शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

‘आत्मदीपो भव’ बन आगे बढ़ती रहीं कविता

जज्बा हो तो कुछ भी असंभव नहीं। यह बात सच लागू होती है कविता यादव पर।  बारहवीं पास करने के बाद ही इलाहाबाद शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार में शादी हो गई। तकरीबन सात बरस का खुशहाल पारिवारिक जीवन बीता लेकिन एक दिन अचानक पति विजय सिंह यादव को ‘साइलेंस हार्ट हटैक’ हुआ और कविता अकेली हो गई। यह हादसा उसकी कल्पना से परे था लेकिन उसने बड़ी मुश्किल से खुद और पति की ओर से छोड़े गए गैस एंजेसी के कारोबार को संभाला। छह बरस के मितुल और ढाई बरस के तेजस की देखभाल भी बड़ी जिम्मेदारी थी लेकिन ससुर रिटायर्ड जस्टिस सखाराम सिंह यादव सहित पूरे परिवार ने भरपूर सहयोग दिया।

शुरुआत में तो कविता कभी कभार ही किसी जरूरी काम से एजेंसी पर जाती थीं लेकिन उन्हें अपने पर पूरा भरोसा था सो साल भर छह बरस के मितुल को पढ़ने के लिए देहरादून भेजने के बाद उन्होंने पूरी तरह काम संभाल लिया। डिलेवरी मैन और उपभोक्ताओं से लेकर इंडियन ऑयल के अधिकारियों तक से आए दिन जूझना उनकी दिनचर्या बन गई। धैर्य से लोगों की शिकायतें दूर करने सहित काम को बेहतर बनाने का क्रम जारी रहा।

एक बार एक वरिष्ठ अधिकारी ने मामूली सी बात पर तीन वर्ष के लिए उनकी एजेंसी के लिए गैस के नए कनेक्शन पर रोक लगा दी। कागजी औपचारिकताओं के बाद भी आदेश बहाल नहीं हुआ तो कविता ने दफ्तर पहुंचकर सबके सामने कारण पूछा, तब जाकर मामला सुलझा। कई बार शिकायतें दूर करने के लिए वह उपभोक्ताओं के घर तक भी गईं। शुरुआत में संकोची कविता दफ्तर की मीटिंग में पीछे बैठतीं लेकिन बेहतर काम से उन्होंने अगली पंक्ति में जगह बना ली।

‘आत्मदीपो भव’ यानी खुद अपना प्रकाश बनती कविता आगे बढ़ते हुए दूसरों की मुश्किलों में भी खड़ी रहीं। बिना जान पहचान किसी मरीज की जिंदगी बचाने के लिए खून देने से लेकर किसी जरूरतमंद की बेटी की शादी सहित अनाथालय, विकलांग केंद्र के किसी बच्चे को हर तरह से मदद जैसे कामों में वह हमेशा आगे रहीं। कुल मिलाकर अपने आंगन की लक्ष्मी बनने सहित कविता, कई परिवारों के लिए भी किसी ‘लक्ष्मी’ से कम नहीं।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

मुलायम सिंह यादव नौवीं बार सपा अध्यक्ष


मुलायम सिंह यादव लगातार नौवीं बार समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं।  8 अक्टूबर 2014 को समाजवादी पार्टी के नौंवे राष्ट्रीय अधिवेशन में  मुलायम सिंह को लगातार नौवीं बार सर्वसम्मति से पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है।  मुलायम अगले तीन साल तक पार्टी के अध्यक्ष रहेंगे। प्रो. राम गोपाल यादव ने बतौर निर्वाचन अधिकारी उन्हें तीन साल के लिए सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया। जनेश्वर मिश्र पार्क, लखनऊ  में चल रहे सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और कई अन्य नेता मौजूद रहें। इस अवसर पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक सफर पर एक डाक्युमेंट्री भी  बड़ी एलईडी स्क्रीन पर दिखाई गई । 

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

साहित्य में योगदान हेतु कृष्ण कुमार यादव को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने किया सम्मानित


पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव को सम्मानित किया। उक्त सम्मान श्री यादव को मिर्जापुर में आयोजित एक कार्यक्रम में 5 अक्टूबर, 2014 को प्रदान किया गया। राज्यपाल ने शाल ओढाकर  और सम्मान पत्र देकर श्री यादव को सम्मानित किया। गौरतलब है कि सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी चर्चित श्री यादव की अब तक कुल 7 पुस्तकें 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), India Post : 150 glorious years  (2006), 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (संपादित, 2007), ’जंगल में क्रिकेट’ (बाल-गीत संग्रह-2012) एवं ’16 आने 16 लोग’(निबंध-संग्रह, 2014) प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं0 डाॅ0 दुर्गाचरण मिश्र, 2009, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद) भी प्रकाशित हो चुकी  है। श्री यादव देश-विदेश से प्रकाशित तमाम रिसर्च जनरल, पत्र पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर भी प्रमुखता से प्रकाशित होते रहते हैं।

श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा ’’अवध सम्मान’’, परिकल्पना समूह द्वारा ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लाॅगर दम्पति’’ सम्मान, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाॅक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वारा ”विज्ञान परिषद शताब्दी सम्मान”, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, वैदिक क्रांति परिषद, देहरादून द्वारा ‘’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान‘’, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा ’’पं0 बाल कृष्ण पाण्डेय पत्रकारिता सम्मान’’, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।   

उक्त अवसर पर न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय, पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर  के कुलपति प्रो0 पीयूष रंजन अग्रवाल, इग्नू के प्रो चांसलर प्रो0  नागेश्वर राव, बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो0 पंजाब सिंह, भोजपुरी फिल्म अभिनेता कुणाल सिंह, पूर्व शिक्षा मंत्री सुरजीत सिंह डंग सहित तमाम साहित्यकार, शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी व अधिकारीगण मौजूद रहे।

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

इण्टरनेशनल कोआपरेटिव एलायन्स (आईसीए) के सबसे कम उम्र के निदेशक बने आदित्य यादव

इफ्को के निदेशक तथा पीसीएफ के सभापति आदित्य यादव ने भारतीय सहकारिता आन्दोलन तथा समाजवादी विचारधारा का परचम कनाडा में लहराते हुए इण्टरनेशनल कोआपरेटिव एलायन्स (आईसीए) के निदेशक निर्वाचित हुये हैं। श्री यादव ब्रिटेन, पोलैंण्ड, ईरान समेत 7 देशों के कद्दावार प्रतिनिधियों को पराजित कर निर्वाचित हुए हैं। आईसीए और वैश्विक सहकारिता के इतिहास में आदित्य यादव यह गौरव हासिल करने वाले प्रदेश के पहले और भारत के तीसरे व्यक्ति हैं। उन्हें सबसे कम उम्र के निदेशक होने का भी सम्मान मिला है।

 उल्लेखनीय है कि आईसीए सहकारिता की सर्वोच्च निकाय है जो 94 देशों का प्रतिनिधित्व करता है। सहकारिता के जानकारों के अनुसार इस उपलब्धि से देश की पकड़ और प्रभाव में काफी वृद्धि होगी। 5 अक्टूबर, 2014 को कनाडा के क्यूबेक शहर में हुए आईसीए के इस प्रतिष्ठापरक चुनाव में आदित्य यादव ब्रिटेन के विवियन स्टेनली, पोलैंड के जे0पाकोस्की, बेल्जियम के हार्वेगाइडर, ईरान के एम0जकरिया, मलेशिया के इस्माइल कमरूद्दीन, डोमिनिकल गणराज्य के वैलेन्टिन मेड्रोनो एवं नाइजीरिया के एडेलेक ओजेयामी जैसे कद्दावर नेताओं को हराया। आदिम्य यादव उत्तर प्रदेश सरकार में वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं। उनकी इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई !!

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

21वीं सदी बेटियों की है


बेटियाँ हमारी शान हैं और इनके उपर हमें गर्व है। यह कहना है इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव का। दोनों ही जन साहित्य और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में चर्चित नाम हैं और उनकी इस परम्परा को बेटियाँ भी बढ़ा रही हैं। इनकी अक्षिता और अपूर्वा नामक दो बेटियाँ हैं, एक साढ़े सात साल की तो दूसरी चार साल की। जीएचएस  में क्लास 2 की स्टूडेंट अक्षिता जहाँ नन्ही ब्लॉगर के रूप में पॉपुलर है, वहीं इतनी कम उम्र में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड्स पाने के रिकार्ड भी हैं। अपने ब्लॉग 'पाखी की दुनिया' लिए उसे वर्ष 2011 में दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल ब्लॉगर्स कांफ्रेंस में 'बेस्ट नन्ही ब्लॉगर' ख़िताब से सम्मानित किया गया, वहीं मात्र मात्र साढ़े चार साल की उम्र में 'नेशनल चाइल्ड अवार्ड' (2011) पाकर वह इण्डिया की सबसे कम उम्र की विजेता भी बनी। अब यादव दंपती की दूसरी बेटी अपूर्वा भी अपनी सिस्टर के साथ क्रिएटिविटी सीख रही हैं।यादव दम्पति को जहाँ अपनी बेटियों पर नाज है। इनका मानना है कि बेटियां किसी से कमतर नहीं, बशर्ते आप उनकी भावनाओं और इच्छाओं को समझते हुए उन्हें प्रोत्साहित करें। 21वीं सदी बेटियों की है और वे नया मुकाम रचने को तैयार हैं। 

(साभार : 'आई-नेक्स्ट' अख़बार की पहल 'नवरात्रि में लीजिये संकल्प : बेटियों को बचाओ' अभियान के तहत 2 अक्टूबर (इलाहाबाद संस्करण) में   जिक्र।)

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

नन्ही ब्लाॅगर अक्षिता (पाखी) की बड़ी कामयाबी


ककहरा सीखने की उम्र में नन्ही अक्षिता (पाखी) ने अपनी सृजनात्मक क्षमता के बल पर मात्र सात साल में बड़े रिकार्ड कायम किए हैं। ‘पाखी की दुनिया’ ब्लाग का संचालन 24 जून 2009 से कर रही अक्षिता (पाखी) को सबसे कम उम्र की ब्लागर के तौर पर भारत सरकार की ओर से 2012 में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ मिल चुका है। उसे मात्र चार वर्ष आठ माह की अवस्था में आर्ट और ब्लागिंग के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। इसको 66 हजार से अधिक लोगों ने पढ़ा।

भारत सरकार की ओर से ब्लागिंंग के क्षेत्र में सम्मानित होने वाली अक्षिता पहली बाल प्रतिभा है। इससे पहले भी अक्षिता को 2011 में अंतरराष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन में ‘श्रेष्ठ नन्ही ब्लागर’ के सम्मान से नवाजा जा चुका है। सितंबर 2013 में काठमांडू (नेपाल) में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन में अक्षिता ने एकमात्र ब्लागर के तौर पर भाग लेकर सम्मान पाया।

ड्राइंग और कविता पहली पसंद

25 मार्च 2007 को कानपुर में जन्मी अक्षिता वर्तमान में गर्ल्स हाई स्कूल इलाहाबाद में दूसरी कक्षा की छात्रा हैं। पिता कृष्ण कुमार यादव इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं पद पर तैनात होने के साथ चर्चित ब्लागर हैं। माता आकांक्षा यादव भी साहित्य लेखन के साथ ब्लागर हैं। अक्षिता ने बताया कि उसे ड्राइंग बनाना, कविता कहना और लिखना पसंद है।

( अक्षिता (पाखी) के बारे में अमर उजाला (इलाहाबाद, 25 सितंबर 2014) में प्रकाशित रिपोर्ताज़।)

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

तेज प्रताप यादव के साथ मुलायम सिंह की तीसरी पीढ़ी भी संसदीय राजनीति में


मैनपुरी में तेज प्रताप यादव के सांसद बनते ही मुलायम सिंह की तीसरी पीढ़ी भी संसदीय राजनीति में प्रवेश कर गई।  16 सितम्बर 2014 को को मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद  सपा प्रत्याशी तेज प्रताप यादव ने भाजपाई उम्मीदों और अपेक्षाओं को झटका देते हुए बडे़ अंतर से उपचुनाव जीता। पांचों विधानसभाओं में सपा प्रत्याशी को 6 लाख 53 हजार 686 वोट मिले। वहीं भाजपा प्रत्याशी प्रेम सिंह को 3 लाख 32 हजार 557 वोट ही मिल सके। इस तरह तेज प्रताप ने 3 लाख 21 हजार 149 मतों से भाजपा प्रत्याशी को करारी शिकस्त दी । इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने वाले तेजप्रताप के पिता स्व. रणवीर सिंह सैफई के पहले ब्लॉक प्रमुख थे। रणवीर सिंह का 13 नवंबर, 2002 में आकस्मिक निधन हो गया था। साल 2011 में 28 साल के तेजप्रताप सिंह यादव सैफई ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए थे। उन्होंने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल की है। तेज प्रताप यादव को इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!
(चित्र में : अपनी माँ के साथ तेज प्रताप)

सोमवार, 15 सितंबर 2014

हिन्दी के क्षेत्र में सम्मान का सैकड़ा


आज के दौर में प्रशासनिक सेवा में रहकर राजभाषा हिंदी के विकास के लिए चिंतन मनन करना अपने आप में एक उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणिकांचन योग विरले ही मिलता है। समकालीन साहित्यकारों में उभरते चर्चित कवि, लेखक एवं चिंतक तथा जौनपुर जिले के बरसठी विकास खंड के सरावां गांँव निवासी और मौजूदा समय में डाक निदेशक इलाहाबाद परिक्षेत्र कृष्ण कुमार यादव इस विरले योग के ही प्रतीक हैं। श्री यादव को इसके लिए अब तक 102 बार सम्मान व मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य देश भारत के पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला, पर आधुनिक दौर में हर व्यक्ति अंग्रेजी की ओर भाग रहा है। खासकर प्रोफेशनल और सरकारी नौकरियों में अंगे्रजी को महत्वपूर्ण अंग के रूप में लिया जा रहा है। ऐसे में श्री यादव लोगों को बताते हैं कि कक्षा छह से ही हिंदी के सहारे मंजिल पाने का सपना देखना शुरू किया। इस सपने को साकार कराने में उनके पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव का विशेष योगदान रहा है। जिसकी बदौलत उन्हें वर्ष 2001 में सिविल सेवा में सफलता मिली। इसके बाद तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के साथ ही उन्होंने ब्लाॅगिंग के सहारे हिंदी के विकास के लिए कार्य करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी जीवन संगिनीआंकाक्षा यादव और पुत्री अक्षिता (पाखी) भी लेखन ब्लाॅगिंग में सक्रिय हो गईं। परिणाम रहा कि तीन पीढि़यों संग हिन्दी के विकास में जुटे कृष्ण कुमार यादव को 102 बार हिंदी के विकास हेतु विभिन्न सम्मान व मानद उपाधियांँ प्राप्त हुई। 

दो बार मिला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर पुरस्कार

हिंदी के विकास में जुटे डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव  को उत्कृष्ट कार्य के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी सम्मानित कर चुके हैं।  उन्होंने 'अवध सम्मान’ से श्री यादव को नवाजा था। लखनऊ में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर सम्मलेन में ’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लाॅगर दंपती’ का सम्मान श्री यादव को प्रदान किया गया। इसके अलावा काठमांडू में हुए तृतीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर सम्मेलन में नेपाल के संविधान सभा के अध्यक्ष नरसिंह केसी ने उन्हें  ’परिकल्पना साहित्य सम्मान’ दिया था।

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हिन्दी के क्षेत्र में सम्मान का सैकड़ा
तीन पीढि़यों संग हिन्दी के विकास में जुटे हैं डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव
102 बार मिल चुका है पुरस्कार और मानद उपाधियाँ
(साभार : दैनिक जागरण, जौनपुर-वाराणसी संस्करण, 15 सितंबर, 2014) 

रविवार, 31 अगस्त 2014

जब असली जीवन की 'मर्दानी' बनीं ममता यादव

'मर्दानी' फिल्म आजकल चर्चा में है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के ऊपर लिखी सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ  'खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी' भला किसे न याद होंगी। बदलते वक़्त और परिप्रेक्ष्य के साथ इस प्रकार की तमाम घटनाएँ सामने आती हैं तो अनायास ही लोगों के मुँह से निकला पड़ता है -खूब लड़ी मर्दानी।

अपने देश भारत के तमाम अंचलों  में महिलाओं पर हो रहे जुल्म-ओ-सितम के बीच भय और आतंक के साए में सांस ले रही महिलाओं ने खुद पर भरोसा करना सीख लिया है। इन सबके बीच मेरठ की एक दिलेर महिला ममता यादव नई मिसाल बनकर उभरी हैं। मेरठ के  सिविल लाइन क्षेत्र में 19 अगस्त, 2014 को कचहरी पुल के पास  अपनी अस्मिता और पति की रक्षा के लिए ममता ने हमलावर युवकों की पिटाई कर डाली थी। इस दौरान पुलिस  तमाशबीन बनी रही तो कुछ लोग नैतिकता का प्रवचन झाड़ रहे थे। जब वह लोगों से अपील कर रही थी, तो इन युवकों में से कुछ युवक अश्लील टिप्पणियां भी कर रहे थे और कुछ उनकी फोटो और वीडियो उतारने में लगे हुए थे।  

वस्तुत:  कार में सवार कुछ मनचले, बाइक पर पति के साथ जा रही युवती ममता यादव पर छींटाकशी करते चल रहे थे। इसी दौरान मनचलों ने कार बाइक में भिड़ा दी। जब बाइक सवार पति-पत्नी ने इसका विरोध किया तो मनचलों ने गाली- गलौज करते हुए पति पर हमला बोल दिया। यह सब देख युवती असहज हो गई। आसपास नजर घुमाकर देखा, तो पूरी भीड़ बेजान नजर आई। बुजदिल जमाने में उसे कोई अपना नहीं लगा। पास में खड़े पुलिस के जवानों में भी कोई हरकत नहीं हुई। लफंगों के हाथ से पिट रहे अधेड़ व्यक्ति को छुड़ाने के लिए कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा। बेशर्मी की हद तो तब पार हो गई जब कइयों ने मारपीट सीन पर अपने मोबाइल के कैमरे की फ्लैश डालनी शुरू कर दी। ऐसे में भय की आबोहवा में कायर होते जा रहे समाज का घिनौने चेहरे ने युवती के अंदर हौसला भर दिया। उसने ताल ठोंकी और आधा दर्जन लड़कों से अकेले मुकाबला करते हुए उन्हें भागने पर मजबूर किया। लफंगे युवाओं ने ममता यादव  पर काबू जमाने की भरपूर कोशिश की, किंतु नारी की शक्ति और स्वाभिमान ने उनके पैर उखाड़ दिए। मामला बिगड़ता देख जब भी युवाओं ने भागने का प्रयास किया तो ममता  ने उनका रास्ता रोक लिया। तमाशबीन व जड़ हो चुकी भीड़ भी दृश्य को देख शर्मसार हो गई। कइयों ने बाद में ममता  के समर्थन में आवाज ऊंची करने की कोशिश की, जिसे उन्होंने  ने डांटकर चुप करा दिया। तमाशबीन लोगों के बीच घायल अवस्था में ही वे घर लौट आए। ममता ने कहा कि वे विक्टोरिया पार्क स्थित बिजली विभाग कार्यालय में बिल जमा कराने के लिए 23 हजार रुपये लेकर जा रहीं थीं। पैसे तो बच गए, लेकिन पति को बचाने की जद्दोजहद में उनकी चेन टूट गई। ममता यादव एलआइसी की एजेंट है और उनके पति कपड़े का व्यवसाय करते हैं। बहरहाल, लफंगों के आतंक से भयभीत भीड़ को ममता ने बहादुरी से अन्याय के खिलाफ लडऩे का संदेश दिया। लगे हाथ पुलिस को आइना दिखाया।

इस घटना के समय ममता ने हिम्मत तो दिखाई, पर इससे  वह बेहद घबराई भी हुई थीं। उन्हें  डर था कि उनके सामने आने के बाद हमलावर उनके घर तक नहीं पहुंच जाए। इसलिए वह तीन दिन से घर में चुप बैठी थीं। ममता की बड़ी बहन शशि यादव को जब पूरी घटना का पता चला तो वे दिल्ली से मेरठ पहुंचीं और ममता को मीडिया के सामने आने व पुलिस में अपनी ओर से शिकायत देने के लिए तैयार कराया। घटना के तीन दिन बाद 23 अगस्त को अंतत : तमाम झिझक को ताक पर रखकर ममता  मीडिया से मुखातिब हुई और पूरे वाकये को दोहराया। ऐसे में  अकेले दम कई युवाओं को धूल चटाने वाली ममता यादव के जज्बे की खबर राष्ट्रीय स्तर पर अख़बारों और तमाम  टीवी चैनलों की सुर्खियां बन गई।  ममता ने इस मामले की लिखित शिकायत पुलिस में की है। सामान्य सी जिंदगी जी रही ममता हाल-फिलहाल कैमरे की चकाचौंध और अखबारनवीसों के सवालों से घिरी हैं। यहाँ तक कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आदेश पर जिले के आला अफसरान ने ममता यादव के घर जाकर उन्हें एक लाख रुपये का चेक सौंपा। ममता का कहना है कि वह चाहती है कि हमलावरों को कड़ी से कड़ी सजा मिले, जिससे समाज में संदेश जाए कि ऐसे बदमाशों के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने की बजाए उनका सामना करना चाहिए।

हमलावरों के ग्रुप से अकेली लड़ने वाली साहसी महिला ममता यादव ने रविवार को साफ कहा है कि मुझे इनाम नहीं, न्याय चाहिए।ममता ने कहा कि मैं किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष नहीं बल्कि व्यवस्था के खिलाफ बोल रही हूं। रविवार को महिला की तरफ से भी पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है और उसका मेडिकल भी करा दिया है। ममता ने कहा कि यदि मुझे तीन दिनों में न्याय नहीं मिला तो जान देने से भी नहीं हिचकूंगी। मीडिया से बातचीत में  ममता यादव ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा कि तीन दिन के बाद रविवार शाम को उनकी तहरीर रिसीव की गई। इसके बाद सीओ ने उनका मेडिकल परीक्षण कराया जिसमें उनके हाथ में फैक्चर आया है।ममता ने कहा कि मैं और मेरा परिवार खौफ में जी रहे हैं। चार आरोपियों में से अभी केवल एक ही आरोपी गिरफ्तार हुआ है।  ऐसे में मैं कैसे खुद को सुरक्षित महसूस कर सकती हूं। ममता ने कहा कि मैं किसी भी पार्टी पर अंगुली नहीं उठा रही हूं। बस न्याय मांग रही हूं। ममता ने कहा कि मेरे पति की जिंदगी पर खतरा मंडराया तो मैं हमलावरों से जा भिड़ी। मैंने भीड़ से मदद मांगी लेकिन कोई आगे नहीं आया था। मुझे सरकारी इनाम नहीं बल्कि न्याय चाहिए।अपने सम्मान की रक्षा करना अपराध नहीं है। ममता ने कहा कि मैंने जो किया, वह वक्त की नजाकत थी। हर इज्जतदार महिला को वही करना चाहिए जो मैंने किया। 

 .............पर यह लड़ाई तो अभी अधूरी है क्योंकि अब ममता यादव इंसाफ के लिए व्यवस्था से लड़ रही हैं !!
साभार : आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 
http://www.shabdshikhar.blogspot.in/

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

रोहित कुमार यादव बने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज के अध्यक्ष

आईएएस की परीक्षा में सी-सैट के बहाने भले ही हिंदी को नजरअंदाज कर अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जा रहा हो और सामाजिक न्याय की अवधारणा को कुंद किया जा रहा हो, पर दिल्ली विश्वविद्यालय  के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में 24 अगस्त 2014 को वहाँ माली का कार्य करने वाले व्यक्ति के बेटे रोहित कुमार यादव ने छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव जीतकर इतिहास रचा है। खास बात यह है कि जहां हर कोई ऑक्सफर्ड एक्सेंट की अंग्रेजी में बात करता हो वहां रोहित ने अपना चुनाव प्रचार हिंदी में किया। रोहित के पिता कॉलेज में ही माली का काम करते हैं।यह चुनाव कई मायनों में काफी प्रतिष्ठित माना जाता है, क्योंकि शशि थरूर भी सेंट स्टीफेंस कॉलेज के प्रेसीडेंट रह चुके हैं और सलमान खुर्शीद ये चुनाव हार गए थे।

स्टीफंस में पढ़ना किसी भी स्टूडेंट के लिए सपने की तरह होता है। देश के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले इस कॉलेज में इस साल के सीबीएसई टॉपर सार्थक का नाम भी ऐडमिशन के लिए वेटिंग लिस्ट में था। रोहित इतिहास से बीए कर रहे हैं। 12वीं तक की पढ़ाई उन्होंने इलाहाबाद से की है।

रोहित का कहना है कि उन्होंने प्रेसिडेंशियल डिबेट के दौरान भी हिन्दी में ही बात की थी। उन्होंने स्टूडेंट्स से कहा कि मैं आपके हक और समस्याओं के लिए आवाज उठाना चाहता हूं, हमारा अजेंडा वही है जो छात्रों से जुड़ा हो। इसके जवाब में तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्टूडेंट्स ने स्वागत किया। कॉलेज के इतने सालों के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी स्टूडेंट ने हिन्दी में चुनाव प्रचार किया हो।

डूटा प्रेजिडेंट और सेंट स्टीफंस में गणित की प्रफेसर नंदिता नारायण ने रोहित की जीत पर कहा कि कॉलेज स्टाफ के बच्चों को ऐडमिशन मिल जाता है। रोहित जैसे स्टूडेंट्स अब पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे आ रहे हैं और बराबर की भागीदारी निभा रहे हैं यह देखना हमारे लिए सुखद है।

रोहित ने अपनी जीत का श्रेय कॉलेज के दोस्तों और प्रिंसिपल को दिया। जिन्होंने चुनाव लड़ने के उसके फैसले का न सिर्फ स्वागत किया बल्कि हर संभव मदद भी की। रोहित के दोस्तों ने चुनाव प्रचार के दौरान उसकी बातों को अंग्रेजी में लिख कर स्टूडेंट्स तक पहुंचाया। इस जीत के बाद रोहित का कहना है कि मेरे लिए यह गर्व का विषय है, लेकिन मैं चाहता हूं कि चुनाव जीतने के बाद स्टूडेंट्स के हक की आवाज उठा सकूं।

सेंट स्टीफेंस कॉलेज के बारे में आमतौर पर धारणा है कि यहां अंग्रेजियत और इलीटिसिज्म बहुत ज्यादा हावी है। इस कॉलेज ने राष्ट्रपति रह चुके फखरुद्दीन अली अहमद, कपिल सिब्बल, चंदन मित्रा, पुलक चटर्जी जैसे कई ताकतवर नेता और नौकरशाह दिए हैं। यहां दाखिले के लिए 95 परसेंट से ज्यादा नंबर के साथ इंटरव्यू में पास होना ज़रूरी है। लेकिन हाल के दिनों में सुल्तानपुर के सेंट्रल स्कूल से पढ़े वैभव, मुंबई की श्रेया सिन्हा, लखनऊ की फालगुनी तिवारी और अशोक वर्द्धन जैसे स्टूडेंटस ने कॉलेज की इस छवि या धारणा को तोड़ने की ठानी।

रोहित यादव के पीछे बीए थर्ड ईयर की यही टीम है, जिसने सेंट स्टीफेंस कॉलेज के तमाम स्टूडेंट के जेहन को बदला। तभी तो 21 अगस्त को सेंट स्टीफेंस के ओपेन कोर्ट के नाम से होने वाली प्रेसीडेंशियल स्पीच में जब 22 साल के सांवले रंग और दरम्याने कद के इस  लड़के ने एक हज़ार स्टूडेंटस के सामने हिंदी में कहा कि मेरा एजेंडा वहीं है, जो आप की ज़रूरत है.. तो तालियों की गड़गड़ाहट देर तक गूंजती रही। खुद वैभव मानते हैं कि रोहित के खिलाफ लड़ रहे कुछ लोगों ने उसके हिन्दी बोलने और गरीब परिवार को मुद्दा बनाया। लेकिन उसके काम को देखते हुए कॉलेज ने इस बदलाव की बयार के साथ बहना मंजूर किया। खुद श्रेया सिन्हा कहती हैं कि कॉलेज के प्रिंसीपल थंपू सर ने भी रोहित का आत्म विश्वास बढ़ाया।

रोहित कुमार यादव जैसे छात्र का अध्यक्ष बनना ये भरोसा भी दिलाता है कि नई पीढ़ी जात−पात, अमीरी गरीबी के फर्क को फेंक कर समानता के आधार पर तरक्की करने की हिमायती है।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

योगी श्रीकृष्ण के चरित्र में विरोधाभास क्यों


कृष्ण को संपूर्ण अवतार माना जाता है, लेकिन फिर भी उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे सवाल हैं, जिन्हें लेकर मन में अक्सर दुविधा रहती है। आइए जानें ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब : 

सवाल : वैसे तो भगवान कृष्ण धर्म की बात करते हैं लेकिन महाभारत के युद्ध में उन्होंने खुद छल और अधर्म का इस्तेमाल क्यों किया? 

जवाब : महाभारत के युद्ध को केवल दो राज्यों या राजाओं का युद्ध न होकर अच्छाई और बुराई का युद्ध कहा जा सकता है। कौरवों ने इस युद्ध से बहुत पहले ही अधर्म और छल-कपट से पांडवों को खत्म करने की साजिश शुरू कर दी थी, चाहे वह भीम को जहर खिलाकर पानी में डुबोने की कोशिश हो या लाक्षागृह को आग लगाकर पांडवों को मारने का षडयंत्र। जब इससे भी बात न बनी तो उन्होंने जुए का ऐसा खेल रचा जो पांडवों को पूरी तरह खत्म कर दे। इस अनीति और अधर्म के खात्मे के लिए कृष्ण से धर्म की अपेक्षा करना बेमायने है। भगवान कहते हैं कि जो वो कर रहे हैं, वह अधर्म है और जो हम कर रहे हैं, वह भी अधर्म है लेकिन हममें और उनमें फर्क यह है कि हम यह सब धर्म की रक्षा के लिए कर रहे हैं। धर्म की रक्षा करने की यह महान इच्छा ही हमें धर्म-अधर्म के बंधनों से मुक्त कर देती है। कृष्ण कभी नहीं कहते कि वह जो कर रहे हैं, वह सही है लेकिन वह यह जरूर कहते हैं कि वह जिस उद्देश्य से यह कर रहे हैं, वह बिल्कुल सही है। 

सवाल : कृष्ण माखन चुराते हैं और गोपियों के कपड़े उठा लेते हैं। ऐसे में उन्हें योगी कैसे कह सकते हैं? 

जवाब : यह आश्चर्य की बात है कि जो कृष्ण माखन चुराता है, गोपियों के कपड़े लेकर छुप जाता है, वह गीता का गंभीर योगी कैसे हो जाता है। यही कृष्ण के व्यक्तित्व की निजता है। यही वह विशेषता है जिससे कृष्ण हमारे इतने नज़दीक लगते हैं। कृष्ण इन विरोधों से मिलकर ही बने हैं। हमारा सारा जीवन ही विरोधों पर खड़ा है लेकिन इन विरोधों में एक लय है, एक प्रवाह है। सुख-दुख, बचपन-बुढ़ापा, रोशनी-अंधेरा, जन्म-मृत्यु ये सब विरोधी बातें हैं लेकिन एक लय में बंधे होते हैं। इसी लय में जीवन संभव होता है और इस संतुलन को साधने का संदेश देता है कृष्ण चरित्र। 

सवाल : कृष्ण ने राधा से प्रेम किया लेकिन विवाह नहीं किया? 

जवाब : कृष्ण जीवन के इस प्रसंग को लेकर तरह-तरह के तर्क और कहानियां सुनने को मिलती हैं। श्रीकृष्ण के गुरु गर्गाचार्य जी द्वारा रचित गर्ग संहिता में वर्णन मिलता है कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था। आध्यात्मिक स्तर पर प्रेम की बात करने वालों के अनुसार एक विवाह न करने को लेकर यह सवाल खुद राधा ने भगवान कृष्ण से किया कि आपने मुझसे विवाह क्यों नही किया। इस पर कृष्ण बोले कि विवाह तो दो अलग-अलग मनुष्यों के बीच होता है और मैं और तुम अलग नहीं हैं। ऐसे में हमें विवाह की क्या जरूरत! तार्किकता से बात करने वाले कहते हैं कि कृष्ण से जुड़े प्रामाणिक ग्रंथों जैसे महाभारत या भागवत पुराण में राधा के नाम का उल्लेख ही नहीं मिलता और राधा नाम के चरित्र को भक्तिकाल में ही ज्यादा विस्तार मिला। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ-संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। 

कृष्ण भोग, कृष्ण त्याग, कृष्ण तत्व ज्ञान है


कृष्ण उठत कृष्ण चलत कृष्ण शाम भोर है, 
कृष्ण बुद्धि कृष्ण चित्त कृष्ण मन विभोर है।

कृष्ण रात्रि कृष्ण दिवस कृष्ण स्वप्न शयन है, 
कृष्ण काल कृष्ण कला कृष्ण मास अयन है।

कृष्ण शब्द कृष्ण अर्थ कृष्ण ही परमार्थ है, 
कृष्ण कर्म कृष्ण भाग्य कृष्णहि पुरुषार्थ है।

कृष्ण स्नेह कृष्ण राग कृष्णहि अनुराग है, 
कृष्ण कली कृष्ण कुसुम कृष्ण ही पराग है।

कृष्ण भोग कृष्ण त्याग कृष्ण तत्व ज्ञान है, 
कृष्ण भक्ति कृष्ण प्रेम कृष्णहि विज्ञान है।

कृष्ण स्वर्ग कृष्ण मोक्ष कृष्ण परम साध्य है,
कृष्ण जीव कृष्ण ब्रह्म कृष्णहि आराध्य है।

जय श्री कृष्ण....!!

!! कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ !!

(  सन्देश के रूप में  प्राप्त श्रीकृष्ण-काव्य आप सभी के साथ साभार शेयर कर रहा हूँ. इसके स्रोत या रचयिता का नाम पता हो तो जरूर बताइयेगा )


शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव को सेवा में पदोन्नति

इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव को भारत सरकार ने सेलेक्शन ग्रेड में पदोन्नत किया है। भारतीय डाक सेवा के 2001 बैच के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड में थे और अब उन्हें भारत सरकार ने पे बैंड-4 में नान फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (वेतनमान-रू 37,400-67,000, ग्रेड पे-8700) में पदोन्नत किया है।  कृष्ण कुमार यादव सहित उनके बैच के सभी 9 अधिकारियों को यह पदोन्नति 1 जनवरी 2014 से दी गयी है। 

कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के लोकप्रिय अधिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने भारतीय डाक सेवाओं को आम जन में और ज्यादा उपयोगी बनाने के लिए सतत् प्रयास किए हैं। उनका विभिन्न विषयों पर साहित्य लेखन बहुत सशक्त है, जिसके लिए उनको कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले हैं। उन्होंने अपने मूल कार्य क्षेत्र में भी हिंदी के उपयोग और विकास में बेहतर योगदान दिया है। कृष्ण कुमार यादव के पिताश्री श्रीराम शिवमूर्ति यादव भी हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नाम हैं।  इनकी पत्नी श्रीमती आकांक्षा यादव जहाँ  हिंदी साहित्य, लेखन और ब्लागिंग में बखूबी सक्रिय हैं, वहीँ  इनकी पुत्री अक्षिता (पाखी) भी एक नवोदित ब्लागर है। कृष्ण कुमार यादव की कार्यप्रणाली में उच्चकोटि की रचनात्मकता और व्यवहार कुशलता देखने को मिलती है।



मंगलवार, 29 जुलाई 2014

अभावों के बीच पूनम यादव ने कॉमनवेल्थ गेम्स में जीता कांस्य


मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है।
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।।

ये पंक्तियां एकदम सही बैठती हैं वाराणसी की 19 वर्षीया पूनम यादव पर। अभावों के बीच पली-बढ़ी पूनम यादव ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में देश का झंडा ऊंचा किया हैं। उन्होंने भारोत्तोलन में महिलाओं के 63 किग्रा वर्ग में कुल 202 किग्रा का भार उठाकर कांस्य पदक जीता है। भारत का 20वें राष्ट्रमंडल खेलों की इस प्रतियोगिता में सातवां पदक है। उन्हें नाईजीरियाई खिलाड़ी ओबियोमा ओकोली और ओलेयुवाटोयिन अदेसनमी सेे कड़ी टक्कर मिली। दोनों एथलीटों ने  पांच किलो अधिक का वजन उठाया और क्रमश: स्वर्ण और रजत पदक अपने नाम किया।

 पूनम के सपनों को पूरा करने के लिए गरीब परिवार ने भी अपना  सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। गरीब पिता ने अपनी आमदनी का साधन दोनों भैंसें तक बेच दी और पूनम की दोनों बहनों ने पूनम की जिंदगी में ये दिन देखने के लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग दिया। पूनम के पिता कैलाश यादव  बेटी की इस जीत से काफी उत्साहित हैं। वह बताते हैं कि 2011 में जब पूनम ने खेलना शुरू किया था तो  धीरे-धीरे वह जिला, मंडल, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन करने लगी। उन्होंने बताया कि कॉमनवेल्थ की तैयारी में आर्थिक परेशानियां भी सामने आने लगीं। पूनम के खेल और उसके डाइट के लिए दो भैसों को बेच दिया गया। परिवार ने भूखे रहकर पूनम को मौका दिया। छोटा सा खेत है, उसी से किसी तरह परिवार का गुजारा होता है। साथ ही, पूनम को सारी सुविधाएं देने की कोशिश जाती हैं। 

कहते हैं आगे बढ़िए तो रास्ते  स्वमेव खुलते जाते हैं। गरीबी और लाचारी से जूझ रहे परिवार की मदद एक साल पहले एक स्थानीय नेता सतीश फौजी ने की थी। उन्होंने बताया कि पूनम के पिता से उनकी मुलाकात एक संत के यहां हुई थी। उनके घर की परेशानी सुनकर उन्हें काफी तकलीफ हुई। ऐसे में उनकी बेटी की सारी जिम्मेदारियां उन्होंने खुद पर ले ली। उन्होंने बताया कि थाईलैंड एशियाड में सिलेक्शन के पहले उसकी डाइट पर हर महीने 25,000 रुपए खर्च होते थे। ऐसे में उन्होंने उसे अपनी बेटी मानकर उसकी सारी जरूरतें पूरी की। वह चाहते हैं कि वह देश के लिए मेडल जीते। साथ ही, अपने परिवार का नाम रोशन करे।

बड़ी बहन किरण यादव ने बताया कि पहले जब घर में भैंसे थी, तो पूनम ही उनकी देखभाल किया करती थी। हालांकि, गरीबी के चलते भैंस भी बिक गए। उम्मीद है कि घरवालों की मेहनत और कुर्बानी रंग लाएगी। उनकी बहन देश के लिए मेडल जरूर जीतेगी। वहीं, चाचा गुलाब यादव बताते हैं कि उसके पिता ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बेटी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। दोनों भाई भी भगवान से बहन की जीत की कामना करते रहते थे।  

पूनम का प्रोफाइल

1. नाम: पूनम यादव
2. गांव: क्राइस्ट नगर
3. पिता: कैलाश यादव (किसान)
4. पढ़ाई: बीए, थर्ड ईयर (परीक्षा छूट गई)
5. भाई-बहन: चार बहनें दो भाई
बड़ी बहन किरण यादव, शशिलता यादव, शशि, पूनम, पूजा। छोटे भाई आशुतोष यादव और अभिषेक यादव (नेशनल  हॉकी प्लेयर)
6. कैटगरी: वजन 63 Kg महिला वर्ग
7. मेडल: एशियाड 2014 में सिल्वर मेडल, सीनियर नेशनल 2014 में सिल्वर मेडल

वाकई सोना तप कर ही खरा होता है।  पूनम की इस होनहार उपलब्धि पर हम सभी को गर्व है !!

- राम शिव मूर्ति यादव @ यदुकुल : www.yadukul.blogspot.com/
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वाकई सोना तप कर ही खरा होता है।  पूनम की इस होनहार उपलब्धि पर हम सभी को गर्व है !!



रविवार, 15 जून 2014

सिविल सर्विसेस में चयनित हुए 24 यादव, इनमें एक-तिहाई लड़कियाँ

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा पिछले दिनों सिविल सर्विसेस में चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी की गई है। इसमें यादव समाज से भी तमाम लोग चयनित हैं।  इन सभी को  हार्दिक बधाईयाँ। इन सभी की रैंक उनके नाम से पहले दी गई है। इन 24 सफल लोगों में से कुल 8 लड़कियां अर्थात एक-तिहाई .... यह वाकई एक शुभ संकेत है।  सभी को उनके उज्जवल भविष्य के लिए अनेकों बधाइयाँ और स्नेहाशीष !!

1 -24 नेहा यादव
2 -123 अनीस यादव
3 -235 प्रीति यादव
4 -291 भोर सिंह यादव
5 -315 चेष्टा यादव
6 -327 पवन यादव
7 -331 राहुल यादव
8 -360 सरिता यादव
9 -368 दिलीप कुमार यादव
10 -407 करण यादव
11 -453 आकांक्षा यादव
12 -470 सुप्रिया यादव
13- 478 पूजा यादव
14 -674 अदिति यादव
15 -712 इन्द्रजीत यादव
16 -719 दीपक यादव
17 -742 आदित्य सिंह यादव
18 -753 मनीष कुमार यादव
19 -768 ऋषि यादव
20- 856 महेश यादव
21 -914 बब्बल यादव
22 -927 गौरव यादव
23 -960 राहुल यादव
24 -1055 विजय कुमार यादव

उपरोक्त के अलावा कुछेक अन्य नाम भी इस सूची में  संभावित हैं।

- राम शिव मूर्ति यादव @ यदुकुल 
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सोमवार, 26 मई 2014

राजकुमार राव (यादव) को फिल्म फेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवार्ड

राजकुमार राव (यादव) हिंदी फिल्मों में अपना परचम बखूबी फहरा रहे हैं।  अभी हाल ही में 59वें फिल्म फेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का क्रिटिक्स अवार्ड राजकुमार राव (यादव) को उनकी फिल्म शाहिद के लिये  दिया गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पाकर हरियाणा में गुड़गांव के प्रेम नगर की गलियों का यह छोरा अचंभित है। कुछ उसी तरह जैसे उन्हें सिर्फ नाम से जानने वाले अबतक दक्षिण भारतीय समझ रहे थे। अब रिश्ते ढूंढ रहे हैं। यार-दोस्त, नाते-रिश्तेदार, शिक्षक-प्रशिक्षक तो 2008 से ही उम्मीदें लगाए बैठे थे। तब वह माया नगरी में स्ट्रग्लर के रूप में गए थे। 2010 में 'लव सेक्स और धोखा' फिल्म से करियर को शुरुआत मिली तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फ़िलहाल तो वह  'डॉली की डोली' की शूटिंग में व्यस्त हैं।

 सबसे कम उम्र में राष्ट्रीय फिल्म फेयर अवार्ड जीतने वाले राजकुमार राव (यादव)  को अभी भी गुड़गांव का बचपन और शहर हर समय प्रेरित करता है। उनका मानना है कि मेहनत तो खूब की थी मगर कभी सोचा नहीं था कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेंगे। अब लोगों की उम्मीदें भी ज्यादा होंगी, इसके लिए और मेहनत करूंगा।यह मेरे जीवन का अबतक का सबसे बड़ा और सुंदर लम्हा है। परिजनों, दोस्तों और फिल्म इंडस्ट्री का शुक्रगुजार हूं। सबने ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार दिया।

2010 में 'लव सेक्स और धोखा' से करियर की शुरुआत करने वाले   राजकुमार राव  की   सात मार्च, 2014 को फिल्म 'क्वीन' रिलीज हुई है। फिल्म 'शाहिद' के लिए ही 2013 का फिल्म फेयर का क्रिटिक्स अवार्ड फॉर बेस्ट एक्टर मिला था। साथ ही फिल्म 'काई पोचे' में बेस्ट सर्पोटिंग एक्टर का पुरस्कार मिला था। पिछले चार सालों माया नगरी में उन्हें कई सफलताएं मिली हीं। उन्हें अच्छी भूमिकाएं मिलीं तो उनके लिए काफी मेहनत और संघर्ष भी किया।

 फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटयूट पूणे से वर्ष 2008 में ग्रेजुएशन करने के बाद  राजकुमार राव  मुंबई पहुंचे  था। उनका मानना है कि मैं तो एक बढि़या एक्टर बनने की चाहत रखता हूं। स्टार तो लोग बनाते हैं। एक अच्छा एक्टर हर तरह की भूमिका निभाता है। मैं ऐसे रोल चुनता हूं जिसमें अभिनय निखर कर सामने आए। चार वर्षो में रागिनी एमएमएस, गैंग्स ऑफ वासेपुर भाग दो, तलाश, काई पोचे, डी डे, क्वीन आदि लगभग एक दर्जन फिल्मों में भूमिकाएं निभा चुके राजकुमार राव   चाहनेवालों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए भविष्य में और कठिन परिश्रम करना चाहते हैं।
- राम शिव मूर्ति यादव @ यदुकुल : http://yadukul.blogspot.in/

गुरुवार, 15 मई 2014

'प्रयाग प्रेस क्लब’ एवं 'उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा)' ने किया कृष्ण कुमार यादव का सम्मान

पत्रकार लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के पहरुए हैं और उनकी सुरक्षा बेहद जरुरी है। यह एक अजीब संयोग है कि जो पत्रकार लोगों की आवाज़ उठाते हैं, अपने ही मामले में शांत रह जाते हैं।  उक्त उद्गार हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद में 14 मई, 2014 को  'प्रयाग प्रेस क्लब’ एवं 'उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा)' के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं एवं चर्चित साहित्यकार व् सोशल मीडिया एक्टिविस्ट श्री कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किया। श्री यादव ने कहा कि प्रयाग प्रेस क्लब ने जिस कार्य के लिए इस संगठन का गठन किया है, वह बहुत ही सराहनीय कार्य है। आज पत्रकारों की सबसे अहम समस्या आवास की है और पत्रकारों को आवास उपलब्ध कराने का जो बीड़ा प्रयाग प्रेस क्लब ने उठाया है, वह काबिलेतारीफ है। इस अवसर पर 'प्रयाग प्रेस क्लब’ और उपजा की तरफ से  अध्यक्ष श्री पवन कुमार द्विवेदी ने श्री कृष्ण कुमार यादव को प्रशासनिक व्यस्तताओं के मध्य निरंतर रचनाधर्मिता में सक्रियता  और उनकी उपब्धियों हेतु  सम्मान भी किया। कार्यक्रम के दौरान इलाहाबाद परिक्षे़त्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने  शहर के कई वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया । 

प्रयाग प्रेस क्लब के अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी और महामंत्री भूपेश सिंह ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव के अलावा  वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार आनन्द नारायण शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार के सी मौर्या, नचिकेता नारायण, संजय कुमार को माल्यार्पण कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार शुक्ला ने कहा कि आज पत्रकारों की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है, प्रयाग प्रेस क्लब की ओर से पत्रकारों का जो दुर्घटना बीमा कराया गया है, वह वास्तव में संगठन का सराहनीय कार्य है। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार आनन्द नारायण शुक्ला, के सी मौर्या, नचिकेता नारायण ने कहा कि यह ऐसा पहला पत्रकार संगठन है, जिसने पत्रकारों के हित के बारे में सोचा है। प्रयाग प्रेस कलब के अध्यक्ष, महामंत्री समेत सभी पदाधिकारी इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं। प्रयाग प्रेस क्लब के अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी ने नवगठित प्रयाग प्रेस क्लब के बारे में बताते हुए आगामी योजनाओं की घोषणा की। 

मुख्य अतिथि इलाहाबाद परिक्षे़त्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने  इस मौके पर तमाम पत्रकारों और फोटो जर्नलिस्ट्स को बीमा बांड वितरित किया। मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों के हाथों बीमा बांड ग्रहण करने वालों में वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्रा, पवन कुमार द्विवेदी, भूपेश सिंह, कुन्दन श्रीवास्तव, संजय कुमार, संदीप कुमार दुबे, सूर्य प्रकाश त्रिपाठी, वरिष्ठ छायाकार विभु गुप्ता, रंजन मिश्रा, नवीन सारस्वत, अनुराग शुक्ला, जितेन्द्र प्रकाश, भीम सिंह यादव, अनूप रावत, सत्यम श्रीवास्तव, दिलीप गुप्ता, विनोद कुमार, पत्रकार नागेन्द्र सिंह, अंजनी श्रीवास्तव, विद्याकांत मिश्रा, मनीष द्विवेदी, अमरदीप चौधरी, संतोष जायसवाल, वीरेन्द्र द्विवेदी, अनुराग तिवारी, गौरव केशरवानी, चन्द्रशेखर सेन, देवेन्द्र त्रिपाठी, संतोष तिवारी, सलीम अहमद, प्रदीप गुप्ता, रोहित शर्मा, अमरजीत सिंह, इरफान खान समेत 151 पत्रकार शामिल हैं। वहीं इस मौके पर अतिथियों को उपजा द्वारा प्रकाशित डायरेक्टरी भी वितरित की गयी। समारोह का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मनीष द्विवेदी एवं धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी ने किया। 

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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

जनता को राइट टू रिकॉल का अधिकार

'वोट' जरूर दीजिये और राजनैतिक दलों के लिए अपना भी घोषणा पात्र जारी कीजिये कि आखिर आप उनसे क्या चाहते हैं। 'सिविल सोसाइटी' और 'सिटिज़न जर्नलिस्ट' की अवधारणा भारतीय समाज में तेजी से कदम बढ़ा  रही है और यही कारण है  कि जनता अब खुलकर सवाल पूछ रही है।  मात्र वोट देकर पाँच साल का इंतज़ार क्यों ? लोहिया जी अक्सर कहा करते थे कि, 'जिन्दा कौमें पाँच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं।' मतदान लोकतंत्र में जीवंतता का प्रतिक है तो अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल करना और उन्हें कटघरे में खड़ा करना भी जनता का हक़ है !

इस चुनाव में तमाम मुद्दों के अलावा निम्न मुद्दे सभी राजनैतिक दलों की प्राथमिकता में होना चाहिए -

-जनता को राइट टू रिकॉल का अधिकार। 
- भ्रष्टाचारमुक्त शासन हेतु पारदर्शिता और आईटी पर जोर। 
-सभी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छ पानी की गारंटी। 
- किसानों, ग्रामीणों व आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने पर रोक। 
-महँगाई पर नियंत्रण। 
-पर्यावरण संरक्षण पर जोर। 
- चुनाव लड़ने हेतु न्यूनतम स्नातक अहर्ता। 
-नारी उत्पीड़न पर रोक और नारी -सशक्तीकरण को बढ़ावा।


(राम शिव मूर्ति यादव) 
स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी (से.नि.)
सिविल लाइंस, इलाहाबाद -211001 
******************************
(साभार : दैनिक जागरण, 18 अप्रैल 2014)
http://epaper.jagran.com/epaper/18-apr-2014-79-edition-Allahabad-City-Page-5.html

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

डॉ दिनेश्वर यादव को “BEST EDUCATIONIST AWARD 2014” का सम्मान

रामेश्वर लता संस्कृत महाविद्यालय दरभंगा के प्रधानाचार्य डॉ दिनेश्वर यादव को नई दिल्ली की संस्था इन्टरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडुकेशन एंड मेनज़मेंट द्वारा “BEST EDUCATIONIST AWARD 2014” द्वारा 3 अप्रैल 2014 को नई दिल्ली में सम्मानित किया गया। डॉ दिनेश्वर यादव मूल रूप से समस्तीपुर के रहने वाले है। 

दिल्ली की संस्था इन्टरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडुकेशन एंड मेनज़मेंट द्वारा 3 अप्रैल 2014 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश भर से शिक्षा के क्षेत्र मे बेहतर कार्य और योगदान देने वाले को “BEST EDUCATIONIST AWARD 2014” से सम्मानित किया गया। यह संस्था प्रत्येक वर्ष देश भर से शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले को सम्मानित करती है। इसकी संस्था की पहचान देश ही नहीं विदेश स्तर पर है। 

इस अवसर पर श्री जोगिंदर सिंह पूर्व सीबीआई निदेशक, डॉ जी वी जी कृष्णमूर्ति पूर्व इलैक्शन कमिश्नर, डॉ भीष्म नारायण सिंह पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री, और पूर्व राज्यपाल श्री ओ पी वर्मा, पूर्व माननीय न्यायाधीश एवं देश के कई महान शिक्षाविद उपस्थित थे। 

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में लोकार्पित हुई कृष्ण कुमार यादव की पुस्तक ’16 आने 16 लोग’


इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं एवं लेखक व साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव की किताब ’’16 आने 16 लोग’’ का विमोचन नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में किया गया। किताब का विमोचन करते हुए वरिष्ठ आलोचक एवं कवि ओम निश्चल ने कहा कि साहित्य की संवेदना और प्रशासनिक दायित्व का जीवंत मिश्रण कृष्ण कुमार यादव की लेखनी में बखूबी मिलता है। इस किताब में साहित्य-कला और संस्कृति के क्षेत्र की 16 महान विभूतियों के पुनर्पाठ के बहाने श्री यादव ने उन्हें समकालीन सरोकारों के साथ व्याख्यायित किया है, जो इस किताब को महत्वपूर्ण बनाती है। 

महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालय, वर्धा से पधारे बहुवचन के संपादक अशोक मिश्र ने कहा कि इस संग्रह में शामिल सभी लेखक अपने समय के सशक्त स्तम्भ रहे हैं और समय-समय पर कृष्ण कुमार ने विभिन्न स्तम्भों में इन विभूतियों पर प्रकाशित अपने आलेखों को जिस तरह एक पुस्तक में गूँथा है, वह इस पुस्तक को शोधार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती है। 

वरिष्ठ लेखिका पुष्पिता अवस्थी ने इस बात को उद्धृत किया कि किताब में अमृता प्रीतम और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी लेखिकाओं केे बहाने महिला साहित्यकारों के अवदान को शामिल करके उन मुद्दों को भी उठाया गया है जो आज नारी विमर्श की पडताल करते हैं। 

नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक लालित्य ललित ने कहा कि पुनर्पाठ की परम्परा में पुस्तक में शामिल साहित्यकारों के साथ संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता जोडते हुए कृष्ण कुमार ने उनका सटीक विश्लेषण किया है। 

इस अवसर पर कृष्ण कुमार यादव ने अपनी सृजनधर्मिता के आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने किताब के बारे मेें बताया कि इसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर, नागार्जुन, निराला, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, गणेश शंकर विद्यार्थी, अज्ञेय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अहमद फराज, कैफी आजमी, अमृता प्रीतम और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी अमर शख्सियतों के अलावा वर्तमान समय में सक्रिय अब्दुल रहमान राही, कुंवर नारायण, गोपालदास नीरज के अवदानों की भी चर्चा की गयी है। 

इस अवसर पर चर्चित कवि मदन कश्यप, दूसरी परम्परा के संपादक सुशील सिद्धार्थ इत्यादि ने भी विचार व्यक्त किए।  कार्यक्रम का संयोजन हिन्द युग्म के शैलेश भारतवासी द्वारा किया गया।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

सुर्खियों में क्रिकेटर कुलदीप यादव

उसे देखकर शेन वार्न का धोखा हो जाता है। दोनों का बॉलिंग एक्शन एक ही जैसा है। बस वार्न दाएं हाथ से लेग स्पिन करते हैं और कुलदीप यादव बाएं हाथ से चाइनामैन। वार्न उसके गुरु रहे हैं। अठारह साल के कुलदीप यादव की बॉलिंग के चर्चे क्रिकेट की दुनिया में होने लगे हैं।

शारजाह में चल रहे अंडर-19 एशिया कप में भी वे खेल रहे हैं। अभी तक युवाओं के 18 वनडे इंटरनेशनल मैचों में उसने 34 विकेट लिए हैं। श्रीलंका अंडर-19 के खिलाफ दो टेस्ट मैचों में 14 विकेट और घरेलू क्रिकेट के इस सीजन में उत्तर प्रदेश की युवा टीम से खेलते हुए 6 मैचों में 53 विकेट।

हाल की आईपीएल नीलामी में कोलकाता नाइटराइडर्स ने उसकी बोली 40 लाख रुपए लगाई। पिछले सीजन में मुंबई इंडियंस ने रिजर्व खिलाडिय़ों में रखा था। लेकिन नेट प्रैक्टिस में उसकी गेंदों के सामने सचिन तेंदुलकर भी चकरा गए थे।

1960 में हैदराबाद से खेलने वाले मुमताज हुसैन देश के पहले चाइनामैन गेंदबाज थे। लेकिन वे केवल फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेले और दो साल बाद वे परंपरागत तरीके से बॉलिंग करने लगे। उसके बाद से कुलदीप पहले चाइनामैन हैं। हाल के सालों में दक्षिण अफ्रीका का पॉल एडम, ऑस्ट्रेलिया के ब्रैड हॉग और साइमन कैटिच ही चाइनामैन बॉलर्स हुए हैं। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के माइकल बीवन और वेस्ट इंडीज़ के गैरी सोबर्स भी चाइनामैन बॉलिंग ही करते थे।

क्या है चाइनामैन 

जिस एक्शन से दाएं हाथ के गेंदबाज लेगस्पिन करते हैं उसी एक्शन से अगर बाएं हाथ का बॉलर करता है तो उसे चाइनामैन कहते हैं। इस तरह के पहले बॉलर वेस्ट इंडीज के एलिस एचांग थे जो दरअसल चीनी मूल के थे। इसीलिए इस बॉल को चाइनामैन डिलीवरी कहा गया।

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अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ‘चाइनामैन’ गेंदबाज यदा कदा ही नजर आते हैं तो ऐसे में भारतीय स्पिन गेंदबाजी की नयी सनसनी कानपुर के कुलदीप यादव ने इस अनूठी कला से पूरी दुनिया का ध्यान बरबस अपनी तरफ खींच लिया है। क्रिकेट में आफ स्पिनर, लेग स्पिनर और लेफट आर्म स्पिनर तो तमाम देशों में खेलते नजर आते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि इतिहास में नजर डाली जाये तो मुश्किल से आठ दस चाइनामैन गेंदबाज ही याद आ पायेंगे। 

दक्षिण अफ्रीका के पाल एडम्स, आस्ट्रेलिया के माइकल बेवन, ब्रैड होग और साइमन कैटिच तथा वेस्टइंडीज के दिग्गज आलराउंडर गैरी सोबर्स कुछ ऐसे गेंदबाज थे जो चाइनामैन शैली की गेंदबाजी किया करते थे। हालांकि सोबर्स नियमित चाइनामैन गेंदबाज नहीं थे, लेकिन वह अपनी गेंदबाजी में ऐसी गेंदों का मिश्रण करते थे। 

भारतीय अंडर-19 टीम के गेंदबाज कुलदीप ने अंडर-19 विश्वकप टूर्नामेंट में स्काटलैंड के खिलाफ हैट्रिक सहित चार विकेट झटके और अपनी चाइनामैन गेंदबाजी के कारण वह एक झटके में ही सुर्खियों में आ गये। वह अंडर-19 विश्वकप में हैट्रिक लेने वाले पहले भारतीय गेंदबाज बने। 

कानपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे कुलदीप यादव की चाइनामैन शैली ने बरबस ही विशेषज्ञों को इतिहास के पन्ने पलटने और ऐसे गेंदबाजों को ढूंढने पर मजबूर किया है जो इस शैली की गेंदबाजी किया करते थे। 

चाइनामैन गेंदबाजी के लिये माना जाता है कि इसका जन्म 1933 में ओल्ड ट्रेफर्ड में वेस्टइंडीज और इंगलैंड के बीच खेले गये मैच के दौरान हुआ था। चीनी मूल के खिलाड़ी एलिस पस एचोंग लेफट आर्म स्पिनर थे और उस समय वेस्टइंडीज की ओर से खेला करते थे। कहा जाता है कि एचोंग ने अपनी एक गेंद पर दाहिने हाथ के बल्लेबाज वाल्टर राबिन्स को इस कदर चौंकाया था कि वह स्टम्प हो गये थे। पवेलियन लौटते समय राबिन्स ने अंपायर से कहा था कि इस ‘चाइनामैन’ ने उन्हें छका दिया। उसके बाद से ही ऐसी गेंदबाजी को चाइनामैन कहा जाने लगा। दरअसल चाइनामैन गेंदबाजी लेफट आर्म स्पिनर की लेग स्पिन गेंदबाजी है जो टप्पा पड़ने के बाद अंदर की ओर आती है। इसमें गेंदबाज अपनी कलाइयों का इस्तेमाल कर गेंद को स्पिन कराता है जिसके कारण वह लेफट स्पिन गेंदबाज से अलग होता है।



सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान द्वारा कृष्ण कुमार यादव ‘’साहित्य गौरव‘‘ से सम्मानित

विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान ने इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ एवं युवा साहित्यकार और ब्लागर श्री कृष्ण कुमार यादव को हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद में 16 फरवरी 2014 को आयोजित 11वें साहित्य मेला सम्मेलन में हिन्दी के संवर्द्धन एवं विशिष्ट साहित्य सेवा हेतु ‘’साहित्य गौरव‘‘ की मानद उपाधि से सम्मानित किया। विभिन्न विधाओं में अब तक कुल 7 पुस्तकें लिख चुके श्री यादव को इससे पूर्व विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकीं हैं। 



इस अवसर पर सुश्री बीएस शांताबाई, प्रधान सचिव, कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति, प्रोफेसर नित्यानंद पाण्डेय, पूर्व निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा, जाने-माने कवि-चित्रकार संदीप राशिनकर, श्री गोकुलेश्वर द्विवेदी, डा राम आसरे गोयल, हितेश पांडेय, नरेश पाण्डेय ’चकोर’ सहित तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे।

 गौरतलब है कि श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा ’’अवध सम्मान’’, परिकल्पना समूह द्वारा ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लागर दम्पति’’ सम्मान, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डा0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, वैदिक क्रांति परिषद, देहरादून द्वारा ‘’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान‘’, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा ’’पं0 बाल कृष्ण पाण्डेय पत्रकारिता सम्मान’’, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।   



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

भारत का पहला चाइनामैन गेंदबाज : कुलदीप यादव

मुंबई इंडियंस की टीम में हरभजन सिंह व प्रज्ञान ओझा जैसे स्थापित स्पिन गेंदबाज हैं, इसलिए एक जूनियर स्पिनर को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के मैच में जगह मिलनी कठिन थी। फिर भी प्रैक्टिस मैचों में जूनियर खिलाडिय़ों को अपने हुनर का प्रदर्शन करने व टीम प्रबंधन को प्रभावित करने का अवसर मिल जाता है। ऐसे ही एक प्रैक्टिस मैच में जब बल्लेबाजी के लिए  सचिन तेंदुलकर मैदान में उतरे तो उनके सामने एक अंजान सा नई उम्र का गेंदबाज था। उसने अपनी स्टॉक बॉल फेंकी। गेंद ऑफ  स्टम्प के बाहर पिच हुई और तेजी से अंदर की ओर आयी। सचिन तेंदुलकर हक्के-बक्के रह गए। पहली ही गेंद पर उनका मिडिल स्टम्प उखड़ गया था। इस यादगार गेंद को फेंकने वाले 18 वर्षीय कुलदीप यादव का कहनाथा, ‘सचिन पाजी को मालूम नहीं था कि मैं चाइनामैन गेंदबाज हूं। दरअसल, कोच शॉन पोलक को छोड़कर टीम में किसी को भी मेरे बारे में पता नहीं था। लेकिन मेेरे लिए यह सपने के सच होना जैसा हो गया कि मैंने क्रिकेट इतिहास के  सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज को पहली गेंद पर बोल्ड किया।’

सचिन तेंदुलकर का विकेट इत्तेफाक हो सकता है, लेकिन इसी अनुभव को एक अन्य अच्छे बल्लेबाज के खिलाफ  दोहराना संयोग नहीं हो सकता। यह प्रतिभा व लगन का ही कमाल कहा जा सकता है  कि कुलदीप यादव जब नेशनल क्रिकेट एकेडमी में चितेश्वर पुजारा को गेंद कर रहे थे तो पुजारा ने पहली तीन गेंद तो किसी तरह से अपने विकेट में जाने से रोकीं, लेकिन चौथी गेंद वह भी, डंडे पर खा गए।

दरअसल, इन बेहतरीन बल्लेबाजों का इस तरह से आउट होना इस वजह से भी हो सकता है कि चाइनामैन गेंदबाजों का सामना करने का अवसर मुश्किल से ही मिलता है। जब कोई बाएं हाथ का स्पिनर गेंद को उंगलियों की बजाय कलाई से स्पिन कराता है तो उसे चाइनामैन गेंदबाज कहते हैं। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि दायं हाथ से कलाई के जरिए लेग स्पिन कराने वाले को लेग स्पिनर कहते हैं, जबकि बायें हाथ से कलाई के जरिए ऑफ  स्पिन कराने वाले को चाइनामैन गेंदबाज कहते  हैं। चाइनामैन गेंदबाज दुर्लभ में भी अति दुर्लभ होते हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुश्किल से ही कोई नाम याद आता है, जैसे दक्षिण अफ्रीका के पॉल एडम्स थे।

इस लिहाज से देखा जाए तो कुलदीप यादव दुर्लभ गेंदबाजों में से एक हैं। लेकिन यह प्रतिभावान अंडर-19 की टीम के साथ भारत का प्रतिनिधित्व कर चुका है। इस स्तर पर खेलने वाला वह भारत का पहला चाइनामैन गेंदबाज है। गौरतलब है कि हाल में ऑस्ट्रेलिया में जो त्रिकोणीय एकदिवसीय प्रतियोगिता खेली गई थी, जिसे भारत की अंडर-19 टीम ने जीता, उसमें कुलदीप यादव अपनी टीम की तरफ से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। उन्होंने चार मैचों में 6.44 की औसत से 9 विकेट हासिल किए और उनका इकोनॉमी दर 1.81 रहा, यानी प्रति ओवर उन्होंने 2 रन से भी कम दिए।
एक चाइनामैन गेंदबाज के लिए इतना शानदार औसत व इकोनॉमी दर हासिल करना आसान काम नहीं है। इससे जाहिर हो जाता है कि कुलदीप नायर का गेंद पर जबरदस्त नियंत्रण है। बहरहाल, इस उभरते हुए गेंदबाज का सपना है कि वह भारत का शेन वॉर्न बने।

आश्चर्य की बात यह है कि कुलदीप स्पिन गेंदबाज की बजाय तेज गेंदबाज बनना चाहते थे। जब वह एक स्थानीय एकेडमी में ट्रायल के लिए गए तो उन्हें देखने के बाद कोच कपिल पांडे ने उनसे व उनके पिता से कहा कि कुलदीप की लंबाई एक  तेज गेंदबाज के लायक नहीं बढ़ पाएगी, इसलिए उसे स्पिन गेंदबाजी करनी चाहिए।

कोच ने कुलदीप पर स्पिन गेंद करने का दबाव डाला, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया। कुलदीप ने गेंदबाजी की असामान्य शैली अपनाई। बहरहाल, अगर आप पहली बार लेग स्पिन फेंकने का प्रयास करेंगे तो अधिक संभावनाएं इस बात की हैं कि आप गुगली फेकेंगे क्योंकि गेंद को सही से छोड़ा नहीं जाएगा। कुलदीप के मामले में पहली गेंद सटीक चाइनामैन थी। कपिल पांडे को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कुलदीप से कहा, ‘अब से तू यही डालेगा।’
चूंकि कपिल पांडे  मूलत: तेज गेंदबाजी के कोच हैं, इसलिए कुलदीप को ट्रेनिंग देने के लिए उन्होंने यूट्यूब का सहारा लिया। यह दोनों शेन वॉर्न के वीडियो देखते और उनकी शैली की समीक्षा करते- एक्शन, गेंद को छोडऩे का बिन्दु आदि। इसके बाद कपिल पांडे की निगरानी में कुलदीप घंटों तक वॉर्न जैसी ही गेंदबाजी करने का प्रयास करते। साथ ही कुलदीप ऑस्ट्रेलिया के असामान्य गेंदबाज ब्रेड हॉज का भी अध्ययन करने लगे, खासकर उनकी उलट दिशा में मुडऩे वाली गेंद का। लेकिन कुलदीप ने अपने आपको वॉर्न पर मॉडल किया है।

इसके वर्षों बाद कुलदीप की राष्ट्रीय क्रिकेट एकेडमी में वॉर्न से मुलाकात हुई और वॉर्न ने कहा, ‘हम दोनों का गेंदबाजी स्टाइल एकसा है।’ वॉर्न ने कुलदीप को सुझाव दिया कि वह अपनी गेंदबाजी में अधिक नियंत्रण व वेरिएशन लाए। यानी अलग-अलग अंदाज से गेंद करना।

चाइनामैन गेंदबाजी के फायदे भी हैं और नुकसान भी। फायदा यह है कि अपने नयेपन व अनोखेपन से सफलता बहुत जल्दी मिलती है, लेकिन जब इसको बल्लेबाज पढऩे लगते हैं तो विकेट मिलना बहुत कठिन होता जाता है। संसार के लगभग सभी असामान्य गेंदबाजों के साथ यही हुआ है, जैसे पॉल एडम्स (दक्षिण अफ्रीका), ब्रेड हॉज (ऑस्ट्रेलिया), अजंता मेंडिस (श्रीलंका), सुहैल तनवीर (पाकिस्तान) आदि। फिलहाल कुलदीप  वार्न के नक्शेकदम पर चलने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

सामाजिक न्याय की राजनीति ठहराव के बिन्दू पर आकर खड़ी हो गयी है - योगेन्द्र यादव

देश के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव पिछले दिनों पटना में थे। एक कार्यक्रम के दौरान इनसे बातचीत करने का अवसर मिला। अपनी बेबाक, गंभीर और सटीक टिप्पणियों के लिए मशहूर श्री यादव ने देश की राजनीति, ओबीसी की दशा दिशा और वर्ष 2014 में देश में राजनीतिक संभावनाओं पर विस्तार से बात की। प्रस्तुत है बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा-

नवल किशोर कुमार– पिछले 4-5 वर्षों में देश की राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव आया है। आंकड़े विकास की अलग कहानी कहते हैं, वही उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं। आंकड़ों के विशेषज्ञ होने के नाते आप क्या कहेंगे?

योगेंद्र यादव – देखिए, आंकड़ों से मैंने अपने आपको बहुत दूर कर लिया है। रही बात देश की राजनीति में बदलाव की तो निश्चित तौर पर बदलाव हुआ। देश के लोग गुस्से में हैं। लेकिन यह सकारात्मक गुस्सा है। पहली बार देश का आम आदमी अपनी बात कहने लगा है। निश्चित तौर पर यह बदलाव आने वाले दिनों में रंग दिखलायेगा।

नवल किशोर कुमार – देश में सामाजिक न्याय की लड़ाई कुंद पड़ती जा रही है। आपके हिसाब से इसकी क्या वजहें हो सकती हैं?

योगेन्द्र यादव – सामाजिक न्याय की राजनीति एक ठहराव के बिन्दू पर आकर खड़ी हो गयी है। उसकी वजह यह है कि सामाजिक न्याय की राजनीति का जो पहला दौर था, वह एक तरह से चूक गया है। जो नेताओं के चेहरा बदलने का काम था वह पूरा हो चुका है। अगर सामाजिक न्याय की राजनीति का मतलब यह था कि एक जाति के नेताओं को हटाकर दूसरी जाति के नेताओं को बिठाया जाय तो वह काम मोटे तौर देश के अनेक राज्यों में हो चुका है। लेकिन उसका जो दूसरा गहरा पड़ाव था कि सामान्य लोगों के जीवन में बदलाव लाया जाय। जन्म के संयोग पर जो विसंगतियां हैं, उसे खत्म किया जाय। उस चुनौती को लेने के लिए पहले दौर की राजनीति तैयार नहीं है। फ़िर चाहे वह लालू प्रसाद यादव की राजनीति हो या करूणानिधि की राजनीति। जो अपने आपको सामाजिक न्याय की राजनीति का वाहक कहते हैं, वे लोग इस बुनियादी चुनौती के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ही साथ वह राजनीति अपने आप में अंदरूनी ठहराव में भी पहूंच चुकी है। चूंकि पिछड़ों में ओबीसी के अंदर जो बड़ी जातियां थीं, थोड़ा अगड़ी जातियां थीं, थोड़ा सा दबंग जातियां थीं, उन्होंने ओबीसी के नाम पर बाकी सब चीजों पर कब्जा कर लिया। दलित समाज में जो उपरी तबका है उसने अन्य दलितों के अधिकारों पर कब्जा कर लिया है। आदिवासी समाज में भी पूर्वोत्तर के राज्यों में आदिवासी, इसाई आदिवासी और जो थोड़े से समुदाय हैं उसने कब्जा कर लिया है। मुस्लिम समाज में भी जो अति पिछड़ा समाज है उसे कुछ नहीं मिला। तो आज अगर सामाजिक न्याय की राजनीति होगी तो वह अति पिछड़े, पसमांदा और सबसे पिछड़े आदिवासी की राजनीति होगी। आज अगर सामाजिक न्याय की राजनीति होगी तो केवल चेहरा बदलने की राजनीति नहीं होगी। लोगों के जीवन बदलने की राजनीति होगी। इस राजनीति के लिए पुराने सामाजिक न्याय की राजनीति अभी तैयार नहीं है।

नवल किशोर कुमार – कल एक वामपंथी नेता ने विक्ल्प के तौर पर वामपंथ और समाजवादियों को एक मंच पर आने का आहवान किया है। आपकी नजर में यह कितना तर्कसंगत है?

योगेंद्र यादव – इसमें कोई शक नहीं कि देश में बदलाव की तमाम बड़ी ताकतों को एक साथ आना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि जिसे 20वीं सदी में समाजवाद कहा जाता था और जिसे 20वीं सदी में साम्यवाद कहा जाता था, जिसमें आगे कोई नक्सली था या जो आम्बेडकरवादी ताकतें थीं, इन सबको एक मंच पर आना होगा। लेकिन इन धाराओं के जो बड़े-बड़े दल बने हैं, वे आज इन्हीं धाराओं के बदलाव को लाने में असमर्थ हैं। तो मैं नहीं समझता कि जो देश में बड़ी कम्यूनिस्ट पार्टियां हैं या समाजवाद का नाम लेने वाली कुछ पार्टियां इस देश में जो हैं, वे बड़े बदलाव में सहायक हो सकती हैं। मेरे विचार से तो इस देश में समाजवाद लाने में जो बाधक पार्टियां हैं, वे वो पार्टियां हैं जो समाजवाद के नाम पर चल रही हैं। या सीपीआई-सीपीएम जैसी बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियां जो कम्युनिज्म के नाम पर चल रही हैं, वे कम्युनिज्म के सबसे बड़ी बाधक हैं। मैं समझता हूं कि इतिहास का जो प्रवाह है, बदलाव है, वो इन बड़ी पार्टियों को किनारे कर देगा। इनके किनारे होने के बाद समाजवाद, साम्यवाद, नारीवाद और आम्बेडकरवाद आदि विचारधाराओं की जो छोटी-छोटी शक्तियां हैं, वे बदलाव लाने में सक्षम होंगी।

नवल किशोर कुमार – साहित्य के क्षेत्र में बात करें तो एक राजनीतिक कोशिश वहां भी की जा रही है। मेन स्ट्रीम साहित्य और दलित साहित्य के तर्ज पर ओबीसी साहित्य की बात कही जा रही है। इसका कैसा भविष्य आप देख पाते हैं?

योगेंद्र यादव – साहित्य में मेरी बहुत गति नहीं है। और जरूरी नही है कि एक क्षेत्र के बारे में कुछ जानकारी रखने वाला व्यक्ति बाकी क्षेत्रों के बारे में भी साधिकार टिप्पणी करे। मैं बहुत कम जानता हूं। यह संभव है कि और यह जरूरी है कि समाज का जो साहित्य है, समाज में आप कहां से आते हैं, कहीं न कहीं उसे प्रतिबिंबित करता है। फ़णीश्वरनाथ रेणु का साहित्य, जो मेरा प्रिय साहित्य है वो किसी शहरी मध्यम वर्गीय जीवन जीने वाले व्यक्ति का साहित्य नहीं हो सकता था। वो वही से आया, जहां से वह उपजा था। तो इसलिए जरुर है कि साहित्य समाज में जो आपका अस्तित्व है या फ़िर समाज में जो समुदाय है उसे प्रतिबिंबित करेगा। लेकिन यह भी याद रखें कि साहित्य केवल कटघरा नहीं है। साहित्य पूरी दुनिया की आंख खोलता भी है। साहित्य में यह आकांक्षा रहनी चाहिए कि वह जहां भी पैदा हो, वह अनंत से जुड़ सके। वह पूरी दुनिया से जुड़ सके। जो साहित्य यह आकांक्षा छोड़ दे वह साहित्य नहीं हो सकता।

नवल किशोर कुमार – योगेंद्र जी, फ़िर से वापस राजनीति की ओर चलते हैं। आज देश के कई राज्यों में पिछड़े वर्गों के लोगों का शासक है। फ़िर भी देश का पिछड़ा वर्ग उपेक्षित क्यों महसूस करता है?

योगेंद्र यादव – ये जो पिछड़ा वर्ग नामक कैटेगरी बनी है। यह कोई हमारे समाज की बनाई हुई कैटेगरी नहीं है। ओबीसी शब्द शुद्ध रुप से सरकारी कागजों और कमीशनों की बनाई हुई कैटेगरी है। जिसे हम ओबीसी कहते हैं, उसमें कम से कम 4 अलग-अलग किस्म के समुदाय शामिल हैं। एक वो जो कृषक समुदाय है, सम्पन्न है और जो जमींदार किस्म के लोग हैं। ये जातियां सक्षम हैं। अनेक जगहों पर दबंग भी हैं। इनके पास देश के कई इलाकों में जमीन और साधन भी हैं। ये भी अपने-आपको ओबीसी कहलाते हैं। कर्नाटक के लिंगायत हों, महाराष्ट्र के मराठा हों, या कांबा हों आंध्रप्रदेश, या उत्तरप्रदेश और बिहार में यादव एवं कुर्मी या फ़िर हरियाणा के जाट हों, ये अधिकांश इस वर्ग में आते हैं। इसके बाद देश के तमाम सीमांत किसान, छोटे-छोटे किसान जो हैं, वे भी हैं इसमें। लेकिन पहली और दूसरी कोटि के लोगों की कोई तुलना नहीं हो सकती। तीसरी श्रेणी में वे जातियां आती हैं जो कि आर्टिजन यानी शिल्पकार या हाथ का काम करके बनाने वाले लोग हैं। चौथी वे जातियां जिसे समाज में सर्विस कास्ट की संज्ञा दी गयी है। जैसे नाई, धोबी एवं अन्य जातियां। और पांचवी श्रेणी में उन जातियों के लोग आते हैं जिनकी सामाजिक हैसियत भी लगभग एक जैसी ही हैं। लेकिन चूंकि ये ईसाई या फ़िर मुसलमान धर्म की जातियां हैं, इसलिए इन्हें दलित नहीं कहा जाता। ये पांच अलग-अलग किस्म के कैटेगरी हैं। इन सबको एक कैटेगरी में डाल देना और ओबीसी कहना राजनीति के साथ न्याय नहीं है। क्योंकि इनमें जमीन आसमान का अंतर है। इनमें इतना ही अंतर होता है जितना कि दलित और ब्राह्म्ण में होता है। इसलिए इनकी राजनीति को एक साथ लाने के लिए जिस किस्म की रचनात्मकता चाहिए, उसके लिए अभी इसकी राजनीति तैयार नहीं हुई है। क्योंकि राजनीति चंद ऊपरी जातियों के कब्जे में आ गयी है। जब तक ओबीसी की राजनीति को ऊपरी जातियों के चंगुल से छुड़ाया नहीं जायेगा या उसे अति पिछड़े के पास नहीं लाया जाएगा और ओबीसी की राजनीति को उनके दैनन्दिन अनुभवों से जोड़ा नहीं जाएगा तब तक ओबीसी की राजनीति आगे नहीं बढ सकती। और इस मायने में उत्तर भारत में ओबीसी राजनीति की स्थिति बहुत ही दयनीय है। दक्षिण भारत की ओबीसी राजनीति ने इन सबकों को सीखा है और इससे वहां के लोगों की जिंदगी में कुछ न कुछ बदलाव आया है। ये जो करूणानिधि हैं, वे अनेक्सर वन से आते हैं। दक्षिण भारत की ओबीसी राजनीति अति पिछड़े की राजनीति बनी। जबकि उत्तर भारत की ओबीसी राजनीति में कम दृष्टि रखने वाले लोग आये। जिसके चलते बहुत बुनियादी राजनीति नहीं हो पायी।

नवल किशोर कुमार – योगेंद्र जी आखिरी सवाल। वर्ष 2014 में कैसा परिवर्तन देख रहे हैं आप?

योगेंद्र यादव – निर्भर करता है कि परिवर्तन से आपका आशय क्या है। अगर परिवर्तन का मतलब यह कि जो पार्टी सत्ता में है उसके बुरे दिन आयेंगे तो ये बताने के लिए आपको किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं है। आप आंख घुमाकर देख लिजिए। देश में चारों तरफ़ कांग्रेस की हालत त्रस्त है। चारों तरफ़ हार रहे हैं। बंगाल में प्रणव मुखर्जी के बेटे बमुश्किल से जीत पाते हैं। वही उत्तराखंड में मुख्यमंत्री के बेटे चुनाव हार गये। यह सब संकेत है। जाहिर है देश में कांग्रेस की हालत पस्त है। इसमें कोई नई बात नहीं है। जो नई बात है वह यह कि मुख्य विपक्षी दल की हालत भी उतनी ही खराब है या फ़िर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि उससे भी ज्यादा खराब है। और यह देश में अलग परिस्थिति पैदा करती है जहां सत्तारुढ दल डूब रहा है। विपक्षी स्थिति लेने की स्थिति में नहीं हैं। इस प्रकार देश में एक नई राजनीतिक संभावना पैदा होती है। अभी से इस संभावना के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

(नवल किशोर कुमार अपनाबिहार.आर्ग के संपादक हैं)
साभार : विस्फोट. काम