शनिवार, 6 अगस्त 2011

साहित्य के प्रति समर्पित : प्रो. उषा यादव

प्रो. उषा यादव का नाम हिंदी-साहित्य में किसी परिचय का मोहताज नहीं है. उन्होंने लगभग हर विधा में लिखा है और खूब लिखा है. उनके विस्तृत जीवन-परिचय और कृतित्व के लिए देखें-











(बड़े रूप में अच्छे से पढने के लिए फोटो पर चटका लगायें.)


सोमवार, 1 अगस्त 2011

‘हंस‘ के 25 साल और हिन्दी साहित्य के ‘द ग्रेट शो मैन‘ राजेन्द्र यादव

यदि भारत में आज हिन्दी साहित्य जगत की लब्धप्रतिष्ठित पत्रिकाओं का नाम लिया जाये तो उनमें शीर्ष पर है-हंस और यदि मूर्धन्य विद्वानों का नाम लिया जाय तो सर्वप्रथम राजेन्द्र यादव का नाम सामने आता है। साहित्य सम्राट प्रेमचंद की विरासत व मूल्यों को जब लोग भुला रहे थे, तब राजेन्द्र यादव ने प्रेमचंद द्वारा 1930 में प्रकाशित पत्रिका ‘हंस’ का पुर्नप्रकाशन आरम्भ करके साहित्यिक मूल्यों को एक नई दिशा दी।

अपने 25 साल पूरे कर चुकी यह पत्रिका अपने अन्दर कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, समीक्षा, लघुकथा, गजल इत्यादि सभी विधाओं को उत्कृष्टता के साथ समेटे हुए है। ‘‘मेरी-तेरी उसकी बात‘‘ के तहत प्रस्तुत राजेन्द्र यादव की सम्पादकीय सदैव एक नये विमर्श को खड़ा करती नजर आती है। यह अकेली ऐसी पत्रिका है जिसके सम्पादकीय पर तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाएं किसी न किसी रूप में बहस करती नजर आती हैं। समकालीन सृजन संदर्भ के अन्तर्गत भारत भारद्वाज द्वारा तमाम चर्चित पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं पर चर्चा, मुख्तसर के अन्तर्गत साहित्य-समाचार तो बात बोलेगी के अन्तर्गत कार्यकारी संपादक संजीव के शब्द पत्रिका को धार देते हैं। साहित्य में अनामंत्रित एवं जिन्होंने मुझे बिगाड़ा जैसे स्तम्भ पत्रिका को और भी लोकप्रियता प्रदान करते है।

कविता से लेखन की शुरूआत करने वाले हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने बड़ी बेबाकी से सामन्ती मूल्यों पर प्रहार किया और दलित व नारी विमर्श को हिन्दी साहित्य जगत में चर्चा का मुख्य विषय बनाने का श्रेय भी उनके खाते में है। निश्चिततः यह तत्व हंस पत्रिका में भी उभरकर सामने आता है। आज भी ‘हंस’ पत्रिका में छपना बड़े-बड़े साहित्यकारों की दिली तमन्ना रहती है। न जाने कितनी प्रतिभाओं को इस पत्रिका ने पहचाना, तराशा और सितारा बना दिया, तभी तो इसके संपादक राजेन्द्र यादव को हिन्दी साहित्य का ‘द ग्रेट शो मैन‘ कहा जाता है। निश्चिततः साहित्यिक क्षेत्र में हंस एवं इसके विलक्षण संपादक राजेन्द्र यादव का योगदान अप्रतिम है।

(राजेंद्र यादव के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए क्लिक करें- http://en.wikipedia.org/wiki/Rajendra_Yadav)
संपर्क-राजेन्द्र यादव, अक्षर प्रकाशन प्रा0 लि0, 2/36 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली

हंस के जरिये हिंदी का इतिहास बनाया राजेंद्र यादव ने - नामवर सिंह

हंसाक्षर ट्रस्‍ट और ऐवाने गालिब की ओर से 'हंस' पत्रिका के पचीस साल पूरे होने पर रविवार को आयोजित रजत जयंती समारोह में 'साहित्यिक पत्रकारिता और हंस' पर बोलते हुए हिंदी के वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि 'हंस' के जरिए इसके संपादक राजेंद्र यादव ने हिंदी के इतिहास को बनाने के साथ-साथ उसे पालने-पोसने का काम भी किया है. नामवर सिंह ने 'हंस' में अपनाए गए लोकतांत्रिक रुख की प्रशंसा करते हुए कहा कि हंस में निंदकों को भी उतनी ही जगह और स्‍वतंत्रता दी गई जितनी प्रशंसकों को. उन्‍होंने मुंशी प्रेमचंद के जमाने से 'हंस' के इतिहास को उजागर करते हुए कहा कि प्रेमचंद के 'हंस' के बाद 'हंस' का एक नया अर्द्धवार्षिक अंक निकला, लेकिन वह अंक भी पहला और आखिरी साबित हुआ. इसके बाद राजेंद्र यादव ने इसकी शुरुआत की, जो आज भी नियमित प्रकाशित हो रही है. 'हंस' के बारे में दूसरे संपादकों की टिप्‍पणियों का हवाला देते हुए सिंह ने कहा कि भविष्‍य में जब भी कोई हिंदी पत्रिकाओं का इतिहास टटोलेगा तो 'हंस' का नाम स्‍वर्ण अक्षरों में दर्ज मिलेगा. उन्‍होंने युवा पीढ़ी को राजेंद्र यादव से कहानी लिखने की शैली सीखने का आह्वान किया.

इस मौके पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार राजेंद्र यादव ने 'हंस' के पचीस साल के सफर में सहयोग देने वाले हर शख्‍स को धन्‍यवाद दिया और कहा कि उन्‍हें कई दफा ठोकरें लगीं और वे कई दफा घबराए भी लेकिन इतने लोगों के साथ ने उन्‍हें कभी निराश नहीं होने दिया. राजेंद्र यादव ने आश्‍वस्‍त किया कि 'हंस' का सफर आगे भी जारी रहेगा.

कार्यक्रम में संजीव, टीएम लालानी, गौतम नवलखा और अनिता वर्मा ने भी अपने विचार रखे. इस मौके पर 'पचीस साल पचीस कहानियां' और 'मुबारक पहला कदम' पुस्‍तकों का लोकार्पण भी किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत में 'हंस' को योगदान देने वालों में संजीव, हरिनारायण, गौतम नवलखा, अर्चना वर्मा, विभांशु दिव्‍याल, दुर्गा प्रसाद, किशन राय, टीएम लालानी और विनोद खन्‍ना को सम्‍मानित किया गया. कार्यक्रम में तसलीमा नसरीन भी मौजूद थीं. कार्यक्रम का संचालन अजय नावरिया ने किया !

चर्चित साहित्यकार राजेन्द्र यादव को शब्द साधक शिखर सम्मान

जे सी जोशी स्मृति साहित्य सम्मान के तहत दिया जाने वाला चौथा शब्द साधक शिखर सम्मान हिन्दी के प्रख्यात कथाकार और हंस के संपादक श्री राजेन्द्र यादव को देने का निर्णय हुआ है । श्री यादव को यह सम्मान आगामी 27 अगस्त को उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर पाखी महोत्सव में दिया जायेगा । इस सम्मान के तहत उन्हें 51 हजार रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा । इस मौके पर पाखी के श्री राजेन्द्र यादव पर केंद्रित अंक का लोकार्पण भी होना है । यह सूचना श्री अपूर्व जोशी ने दी, जो इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी के अध्यक्ष और दि संडे पोस्ट के संपादक हैं। गौरतलब है कि इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी पिछले दस साल से हिन्दी साहित्य का प्रकाशन तथा अन्य सामाजिक गतिविधियां कर रही है । जिसमें दस साल से लगातार हिन्दी साप्ताहिक अखबार दि संडे पोस्ट के प्रकाशन के अलावा तीन साल से हिन्दी पत्रिका पाखी का भी प्रकाशन कर रही है । इसके अलावा सोसायटी ने कई जाने माने लेखकों की पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं ।

श्री राजेन्द्र यादव के पहले यह सम्मान स्व. विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल और श्री नामवर सिंह को दिया जा चुका है । यह सम्मान उन्हें समग्र साहित्यिक अवदान के लिये दिया जा रहा है। नयी कहानी आंदोलन की त्रयी में से एक रहे राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा में हुआ। ‘सारा आकाश’, ‘उखड़े हुए लोग’, ‘शह और मात’ जैसे उपन्यास लिख चुके श्री राजेन्द्र यादव अगस्त 1986 से हंस मासिक साहित्यिक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं । इस पत्रिका ने दलित और स्त्री विमर्श को नयी जमीन दी । हंस ने इस साल 25 वर्ष पूरे कर रजत जयंती मनायी है ।

'यदुकुल' की तरफ से राजेंद्र यादव जी को कोटिश: बधाई !!

शनिवार, 30 जुलाई 2011

संवेदनशील लेखिका और ब्लागर : आकांक्षा यादव

आज चर्चित ब्लागर, कवयित्री, लेखिका आकांक्षा यादव जी का जन्मदिन (30 जुलाई) है. कम समय में ही इन्होने साहित्य में अपनी शानदार पहचान बनाई है. कॉलेज में प्रवक्ता के साथ-साथ साहित्य की तरफ रुझान. पहली कविता कादम्बिनी में प्रकाशित. तत्पश्चात- इण्डिया टुडे, नवनीत, साहित्य अमृत, आजकल, दैनिक जागरण, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, स्वतंत्र भारत, आज, राजस्थान पत्रिका, इण्डिया न्यूज, उत्तर प्रदेश, अक्षर पर्व, शुभ तारिका, गोलकोण्डा दर्पण, युगतेवर, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, युद्धरत आम आदमी, अरावली उद्घोष, प्रगतिशील आकल्प, राष्ट्रधर्म, नारी अस्मिता, अहल्या, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, मेरी संगिनी, वुमेन ऑन टॉप, बाल भारती, बाल साहित्य समीक्षा, बाल वाटिका, बाल प्रहरी, देव पुत्र, अनुराग, वात्सल्य जगत, इत्यादि सहित शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में कविता, लेख और लघुकथाओं का अनवरत प्रकाशन.अंतर्जाल पर रचनाओं का प्रकाशन. शब्द-शिखर, सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित.नारी विमर्श, बाल विमर्श और सामाजिक मुद्दों से सम्बंधित विषयों पर प्रमुखता से लेखन. "क्रांति-यज्ञ:1857-1947 की गाथा" में संपादन सहयोग. व्यक्तित्व-कृतित्व पर "बाल साहित्य समीक्षा (कानपुर)" द्वारा विशेषांक जारी. विभिन्न सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित. एक रचनाधर्मी के रूप में रचनाओं को जीवंतता के साथ सामाजिक संस्कार देने का प्रयास. बिना लाग-लपेट के सुलभ भाव-भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें, यही मेरी लेखनी की शक्ति है !!
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'यदुकुल' की तरफ से आकांक्षा यादव को जन्म-दिन पर कोटिश: शुभकामनाएँ !!

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

उपेक्षित जनकवि : बिसंभर यादव 'मरहा'

बिसंभर यादव मरहा जैसे योद्धा कवि का शरशैया पर लेटे रहना तथा निरुपाय एक- एक दिन गिनना हम सबको लज्जित करता है। समाज को मरहा जी जैसे कवियों ने खूब उल्लसित किया है। जीवन की संध्या में उनका उत्साह भी कम न हो यह जिम्मेदारी भी समाज की है।

जनकवि बिसंभर यादव 'मरहा' 83 वर्ष के हो गए। दो वर्ष पूर्व तक वे गांव- गांव की जन सभाओं, रामायण मेलों में सायकिल चलाकर जाते थे। बेहद गरीबी में पले बढ़े जनकवि बिसंभर यादव मरहा अनपढ़ हैं।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनों में वे सबसे लोकप्रिय कवि हैं। लेकिन विगत दो वर्षों से वे खाट पर हैं। गांव में टहल रहे थे कि एक बैल ने उन्हें उठाकर पटक दिया। मरहा जी यादव हैं उनके पुरखों ने बड़े से बड़े मरखंडा बैल को साधकर पोसवा बनाया। लेकिन दुखद संयोग रहा कि उन्हें एक बैल ने ही पटक दिया। जीवन भर समाज के अनुशासनहीन बैलों को कविता के सोंटे से पीट- पीट कर सीधा करते रहे। लेकिन दुर्घटना के बाद अब वे वस्त्र भी स्वयं नहीं पहन पाते। उनका बेरोजगार पुत्र उन्हें कपड़ा पहनाता है।

83 वर्षीय जनकवि अब साधनहीन हैं। पहले गांव- गांव जाकर कविता सुनाते थे तो कविता का पारिश्रमिक पा जाते थे। विगत बीस वर्ष उनके घर की गाड़ी काव्य मंचों से प्राप्त पारिश्रमिक से चली। बेटा सिंचाई विभाग में दिहाड़ी मजदूर था। शासन से गुहार लगाने के बावजूद अब घर बैठा दिया गया है।

अत्यंत गरीबी और साधनहीनता में जीवन भर संघर्ष करते हुए आगे ही आगे बढऩे वाले जनकवि बिसंभर यादव मरहा को शासन से प्रतिमाह 1500 रुपए की राशि साहित्यकार पेंशन के रूप में मिलती है। इलाज के लिए सहायता के बावजूद मरहा जी शैया सायी होकर रह गये। न केवल मरहा जी बल्कि बहुतेरे साहित्यकार जीवन की संध्या में कष्ट भोग रहे हैं। डॉ. विमलकुमार पाठक, डॉ. बलदेव लगातार शारीरिक कष्ट से उबरने के लिए संघर्षरत हैं। शासन की सदाशयता ने उन्हें संबल आवश्य प्रदान किया किन्तु 15 सौ रुपए की पेंशन बहुत कम है। सुझाव यह भी है कि राज्य शासन के मानदंडों के अनुसार जो साहित्यकार पेंशन की पात्रता रखते हैं उनका व्यापक सर्वे भी प्रतिवर्ष शासकीय स्तर पर होना चाहिए।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा साहित्य के लिए दो लाख का एक ही पुरस्कार दिया जाता है। देश के अन्य प्रांतों में एक वर्ष में साहित्य के क्षेत्र में बीस पचीस छोटी बड़ी राशियों के सम्मान दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी इश तरह के प्रयास किए जाएं। इससे बड़ी संख्या में साहित्यकार अपने लेखकीय श्रम के लिए सम्मान प्राप्त कर संतोष पा सकेंगे।

अभी- अभी नायडू स्मृति लाइफ टाइम सम्मान क्रिकेट के पुराने स्टार सलीम दुर्रानी को दिया जा रहा है। राशि भी पंद्रह लाख की है। साहित्य उस तरह लाभ का धंधा नहीं है जिस तरह खेल या फिल्म है। लेकिन साहित्य की अपनी महत्ता है। समाज में समरसता एवं एकता के लिए साहित्यकार जीवन भर चुपके- चुपके जो काम करता है, महसूस करने वाले ही उसकी महत्ता जान पाते हैं। इसीलिए बिसंभर यादव मरहा जैसे योद्धा कवि का शरशैया पर लेटे रहना तथा निरुपाय एक- एक दिन गिनना हम सबको लज्जित करता है। समाज को मरहा जी जैसे कवियों ने खूब उल्लसित किया है। जीवन की संध्या में उनका उत्साह भी कम न हो यह जिम्मेदारी भी समाज की है।

मरहा जी ने देशप्रेम की कविताओं का खूब सृजन किया। कुछ वर्ष पूर्व तक 'मरहा नाइट' का आयोजन भी होता था जिसमें यह अकेला कवि रात- रात भर कविता सुनाकर श्रोताओं को विभोर कर देता था।

छत्तीसगढ़ में भिन्न- भिन्न क्षेत्रों में समृद्धि के द्वीप हम देखते हैं। यह तेजी से विकसित हो रहा राज्य सबकी आंखों का तारा है। ऐसे में इस राज्य के साहित्यकार भी इसकी समृद्धि को महसूस करें, ऐसा प्रयास जरुरी हो जाता है। अभी तो स्थिति शंकर सक्सेना के इस दोहे सी है ...
'प्यासा का प्यासा रहा द्वीप नदी के बीच
सारी नदियां पी गया, सागर आंखें मींच।'

डॉ. परदेशीराम वर्मा
एलआईजी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाईनगर 490009, मो. 9827993494

साभार : उदंती

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

हैदराबाद से प्रकाशित : यादव टुडे (Yadav Today)


हैदराबाद से निकालने वाली दि-भाषीय पत्रिका 'यादव टुडे' के संपादक श्री बी.बी. यादव इसे बड़े जतन के साथ प्रकाशित-सम्पादित कर रहे हैं. यह अंग्रेजी और तेलगु में प्रकाशित होने वाली पत्रिका है. पत्रिका में यादव-समाज से जुडी विभूतियों पर रचनाएँ हैं, उनके अवदान की बातें हैं, प्रेरक प्रसंग हैं और समसामयिक विषयों पर भी नजर है.

Magazine : Yadav Today (Bi-monthely, English & Telugu)
Editor : Mr. Bikshapathi B. Yadav
Yearly Subscription : Rs. 100/-
Address : H. No. 5-35, Kailash Bhavan, Opp Malkajgiri Post Office, Malkajgiri, RR Dist., Andhra Pradesh-500047
email : yadavtoday@gmail.com
website : http://www.yadavtoday.org/

सोमवार, 4 जुलाई 2011

एक सन्देश बाबा रामदेव के लिए


भ्रष्टाचार करना कुछ व्यक्तियों का, जातियों का, वर्गों, धर्मों, दलों का जन्मना हक़ है, बाबा तेरी सामत आयी थी क्या ? जो नज़र उठाकर उनको देखने की कोशिश की. वैसे तो यह कहते हैं कि जाति न पूछो साधू की, पर बाबा तू ठहरे 'यादव' जाति के इसलिए इन्होने जो किया है, बाबा वक्त तो ठीक है पर जो आपके साथ हैं वह 'आनंद' लेने इलाज कराने और आपके नाम पर दुकान चलाने वाले हैं , संघर्षों में इनका रूप आपकी समझ में आ गया होगा. आपके असली वफादार इंतजार में हैं, पहले अपने आस पास के भ्रष्टाचारियों से निजात पाईये.

फेसबुक पर डा. लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

राजभाषा हिंदी के विकास के लिए सक्रिय : डा. दलसिंगार यादव

डॉ.दलसिंगार यादव का नाम ब्लागिंग के लिए अ-परिचित नहीं है. अपने ब्लॉग 'राजभाषा विकास परिषद्' के माध्यम से वे लगातार सक्रिय हैं. एक तरफ इस पर वे समसामयिक विषयों पर लिख रहे हैं, वहीँ हिंदी और उसके तकनीकी पक्ष को लेकर भी ब्लॉग के माध्यम से उन्होंने एक अनूठी पहल छेड़ रखी है. डॉ. दलसिंगार यादव का जन्म आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ और प्रारंभिक शिक्षा गांव व आज़मगढ़ में, बी.ए. व एम.ए. बी.एच.यू. वाराणसी, एलएल. बी. व पीएच. डी. पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, कंप्यूटर शिक्षा पुणे, कानपुर से। बी.ए. की पढ़ाई के दौरान 1967 में हिंदी आंदोलन में भाग लिया।

उन्होंने भारतीय रिज़र्व बैंक से उप महाप्रबंधक (राजभाषा)के पद से सेवा निवृत्त होकर राजभाषा विकास परिषद की स्थापना की और सम्प्रति इसके संस्थापक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं. इन्होंने सेवा काल में 9 पुस्तकें, बैंकिंग व भाषा तथा पशुपालन पर लिखीं। एक पुस्तक इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार से सम्मानित। फ़िलहाल नागपुर हाई कोर्ट में कानून की प्रैक्टिस कर रहे डा. यादव सामाजिक तौर पर भी काफी सक्रिय हैं।


आज डा. दलसिंगार यादव जी का जन्म-दिवस है और इस अवसर पर यदुकुल परिवार की तरफ से उन्हें ढेरों शुभकामनायें. आप यूँ ही उन्नति के पथ पर प्रशस्त हों और समाज को नए आयाम दें !!

चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव के संपादन में प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' का लघुकथा अंक अंडमान में लोकार्पित

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है । >ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए । उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

मूलत: आजमगढ़ के वासी युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है.

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है । केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है । उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला । डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला व साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.ए. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

प्रस्तुति : दुर्ग विजय सिंह दीप
संयोजक- 'चेतना' (सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था)
उपनिदेशक- आकाशवाणी (समाचार अनुभाग)
पोर्टब्लेयर -744102











विमल यादव बने गुडग़ांव के पहले महापौर


गुडगाँव की गिनती आज देश के सर्वाधिक समृद्ध नगरों में होती है. हाल ही में 21 जून को हुए चुनाव में विमल यादव गुड़गांव नगर निगम के पहले महापौर निर्वाचित हुए। कहा जाता है कि राव इंद्रजीत समर्थक विमल यादव को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। उन्होंने 20 मत हासिल कर भाजपा प्रत्याशी सीमा पहेजा को हराया, जिन्हें केवल नौ मत मिले। विमल यादव के नाम का प्रस्ताव वार्ड 9 के पार्षद लखपत ने किया था जिसका अनुमोदन वार्ड नं0 35 के पार्षद सुन्दर ने किया। अपनी विजय के बाद विमल यादव ने कहा कि मिलेनियम सिटी में पेयजल तथा जलनिकासी की सुविधा बढ़ाना उनकी प्राथमिकता होगी। 'यदुकुल'' की तरफ से विमल यादव हो हार्दिक बधाई !!


(चित्र में : नव निर्वाचित मेयर विमल यादव (बीच में)

शुक्रवार, 24 जून 2011

आकाश यादव बने यू. पी. बोर्ड में हाई स्कूल टापर

उत्तर प्रदेश हाई स्कूल बोर्ड के 11 जून, 2011 को घोषित रिजल्ट में फैजाबाद के श्याम सुन्दर सरस्वती इंटर कालेज के विद्यार्थी आकाश यादव 92.33 प्रतिशत नंबर के साथ पूरे प्रदेश में अव्वल रहे. आकाश यादव की इस सफलता पर तमाम गणमान्य व्यक्तियों, राजनेताओं और संस्थाओं ने उसे सम्मानित कर प्रोत्साहित किया.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने फैजाबाद के एसएसबी इंटर कॉलेज के इस 14 वर्षीय मेधावी छात्र को 50,000 रुपए की पुरस्कार राशि देते हुए भविष्य में भी उसकी शिक्षा में सहयोग का आश्वासन दिया। श्री यादव ने आकाश से कहा कि अब उसे आगे की पढ़ाई में और ज्यादा मेहनत करनी होगी क्योंकि उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। उन्होंने बताया मैं तो खेत में काम करता था। पढ़ाई करता था और कुश्ती भी लड़ता था। कुश्ती में नाम कमाया। उसमें कई बड़े पहलवानों को चित किया। लेकिन साथ ही साथ पढ़ाई भी जरूरी है। मैंने उसके लिए भी मेहनत की। उन्होंने आकाश से कहा पढ़ाई के साथ खेल भी आवश्यक है क्योंकि इससे सेहत ठीक रहती है। शरीर पुष्ट होता है। स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन होता है।

टॉपर छात्र आकाश यादव के पिता श्री राम कुमार यादव, माता श्रीमती लालमणि यादव, बहन दिव्या, तथा भाई अरविंद यादव सभी इस मौके पर काफी खुश हैं. यदुकुल की तरफ से आकाश को ढेरों बधाइयाँ और उन्नति की कामना !!

शनिवार, 11 जून 2011

राजकुमार यादव अभिनीत रागिनी एमएमएस

फ़िल्मी दुनिया में अब कुछेक यदुवंशी दिखने लगे हैं. इनमें से एक हैं राजकुमार यादव. इन्होने रागिनी एमएमएस में बतौर मुख्य अभिनेता काम किया है. धोखा, सेक्स और हॉरर पर आधारित रागिनी एमएमएस फिल्म की एक समीक्षा साभार यहाँ प्रस्तुत है-

मुख्य कलाकार : राज कुमार यादव, कैनाज मोतीवाला। निर्देशक : पवन कृपलानी तकनीकी टीम : निर्माता- शोभा कपूर, एकता कपूर, कथा-पटकथा-पवन कृपलानी, वास्पर दांडीवाला, संवाद-मयंक तिवारी, गीत-मजरूह सुल्तानपुरी, विराग मिश्रा, फैजान हुसैन, ऐग्नेल बोमन, इंदीवर , संगीत-एस डी बर्मन, शमीर टंडन, फैजान हुसैन, ऐग्नेल बोमन, बप्पी लाहिरी। 0 हिंदी फिल्मों में आ रहे बदलाव का एक नमूना रागिनी एमएमएस है। इसे हाथों में लिए कैमरे से शूट किया गया है। ज्यादातर फ्रेम हिलते-डुलते और कई बार उड़ते नजर आते हैं। लव सेक्स और धोखा के बाद एकता कपूर ने दिबाकर बनर्जी की प्रयोगात्मक शैली को यहां शिल्प बना दिया है। इसके फायदे और नुकसान फिल्म में नजर आते हैं। रागिनी और उदय के बीच प्रेम है। उदय भदेस युवक है। रागिनी संभ्रांत मध्यवर्गीय युवती है। दोनों वीकएंड मनाने के उद्देश्य से शहर से बाहर निकलते हैं। इस वीकएंड का एक मकसद शारीरिक संबंध भी बनाना है। रागिनी मानसिक रूप से इसके लिए तैयार है। बस, उसे यह नहीं मालूम कि उदय इसी बहाने उसका एमएमएस तैयार कर अपनी लालसा पूरी करना चाहता है। दोनों एक वीराने फार्म हाउस में पहुंचते हैं। उनके वहां पहुंचने के थोड़ी देर के बाद दर्शकों को बता दिया जाता है कि उस घर में कोई और भी रहती है आत्मा के रूप में। फिल्म के प्रचार से हमें पहले से मालूम है कि फिल्म में सेक्स और हॉरर है। सिनेमाघर में बैठते ही उत्कंठा और आशंका बनती है, जो पाश्‌र्र्व संगीत के प्रभाव से चढ़ती और उतरती है। इस फिल्म से पाश्‌र्र्व संगीत हटा दें तो डर भी भूत की तरह अदृश्य हो सकते हैं। हालीवुड की पैरानार्मल एक्टिविटी से प्रभावित यह हिंदी फिल्म रामसे बंधुओं की भुतहा फिल्मों का मल्टीप्लेक्स संस्करण हैं, जिसमें तकनीक का उम्दा और संगत इस्तेमाल किया गया है। शूटिंग स्टाइल में नयापन है और पश्चिमी तर्ज पर उसे तेज और धारदार रखा गया है। हिंदी फिल्मों की डरावनी परंपरा में इसे म्यूजिकल भी नहीं रखा गया है। फिल्म में सेक्स का पर्याप्त तड़का है। हीरो-हीरोइन के बीच के दृश्यों में अंतरंगता और सहजता है। दोनों मुख्य किरदारों का स्थूल शारीरिक अभिनय दर्शकों के एक समूह की उत्तेजना बढ़ा सकता है। निर्माता और निर्देशक का यही मकसद भी है। राज कुमार यादव और कायनाज मोतीवाला ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। डर तो यह है कि कहीं राज कुमार यादव ऐसी फिल्मों और किरदारों के लिए टाइप होकर अपनी प्रतिभा का नुकसान न कर बैठें। कायनाज मोतीवाला ने मुश्किल दृश्यों में अपना डर बनाए रखा है। दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म को विश्वसनीय बनाती है। इस हिंदी फिल्म की आत्मा मराठी भाषा में बातें करती है।

रेटिंग-***तीन स्टार -अजय ब्रह्मात्मज

शुक्रवार, 10 जून 2011

शाबाश ! शालिनी यादव


बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (Bihar School Examination Board) (BSEB) द्वारा 25 जून, 2011 को घोषित 10वीं के परीक्षा परिणाम में पटना जिला के खगौल स्थित घनश्याम बालिका उच्च विद्यालय की छात्रा शालिनी यादव ने 460 अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया. खगौल के शिक्षक राम श्रंगार यादव व पुष्पा यादव की इकलौती बेटी शालिनी यादव मूलत:ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखती है. शालिनी ने कहा-मुङो उम्मीद नहीं थी कि मैं टॉपर बनूंगी. उसने अपनी सफलता का श्रेय मां-पिता व शिक्षकों को दिया. कहा-मैं प्रतिदिन सात-आठ घंटे पढ़ाई करती थी. मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं व गरीबों की सेवा करना चाहती हूं.

उसकी सफलता पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि राज्य में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और सरकार प्रतिभाओं को उभरने और निखरने में हर संभव सहयोग देगी।नीतीश कुमार ने शालिनी यादव के पटना के फुलवारी शरीफ स्थित आवास पर जाकर उसे पंद्रह हजार रुपये का चेक देने के साथ ही सम्मान स्वरूप एक लैपटॉप भेंट किया। उन्होंने शालिनी को उसकी शानदार सफलता के लिए बधाई देते हुए आगे की पढ़ाई भी पूरे मन से करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता अंतिम नहीं है और लक्ष्य काफी दूर है और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निरंतर संघर्षशील रहना पड़ता है।

गुरुवार, 9 जून 2011

साइकिल यात्री हीरालाल यादव के जूनून को सलाम

हीरालाल यादव का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. इन पर हमने 'यदुकुल' पर पूर्व में भी जानकारी दी थी.बगैर सीट वाली साइकिल से 54 वर्षीय हीरालाल यादव पिछले एक दशक में देश और दुनिया में 65,000 किमी की दूरी नाम चुके हैं, कभी वे किसी युद्धबंदी के परिजनों के पास बैठकर खत लिख रहे होते हैं तो कभी शहीद के परिजन से दुःख बांटते हैं, अन्य दिनों में वे युद्धबंदियों की रिहाई पर केंद्रित अपनी प्रदर्शनी में व्यस्त होते हैं या फिर सभागार में अभागे फौजियों और उनके परिजनों पर लिखी कविताएं सुना रहे होते हैं। गोरखपुर जिले के, पेशे से बीमा एजेण्ट हीरालाल यादव का यह जुनून 1997 में आजादी की स्वर्ण जयंती से शुरू हुआ. वे साइकिल से सद्भावना यात्रा पर निकल पड़े. 1999 में उन्होने कारगिल सलाम सैनिक यात्रा की. इसके बाद तो यह सिलसिला उनके जीवन का हिस्सा ही बन गया। हाल ही में 26-11 की आतंकी घटना में शहीद एन.एस. जी. कमांडो संदीप उन्नीकृष्णन के पिताजी के साथ इण्डिया गेट से गेट-वे-इण्डिया तक की सायकिल यात्रा करके हीरालाल यादव पुन: चर्चा में रहे !!





सफलता का गुरः कोई काम नामुमकिन नही है.
सबसे बड़ी बाधाः जब लोग इस अभियान के ’फायदे’ पर बहस करते हैं.
सबसे बड़ी ताकतः फल की दुकान चलाने वाली उनकी पत्नी शकुन्तला, जो अक्सर दौरे पर रहती है.
जिंदगी का सबसे अहम क्षणः 30 जुलाई 99 का दिन जब कारगिल में सैनिकों ने उनकी अगवानी की और उन्हें सगे भाई से ज्यादा सगा कहा.









हीरालाल यादव पर लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'दस्तक टाइम्स' (मई, 2011) की एक रिपोर्ताज की कापी यहाँ सुधि-पाठकों हेतु संलग्न है. इस पर चटका लगाकर इसे बड़ा करके पढ़ा जा सकता है

बुधवार, 8 जून 2011

उजाला करने के लिए सलाम बाबा रामदेव !!


बाबा रामदेव के साथ सत्ता के मद में चूर लोगों ने जो किया, उसकी जितनी भी निंदा की जाय कम होगी. भ्रष्टाचार की विषबेल काफी लम्बी फ़ैल चुकी है, इसका समाधान तो निकालना ही होगा. एक बाबा पर अत्याचार करके सत्ता भले ही उन्हें दिल्ली से दूर कर ले, पर उन आवाज़ों का क्या जो लोगों के दिलों में उमड़ रही है. 'स्वार्थ' ब्लॉग पर रफत आलम जी की एक ऐसी ही कविता पढ़ी तो उसे साभार यहाँ प्रकाशित करने का मोह नहीं छोड़ पाया-

उजाला करने के लिए
सलाम आपको बाबा!

करोड़ों आखों को
आज यही ईमान की रौशनी चाहिए
अन्यथा
गाँव का सबसे ईमानदार आदमी
शराब के ठेकेदार से
सरपंच का चुनाव हारता रहेगा
रातो-रात बदलती रहेंगी निष्ठाएं

माहौल की सड़न इसी तरह
सदा बिकने वाले को
मेले का खरीदार बना देती है
जड़ों में फैली गंद को
कमल ने सर पे रख लिया है.
यानी व्यवस्था की खराबी को
जनता आवश्यकता मानने लगी है

मन से रोती है परन्तु
खुश-खुश ‘सुविधा शुल्क’ दे रही है
ले रही है

आप बाखूब जानते हैं बाबा साहिब!
ये वह दुनिया है जहाँ
मसीहाओं के उजालों का
स्वागत सदा सियारों ने किया है
जो मौका पाते ही सूली में कीलें ठोकते हैं।

हमाम के ये ही नंगे
कल आपके साथ हो लेंगे
कुछ तो अभी से शेर की बोली बोल रहे हैं।

ये केवल सत्ता के दलाल हैं
इन्हें तख्ते नही तख़्त की है आरज़ू
इन्होने सदा ही संवदनाओं का शोषण किया है
इन्होने ही पनपाया है
भ्रष्टाचार को विष वृक्ष
इन बेईमानों को दूर रखना है ज़रूरी
कल हमें इन्ही के पास कैद
काले धन को आज़ाद कराना है।

शोषण से त्रस्त सारा देश
आपको आशा से देख रहा है
लाखों दीपक चल पड़ने को हैं आतुर
आपके उजाले के साथ।

कल कश्मीर से कन्याकुमारी तक
करोड़ों नारे लगने तय हैं
भ्रष्टाचार मुर्दाबाद!
कल ज़रूर मैली धूप उजली होगी।

- रफत आलम

बुधवार, 25 मई 2011

बाबा रामदेव की मुहिम


दिल्ली चलो ।दिल्ली चलो ।

जागने का वक्त आ गया

परम पूज्य स्वामी रामदेवजी आमरण अनशन पर बैठेंगे :

राष्ट्रनिष्ठ गुरु बंधु / बहिन

भारत स्वाभिमान आंदोलन की क्रमबद्ध मुहिम मे 30 जनवरी, 27 फरवरी, 23 मार्च
के कार्यक्रमों की अभूतपूर्व सफलता के पश्चात आंदोलन निर्णायक मोड पर है ।

सत्य की इस लड़ाई में आपका सहयोग अपेक्षित है

4 जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में स्वामीजी स्वयं अनिश्चित कालीन
उपवास (आमरण अनशन ) पर बैठेंगे । उनका साथ देंगे भारत स्वाभिमान के जांबाज़
कार्यकर्ता शिष्य । इस आंदोलन मे अपना सहयोग दे ।-

राष्ट्रहित में तीन माँगे

लगभग चार सौ लाख करोड़ रुपये का काला धन जो की राष्ट्रीय संपत्ति है यह देश को मिलना चाहिए ।

सक्षम लोकपाल का कठोर कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाना ।

स्वतंत्र भारत में चल रहा विदेशी तंत्र (ब्रिटिश रूल ) खत्म होना चाहिए जिससे कि सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिले ।

सभी के लिए संदेश :

गुरु बंधु
ॐ सादर नमन
योग ऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के प्रतिदिन के विचार तथा भारत स्वाभिमान
जय हिंद ...

सोमवार, 9 मई 2011

माँ का आशीष...


माँ इस दुनिया में सबसे अनमोल रत्न होती है. कहते हैं ईश्वर ने अपनी प्रतिमूर्ति के रूप में माँ को इस धरती पर भेजा है. आइये हम सभी अपनी माँ का सम्मान करना सीखें.
वृद्धावस्था में भी माँ बोझ नहीं होती क्योंकि माँ का आशीष हमें हर-पल चाहिए होता है. जननी से बड़ा इस दुनिया में कोई नहीं. भगवान श्री कृष्ण और श्री राम ने तो अपनी जननी के लिए काफी बिछोह सहा, नसीब वाले होते हैं, जिन्हें जननी का प्यार निरंतर मिलता है. इस प्यार को सहेजिये, यह हमारी अमूल्य पूंजी है. माँतृ दिवस पर 'माँ' को नमन !!

सोमवार, 2 मई 2011

अक्षिता यादव को उत्तरांचल के मुख्यमंत्री द्वारा श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर अवार्ड


हिंदी साहित्‍य निकेतन, परिकल्‍पना डॉट कॉम और नुक्‍कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित भव्य अन्तराष्ट्रीय ब्लागर्स सम्मलेन में अक्षिता यादव (पाखी) को 'बेस्ट बेबी ब्लागर अवार्ड' का ख़िताब दिया गया. यह पुरस्कार उत्तरांचल के मुख्यमंत्री श्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' जी द्वारा चर्चित व्यंग्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ. रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे गणमान्य साहित्यकारों की गौरवमयी उपस्थिति में दिया गया.
गौरतलब है कि इस अवसर पर हिन्दी ब्लॉगिंग के उत्‍थान में अविस्मरणीय योगदान हेतु 51 हिंदी ब्लॉगरों को ''हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया, जिसके अंतर्गत स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, पुस्तकें और एक निश्चित धनराशि भी दी गई. इस सूची में सर्वप्रथम नाम अक्षिता का था, जिसे श्रेष्ट नन्हीं ब्लागर का ''हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010'' दिया गया. सम्मान पाने वालों में अक्षिता सबसे कम उम्र की थी. इससे पूर्व अक्षिता (पाखी) को लोकसंघर्ष-परिकल्पना द्वारा आयोजित और लखनऊ ब्लाॅगर्स एसोसिएशन द्वारा सहप्रयोजित ब्लाॅगोत्सव-2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर वर्ष 2010 के लिए श्रेष्ठ नन्हीं ब्लाॅगर का खिताब भी मिल चुका है.

दुर्भाग्यवश पायलटों की हड़ताल के चलते ऐनवक्त पर फ्लाईट कैंसिल हो जाने के चलते अक्षिता पोर्टब्लेयर से सम्मान ग्रहण करने नहीं जा सकीं, अत: उनकी अनुपस्थिति में यह सम्मान उनके चाचा श्री अमित कुमार यादव, जो की 'युवा-मन' ब्लॉग के संयोजक भी हैं ने ग्रहण किया.

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25 मार्च 2007 को कानपुर में जन्मीं अक्षिता वर्तमान में कार्मेल स्कूल, पोर्टब्लेयर में के.जी.-I में पढ़ती है। अक्षिता के पिता कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएं पद पर पदस्थ हैं व मम्मी आकांक्षा यादव उ0प्र0 के एक काॅलेज में प्रवक्ता हैं। दोनों ही जन चर्चित साहित्यकार व सक्रिय ब्लाॅगर भी हैं। अक्षिता की रुचियाँ हैं- प्लेयिंग, डांसिंग, ड्राइंग, ट्रेवलिंग, ब्लाॅगिंग। अक्षिता को ड्राइंग बनाना बहुत अच्छा लगता है। पहले तो हर माँ-बाप की तरह उनके मम्मी-पापा ने भी ध्यान नहीं दिया, पर धीरे-धीरे उन्होंने अक्षिता के बनाए चित्रों को सहेजना आरंभ कर दिया। इसी क्रम में इन चित्रों और अक्षिता की गतिविधियों को ब्लाॅग के माध्यम से भी लोगों के सामने प्रस्तुत करने का विचार आया और 24 जून 2009 को “पाखी की दुनिया” नाम से अक्षिता का ब्लाॅग अस्तित्व में आया। एक साल के भीतर ही करीब 30,000 हिन्दी ब्लाॅगों के मध्य यह ब्लॉग काफी लोकप्रिय होता गया. आज इस ब्लॉग पर 150 से भी ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं और 140 से ज्यादा लोग इसका अनुसरण करते हैं। इस ब्लाॅग का संचालन अक्षिता के मम्मी-पापा द्वारा किया जाता है।

‘पाखी की दुनिया‘ ब्लाॅग के माध्यम से अक्षिता (पाखी) की सृजनात्मकता को भी पंख लग गए और लोगों ने उसे हाथों-हाथ लिया। इस ब्लॉग पर अंडमान के बारे में भी काफी जानकारियां और फोटोग्राफ हैं, जिसे पाठक काफी उत्सुकता से पढ़ते और सराहते हैं। गौरतलब है कि ‘पाखी की दुनिया‘ की चर्चा जहाँ तमाम पत्र-पत्रिकाओं में हुई है, वहीँ कुछ बाल साहित्यकार अक्षिता की मासूम प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि अपनी पुस्तक के कवर-पेज पर उसकी फोटो ही लगा दी।दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ ने लिखा कि- ‘‘अक्षिता की उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लाॅगिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता का ब्लाॅग बेहद पापुलर है और फिलहाल हिन्दी के टाॅप 100 ब्लाॅगों में से एक है। अक्षिता की तस्वीर बच्चों की एक पुस्तक के कवर पर भी छप चुकी है।“

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

राम शिव मूर्ति यादव को सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन हेतु ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ सम्मान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में 19 अप्रैल, 2011 को प्रखर लेखक एवं समाज सेवी श्री राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित किया गया। उक्त समारोह में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले ने श्री यादव को यह सम्मान प्रदान किया एवं अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु उनके कार्य-कलापों की प्रशंसा करते हुए उसे समाज के लिए अनुकरणीय बताया। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के 120 अम्बेडकरवादियों को सम्मानित किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय पुस्तकों और संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। श्री राम शिव मूर्ति यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ”यदुकुल” (www.yadukul.blogspot.com) ब्लॉग का आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है।

इससे पूर्व आपको भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए ‘’ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान-2007‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद ने विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘‘भारती ज्योति’’ सम्मान एवं आसरा समिति, मथुरा ने ‘बृज गौरव‘, म0प्र0 की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी ने हिन्दी साहित्य सेवा के आधार पर वर्ष 2010 के लिए रचनात्मक क्षेत्र में सेवाओं के निमित्त ”भारत-भूषण“ की मानद उपाधि से अलंकृत किया है।

गोवर्धन यादव
संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म0प्र0)-480001

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

यदुकुल की एक अपील

आओ एक समृद्ध और विकसित समाज बनायें ! एक होकर आगे चलें और मुख्य धारा में आयें !!

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

प्यारी पाखी को जन्मदिन की बधाइयाँ

आज हमारी पोती (Grand daughter) अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिन है. पाखी के जन्मदिन पर दादा-दादी की तरफ से खूब सारा प्यार और आशीष. पाखी जीवन में खूब उन्नति करे और अपने परिवार, समाज, राष्ट्र का नाम समृद्ध और रोशन करे. पाखी तो हमसे बहुत दूर अंडमान में है, पर भला दादा-दादी के दिल से कैसे दूर हो सकती है. नन्हीं सी पाखी जब भी यहाँ आती है, खूब धमाल मचाती है. फोन पर तो न जाने कितनी सारी बातें बताती है. पाखी का एक ब्लॉग भी है-पाखी की दुनिया. कई बार तो लगता है कि काश पाखी परी बनकर हमारे पास उड़ आती.



पाखी के लिए कानपुर से डा0 दुर्गाचरण मिश्र जी ने एक प्यारी सी कविता भेजी है. इसे उन्होंने पाखी के कानपुर में रहने के दौरान लिखा था, पर अब इसे परिमार्जित करते हुए नए सिरे से भेजा है. आप भी इसका आनंद लें और पाखी को ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार दें-

प्यारी-न्यारी पाखी

अक्षिता (पाखी) मेरा नाम है
सब करते मुझको प्यार
मम्मी-पापा की लाडली
मिलता जी भर खूब दुलार।

कानपुर नगर में जन्म लिया
25 मार्च 2006, दिन शनिवार
मम्मी-पापा हुए प्रफुल्लित
पूरा हुआ सपनों का संसार।

दादा-दादी, नाना-नानी
सब देखने को हुए बेकरार
मौसी, बुआ, मामा-मामी,
चाचू लाए खूब उपहार।

नन्हीं सी नटखट गुडि़या
सब रिझायें बार-बार
कितनी प्यारी किलकारी
घर में आये खूब बहार ।

मम्मी-पापा संग आ गई
अब, अण्डमान-निकोबार
यहाँ की दुनिया बड़ी निराली
प्रकृति की छाई है बहार ।

कार्मेल स्कूल में हुआ एडमिशन
प्लेयिंग, डांसिंग, ड्राइंग से प्यार
एल.के.जी. में पढ़ने जाती
मिला नए दोस्तों का संसार ।

समुद्र तट पर खूब घूमती
देखती तट और पहाड़
खूब जमकर मस्ती करती
और जी भरकर धमाल ।

मिल गई इक प्यारी बहना
खुशियों का बढ़ा संसार
तन्वी उसका नाम है
करती उसको मैं खूब प्यार ।

डा0 दुर्गाचरण मिश्र
अर्थ मंत्री- उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन,
अध्यक्ष- साहित्य मन्दाकिनी (साहित्यिक संस्था)
248 सी-1 इंदिरानगर, कानपुर-208026

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति : राधा-कृष्ण


एक बार राधा जी ने श्रीकृष्ण से पूछा- हे श्रीकृष्ण ! आप प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु विवाह मुझसे नहीं किया, ऐसा क्यों? मैं अच्छे से जानती हूँ कि आप साक्षात ईश्वर ही हो और आप कुछ भी कर सकते हों, भाग्य का लिखा बदलने में आप सक्षम हो, फिर भी आपने रुक्मणि से शादी की, मुझसे नहीं।

राधा जी की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया-''हे राधे, विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। आप मुझे यह बताओं कि राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है? हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है।'' श्रीकृष्ण जी का यह उत्तर सुनकर राधा जी निरुत्तर रह गईं.

वाकई नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक पवित्र और महान होता है, इसीलिए आज भी राधा-कृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति रूप में पूजे जाते हैं !!

गुरुवार, 17 मार्च 2011

जगप्रसिद्ध है बरसाने की होली

होली के रंग अभी से फगुनाहट में रंग बिखेरने लगे हैं. होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है।

परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारों ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं।

बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वृन्दावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धुलेंडी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है।

कृष्ण कुमार यादव

बुधवार, 9 मार्च 2011

'यदुकुल' ब्लॉग से मैटर चोरी कर छाप रही हैं पत्र-पत्रिकाएं...

यह पोस्ट लिखने से मैं बचना चाह रहा था, पर परिस्थितियां ही ऐसी पैदा हो गईं कि लिखना पड़ रहा है. इधर अक्सर देख रहा हूँ कि 'यदुकुल' पर प्रकाशित पोस्ट को आर्कुट, फेसबुक इत्यादि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर लोग आपने नाम से धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं. यहाँ तक कि यदुकुल का जिक्र भी नहीं करते. ऐसा करने वालों में युवा वर्ग के लोग ज्यादा हैं. यह बात समझ से परे है कि किसी सामग्री को चुराकर कट-पेस्ट कर आपने नाम से प्रकाशित करने में क्या आनंद आता है. जिस वंश में तमाम बुद्धिजीवी और लेखक भरे हुए हैं, वहाँ ऐसे चोरों से क्या सन्देश जा रहा है ? मुझे बेहद अच्छा लगता यदि कोई यादव मुझे यदुकुल के लिए सामग्री भेजता, पर यहाँ तो उलटे यदुकुल कि सामग्री कि ही चोरी की जा रही है.

बात यहीं तक नहीं है, यादवों पर केन्द्रित तमाम पत्र-पत्रिकाएं भी अब मेहनत करने और चीजों को ढूंढने की बजे 'यदुकुल' ब्लॉग से मैटर गायब करने लगी हैं. शायद उन्हें ब्लॉग का जिक्र करने में शर्म आती है कि कहीं उनकी मठैती पर ही प्रशन चिन्ह ना लग जाय. हाल ही में हमारे पास दिल्ली से एक शुभचिंतक पाठक का ई-मेल आया कि दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'यादव कुल दीपिका' के फरवरी-2011 अंक में पृष्ठ संख्या 30 पर मानवता को नई राह दिखाती कैंसर सर्जन डॉ. सुनीता यादव नामक रिपोर्ट किसी यादव रक्षक एवं मंच स्मृति से साभार दिया गया है. सबसे मजेदार तो यह है कि यह रिपोर्ट यदुकुल पर 27 सितम्बर, 2010 को प्रकाशित है और इसे हू-ब-हू कापी कर 'यादव रक्षक' और 'यादव कुल दीपिका' ने प्रकाशित किया है, जो कि घोर आपत्तिजनक है. सन्दर्भ हेतु 'यादव कुल दीपिका' का वह पेज यहाँ स्कैन कर लगाया जा रहा है.

मेरा सभी यादव बंधुओं से अनुरोध है कि कृपया इस प्रकार की चोरी को प्रोत्साहित ना करें और ना ही कोई पत्र-पत्रिका, वेबसाईट या सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर बनाये गए ग्रुप 'यदुकुल' पर प्रकाशित किसी सामग्री का बिना इसका कोई रिफरेन्स दिए इस्तेमाल करें. साभार इस्तेमाल किये जाने की अवस्था में इसकी सूचना हमारे ई- मेल या ब्लॉग के माध्यम से दी जाय.

आपने शुभचिंतकों और पाठकों से भी हमारा अनुरोध है कि ऐसी किसी भी चोरी को हमारे संज्ञान में लायें, ताकि इस प्रकार की दुष्प्रवृत्ति को दूर किया जा सके. यहाँ राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण‘ जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-

अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है;
मुर्दा है वह देश, जहाँ साहित्य नहीं है।

... यही बात जातियों पर भी लागू होती है. यदुवंश को समृद्ध बनाने के लिए समृद्ध लेखनी और विचारों की जरुरत है, न कि ऐसे मुर्दा लोगों की जो दूसरों के साहित्य, लेख और विचारों को चुराकर अपना कहें !!