुत्र यादव वंश के नाश का कारण बना था साम्ब का विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा के साथ हुआ था मित्रव्रंदा का पुत्र वृक था सत्याके पुत्र का नाम वीर था कृष्ण और रुक्मिणी की पुत्री का नाम चारु था कृष्ण की तीन बहने थी.1- एकानंगा....यह यशोदा पुत्री थी. 2- सुभद्रा ...यह रोहिणी पुत्री थी. 3- द्रोपदी ....मानस भगिनी थी गुरु संदीपन ने कृष्ण को शास्त्रों सहित चौदह विद्या और चौसठ कलाओं का ज्ञान दिया था गुरु घोरंगिरस ने सांगोपांग ब्रह्म ज्ञान की शिक्षा दी थी राधा और द्रोपदी कृष्ण की सखियाँ थी !!

साभार : कल्पना दुबे

सोमवार, 14 मई 2012

जैसलमेर को बसाया यादव वंश के प्रसिद्ध राजा जयशाली ने

जयशाली यादव वंश के प्रसिद्ध राजा थे, जिन्होंने जैसलमेर नगर बसाया और वहाँ का किला बनवाया था। अपने पिता के सबसे बड़े पुत्र होने पर भी पहले इन्हें राजसिंहासन नहीं मिला था। पर अपने छोटे भाई की मौत पश्चात् इन्होंने शाहाबुद्दीन गोरी से सहायता लेकर अपने भतीजे भोजदेव को मारा और राज्याधिकार प्राप्त किया था। सिंहासन पर बैठने के बाद संवत् १२१२ में इन्होंने जैसलमेर नगर बसाया और किला बनवाया था।

शनिवार, 12 मई 2012

यादव वंश के राजा भिल्लम द्वारा स्थापित शहर दौलताबाद

दौलताबाद गाँव और प्राचीन शहर, महाराष्ट्र राज्य, दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित है। दौलताबाद दक्षिण के यादववंशी राजाओं की राजधानी थी। और यह देवगिरी का सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा रखा गया नाम था। यह गोदावरी नदी की उत्तरी घाटी में स्थित है और भौगोलिक दृष्टि से भारत का केन्द्रीय स्थल कहा जा सकता है।

इतिहास

12वीं सदी के उत्तरार्द्ध में यादव वंश के राजा भिल्लम द्वारा स्थापित यह शहर मध्य काल में एक महत्त्वपूर्ण दुर्ग और प्रशासनिक केंद्र था। एक विशाल चट्टानी परिदृश्य वाला यह दुर्ग अपराजेय था और इसे कभी ताक़त के बल पर हासिल नहीं किया जा सका, षड्यंत्रों के द्वारा ही इस पर क़ब्ज़ा किया गया।

14वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली की मुस्लिम सल्तनत के अधीन आने तक यह शहर हिन्दू यादव वंश की राजधानी था।

17वीं शताब्दी में मुग़लों द्वारा दक्कन में औरंगाबाद के समीप अपना प्रशासनिक मुख्यालय स्थापित करने के साथ ही इसका पतन हो गया।

इस नगर ने इतिहास में बहुत बार उत्थान और पतन देखा। यह 1318 ई. तक यादवों की राजधानी रहा, 1294 ई. में अलाउद्दीन ख़िलजी ने इसे लूटा। बाद में ख़िलजी की फ़ौजों ने दुबारा 1318 ई. में यादव राजा हरपाल देव को पराजित कर मार डाला। उसकी मृत्यु से यादव वंश का अंत हो गया। बाद में जब सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ गद्दी पर बैठा, उसे देवगिरी की केन्द्रीय स्थिति बहुत पसंद आयी। उस समय मुहम्मद तुग़लक़ का शासन पंजाब से बंगाल तक तथा हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ था।

राजधानी बनाने का प्रयत्न

सुल्तान ने देवगिरि का नाम दौलताबाद रखा। उसने इस नगर में बड़े-बड़े भवन और सड़कें बनवायीं। एक सड़क दौलताबाद से दिल्ली तक बनायी गई। 1327 ई. में सुल्तान दिल्ली से राजधानी हटाकर दौलताबाद ले गया। दिल्ली के नागरिकों ने दौलताबाद जाना पसंद नहीं किया। इस स्थानांतरण से लाभ कुछ नहीं हुआ, उल्टे परेशानियाँ बढ़ गयीं। फलत: राजधानी पुन: दिल्ली ले आयी गई। लेकिन इससे दौलताबाद का महत्त्व नहीं घटा। दक्षिण में जब बहमनी राज्य टूटा, तब अहमदनगर राज्य में दौलताबाद का गढ़ अत्यंत शक्तिशाली माना जाता रहा। 1631 ई. में सम्राट शाहजहाँ इस गढ़ को सर न कर सका, और क़िलेदार फतेह ख़ाँ को घूस देकर ही उस पर क़ब्ज़ा कर सका। मुग़ल शासन के अंतर्गत भी दौलताबाद प्रशासन का मुख्य केन्द्र बना रहा इसी नगर से औरंगज़ेब ने अपने दक्षिणी अभियानों का आयोजन शुरू किया। औरंगज़ेब के आदेश से गोलकुण्डा का अंतिम शासक अब्दुल हसन दौलताबाद के ही गढ़ में कैद किया गया था। 1707 ई. में बुरहान-पुर में औरंगज़ेब की मृत्यु होने पर उसके शव को दौलताबाद में ही दफनाया गया। 1760 ई. में यह नगर मराठों के अधिकार में आ गया, लेकिन इसका पुराना नाम देवगिरि पुन: प्रचलित न हो सका। आज भी यह दौलताबाद के नाम से ही जाना जाता है।

साभार : भारत कोश

गुरुवार, 10 मई 2012

वृष्णि और अन्धक संघ / Vrishni and Andhak

मधु राजा के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र, एक यादवराज था। इसी के कुल में श्रीकृष्ण पैदा हुए थे और इसी कारण 'वार्ष्णेय' कहलाए। इनका वंश 'वृष्णि वंशीय यादव' कहलाता था। ये लोग द्वारिका में निवास करते थे। प्रभास क्षेत्र में यादवों के गृह कलह में यह वंश भी समाप्त हो गया।


वृष्णि-गणराज्य शूरसेन-प्रदेश में स्थित था। वृष्णियों का तथा अंधकों का प्राचीन साहित्य में साथ-साथ उल्लेख है। पाणिनि [1] में वृष्णियों तथा अंधको का उल्लेख हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र [2] में वृष्णियों के संघ-राज्य का वर्णन है।

महाभारत में अंधक वृष्णियों का कृष्ण के संबंध में वर्णन है। [3]

इसी प्रसंग में कृष्ण को संघ मुख्य भी कहा गया है जिससे सूचित होता है कि वृष्णि तथा अंधक गणजातियों के राज्य थे। [4]

वृष्णि राजज्ञागणस्य भुभरस्य । ' यह सिक्का वृष्णि-गणराज्य द्वारा प्रचलित किया गया था और इसकी तिथि प्रथम या द्वितीय शती ई॰पू॰ है। [5]

अंधक एवं वृष्णि संघ सम्भवतः यदुवंशियों के राजा भीम सात्वत के पुत्रों के नाम पर बने थे । कृष्ण वृष्णि थे एवं उग्रसेन और कंस अंधक थे ।

मथुरा में तीर्थंकर नेमिनाथ भी अंधक कहे गये हैं । कुछ ग्रंथों में कृष्ण को अंधक भी कहा गया है ।

मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की ।

श्री राम के पश्चात जब अयोध्या की गद्दी पर कुश थे और लव युवराज थे, तब मथुरा में भीम के पुत्र अंधक राज्य करते थे । उनके बाद अंधक वंशियों का मथुरा पर अधिकार रहा, जो उग्रसेन और उनके पुत्र कंस तक कायम रहा था । भीम के दूसरे पुत्र का नाम वृष्णि था । उनके वंश में उत्पन्न शूर ने शौरपुर (वर्तमान बटेश्वर) बसा कर अपना पृथक् राज्य स्थापित किया था । शूर के पुत्र वसुदेव हुए, जिनके पुत्र बलराम तथा श्री कृष्ण थे ।

वैदिक साहित्य में उत्तरी पांचाल के पौरव-राजा दिवोदास और उनके वंशज सुदास की विजय-गाथाओं का उल्लेख मिलता है । सुदास ने हस्तिनापुर के पौरव राजा संवरण को उनके नौ साथी राजाओं की विशाल सेना सहित पराजित किया था । 10 राजाओं के उस भीषण संघर्ष को प्राचीन वाग्मय में "दशहराज्ञ युद्ध' कहा गया है । वीरवर सुदास से पराजित होने वाले उन नौ राजाओं में एक यादव नरेश भी था ।

महाभारत शांति पर्व अध्याय-82:
कृष्ण:-

हे देवर्षि ! जैसे पुरुष अग्रिकी इच्छा से अरणी काष्ठ मथता है; वैसे ही उन जाति-लोगों के कहे हुए कठोर वचनसे मेरा हृदय सदा मथता तथा जलता हुआ रहता है ॥6॥

हे नारद ! बड़े भाई बलराम सदा बल से, गद सुकुमारता से और प्रद्युम्न रूपसे मतवाले हुए है; इससे इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हुआ हूँ। ॥7॥ आगे पढ़ें:-कृष्ण नारद संवाद

श्री कृष्णदत्त वाजपेयी का अनुमान है कि यादव राजा भीम सात्वत का पुत्र अंधक रहा होगा, जो सुदास के समय यादवों की मुख्य शाखा का अधिपती और शूरसेन जनपद के तत्कालीन गणराज्य का अध्यक्ष था । वह संभवत: अपने पिता भीम के समान वीर नहीं था । अंधक के वंश में कुकुर हुआ था । कुकुर की कई पीढ़ी बाद आहुक हुआ, जिसके दो पुत्र उग्रसेन और देवक हुए थे । उग्रसेन का पुत्र कंस था और देवक की पुत्री देवकी थी । उग्रसेन, देवक और कंस अपने पूर्वज अंधक और कुकुर के नाम पर अंधक वंशीय अथवा कुकुर वंशीय कहलाते थे । अंधक के भाई वृष्णि के दो पुत्र हुए, जिनके नाम देवमीढूष और युधाजित थे । देवमीढूष के पुत्र श्र्वफल्क और उनके पुत्र अक्रूर थे । वृष्णि के वंशज वाष्णि वंशीय अथवा वार्ष्णेय कहलाते थे ।




अंधक और वृष्णि वंशिय द्वारा शासित शूरसेन प्रदेशांतर्गत मथुरा और शौरिपुर के दोनों राज्य 'गणराज्य' थे । उनका शासन वंश-परंपरागत न होकर समय-समय पर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता था । वे प्रतिनिधि अपने-अपने गणों के मुखिया होते थे, और राजा कहलाते थे ।




महाभारत युद्ध से पूर्व उन दोनों राज्यों का संघ था, जो 'अंधक-वृष्णि-संघ' कहलाता था । उस संघ में अंधकों के मुखिया आहुक-पुत्र उग्रसेन थे और वृष्णियों के शूर-पुत्र वसुदेव थे । उस संघीय गण राज्य का राष्ट्रपति उग्रसेन था । इस संघ राज्य के केंद्र मन्त्रियों में एक उद्धव भी थे । उग्रसेन की भतीजी देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था, जिनके पुत्र भगवान कृष्ण थे । उग्रसेन के पुत्र कंस का विवाह उस काल के सर्वाधिक शक्तिशाली मगध साम्राज्य के अधिपति जरासंध की दो पुत्रियों के साथ हुआ था । वसुदेव की बहिन कुन्ती का विवाह कुरु प्रदेश के प्रतापी महाराजा पांडु के साथ हुआ था, जिनके पुत्र सुप्रसिद्ध पांडव थे । वसुदेव की दूसरी बहिन श्रुतश्रवा हैहयवंशी चेदिराज दमघोष को व्याही थी, जिसका पुत्र शिशुपाल था । इस प्रकार शूरसेन प्रदेश के यादवों का पारिवारिक संबंध भारतवर्ष के कई विख्यात राज्यों के अधिपतियों के साथ था । उग्रसेन का पुत्र कंस बड़ा शूरवीर और महत्वाकांक्षी युवक था । फिर उन्हें अपने श्वसुर जरासंध के अपार सैन्य बल का भी अभिमान था । वह गणतंत्र की अपेक्षा राजतंत्र में विश्वास रखता था । उन्होंने अपने साथियों के साथ संघ राज्य के विरुद्ध कर उपद्रव करना आरम्भ किया । अपनी वीरता और अपने श्वसुर की सहायता से उन्होंने अपने पिता उग्रसेन और बहनोई वसुदेव को शासनाधिकार से वंचित कर उन्हें कारागृह में बन्द कर दिया और आप अंधक-वृष्णि संघ का स्वेच्छाचारी राजा बन गया था । वह यादवों से घृणा करता था और अपने को यादव मानने में लज्जित होता था । उसने मदांध होकर प्रजा पर नाना प्रकार के अत्याचार किये थे । अंत में श्री कृष्ण द्वारा उनका अंत हुआ था ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ
↑ पाणिनि 4,1,114 तथा 6,2,34
2.↑ (पृ0 12)
3.↑ 'यादवा: कुकुरा भोजा: सर्वे चान्धकवृष्णय:, त्वय्यासक्ता: महाबाहो लोकालोकेश्वराश्च ये।'महाभारत शांति0 81,29
4.↑ 'भेदाद् विनाश: संघानां संघमुख्योऽसि केशव' शाति0 81,25 ।
5.↑ दे0 मजुमदार-कार्पोरेअ लाइफ इन ऐंशेंट इंडिया–पृ0 280

साभार :ब्रज डिस्कवरी

मंगलवार, 8 मई 2012

पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन



युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.


इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.


कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

शनिवार, 31 मार्च 2012

कन्नौज से चुनाव लड़ेंगी डिंपल यादव

कन्नौज संसदीय सीट से एक बार चुनावी मैदान में उतर सकती हैं उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बेटर हॉफ यानी कि डिंपल यादव। अखिलेश यादव के रूख से तो यही नजर आ रहा है। वह बार-बार यही दोहरा रहे हैं कि कन्नौज की जनता तय करेगी कि वहां से कौन चुनाव लड़े। जनता की तरफ से लगातार डिंपल को संसदीय चुनाव लड़ाने के लिए हो रही मांग पर उन्होंने कहा कि जनभावनाओं के अनुरूप ही पार्टी निर्णय लेगी।

दरअसल अखिलेश यादव कन्नौज से सांसद हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ेगी। इसीलिए अपनी पुश्तैनी सीट कन्नौज से डिंपल को लड़ाने की मांग ज्यादा हो रही है। यदि ऐसा होता है तो यह दूसरा अवसर होगा जब डिंपल अपने पति की छोड़ी गई सीट पर चुनाव लड़ेंगी। वो इससे पहले फिरोजाबाद से लोकसभा का उपचुनाव लड़ चुकी है।

हालांकि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था लेकिन तब के औऱ अब के हालात बिल्कुल अलग है इसलिए इस बार अगर डिंपल अगर चुनाव में उतरती हैं तो यह फैसला सपा के हक में आ सकता है। वैसे मुलायम सिंह यादव इस सीट पर अपने भाई शिवपाल को चुनाव लड़ाना चाहते थे लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। इससे भी डिंपल के लिए चुनाव की बात हो रही है।
-राम शिव मूर्ति यादव : यदुकुल