सोमवार, 9 मई 2011

माँ का आशीष...


माँ इस दुनिया में सबसे अनमोल रत्न होती है. कहते हैं ईश्वर ने अपनी प्रतिमूर्ति के रूप में माँ को इस धरती पर भेजा है. आइये हम सभी अपनी माँ का सम्मान करना सीखें.
वृद्धावस्था में भी माँ बोझ नहीं होती क्योंकि माँ का आशीष हमें हर-पल चाहिए होता है. जननी से बड़ा इस दुनिया में कोई नहीं. भगवान श्री कृष्ण और श्री राम ने तो अपनी जननी के लिए काफी बिछोह सहा, नसीब वाले होते हैं, जिन्हें जननी का प्यार निरंतर मिलता है. इस प्यार को सहेजिये, यह हमारी अमूल्य पूंजी है. माँतृ दिवस पर 'माँ' को नमन !!

सोमवार, 2 मई 2011

अक्षिता यादव को उत्तरांचल के मुख्यमंत्री द्वारा श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर अवार्ड


हिंदी साहित्‍य निकेतन, परिकल्‍पना डॉट कॉम और नुक्‍कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित भव्य अन्तराष्ट्रीय ब्लागर्स सम्मलेन में अक्षिता यादव (पाखी) को 'बेस्ट बेबी ब्लागर अवार्ड' का ख़िताब दिया गया. यह पुरस्कार उत्तरांचल के मुख्यमंत्री श्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' जी द्वारा चर्चित व्यंग्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ. रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे गणमान्य साहित्यकारों की गौरवमयी उपस्थिति में दिया गया.
गौरतलब है कि इस अवसर पर हिन्दी ब्लॉगिंग के उत्‍थान में अविस्मरणीय योगदान हेतु 51 हिंदी ब्लॉगरों को ''हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया, जिसके अंतर्गत स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, पुस्तकें और एक निश्चित धनराशि भी दी गई. इस सूची में सर्वप्रथम नाम अक्षिता का था, जिसे श्रेष्ट नन्हीं ब्लागर का ''हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010'' दिया गया. सम्मान पाने वालों में अक्षिता सबसे कम उम्र की थी. इससे पूर्व अक्षिता (पाखी) को लोकसंघर्ष-परिकल्पना द्वारा आयोजित और लखनऊ ब्लाॅगर्स एसोसिएशन द्वारा सहप्रयोजित ब्लाॅगोत्सव-2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर वर्ष 2010 के लिए श्रेष्ठ नन्हीं ब्लाॅगर का खिताब भी मिल चुका है.

दुर्भाग्यवश पायलटों की हड़ताल के चलते ऐनवक्त पर फ्लाईट कैंसिल हो जाने के चलते अक्षिता पोर्टब्लेयर से सम्मान ग्रहण करने नहीं जा सकीं, अत: उनकी अनुपस्थिति में यह सम्मान उनके चाचा श्री अमित कुमार यादव, जो की 'युवा-मन' ब्लॉग के संयोजक भी हैं ने ग्रहण किया.

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25 मार्च 2007 को कानपुर में जन्मीं अक्षिता वर्तमान में कार्मेल स्कूल, पोर्टब्लेयर में के.जी.-I में पढ़ती है। अक्षिता के पिता कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएं पद पर पदस्थ हैं व मम्मी आकांक्षा यादव उ0प्र0 के एक काॅलेज में प्रवक्ता हैं। दोनों ही जन चर्चित साहित्यकार व सक्रिय ब्लाॅगर भी हैं। अक्षिता की रुचियाँ हैं- प्लेयिंग, डांसिंग, ड्राइंग, ट्रेवलिंग, ब्लाॅगिंग। अक्षिता को ड्राइंग बनाना बहुत अच्छा लगता है। पहले तो हर माँ-बाप की तरह उनके मम्मी-पापा ने भी ध्यान नहीं दिया, पर धीरे-धीरे उन्होंने अक्षिता के बनाए चित्रों को सहेजना आरंभ कर दिया। इसी क्रम में इन चित्रों और अक्षिता की गतिविधियों को ब्लाॅग के माध्यम से भी लोगों के सामने प्रस्तुत करने का विचार आया और 24 जून 2009 को “पाखी की दुनिया” नाम से अक्षिता का ब्लाॅग अस्तित्व में आया। एक साल के भीतर ही करीब 30,000 हिन्दी ब्लाॅगों के मध्य यह ब्लॉग काफी लोकप्रिय होता गया. आज इस ब्लॉग पर 150 से भी ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं और 140 से ज्यादा लोग इसका अनुसरण करते हैं। इस ब्लाॅग का संचालन अक्षिता के मम्मी-पापा द्वारा किया जाता है।

‘पाखी की दुनिया‘ ब्लाॅग के माध्यम से अक्षिता (पाखी) की सृजनात्मकता को भी पंख लग गए और लोगों ने उसे हाथों-हाथ लिया। इस ब्लॉग पर अंडमान के बारे में भी काफी जानकारियां और फोटोग्राफ हैं, जिसे पाठक काफी उत्सुकता से पढ़ते और सराहते हैं। गौरतलब है कि ‘पाखी की दुनिया‘ की चर्चा जहाँ तमाम पत्र-पत्रिकाओं में हुई है, वहीँ कुछ बाल साहित्यकार अक्षिता की मासूम प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि अपनी पुस्तक के कवर-पेज पर उसकी फोटो ही लगा दी।दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ ने लिखा कि- ‘‘अक्षिता की उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लाॅगिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता का ब्लाॅग बेहद पापुलर है और फिलहाल हिन्दी के टाॅप 100 ब्लाॅगों में से एक है। अक्षिता की तस्वीर बच्चों की एक पुस्तक के कवर पर भी छप चुकी है।“

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

राम शिव मूर्ति यादव को सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन हेतु ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ सम्मान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में 19 अप्रैल, 2011 को प्रखर लेखक एवं समाज सेवी श्री राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित किया गया। उक्त समारोह में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले ने श्री यादव को यह सम्मान प्रदान किया एवं अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु उनके कार्य-कलापों की प्रशंसा करते हुए उसे समाज के लिए अनुकरणीय बताया। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के 120 अम्बेडकरवादियों को सम्मानित किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय पुस्तकों और संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। श्री राम शिव मूर्ति यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ”यदुकुल” (www.yadukul.blogspot.com) ब्लॉग का आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है।

इससे पूर्व आपको भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए ‘’ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान-2007‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद ने विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘‘भारती ज्योति’’ सम्मान एवं आसरा समिति, मथुरा ने ‘बृज गौरव‘, म0प्र0 की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी ने हिन्दी साहित्य सेवा के आधार पर वर्ष 2010 के लिए रचनात्मक क्षेत्र में सेवाओं के निमित्त ”भारत-भूषण“ की मानद उपाधि से अलंकृत किया है।

गोवर्धन यादव
संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म0प्र0)-480001

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

यदुकुल की एक अपील

आओ एक समृद्ध और विकसित समाज बनायें ! एक होकर आगे चलें और मुख्य धारा में आयें !!

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

प्यारी पाखी को जन्मदिन की बधाइयाँ

आज हमारी पोती (Grand daughter) अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिन है. पाखी के जन्मदिन पर दादा-दादी की तरफ से खूब सारा प्यार और आशीष. पाखी जीवन में खूब उन्नति करे और अपने परिवार, समाज, राष्ट्र का नाम समृद्ध और रोशन करे. पाखी तो हमसे बहुत दूर अंडमान में है, पर भला दादा-दादी के दिल से कैसे दूर हो सकती है. नन्हीं सी पाखी जब भी यहाँ आती है, खूब धमाल मचाती है. फोन पर तो न जाने कितनी सारी बातें बताती है. पाखी का एक ब्लॉग भी है-पाखी की दुनिया. कई बार तो लगता है कि काश पाखी परी बनकर हमारे पास उड़ आती.



पाखी के लिए कानपुर से डा0 दुर्गाचरण मिश्र जी ने एक प्यारी सी कविता भेजी है. इसे उन्होंने पाखी के कानपुर में रहने के दौरान लिखा था, पर अब इसे परिमार्जित करते हुए नए सिरे से भेजा है. आप भी इसका आनंद लें और पाखी को ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार दें-

प्यारी-न्यारी पाखी

अक्षिता (पाखी) मेरा नाम है
सब करते मुझको प्यार
मम्मी-पापा की लाडली
मिलता जी भर खूब दुलार।

कानपुर नगर में जन्म लिया
25 मार्च 2006, दिन शनिवार
मम्मी-पापा हुए प्रफुल्लित
पूरा हुआ सपनों का संसार।

दादा-दादी, नाना-नानी
सब देखने को हुए बेकरार
मौसी, बुआ, मामा-मामी,
चाचू लाए खूब उपहार।

नन्हीं सी नटखट गुडि़या
सब रिझायें बार-बार
कितनी प्यारी किलकारी
घर में आये खूब बहार ।

मम्मी-पापा संग आ गई
अब, अण्डमान-निकोबार
यहाँ की दुनिया बड़ी निराली
प्रकृति की छाई है बहार ।

कार्मेल स्कूल में हुआ एडमिशन
प्लेयिंग, डांसिंग, ड्राइंग से प्यार
एल.के.जी. में पढ़ने जाती
मिला नए दोस्तों का संसार ।

समुद्र तट पर खूब घूमती
देखती तट और पहाड़
खूब जमकर मस्ती करती
और जी भरकर धमाल ।

मिल गई इक प्यारी बहना
खुशियों का बढ़ा संसार
तन्वी उसका नाम है
करती उसको मैं खूब प्यार ।

डा0 दुर्गाचरण मिश्र
अर्थ मंत्री- उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन,
अध्यक्ष- साहित्य मन्दाकिनी (साहित्यिक संस्था)
248 सी-1 इंदिरानगर, कानपुर-208026

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति : राधा-कृष्ण


एक बार राधा जी ने श्रीकृष्ण से पूछा- हे श्रीकृष्ण ! आप प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु विवाह मुझसे नहीं किया, ऐसा क्यों? मैं अच्छे से जानती हूँ कि आप साक्षात ईश्वर ही हो और आप कुछ भी कर सकते हों, भाग्य का लिखा बदलने में आप सक्षम हो, फिर भी आपने रुक्मणि से शादी की, मुझसे नहीं।

राधा जी की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया-''हे राधे, विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। आप मुझे यह बताओं कि राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है? हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है।'' श्रीकृष्ण जी का यह उत्तर सुनकर राधा जी निरुत्तर रह गईं.

वाकई नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक पवित्र और महान होता है, इसीलिए आज भी राधा-कृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति रूप में पूजे जाते हैं !!

गुरुवार, 17 मार्च 2011

जगप्रसिद्ध है बरसाने की होली

होली के रंग अभी से फगुनाहट में रंग बिखेरने लगे हैं. होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है।

परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारों ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं।

बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वृन्दावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धुलेंडी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है।

कृष्ण कुमार यादव

बुधवार, 9 मार्च 2011

'यदुकुल' ब्लॉग से मैटर चोरी कर छाप रही हैं पत्र-पत्रिकाएं...

यह पोस्ट लिखने से मैं बचना चाह रहा था, पर परिस्थितियां ही ऐसी पैदा हो गईं कि लिखना पड़ रहा है. इधर अक्सर देख रहा हूँ कि 'यदुकुल' पर प्रकाशित पोस्ट को आर्कुट, फेसबुक इत्यादि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर लोग आपने नाम से धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं. यहाँ तक कि यदुकुल का जिक्र भी नहीं करते. ऐसा करने वालों में युवा वर्ग के लोग ज्यादा हैं. यह बात समझ से परे है कि किसी सामग्री को चुराकर कट-पेस्ट कर आपने नाम से प्रकाशित करने में क्या आनंद आता है. जिस वंश में तमाम बुद्धिजीवी और लेखक भरे हुए हैं, वहाँ ऐसे चोरों से क्या सन्देश जा रहा है ? मुझे बेहद अच्छा लगता यदि कोई यादव मुझे यदुकुल के लिए सामग्री भेजता, पर यहाँ तो उलटे यदुकुल कि सामग्री कि ही चोरी की जा रही है.

बात यहीं तक नहीं है, यादवों पर केन्द्रित तमाम पत्र-पत्रिकाएं भी अब मेहनत करने और चीजों को ढूंढने की बजे 'यदुकुल' ब्लॉग से मैटर गायब करने लगी हैं. शायद उन्हें ब्लॉग का जिक्र करने में शर्म आती है कि कहीं उनकी मठैती पर ही प्रशन चिन्ह ना लग जाय. हाल ही में हमारे पास दिल्ली से एक शुभचिंतक पाठक का ई-मेल आया कि दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'यादव कुल दीपिका' के फरवरी-2011 अंक में पृष्ठ संख्या 30 पर मानवता को नई राह दिखाती कैंसर सर्जन डॉ. सुनीता यादव नामक रिपोर्ट किसी यादव रक्षक एवं मंच स्मृति से साभार दिया गया है. सबसे मजेदार तो यह है कि यह रिपोर्ट यदुकुल पर 27 सितम्बर, 2010 को प्रकाशित है और इसे हू-ब-हू कापी कर 'यादव रक्षक' और 'यादव कुल दीपिका' ने प्रकाशित किया है, जो कि घोर आपत्तिजनक है. सन्दर्भ हेतु 'यादव कुल दीपिका' का वह पेज यहाँ स्कैन कर लगाया जा रहा है.

मेरा सभी यादव बंधुओं से अनुरोध है कि कृपया इस प्रकार की चोरी को प्रोत्साहित ना करें और ना ही कोई पत्र-पत्रिका, वेबसाईट या सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर बनाये गए ग्रुप 'यदुकुल' पर प्रकाशित किसी सामग्री का बिना इसका कोई रिफरेन्स दिए इस्तेमाल करें. साभार इस्तेमाल किये जाने की अवस्था में इसकी सूचना हमारे ई- मेल या ब्लॉग के माध्यम से दी जाय.

आपने शुभचिंतकों और पाठकों से भी हमारा अनुरोध है कि ऐसी किसी भी चोरी को हमारे संज्ञान में लायें, ताकि इस प्रकार की दुष्प्रवृत्ति को दूर किया जा सके. यहाँ राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण‘ जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-

अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है;
मुर्दा है वह देश, जहाँ साहित्य नहीं है।

... यही बात जातियों पर भी लागू होती है. यदुवंश को समृद्ध बनाने के लिए समृद्ध लेखनी और विचारों की जरुरत है, न कि ऐसे मुर्दा लोगों की जो दूसरों के साहित्य, लेख और विचारों को चुराकर अपना कहें !!

बुधवार, 2 मार्च 2011

आकांक्षा यादव को 'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान'

युवा कवयित्री एवँ साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संस्था न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फ़िलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।

आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।

गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

अश्विनी कुमार यादव को बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड

अश्विनी कुमार यादव को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2009-2010 के लिए बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड प्राप्त हुआ है। यह अवार्ड उन्हें जूनागढ़ के जिलाधिकारी के कार्यकाल हेतु दिया गया है. इस हेतु अश्विनी कुमार को 51,000 रूपये का नकद इनाम और जूनागढ़ जिले के लिए 20 लाख रूपये का इनाम दिया गया है. गौरतलब है कि अश्विनी कुमार को वर्ष 2007-08 के लिए भी पूर्व में बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड दिया जा चूका है और उससे पूर्व वर्ष 2002-03 के लिए बेस्ट जिला विकास अधिकारी का अवार्ड भी प्राप्त हो चुका है.

आई. आई. टी. कानपुर से बी.टेक पश्चात् 1997 बीच के IAS अधिकारी रूप में चयनित अश्विनी कुमार कि गिनती तेज-तर्रार अधिकारीयों में होती है. स्वाभाव से नम्र और संवेदनशील अश्विनी कुमार मूलत: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के सैदपुर क्षेत्र के निवासी हैं. उनके पिताश्री श्री राजेंद्र प्रसाद और माताश्री श्रीमती सावित्री देवी सैदपुर में नगर पंचायत अध्यक्ष का पद सुशोभित कर चुके हैं. अश्विनी कुमार के भाई समीर सौरभ उत्तर प्रदेश पुलिस में उप पुलिस अधीक्षक तो बड़े भाई पीयूष कुमार बहुराष्ट्रीय कंपनी में उप महाप्रबंधक हैं. अश्विनी कुमार चर्चित ब्लागर और लेखिका आकांक्षा यादव के बड़े भ्राता हैं.
अश्विनी कुमार जी को इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें...!!

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

भ्रष्टाचारियों को सबक सिखा रहा है एक नौकरशाह : संतोष यादव


उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर जिले के जिलाधिकारी संतोष यादव की गिनती ईमानदार अधिकारियों में होती है. आजकल वह भ्रष्टाचारियों को सबक सिखा रहे हैं. इस पर 'जनसत्ता' अख़बार में प्रस्तुत रिपोर्ट यहाँ साभार प्रस्तुत है. संतोष यादव जैसे युवा जज्बे वाले अधिकारियों की बदौलत ही समाज प्रगति कर पता है. संतोष यादव को इस जज्बे के लिए बधाइयाँ !!

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

हिन्दी में न्यायादेश लिखने वाले पटना हाईकोर्ट के प्रथम न्यायाधीश न्यायमूर्ति : राजेश्वर प्रसाद मंडल

बहुमुखी प्रतिभा के धनी और हिन्दी में न्यायादेश लिखने वाले पटना उच्च न्यायालय के प्रथम न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश्वर प्रसाद मंडल ‘मणिराज’ यदुवंश की ही पैदाइश थे.उनका जन्म मधेपुरा जिला के गढिया में २० फरवरी १९२० को हुआ था. आपके दादा रासबिहारी मंडल सुख्यात जमींदार एवं बिहार के अग्रणी कांग्रेसी थे.रासबिहारी मंडल के तीन पुत्र भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल, कमलेश्वरी प्रसाद मंडल तथा बिन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल राजनीति में सक्रिय थे.राजेश्वर पिता भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल और माता सुमित्रा देवी के ज्येष्ठ पुत्र थे.टीएनबी कॉलेज भागलपुर से अर्थशाश्त्र में स्नातक और पटना वि०वि० से एम०ए० करने के बाद इन्होने १९४१ में पटना विधि महाविद्यालय से वकालत की डिग्री हासिल की.१९४० में आपके विवाह पटना में भाग्यमणी देवी से हुआ.

राजेश्वर प्रसाद मंडल १९४२ में वकालत पेशे से जुड़े.१९४६ तक मधेपुरा में वकालत करने के बाद ये १९४७ में मुंसिफ के पद पर गया में नियुक्त हुए.१९६६ में ये पटना हाई कोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार बनाये गए तथा १९६९ में दुमका में एडीजे बने.१९७३ में हजारीबाग के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में पदस्थापित हुए और फिर १९७९ में पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे उत्कर्ष पद पर.१९८२ में अवकाश ग्रहण करने के पूर्व वे समस्तीपुर जेल फायरिंग जांच समिति के चेयरमैन नियुक्त हुए.१९९० में ये राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य तथा १९९० में ही पटना उच्च न्यायालय में सलाहकार परिषद के सदस्य जज मनोनीत हुए.१० अक्टूबर १९९२ को इनके जीवन यात्रा का समापन पटना में ही हो गया.

बहुत सी महत्वपूर्ण उपलब्धियों से सजा था उनका जीवन.बहुत अच्छे खिलाड़ी ही नही,बहुत अच्छे इंसान भी थे वे.हिन्दी में न्यायादेश लिखने वाले पटना उच्च न्यायलय के प्रथम न्यायाधीश थे वे.उन्होंने हजार पृष्ठ से भी अधिक विस्तार में साहित्य-सर्जना की,जिनमे सभ्यता की कहानी,धर्म,देवता और परमात्मा, भारत वर्ष हिंदुओं का देश,ब्राह्मणों की धरती आदि ग्रंथों में वंचितों के प्रति अपनी पक्षधरता द्वारा यह प्रमाणित किया किया है.’जहाँ सुख और शान्ति मिलती है’ जैसे रोचक उपन्यास में उन्होंने पाश्चात्य की तुलना में भारतीय संस्कृति का औचित्य प्रतिपादित किया है तो ‘सतयुग और पॉकेटमारी’ कहानी संग्रह में अपनी व्यंग दक्षता का प्रमाण दिया है.’अँधेरा और उजाला’ के द्वारा उनके नाटककार व्यक्तित्व का परिचय मिलता है तो ‘चमचा विज्ञान’ से कवि प्रतिभा का.

सार रूप में कहें तो राजेश्वर प्रसाद मंडल मानवता के पुजारी,रूढियों के भंजक,प्रगतिकामी,सामाजिक परिवर्तन के शब्द-साधक मसीहा और सर्वोपरि एक नेक इंसान थे.स्व० राजेश्वर प्रसाद मंडल के दो अनुज क्रमश: श्री सुरेश चन्द्र यादव,पूर्व विधायक तथा श्री रमेश चन्द्र यादव (अधिवक्ता) थे.चार अत्मजों में क्रमश: डा० अरूण कुमार मंडल (अवकाश प्राप्त असैन्य शल्य चिकित्सक), सुधीर कुमार मंडल एवं शेखर मंडल (अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करके वहीं के अधिवासी) तथा किशोर कुमार मंडल(पटना उच्च न्यायालय में माननीय न्यायमूर्ति) हैं. पौत्रों में डा० मनीष कुमार मंडल (सर्जन,आईजीआईएमएस), आशीष मंडल(दिल्ली में अपना व्यवसाय), जय मंडल(विदेश में क़ानून विद्) हैं और ऋषि मंडल अभी स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं.अनुवंश परंपरा के रूप में आर० पी० मंडल हमारे बीच अभी भी मौजूद हैं.

20 फरवरी को स्व० राजेश्वर प्रसाद मंडल जी की जयंती पर श्रद्धा-सुमन !!

साभार : मधेपुरा टाइम्स

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर कार्यरत हैं.

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं।

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।
गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिंदवाडा 103, कावेरी नगर छिंदवाडा, मध्यप्रदेश

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

देवगिरि का यादव वंश

यादव वंश भारतीय इतिहास में बहुत प्राचीन है, और वह अपना सम्बन्ध प्राचीन यदुवंशी क्षत्रियों से मानता था। राष्टकूटों और चालुक्यों के उत्कर्ष काल में यादव वंश के राजा अधीनस्थ सामन्त राजाओं की स्थिति रखते थे। पर जब चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई तो वे स्वतंत्र हो गए, और वर्त्तमान हैदराबाद के क्षेत्र में स्थित देवगिरि (दौलताबाद) को केन्द्र बनाकर उन्होंने अपने उत्कर्ष का प्रारम्भ किया।

1187 ई. में यादव राजा भिल्लम ने अन्तिम चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर भी अधिकार कर लिया। इसमें सन्देह नहीं, कि भिल्लम एक अत्यन्त प्रतापी राजा था, और उसी के कर्त्तृत्व के कारण यादवों के उत्कर्ष का प्रारम्भ हुआ था। पर शीघ्र ही भिल्लम को एक नए शत्रु का सामना करना पड़ा। द्वारसमुद्र (मैसूर) में यादव क्षत्रियों के एक अन्य वंश का शासन था, जो होयसाल कहलाते थे। चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर दक्षिणापथ में जो स्थिति उत्पन्न हो गई थी, होयसालों ने भी उससे लाभ उठाया, और उनके राजा वीर बल्लाल द्वितीय ने उत्तर की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए भिल्लम के राज्य पर भी आक्रमण किया। वीर बल्लाल के साथ युद्ध करते हुए भिल्लम ने वीरगति प्राप्त की, और उसके राज्य पर जिसमें कल्याणी का प्रदेश भी शामिल था, होयसालों का अधिकार हो गया। इस प्रकार 1191 ई. में भिल्लम द्वारा स्थापित यादव राज्य का अन्त हुआ।

पर इस पराजय से यावद वंश की शक्ति का मूलोच्छेद नहीं हो गया। भिल्लम का उत्तराधिकारी जैत्रपाल प्रथम था, जिसने अनेक युद्धों के द्वारा अपने वंश के गौरव का पुनरुद्धार किया। होयसालों ने कल्याणी और देवगिरि पर स्थायी रूप से शासन का प्रयत्न नहीं किया था, इसलिए जैत्रपाल को फिर से अपने राज्य के उत्कर्ष का अवसर मिल गया। उसका शासन काल 1191 से 1210तक था। अपने पड़ोसी राज्यों से निरन्तर युद्ध करते हुए जैत्रपाल प्रथम ने यादव राज्य की शक्ति को भली-भाँति स्थापित कर लिया।

जैत्रपाल प्रथम का पुत्र सिंघण (1210-1247) था। वह इस वंश का सबसे शक्तिशाली प्रतापी राजा हुआ है। 37 वर्ष के अपने शासन काल में उसने चारों दिशाओं में बहुत से युद्ध किए, और देवगिरि के यादव राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दिया। होयसाल राजा वीर बल्लाल ने उसके पितामह भिल्लम को युद्ध में मारा था, और यादव राज्य को बुरी तरह से आक्रान्त किया था। अपने कुल के इस अपमान का प्रतिशोध करने के लिए उसने द्वारसमुद्र के होयसाल राज्य पर आक्रमण किया, और वहाँ के राजा वीर बल्लाल द्वितीय को परास्त कर उसके अनेक प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। होयसाल राजा कि विजय के बाद सिंघण ने उत्तर दिशा में विजय यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गुजरात पर उसने कई बार आक्रमण किए, और मालवा को अपने अधिकार में लाकर काशी और मथुरा तक विजय यात्रा की। इतना ही नहीं, उसने कलचुरी राज्य को परास्त कर अफ़ग़ान शासकों के साथ भी युद्ध किए, जो उस समय उत्तरी भारत के बड़े भाग को अपने स्वत्व में ला चुके थे।
कोल्हापुर के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब और पांड्य देश के राजाओं को भी सिंघण ने आक्रान्त किया, और अपनी इन दिग्विजयों के उपलक्ष्य में कावेरी नदी के तट पर एक विजयस्तम्भ की स्थापना की। इसमें सन्देह नहीं, कि यादव राज सिंघण एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करने में सफल हुआ था, और न केवल सम्पूर्ण दक्षिणापथ अपितु कावेरी तक का दक्षिणी भारत और विंध्याचल के उत्तर के भी कतिपय प्रदेश उसकी अधीनता में आ गए थे। सिंघण न केवल अनुपम विजेता था, अपितु साथ ही विद्वानों का आश्रयदाता और विद्याप्रेमी भी था। संगीतरत्नाकर का रचयिता सारंगधर उसी के आश्रय में रहता था। प्रसिद्ध ज्योतिषी चांगदेव भी उसकी राजसभा का एक उज्जवल रत्न था। भास्कराचार्य द्वारा रचित सिद्धांतशिरोमणि तथा ज्योतिष सम्बन्धी अन्य ग्रंथों के अध्ययन के लिए उसने एक शिक्षाकेन्द्र की स्थापना भी की थी।

सिंघण के बाद उसके पोते कृष्ण (1247-1260) ने और फिर कृष्ण के भाई महादेव (1260-1271) ने देवगिरि के राजसिंहासन को सुशोभित किया। इन राजाओं के समय में भी गुजरात और शिलाहार राज्य के साथ यादवों के युद्ध जारी रहे। महादेव के बाद रामचन्द्र (1271-1309) यादवों का राजा बना। उसके समय में 1294 ई. में [[दिल्ली] के प्रसिद्ध अफ़ग़ान विजेता अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी भारत में विजय यात्रा की। इस समय देवगिरि का यादव राज्य दक्षिणापथ की प्रधान शक्ति था। अतः स्वाभाविक रूप से अलाउद्दीन ख़िलज़ी का मुख्य संघर्ष यादव राजा रामचन्द्र के साथ ही हुआ। अलाउद्दीन जानता था, कि सम्मुख युद्ध में रामचन्द्र को परास्त कर सकना सुगम नहीं है। अतः उसने छल का प्रयोग किया, और यादव राज के प्रति मैत्रीभाव प्रदर्शित कर उसका आतिथ्य ग्रहण किया। इस प्रकार जब रामचन्द्र असावधान हो गया, तो अलाउद्दीन ने उस पर अचानक हमला कर दिया। इस स्थिति में यादवों के लिए अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखना असम्भव हो गया, और रामचन्द्र ने विवश होकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी के साथ सन्धि कर ली। इस सन्धि के परिणामस्वरूप जो अपार सम्पत्ति अफ़ग़ान विजेता ने प्राप्त की, उसमें 600 मन मोती, 200 मन रत्न, 1000 मन चाँदी, 4000 रेशमी वस्त्र और उसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य उपहार सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त रामचन्द्र ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी को वार्षिक कर भी देना स्वीकृत किया। यद्यपि रामचन्द्र परास्त हो गया था, पर उसमें अभी स्वतंत्रता की भावना अवशिष्ट थी। उसने ख़िलज़ी के आधिपत्य का जुआ उतार फैंकने के विचार से वार्षिक कर देना बन्द कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को उस पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफ़ूर का सामना करने में रामचन्द्र असमर्थ रहा, और उसे गिरफ़्तार करके दिल्ली भेज दिया गया। वहाँ पर ख़िलज़ी सुल्तान ने उसका स्वागत किया, और उसे रायरायाओ की उपाधि से विभूषित किया। अलाउद्दीन रामचन्द्र की शक्ति से भली-भाँति परिचित था, और इसीलिए उसे अपना अधीनस्थ राजा बनाकर ही संतुष्ट हो गया। पर यादवों में अपनी स्वतंत्रता की भावना अभी तक भी विद्यमान थी।

रामचन्द्र के बाद उसके पुत्र शंकर ने ख़िलज़ी के विरुद्ध विद्रोह किया। एक बार फिर मलिक काफ़ूद देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए गया, और उससे लड़ते-लड़ते शंकर ने 1312 ई. में वीरगति प्राप्त की। 1316 में जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई, तो रामचन्द्र के जामाता हरपाल के नेतृत्व में यादवों ने एक बार फिर स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। हरपाल को गिरफ़्तार कर लिया गया, और अपना रोष प्रकट करने के लिए सुल्तान मुबारक ख़ाँ ने उसकी जीते-जी उसकी ख़ाल खिंचवा दी। इस प्रकार देवगिरि के यादव वंश की सत्ता का अन्त हुआ, और उनका प्रदेश दिल्ली के अफ़ग़ान साम्राज्य के अंतर्गत आ गया।

साभार : भारत कोश

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

आई.ए.एस. राजेश यादव को राष्ट्रीय पुरस्कार

राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने नई दिल्ली में 25 जनवरी को भारत के निर्वाचन आयोग के डॉयमण्ड जुबली समापन समारोह में राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विशिष्ट सचिव और अजमेर के पूर्व जिला कलक्टर राजेश यादव को निर्वाचन कार्यो में सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से नवाचारों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। पुरस्कार में उन्हें एक लाख रूपये नकद एक ट्राफी और प्रमाण पत्र दिया गया.

राजेश यादव को यह पुरस्कार जिला निर्वाचन अधिकारी अजमेर के पद पर सेवायें देते हुए चुनावी तंत्र में सुधार के लिए ऑन लाईन भुगतान सिस्टम विकसित कर उसे लागू करवाने का प्रयोग करने के लिए दिया गया है। इसके लिए उन्होंने गत लोकसभा चुनाव कार्य में लगाये गये अजमेर जिले के सभी 9211 अधिकारियों और कर्मचारियों के एकाउण्ट्स लेकर उनके टी.ए.डी.ए. बिल की राशि को उनके व्यक्तिगत खातों में एडवांस में ऑन लाईन भुगतान जमा करवाया। उन्होंने यह कार्य जिले की नॉडल बैंक के माध्यम से 32 बैको की 221 ऑन लाईन और 59 ऑफ लाईन शाखाओं के माध्यम से किया। इसी प्रकार जिला परिषद एवं पंचायतों के चुनाव तथा नगर निगम के चुनाव में ब्लॉक लेवल अधिकारियों से एस.एम.एम. पर मतदान प्रतिशत और मतगणना की जानकारी हासिल कर उसका ऑन लाईन प्रसारण करवाने जैसे प्रयोग किए। इस प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से उन्होंने चुनावी तंत्र में सुधार के लिए अभिनव प्रयोग किए जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय चुनाव आयोग ने अपने हीरक जंयती समापन समारोह और बेहतर चुनाव पद्धति पर आयोजित दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ चुनाव पद्धति ईजाद करने वाले अधिकारी के रूप में राजस्थान के आई.ए.एस. अधिकारी राजेश यादव को पूरे देश से राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना।

उल्लेखनीय है कि भारत के निर्वाचन आयोग ने देश के सभी राज्यों और केन्द्रीय शासित राज्यों को पांच भागों में बांट कर इन सभी जोन से श्रेष्ठ चुनाव पद्धति पर प्रस्तुतीकरण करवाये थे। जिसमें नॉर्थ जोन से राजस्थान के राजेश यादव को सभी जोन्स में प्रथम चुना गया और उन्हें एक लाख रूपये के नकद राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की गई। समारोह में पुरूस्कृत किये गये अन्य क्षेत्रीय जोन्स के सात अधिकारियों को 25-25 हजार रूपये का नकद पुरस्कार और ट्रॅाफी प्रदान की गई। उल्लेखनीय है कि यादव को अजमेर जिला कलक्टर महानरेगा के क्रियान्वयन का श्रेष्ठ कार्य करने के लिए गत वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिल चुका है। यादव ने पिछले दिनों दिल्ली में मतदान दल कर्मियों के लिए ऑनलाईन भुगतान पद्धति का प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने इस पद्धति का सोर्स कोड भी भारत के निर्वाचन आयोग को सौंपा है, ताकि चुनावी तंत्र में सुधार के लिए ऑन लाईन भुगतान की इस पद्धति को देशभर में लागू किए जाने की कवायद हो सके।

समारोह में राष्ट्रपति के पति देवीसिंह पाटिल, केंद्रीय मंत्री विधि एवं न्यायमंत्री एम.वीरप्पा मोइली, सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती अम्बिका सोनी, साख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री डॉ. एम.एस. गिल और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगोडा के साथ ही भारत के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. एस.वाय. कुरेशी और देश-विदेश के जनप्रतिनिधि एवं अधिकारीगण मौजूद थे।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

न्यायिक और साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय : डा0 रामलखन सिंह यादव


यदुवंश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. यत्र-तत्र बिखरे यदुवंशियों की प्रतिभा को एक जगह पर लाने के लिए ही 'यदुकुल' ब्लॉग आरंभ किया गया था. ऐसे ही एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं- डा0 रामलखन सिंह यादव, जो न सिर्फ न्यायिक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं, बल्कि एक संवेदनशील साहित्यकार के रूप में भी समाज को राह दिखा रहे हैं. स्व. रामबिलास यादव और स्व. लाची देवी के सुपुत्र रूप में 2 मार्च 1956 को अपने ननिहाल पड़री बजार, भटनी, देवरिया (उ.प्र.) में जन्मे रामलखन यादव छात्र जीवन में अव्वल दर्जा के विद्यार्थी रहे और उन्होंने एम.ए.(मनोविज्ञान), पी.एच.डी., एल.एल.बी., पी.जी.डी.एच.आर. की उपाधियाँ ग्रहण कीं. जीवन के एक मोड़ पर डा. कुसुम लखन से मई 21, 1985 को बछउर देवरिया में उनका विवाह संपन्न हुआ. आपकी पत्नी सात्विक विचारों की हैं और आपको सदैव प्रोत्साहित भी करती रहती हैं. आपकी तीन संतान हैं- प्राची, मेधा एवं स्वर्ण सिंह।

डा0 रामलखन सिंह यादव की कई कृतियाँ अब तक प्रकाशित हो चुकीं हैं, जिन्हें काफी सराहना भी मिली है. इनमें दो शोध-प्रबंध (अंग्रेजी में, 2000 एवं 2005), लाजवन्ती के फूल (2005) काव्य-संग्रह,कटघरे में श्रीराम (2006) काव्य-संग्रह,टू स्वामी रामदेव (2006) काव्य-संग्रह (अंग्रेजी), उठो सिद्धार्थ (2007) काव्य-संग्रह, बिका हुआ फैसला (2008) कहानी-संग्रह,आ रही सुनामी (2009) काव्य-संग्रह,पूरी धरती अधूरे लोग (2010) संस्मरण-रिपोर्ताज का नाम प्रमुख है. इसके अलावा आपकी शीघ्र प्रकाश्य कृतियों में हमें चाहिए लाल किला (उपन्यास) और हनुमान आ गये हैं (महाकाव्य) शामिल हैं. आप कविताएं, कहानियाँ, लेख, समीक्षाएँ इत्यादि लगभग सभी विधाओं में बखूबी लिख रहे हैं. आपकी रचनाएँ देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं-आज (पटना), हिंदुस्तान (पटना), आर्यावर्त (पटना), चंपारण-विचार (मोतीहारी), अक्षरगंधा (समस्तीपुर), कंचनलता (खेंतड़ीनगर, झुंझुनू), संसार (2007), अंतर्राष्ट्रीय काव्य-संग्रह, मथुरा, मंथन, स्मृतियों के सुमन, कवर्धा (छ.ग.) इत्यादि.

डा0 रामलखन सिंह यादव की साहित्यिक प्रतिभा के मद्देनजर तमाम प्रतिष्ठित संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित और अलंकृत भी किया है. इन्में लाला जगत ज्योति प्रसाद स्मृति-सम्मान, मुंगेर, 2006, स्व. हरि ठाकुर स्मृति-सम्मान, कवर्धा, छत्तीसगढ़, 2006, विद्यासागर (डी. लिट्.) की मानद उपाधि, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, ईशीपुर, भागलपुर (बिहार), 2007, राष्ट्रीय शिखर साहित्य-सम्मान, 2008,भारतीय साहित्यकार संसद, समस्तीपुर, बिहार, राष्ट्रभाषा आचार्य, 2007 ई. राष्ट्रीय सम्मान के लिए चयनित, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनंदन समिति, बिहारीपुरा, मथुरा, उत्तर प्रदेश,काव्य-भूषण, 2008, पुष्पगंधा प्रकाशन, कवर्धा, छत्तीसगढ़, हिंदी का होमर, 2008, अ. भा. सा. अभिनंदन समिति, मथुरा, उत्तर प्रदेश जैसे तमाम सम्मान और मानद उपाधियाँ शामिल हैं।

स्थायी पता -डा0 रामलखन सिंह यादव, ग्रा. चकउर फकीर, पो. पिपरा दीक्षित, वाया-भटनी, जिला-देवरिया (उ.प्र.) पिन-274701

संपर्क/ संप्रतिः अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-9,सिविल कोर्ट, पटना-800004 (बिहार)

सोमवार, 31 जनवरी 2011

विश्व कप क्रिकेट 2011 के थीम गीत के गीतकार मनोज यादव

एक और उभरता हुआ यदुवंशी अपना जौहर दिखने को तैयार है. ये हैं मनोज यादव. गौरतलब है कि
बॉलीवुड की संगीतकार जोड़ी शंकर, एहसान और लॉय ने क्रिकेट विश्व कप 2011 के लिए थीम सौंग तैयार किया. थीम सौंग के बोल ‘दे घुमा के..’ है. ‘दे घुमा के..’ के गीतकार मनोज यादव हैं. इस गीत को 1 जनवरी 2011 को लॉन्च किया गया.

राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिबली नोमानी और कैफी आजमी की धरती आजमगढ़ सदैव सुर्ख़ियों में रहती है, पर इस बार एक बेहद रचनात्मक और जोशीले वजह से। दरअसल देश में खेल से ज्यादा जुनून का दर्जा प्राप्त क्रिकेट के महाकुम्भ आईसीसी के थीम सांग लिखने का गौरव आजमगढ़ जिले के सपूत मनोज यादव को हासिल हुआ है।मनोज यादव के लिखे गीत को शंकर महादेवन ने गया है और संगीतबद्ध किया शंकर-एहसान-लाय ने। बरास्ता मनोज यादव, आजमगढ़वासी अपनी ओर अंगुली उठाने वालों को एक संदेश भी दे रहे हैं और कह रहे हैं......दे घुमा के.....!

‘दे घुमा के....आसमान में मार के डुबकी, उड़ा दे सूरज की झपकी, सर्र से चीर हवा का पर्दा बाँध ले पट्ठे जमके गर्दा.....‘ आजमगढ़ के वासी मनोज यादव के दिलो-दिमाग में जन्मा यह गीत देश को आज एक ऊर्जा, एक जोश दे रहा है। इससे आजमगढ़ की फिजां बदली-बदली सी नजर आ रही है। अब यहाँ सृजनात्मकता है, जोश है, देश की माथे की बिन्दी बनने का जज्बा है। जिले के सगड़ी तहसील के भरौली गाँव निवासी मनोज यादव की उपलब्धि पर पूरे जिले को नाज है।

बताए हैं कि मनोज यादव के पिता स्व0 हरिश्चन्द्र यादव जब मुम्बई गये थे तो उनकी आखों में तमाम सपने थे। दो पुत्रों मनोज व प्रमोद व एक पुत्री पुष्पा के पिता हरिश्चन्द्र रेमण्ड कम्पनी में सुपरवाइजर बनें। मनोज यादव ने पिता के सपनों को साकार करना सीखा और उतर गए फिल्मों-विज्ञापनों के लिए गीत व जिंगल लिखने में। गुलजार को प्रेरणा स्रोत मानने वाले मनोज की प्रतिभा को गायक शंकर महादेवन ने पहचाना और शंकर-एहसान-लाय के कहने पर ओ एण्ड एम कम्पनी ने आईसीसी वल्र्ड कप के थीम सांग को लिखने का जिम्मा सौंपा, जिसे मनोज ने बखूबी पूरा किया। गौरतलब है कि क्रिकेट विश्व कप 2011 का आयोजन भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 19 फरवरी 2011 से हो रहा है. इसलिए इस गीत को हिंदी, बांग्ला और सिंहली भाषाओं में तैयार किया गया.

'यदुकुल' की तरफ से मनोज यादव को इस सृजनात्मक उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

ओमवीर यादव ने बनाया विमान

कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। इस कहावत को राजस्थान के सोरवा गांव के ओमवीर यादव ने एक वायुयान बना कर सही साबित कर दिया है। छोटे से गांव व साधारण किसान परिवार में जन्में 21 वर्षीय ओमवीर यादव ने कबाड़ से जुगाड़ वाली तकनीक अपनाकर यह विमान तैयार किया है। विमान को तैयार करने में उसे एक साल का समय लगा है। ओमवीर यादव ने उक्त विमान का प्रदर्शन गांव नसीबपुर स्थित राव तुलाराम शहीदी स्मारक पर किया। विमान को देखने के लिए भारी संख्या में लोग आए हुए थे। विमान में फिलहाल चालक व एक अन्य व्यक्ति बैठ सकता है।

ओमवीर यादव के नाना व साहित्यकार जसवंत प्रभाकर ने बताया कि ओमवीर का चयन 2008 में आईआईटी में हो गया था। उसकी रूचि कुछ नया करने की थी, जिसके कारण उसने गहन अध्यन व प्रयोग कर कम लागत से विमान तैयार किया है। ओमवीर ने बताया कि इस विमान में चालक के अलावा एक अन्य व्यक्ति बैठ सकता हैं। इसका वजन कुल 280 किलोग्राम है। उन्होंने यह जेट एक साल में तैयार किया है और उनको दसवीं बार में यह विमान तैयार करने में सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि उसके प्रयोग में अभी तक करीब 20 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। वहीं इस विमान के निर्माण में 50 हजार रुपये का खर्चा आया है। ओमवीर यादव के अनुसार जेट में मारुति जिप्सी का एक हजार सीसी का इंजन लगा हुआ है। जिसकी क्षमता 46 होर्स पावर है। ओमवीर ने दावा किया कि उसका जेट दो हजार मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकता है। वहीं उसकी गति 150 किलोमीटर प्रति घंटा है। उसने बताया कि इसका प्रयोग विशाल भू-भाग के कृषि क्षेत्रों में कीटनाशक दवाओं के छिड़काव को अल्प समय में तथा प्राकृतिक आपदाओं में संकट के समय जीव रक्षा व राहत सामग्री पहुंचाने में कर सकते हैं। उसने बताया कि उनका लक्ष्य अब छह व आठ सीट वाला विमान बनाने का है। वहीं उसे बोइंग विमान कंपनी से जॉब का भी आफर मिल चुका है।

इस अद्भुत कार्य के लिए ओमवीर यादव को 'यदुकुल' की तरफ से हार्दिक बधाइयाँ !!

(फेसबुक पर हितेंद्र सिंह यादव द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी..)

बुधवार, 26 जनवरी 2011

!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!


!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

बलिराम भगत : स्वतंत्रा सेनानी, पत्रकार, लेखक और राजनेता

भारतीय राजनीति ने फिर अपना एक गौरव पुत्र खो दिया है. । देश रत्न श्री बलिराम भगत पर भारत को गर्व था । देश रत्न श्री बलिराम भगत एक मेधावी छात्र , स्वतंत्रा सेनानी, पत्रकार , लेखक, राज्यपाल, विदेश मंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, आदि आदि थे ।

बिहार के समस्तीपुर के मूल निवासी देश रत्न श्री बलिराम भगत का जन्म ०७-१०-१९२२ को हुआ । पटना कॉलेज से स्नातक और पटना विश्वविध्यालय से ही अर्थशास्त्र में परास्नातक किया। उस वक्त परास्नातक करना बहुत बड़ी बात थी। १९३९ में मात्र १७ वर्ष के नाबालिग उम्र में स्वतंत्रा संग्राम की लड़ाई लड़ने भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल हो गए । १९४२ में भारत छोडो आन्दोलन में शामिल होने कॉलेज त्याग दिया। जबकि श्री भगत पटना विश्वविध्यालय के मेधावी छात्र थे। देश रत्न श्री बलिराम भगत १९४६ में कांग्रेस के महासचिव बनाये गए । श्री भगत १९४७ में पटना से राष्ट्र दूत नमक हिंदी पत्रिका शुरू किया। समाचार पत्रों में आर्थिक, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मामलो पर नियमित रूप से लिखते रहे। देश रत्न श्री बलिराम भगत ने अंतराष्ट्रीय विषयों पर कई पुस्तक लिखे। उनके लेखन से तत्कालीन कई राजनेता लेखक प्रभावित थे। देश रत्न श्री बलिराम भगत की प्रतिभा का उपयोग कांग्रेस ने जमकर किया। श्री भगत अंतराष्ट्रीय मामलो के कुशल जानकार थे। वे जितने बेहतर लेखक थे उतने ही बेहतर वक्ता भी थे। श्री भगत विभिन्न अंतराष्ट्रीय मंचो पर भारतीय संसद का प्रतिनिधित्व करते रहे । इन्स्ताबुल,लन्दन,कोलोम्बो और जापान में श्री भगत ने अपने कुशल भाषण से सभी को प्रभावित किया था।

देश रत्न श्री बलिराम भगत पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की सरकार में भारत सरकार में विदेश मंत्री रहे । श्री भगत हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के राज्यपाल के रूप में देश के सेवा करते रहे । पांचवी लोकसभा के अध्यक्ष बन उन्होंने साबित किया योग्यता की परिभाषा क्या होती है। श्री भगत की योग्यता का लोहा पूर्व प्रधानमंत्री नेहरु, इंदिरा भी मानती थी। देश रत्न श्री भगत हम सब को छोड़कर ०२ जनवरी २०११ में चले गए । पर एक ऐसी नजीर गढ़ गए जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-पुंज बनी रहेगी !!

वंदना यादव

सोमवार, 24 जनवरी 2011

बलिराम भगत का जाना...

राजनीति में तमाम यदुवंशी प्रखरता से काम कर रहे हैं. यही कारण है कि अब तक यदुवंश से 9 मुख्यमंत्री हो चुके हैं. पर अब तक मात्र दो लोगों को राज्यपाल बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है- गुजरात में महिपाल शास्त्री (2 मई 1990- 21 दिसंबर 1990) एवं हिमाचल प्रदेश व राजस्थान में बलिराम भगत (क्रमशः 11 फरवरी 1993-29 जून 1993 व 20 जून 1993-1 मई 1998). यह बताना इसलिए प्रासंगिक हो गया क्योंकि लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष और हिमाचल एवं राजस्थान के पूर्व राज्यपाल बलिराम भगत (89) का इस साल के आरंभ में ही 2 जनवरी, 2011 को निधन हो गया। गौरतलब है कि भगत जी का निधन शरीर के कई अंगों के काम बंद कर देने के कारण हुआ। वे कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और अपोलो अस्पताल में उनका देहावसान हुआ.

बलिराम भगत का जन्म सात अक्टूबर 1922 को पटना (बिहार) में हुआ। पटना से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद भगत ने पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। भगत 17 वर्ष की आयु में एक छात्र के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए। स्वतंत्रता के बाद वह प्रथम लोकसभा के लिए चुने गए। वह लोकसभा में सात बार चुनकर आए।वह पहली कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री के संसदीय सचिव के रूप में सेवा दी और उन्हें वर्ष 1956 में उप वित्त मंत्री बनाया गया। वर्ष 1969 में केंद्रीय मंत्री बनाए जाने से पहले उन्होंने योजना, रक्षा और विदेश राज्य मंत्री के रूप में काम किया। भगत 5 जनवरी 1976 को आपातकाल में लोकसभा अध्यक्ष चुने गए थे। वे इस पद पर एक साल तक रहे। वह वर्ष 1993 में थोड़े समय के लिए हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल और वर्ष 1993 से 1998 तक राजस्थान के राज्यपाल रहे। उनके परिवार में पत्नी विद्या भगत, एक बेटा और एक बेटी हैं।

बलिराम भगत के निधन पर अपने शोक संदेश में प्रधानमंत्री ने उन्हें, "एक स्वतंत्रता सेनानी, महान देशभक्त और लोगों के लिए समर्पित एक वरिष्ठ राजनेता बताया।" प्रधानमंत्री ने कहा, "मैंने अपना एक बहुत ही करीबी मित्र और महत्वपूर्ण सहयोगी खो दिया।" लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कहा कि भगत के निधन से उन्हें 'अत्यंत दुख' पहुंचा है। उन्होंने कहा, "भगत स्वतंत्र भारत के उन नेताओं में से थे जिन्होंने आजादी के बाद देश का मार्गदर्शन किया और अपनी राजनीतिक भागीदारी से लोकतंत्र को सशक्त बनाया।" लोकसभा अध्यक्ष ने कहा, "भगत के निधन से हमने भारत के एक योग्य पुत्र को खो दिया।
यदुकुल की तरफ से बलिराम भगत जी को श्रद्धांजलि और नमन !!

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

न्याय के क्षेत्र में विश्व कीर्तिमान : न्यायमूर्ति रवीन्द्र सिंह

न्याय सिर्फ होता नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए। इसके लिए जरूरी है न्यायिक प्रक्रिया की समझ, त्वरित निर्णय की क्षमता एवं संवेदनशीलता। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री रवीन्द्र सिंह ऐसी ही प्रतिभा के व्यक्तित्व हैं। आरंभ से ही मेधावी रहे श्री सिंह हमेशा चीजों को मानवीय पहलू से देखते हैं और उनके निर्णय वाकई मील का पत्थर होते हैं। तभी तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह ने अपने निर्णयों के मामले में ख्याति ही नहीं अर्जित की बल्कि विश्व में कीर्तिमान भी स्थापित किया है। यहाँ तक कि उनकी इस उपलब्धि का गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी इसका उल्लेख है। न्यायमूर्ति सिंह ने तो लगभग 1 लाख मुकदमों का निस्तारण किया है पर जुलाई 2009 से जुलाई 2010 तक एक साल की अवधि में उन्होंने 29,395 मुकदमें निस्तारित किये हैं जो कि अपने आप में विश्व रिकार्ड है। इस उपलब्धि के लिए जहां तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस रिबेरो ने उन्हें बधाई दी बल्कि उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज होने के लिए संस्तुति भी किया, जो कि अंतत: फलीभूत भी हुआ.

वर्ष 2005 में न्यायमूर्ति का पद सँभालने वाले रवींद्र सिंह का जन्म 2 जुलाई 1953 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद में मेदेपुर गाँव में श्री संकट बिहारिया यादव के पुत्र रूप में हुआ. साधारण किसान परिवार में जन्मे न्यायमूर्ति यादव की प्रारंभिक शिक्षा ग्राम मेदेपुर, जीआईसी मैनपुरी, एनडी कालेज शिकोहाबाद और उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई।श्री सिंह 1978 में बार काउंसिल आॅफ उत्तर प्रदेश में अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत हुए और 24 अगस्त 1994 से 1995 तक शासकीय अधिवक्ता रहे. बाद में उन्हें 19 सितंबर 2003 को अपर महाधिवक्ता तथा 24 सितंबर 2004 को एडिशनल जज के रूप में नियुक्ति मिली और 18 अगस्त 2005 को वह परमानेंट हो गये।

यदुवंश परिवार में जन्म लेकर न सिर्फ श्री रवींद्र सिंह ने देश के सबसे बड़े उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति का पद संभाला बल्कि न्यायिक क्षेत्र में ऐसा विशिष्ट कीर्तिमान स्थापित किया की आज भी दुनिया उनका लोहा मानती है. 'यदुकुल' की तरफ से न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह को बधाइयाँ और आशा की जानी चाहिए कि वे इसी तरह समाज में प्रेरणा-स्रोत बने रहेंगें !!

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

स्मृति शेष 'बालेश्वर यादव' ...बस यादें रह गईं

* निक लागे तिकुलिया गोरखपुर के
* मनुआ मरदुआ सीमा पे सोये, मौगा मरद ससुरारी मे.
* कजरा काहें न देहलू
* फुलौड़ी बिना चटनी कइसे बनी
* सात सहेलिया खड़ी खड़ी
* रोज रोज ससुरा दारु पियत है
* कटहर के कोवा तू खइलऽ त ई मोटकी मुगरिया के खाई.

अगर आपो लोगन में से केहू ई गाना के ऊपर मस्ती से झुमल होखे या ई गाना कै शौक़ीन रहल होये तै अब ई आवाज अब कबहू न सुनाई देई. काहें से की ई मशहूर गाना कै गवैया बालेश्वर यादव जी अब ई दुनिया से जा चुकल बटे.

रविवार ०९ जनवरी २०११ को इन्होने लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में आखिरी साँस ली, जहाँ ये कुछ समय से इलाज के लिये भर्ती थे। १ जनवरी १९४२ को आजमगढ़ - मऊ क्षेत्र के मधुबन कस्बे के पास चरईपार गाँव में जन्मे, बालेश्वर यादव भोजपुरी के मशहूर बिरहा और लोकगायक थे.

अई...रई... रई...रई... रे, के विशेष टोन से गीतों को शुरू करने वाले बालेश्वर ने अपने बिरहा और लोकगीतों के माध्यम से यू. पी.- बिहार समेत पूरे भोजपुरिया समाज के दिलों पर वर्षों तक राज किया. वे जन जन के ये सही अर्थों में गायक थे. इनके गीत " निक लागे तिकुलिया गोरखपुर के " ने एक समय पुरे पूर्वांचल में काफी धूम मचाई थी.जन जन में अपनी गायकी का लोहा मनवाने वाले इस गायक पर मार्कंडेय जी और कल्पनाथ राय जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों की नज़र पड़ी तो तो यह गायक गाँव- गाँव की गलियों से निकलकर शहरों में धूम मचाने लगा और कल्पनाथ राय ने अपने राजनितिक मंचों से लोकगीत गवाकर इन्हें खूब सोहरत दिलवाई. बालेश्वर यादव २००४ में देवरिया के पडरौना लोकसभा सीट से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीतकर लोकसभा में भी पहुंचे. इनके गाये गानों पर नयी पीढ़ी के गायक गाते हुए आज मुंबई में हीरो बन प्रसिद्धि पा गये, मगर ये लोकगायक इन सबसे दूर एक आम आदमी का जीवन जीता रहा. ये आम लोंगों के गायक थे और उनके मन में बसे थे. अभी हाल में ही आजमगढ़ के रामाशीष बागी ने महुआ चैनल के सुर संग्राम में इनके गाये गीतों पर धूम मचा दी थी.

भोजपुरी के उत्थान और प्रचार -प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान है. इनके गीत न केवल अपने देश में ही प्रसिद्ध हुए बल्कि जहाँ भी भोजपुरिया माटी के लो जाकर बस गए , वहाँ भी इन्हें गाने के लिये बुलाया जाता रहा. इन्होने अपने भोजपुरी गीतों का डंका सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, मारीशस, फिजी, हौलैंड इत्यादि देशो में भी बजाया . सन १९९५ में बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु 'यश भारती सम्मान 'से सम्मानित किया था.
इनके गाये कुछ और भोजपुरी लोकगीत इस लिकं पर क्लिक करके सुने जा सकते है
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आज जबकि भोजपुरी लोक-संगीत अपनी अस्मिता की लड़ाई में संघर्षरत है,वैसे में बालेश्वर यादव जैसे लोक-गायक के असमय निधन से भोजपुरी अंचल और इसके लोकसंगीत को अपूरणीय क्षति हुई है.बालेश्वर यादव भोजपुरी समाज और भाषा के महेंद्र मिश्र वाली परंपरा के लोक कलाकार थे.श्री यादव लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में कुछ समय से इलाज़ हेतु भर्ती थे.बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने 'उनके लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु 'यश भारती सम्मान'से नवाज़ा था.इतना ही नहीं बालेश्वर पुरस्कारों की सरकारी लिस्ट के गायक नहीं बल्कि सही मायनों में जनगायक थे,उन्होंने भोजपुरी के प्रसार के अगुआ के तौर पर देश-विदेश में पहचाने गए.ब्रिटिश गुयाना,त्रिनिदाद,मारीशस,फिजी,सूरीनाम,हौलैंड इत्यादि देशो में मशहूर बालेश्वर यादव जी के मौत भरत शर्मा,मदन राय,प्रो.शारदा सिन्हा, आनंद मोहन,गोपाल राय जैसे गायकों को भोजपुरी अस्मिता में उनका साथ देने वाले एक स्तम्भ के गिरने जैसा है.ईश्वर बालेश्वर यादव जी की आत्मा को शांति दे और भोजपुरी गीत संगीत से बलात्कार करने वाले सड़कछाप गायकों को सद्बुद्धि दे !!
चित्र साभार : भोजपुरिया. com

बुधवार, 5 जनवरी 2011

जब शिव गये श्रीकृष्ण की शरण में

ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड में शिव के अंहकार को भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा चूर किये जाने की कथा विस्तार से दिया गया है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्येक लीला से शिक्षा मिलती है। जरूरत है श्रीकृष्ण के प्रत्येक कार्य पर विचार करने का जो मानव समाज के लिये आॅक्सीजन का काम करता है। मेरे निजि विचार से श्रीकृष्ण के कार्य को समझने की शक्ति आज के परिवेश में भी केवल प्रकाण्ड विद्वान और सकारात्मक सोच रखने वालों में ही होता है।

भगवान श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधारानी के पूछे जाने पर बतलाते हैं ब्रह्माण्डों में जिन लोगों को अपनी शक्ति पर अंहकार होता है उस पर में शासन कर अंहकार को ध्वस्त कर देता हूँ। एक समय की बात है वृक नामक दैत्य ने शिव के केदारतीर्थ में एक वर्ष तक दिन-रात कठोर तपस्या कर वर माँगा कि प्रभो मैं जिसके माथे पर हाथ रख दूँ वह जलकर भस्म हो। शिव न वर दे दिया। वृक शिव के ही माथे पर हाथ रखने को भागा। मृत्युंजय नाम से चर्चित शिव भी मृत्यु के डर से भागने लगे। शिव के हाथ से डमरू गिर पडा़। शिव ने जो ण्याघ्रचर्म पहना हुआ था वह भी गिर गया। शिव को लगने लगा मृत्यु निश्चित है। भागत-भागते शिव के कण्ठ, ओठ और तालु भी सुख गये। शिव भय से हे कृष्ण रक्षा करो, रक्षा करो बोलते भाग रहे थे। शिव मेरे ही शरण में आये। तभी दैत्य भी पहुँचा मैंने उस दैत्य से कहा वृक ये जो तुम्हें वरदान शिव ने दिया है इसको परख तो लो। अपने ही सिर पर हाथ रखकर परख लो। वृक ने ऐसा ही किया और शिव की रक्षा हो गयी।

शिव इस घटना के बाद बहुत ही लज्जित हो गयें शिव का अंहकार बुरी तरह चूर-चूर हो गया। मैंने शिव को समझाया। एक बार फिर शिव अंहकार से भरे हुए भयानक असुर त्रिपुर का वध करने के लिए गये। शिव मन ही मन यह समझ रहे थे कि वे संहारक है।

शिव युद्व भूमि में चले तो गये पर मेरे ही द्वारा दिये गये त्रिशुल और कृष्ण-कवच साथ नहीं ले गये। भयानक युद्व हुआ और दैत्यराज ने शिव को उठाकर जमीन पर दे मारा। भय के कारण शिव ने एक बार फिर हे कृष्ण मेरी रक्षा करो पुकारने लगे तब मैंने शिव की रक्षा कर उन्हें त्रिशुल और कृष्ण-कवच दिया जिससे दैत्य का वध हो सका। इसके बाद शिव लज्जापूर्वक मेरी स्तुती किया। इस घटना के बाद शिव भी अंहकार का परित्याग कर दिया।

इस प्रकार शिव का अंहकार समाप्त हुआ। अंहकार और लापरवाही से ही शिव को भी मृत्यु सामने नजर आने लगा। शिव ने भी भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा और उनकी रक्षा हो गई। इस कहानी से हमें भी सीख लेनी चाहिए कि हम अंहकार का परित्याग करें। शिव यह भी बतला रहे हैं किनके शरण में जाकर हम पूर्णतः सुरक्षित है। अतः श्रीकृष्ण के ही शरण में रहिये।

-राजाराम राकेश,कार्यालय सहायक, अधीक्षक डाकघर टिहरी उत्तराखण्ड

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नूतन वर्ष-2011 की शुभकामनायें


नव वर्ष में आपकी साधना को, आपके सृजन को उत्तरोत्तर आयाम प्राप्त हों, यदुकुल की ओर से सभी को यही आत्मिक शुभकामनाएं !!

*****आप सभी को नूतन वर्ष-2011 की ढेरों शुभकामनायें *****