शनिवार, 4 अप्रैल 2009

लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करती स्याही

लोकसभा और विधान सभा चुनावों के दौरान हर मतदाता के बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर एक स्याही लगाई जाती है, जो इस बात का प्रतीक होता है कि वह अपना मत दे चुका है। स्याही का यह निशान भारतीय लोकतंत्र की एक अनुपम पहचान बन चुका है। जब हम लोग छोटे-छोटे थे तो इस स्याही के प्रति काफी क्रेज था। इस स्याही को येन-केन-प्रकरेण मिटाना हम लोगो का शगल होता था पर ये मिटने का नाम नहीं लेती थी। तब न तो लोकतंत्र की परिभाषा पता थी और न ही चुनाव का मतलब। पूरी मित्र मण्डली के साथ जाकर अपना वोट दे आते थे और फिर उधर से विभिन्न राजनैतिक दलों के पम्फलेट्स इत्यादि बटोर कर लाते थे। वक्त के साथ जैसे-जैसे किताबी ज्ञान बढ़ा, वैसे-वैसे राजनीति की बारीकियाँ एवं चुनाव की महिमा भी समझ में आती गई। आज के चुनाव पहले के चुनावों जैसे नहीं रहे। जिस प्रकार पर्यावरण में प्रदूषण फैलता गया वैसे ही चुनाव भी प्रदूषित होते गये। जाति-धर्म-धन-गुण्डई जैसे तत्व प्रत्याशियों के लिए आम बात हो गये। इसके बावजूद लोकतंत्र की महिमा कम नहीं हुई और हर बार हम यह सोच कर वोट दे आते हैं कि शायद इससे अगली बार कुछ आमूल चूल परिवर्तन होंगे। इस सकारात्मक दृष्टिकोण पर ही लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है।

फिलहाल हम बात कर रहे थे वोट के दौरान बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर लगाई जाने वाली स्याही की। इस चुनावी स्याही के उत्पादन का श्रेय कर्नाटक के प्रसाद नगर स्थित मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) को जाता है। आजादी के बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फर्जी मतदान रोकने के लिए स्याही लगाने का फैसला किया गया। मैसूर के पूर्व महाराजा नलवाड़ी कृष्णराजे वाडेयार और प्रसिद्ध इंजीनियर भारतरत्न सर मोक्षगंुडम विश्वेश्वरैया ने यह कंपनी बनाने का सपना देखा था। उनके प्रयासों से 1937 में इस कंपनी की स्थापना की गई और आजादी के बाद 1947 में इसे सार्वजनिक उपक्रम में बदल दिया गया। आज भी इस स्याही के उत्पादन का अधिकार केवल मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड के पास है।

यह चुनावी स्याही एक अलोप्य स्याही है, जो उंगली पर लगने के बाद एक मिनट में सूखती है। सूखने के बाद उंगली पर ऐसे चिपकती है कि लाख प्रयास कर लीजिए, कई महीनों तक छूटने का नाम ही नहीं लेती। इसे किसी रसायन, साबुन या तेल से भी नहीं हटाया जा सकता। वस्तुतः यह स्याही फर्जी मतदान को रोककर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में महत्वपूर्ण भूमिका चुपचाप अदा करती है। यह स्याही एक मतदाता द्वारा एक ही मत डालने की प्रक्रिया को भी सुनिश्चित करती है। एक फरवरी 2006 से चुनाव आयोग द्वारा मतदाता की उंगली पर इसके लगाने के तरीके में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब इसे बांये हाथ की तर्जनी उंगली पर नाखून के निचले किनारे से लेकर ऊपरी किनारे और त्वचा के जोड़ तक एक रेखा के रूप में लगाया जाता है। इससे पहले इस स्याही को नाखून के ऊपरी किनारे और त्वचा के जोड़ पर ही लगाया जाता था। यह बात कम लोगों को ही पता होगी कि अगर कोई व्यक्ति फर्जी तौर पर मतदान करते हुए (प्राक्सी मतदान) पकड़ा गया तो इस स्याही को उसके बांये हाथ की बीच की उंगली पर लगाया जाता है।

आज मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड द्वारा इस स्याही का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन हो रहा है। पिछले साल सितंबर तक पहले छह महीने में एमपीवीएल से एनआरडीसी को करीब 20 लाख रूपये रायल्टी मिली। शुरू से यह उपक्रम ही इस स्याही की आपूर्ति चुनाव आयोग को करती आ रही है। खास बात तो यह है कि दुनिया के 25 देशों में यह चुनावों के सफल निष्पादन में अपनी भूमिका निभाती है। भारत में बनने वाली इस चुनावी स्याही को लगभग 25 देशों को निर्यात किया जाता है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

सुबाचन यादव के शीर्षकहीन चित्र

राजनीति-प्रशासन से परे तमाम यदुवंशी साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। इनमें से एक हैं सुबाचन यादव। सुबाचन यादव जिद की हद तक डटे रहने वाले कलाकारों में से हैं। वह पिछले दो दशकों से टैक्सचर में काम कर रहे हैं, उसमें भी श्याम-श्वेत उनके प्रिय रंग हैं, जिनसे वे आकार का निर्माण करतें हैं। उनके आकारों में जो बिंब उभरता है उसमें एक स्त्री का चेहरा रहता है। कुछ चित्र आकारहीनता का अहसास कराते हैं, तो कुछ ब्रह्मांड की रचना करते प्रतीत होते हैं। एक चित्र को देखकर तो लगता है मानो वृक्ष ने अपने पत्ते बिखरा दिये हों। इसी क्रम में उनके द्वारा चित्र अलौकिकता के करीब पहँुच जाते हैं। फिर भी चित्रों को देखकर उनकी तकनीकी सर्वोपरिता का अहसास हो जाता है। यह शायद उनकी व्यवसायिक सक्रियता के चलते लगता है।

श्याम-श्वेत रंग के ही इस्तेमाल पर वह कहते हैं-’सफेद रंग सादगी का प्रतीक है और काले रंग में सभी को अपने भीतर समाहित करने की ताकत है और यह भी सच है कि दोनों का एक दूसरे के बगैर अस्तित्व ही नहीं है।‘ इनके समायोजन से जो कला उभरती है वह गंभीर बहस की माँग करती है। सुबाचन आगे कहते हैं-’बेशक दो रंगों में काम करना कटिन है, और टैक्सचर में यह कठिनाई बढ़ जाती है, लेकिन काम आनंद भाव से किया जाय तो फिर आसान जान पड़ता है, यही वहज है कि सुबाचन के काम में एक ठहराव भी दिखाई पड़ता है। अपने चित्रों को सुबाचन कोई शीर्षक नहीं देते। वह कहते है-’शब्द में इतनी ताकत नहीं है कि वह किसी पेंटिंग को संपूर्णता में आंक सके। वैसे भी एक ही पेंटिग से हर व्यक्ति अपने-अपने अर्थ ग्रहण करता है। फिर कैसे किसी कृति को शीर्षक दिया जा सकता है? कलाकार-कवि अपनी सुविधा के लिए कृति को शाीर्षक दे सकता है, अन्यथा शीर्षक का कोई अर्थ नहीं है। वह शीर्षकहीनता को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का नाम देते हैं। सुबाचन स्वीकारते हैं कि पेटिंग प्रारम्भ करते समय कोई विशेष आकार दिमाग नहीं होता, जैसे-जैसे रंगों का समायोजन होना शुरू होता है, आकार उभरने लगते हैं। कभी-कभी तो ऐसे आकार सामने आते हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं करते। ऐसे आकारों में हर कोई सामंजस्य नहीं बैठा सकता। सुबाचन मानते हैं कि जो कलाकार सच्चाई के करीब होगा, उसका काम स्वतः ऐसा होना शुरू हो जाता है। अध्यात्मिकता शायद इसका चरम बिन्दु है। (साभारः आजकल,मार्च 2009 में कलानिधि द्वारा प्रस्तुत)

रविवार, 15 मार्च 2009

देशज भाषाओं को जोड़ती पत्रिका ‘राष्ट्रसेतु‘

क्षेत्रवाद, विघटनवाद और प्रांतवाद के इस संक्रांति समय में भारतीय भाषाओं को जोड़ने एवं उनके अंतःसंबंधों की पड़ताल करने का महती कार्य कर रही है ‘राष्ट्रसेतु‘ पत्रिका। दिनोंदिन शोध के गिरते स्तर के कारण ‘राष्ट्रसेतु‘ जैसी साहित्य-शोध को समर्पित पत्रिकाओं का महत्व स्वयंसिद्ध है। इस द्वैमासिक पत्रिका की कार्य योजना भारतीय संविधान की बाईस भाषाओं के विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक-लौकिक आयामों को समेटने की है जो निःसंदेह स्वागत योग्य और प्रेरणादायी है। छत्तीसगढ़-रायपुर से प्रकाशित द्वैमासिक ‘राष्ट्रसेतु‘ के संपादक हैं जगदीश यादव।

आम पत्रिकाओं की लीक से हटकर यह एक प्रयोगधर्मी पत्रिका है जिसका आभास संपादकीय में मिलता है। अपने नाम को सार्थक करती इस पत्रिका में विभिन्न भारतीय भाषाओं के सांस्कृतिक, लौकिक एवं व्याकरणगत पक्षों पर गंभीर अनुशीलन प्रस्तुत किया गया है। वस्तुतः ‘राष्ट्रसेतु‘ भाषाओं के मध्य सेतु निर्माण का स्तुत्य कार्य कर एक सुदृढ़ राष्ट्र की अवधारणा को पुष्ट कर रही है जिसके लिए संपादक जगदीश यादव बधाई के पात्र हंै। अपने इस सारस्वत अभीष्ट की ओर संपादकीय आलेख में खुलासा किया गया है जिसकी पुष्टि, पत्रिका में समाहित सामग्री का अवलोकन करने से हो जाती है।
संपर्क- जगदीश यादव, मिश्रा भवन, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़)

बुधवार, 11 मार्च 2009

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

एशिया की प्रथम महिला ट्रेन ड्राइवर: सुरेखा यादव

आज महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहीं हैं। राजनीति, प्रशासन, साहित्य, कला, उद्योग, मीडिया हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। कुछ कार्य ऐसे भी हैं, जिन्हें प्रारम्भ में महिलाओं के योग्य नहीं समझा गया। पर अपने कौशल की बदौलत महिलाएं आज उन क्षेत्रों में भी सफलता के परचम फहरा रहीं हैं। उन्हीं में एक हैं- भारत की प्रथम महिला ट्रेन चालक सुरेखा(भोंसले)यादव। महाराष्ट्र के सतारा जिले में एक किसान परिवार में जन्मीं सुरेखा ने विद्युत अभियांत्रिकी में पत्रोपाधि पाठ्यक्रम 1986 में पूरा किया। रोजगार के विज्ञापन देखते हुए एक दिन उनकी निगाह रेलवे के सहायक इंजन ड्राइवर की रिक्ति पर पड़ी, जिसके लिए न्यूनतम योग्यता विद्युत अभियांत्रिकी में पत्रोपाधि थी। बस फिर क्या था, सुरेखा ने आवेदन कर दिया। सफलता पश्चात तीन वर्षों तक उन्हें विभिन्न परीक्षणों के दौर से गुजरना पड़ा। फिर अन्ततः जब नियुक्ति मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा, आखिर वह ट्रेन का इंजन चलाने वाली देश की ही नहीं बल्कि एशिया महादीप की प्रथम महिला ड्राइवर बन चुकी थीं। प्रारम्भ में कुछ समस्याएं अवश्य आईं परन्तु आत्मविश्वास ने उन्हें आगे बढ़ाया। उनके साथी पुरूषों ने इस काम के खतरों की बात की लेकिन उनका निश्चय देखकर वे सब उनकी मदद करने लगे। इस तरह सुरेखा की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी।

सुरेखा के इस काम से उनके पारिवारिक जीवन पर भी असर पड़ा है। उनके काम के घंटे तो अनिश्चित हैं ही, पुलिस विभाग में काम कर रहे पति के काम का समय भी निश्चित नहीं है। लेकिन बच्चे और पति उन्हें पूरा सहयोग देते हैं। उनके बच्चों के स्कूल ने उन अभिभावकों को सम्मानित करने का आयोजन किया जो विशिष्ट कार्य कर रहे हों। बच्चों ने उनका नाम दे दिया। मंच पर जब वह सम्मानित हो रही थीं तो बच्चे जोरदार तालियाँ बजा रहे थे। वर्ष 2000 में उन्हें उपनगरीय लोकल गाड़ियों का ड्राइवर बनाया गया। पर सुरेखा की मंजिलें तो अभी और भी हैं। उन्हें पैसेंजर गाड़ी का ड्राइवर बनना है, फिर घाट पार करने वाले इंजन का ड्राइवर और फिर लंबी दूरी वाले मेल और एक्सप्रेस का ड्राइवर। सुरेखा को अपने कौशल पर पूर्ण विश्वास है और निश्चिततः ट्रेन की गति के साथ-साथ उनके जीवन की गाड़ी भी अपनी पटरी पर सरपट दौड़ती रहेगी।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

अब गोमूत्र से बनेगी कोल्ड ड्रिंक

पहली नज़र में यह पढ़कर मुझे अजीब लगा कि जल्द ही गोमूत्र से बनने वाली कोल्ड ड्रिंक बाजार में उतरने वाली है। सबसे बड़ी बात है कि अन्य शीतल पेयों की तरह इसमें किसी तरह के रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। वैसे भी आज हर चीज में मिलावट आम बात हो गई है। खाने से लेकर दैनिक उपयोग की हर चीज में भी विभिन्न रसायनों को मिलाया जा रहा है। ऐसे में लोगों का रूझान प्राकृतिक चीजों की तरफ बढ़ता जा रहा है। गोमूत्र और गोबर से भी दैनिक उपयोग की कई वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है। गोबर से मोस्कीटो क्वायल, डिस्टेंपर, नहाने का साबुन, फेस पाउडर, धूप स्टिक, हवन वाला बिस्कुट, पूजन लेप, गोमय कंडे मूर्तियाँ, गमले, दंत मंजन, अच्छी क्वालिटी का कागज, पानी, आग, ध्वनिरोधी और रेडिएशन मुक्त टाइल्स, नालीदार चादरें और जमीन पर बिछाने वाली चटाईयाँ बनाई जा रही हैं। गोमूलत्र का उपयोग भी फिनायल, नील, हैंडवाश, आटर शेव लोशन, बाम और कई अन्य दवाईयों को बनाने में किया जा रहा है। वैज्ञानिक आधार पर भी यह सिद्ध हो चुका है कि गोबर और गोमूत्र का उपयोग पूर्णतः सुरक्षित है। इसी कड़ी में अब जल्द ही गोमूत्र से बनी कोल्ड ड्रिंक भी बाजार में उपलब्ध होगी। वर्तमान में गौरक्षा विभाग की कानपुर गौशाला में कोल्ड ड्रिंक बनाई जा रही है। नागपुर और त्रिपुरा में भी जल्द ही इसका निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। सो अब कोक और पेप्सी को भूल जाइए। कोल्ड ड्रिंक पीते वक्त रसायनों से डरने की भी जरूरत नहीं है।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

टैब्लाइड आकार में प्रथम साहित्यिक पत्रिका ‘प्रगतिशील आकल्प‘ के संपादक:डा0 शोभनाथ यादव

समकालीन प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार एवं संपादक डाo शोभनाथ यादव पिछले पांच दशकों से रचना-कर्म में सक्रिय हैं। 14 जून 1937 को जौनपुर में जन्में डाo यादव (एम.ए., बीएड., पी.एच.डी) टैब्लाइड आकार में देश की प्रथम साहित्यिक पत्रिका ‘प्रगतिशील आकल्प‘ का पिछले 8 वर्षों से कुशल सम्पादन कर रहे हैं। श्रीमती एम.एम.के. काॅलेज, बान्द्रा (पश्चिम), मुंबई में पूर्व रीडर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग रहे डाo यादव ‘आकल्प‘ तथा ‘प्रगतिशील आकल्प‘ द्वारा आयोजित महत्वपूर्ण अखिल भारतीय साहित्यिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सरोकारों पर बेलाग परिचर्चाओं के आयोजन एवं सम्पादन से सतत जुड़े हुए हैं। देश की प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं एवं आपकी कविताओं का अंग्रेजी, रूसी, गुजराती, पंजाबी तथा मराठी में अनुवाद हो चुका है। यूरोप तथा की यात्रा द्वारा अपनी सृजनधर्मिता में वृद्धि करने वाले डाॅ0 यादव विश्व हिन्दी सम्मेलन (न्यूयार्क)-2007 में भी शिरकत कर चुके हैं।
कविता-संग्रहः संभावना (समकालीन भारतीय कविताः संपादन 1970), बियाॅण्ड द साइट (अंग्रेजी में अनूदित कविताएं 1973), कविता (बंबई के प्रतिनिधि कवियों का संपादन 1974), भस्मासुर की भूमिका (1980), ईश्वर आतंकवादी (1991), अग्निमुखी (1993), अनाम त्रिज्याएं (1995), प्रजातंत्र का भोंपू (1996), दहक उठा गुलमोहर (1996), समकालीन कविता-1(1996), बोगनवीलिया के फूल(1997), समकालीन कविता-2 (1997), समकालीन कविता-2000(2000), समकालीन कविता-2002(2002), सूअरबाड़ा (2003), मेरी काव्य-यात्रा (2004), जहां जली है मशाल कोई (2004), प्रतिकार (मराठी रूपांतर 2004), नरकगाथा (प्रबंध-काव्य प्रकाश्य)।
गद्य-कृतियांः थैलसगाथा (प्रयोगात्मक उपन्यास), दरख्तों में सूरज (आत्मोपन्यास), अंतर्यात्रा के साये (रचनात्मक डायरी), खंडहरों के बीच मेरी बेचैनियां (प्रयोगात्मक उपन्यास) प्रकाश्य।
चिंतनः राजनीति, समाज एवं साहित्यः डिसिप्लिन इन डेमोक्रेसी एण्ड सोशलिज्म (अखिल भारतीय अंग्रेजी परिचर्चा एवं संपादन 1976), राजनीति बनाम साहित्य (अखिल भारतीय परिचर्चा एवं संपादन 1978), बर्तोल्त ब्रेख्त (1998)।
आलोचनाः कवयित्री महादेवी वर्मा (शोध-प्रबंध 1970)
संपादनः आकल्प (1976 से 2000 तक), इंद्रधनुष (1980), महाश्वेता (1996), महाराष्ट्र हिन्दी परिषद् विशेषांक (1997), समाजवादी जागरण (1999), प्रगतिशील आकल्प (2001 से नियमित पत्रिका), रामदरश मिश्रः सृजन-सम्मान अंक (2004)।
डाॅ. शोभनाथ यादव पर अन्य रचनाकारों की पुस्तकेंः डाॅ. शोभनाथ यादवः व्यक्तित्व एवं कृतित्व (2004)- डाॅ. रीना सिंह द्वारा पी-एच.डी. उपाधि हेतु शोध-प्रबंध प्रकाशित, प्रगतिशील आकल्प द्वारा प्रकाशित ‘समकालीन कविता-2002‘ पर आगरा से गरिमा अग्रवाल द्वारा एम.फिल. उपाधि। शोभनाथ यादव के काव्य में प्रगति-चेतना पर पी.एच.डी. शोध-कार्य जारी, शोभनाथ यादव की जनधर्मी कविताएं (संपादक-डाॅ. करूणाशंकर उपाध्याय), शोभनाथ यादव के काव्य में आधुनिकता (अमित कुमार सिंह द्वारा पी.एच.डी. शोध-कार्य), शोभनाथ यादव के काव्य में संवदेना (श्रीमती कल्पना जैन द्वारा एम.फिल. शोध-कार्य), शोभनाथ यादव की साहित्यिक पत्रकारिता (गुलाबचंद यादव द्वारा एम.फिल. शोध-कार्य)।
पुरस्कार/सम्मानः महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार (1998), महाराष्ट्र हिन्दी परिषद् सारस्वत -सम्मान (1997), अंतराष्ट्रीय आर्यभट्ट प्रतिष्ठान सारस्वत-सम्मान (1997), ‘अभियान‘ उत्तर प्रदेश साहित्य-सम्मान (1999), डाॅ. शोभनाथ यादव सृजन-वर्ष (1996-97), निराला काव्य-सम्मान (2003), साहित्य गौरव सम्मान (जयहिंद फाउंडेशन-2004), उ0प्र0 हिन्दी संस्थान का एक लाख रूपये का राष्ट्रीय पुरस्कार (2006) आदि।
संपर्कः संपादकः ‘प्रगतिशील आकल्प‘, पंकज क्लासेस, जोगेश्वरी (पूर्व),
मुंबई-400060 (मो0-09969580809)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

अभिव्यंजना द्वारा आकांक्षा यादव को ‘‘काव्य-कुमुद‘‘ सम्मान

कानपुर की चर्चित साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था ‘‘अभिव्यंजना‘‘ द्वारा युवा कवयित्री एवं साहित्यकार श्रीमती आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में सृजनात्मक योगदान एवं काव्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा के लिए ‘‘काव्य-कुमुद‘‘ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं अन्तर्जाल पर प्रकाशित होने वाली श्रीमती आकांक्षा यादव वर्तमान में राजकीय बालिका इण्टर कालेज, नरवल, कानपुर में प्रवक्ता हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली श्रीमती आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘ इत्यादि प्रमुख हैं। आकांक्षा जी को प्राप्त इस सम्मान पर ''यदुकुल'' द्वारा शत्-शत् बधाई !!!

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

नारी विमर्श को आगे बढाती "अनंता''

लखनऊ से प्रकाशित नारी सरोकारों को समर्पित मासिक पत्रिका ‘अनंता‘ का सम्पादन पूनम यादव बखूबी कर रही हैं। खूबसूरत आवरण पृष्ठ, ग्लेज्ड पेपर के साथ रूचिकर व भावात्मक विषयों पर प्रस्तुत रचनाएं अपनी छाप छोड़ती हैं। भारतीय सभ्यता-संस्कृति को अन्तर में प्रतिस्थापित करती हुई पत्रिका उन तमाम नारीवादी विमर्शों को आगे बढ़ाती है, जिससे आम जन प्रभावित होता है। फैशन, सौन्दर्य, केयर, संबंध, मेकअप, हेल्थ, पार्टी, रेसिपी, स्वास्थ्य, निवेश, बागवानी, वास्तु, स्किन केयर, आस्था, ज्योतिष, फिल्मी दुनिया के साथ-साथ इवेन्ट, खेल, किड्स कार्नर, मन्थन, हँसी-ठिठोली, कविता एवं कहानी का रोचक सम्मिश्रण पत्रिका को अलग स्थान देता है। इस पत्रिका को http://www.anantamagazine.com/ पर भी देखा जा सकता है !!
संपर्कः पूनम यादव, २०३-२०४, सरन चैंबर-IIदितीय तल, ५ पार्क रोड, लखनऊ (यू. पी.)

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

अमेरिका के सेटन हाल विश्वविद्यालय में गीता का ज्ञान अनिवार्य

महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना कर्म करने का उपदेश दिया, जो कि भगवद्गीता में वर्णित है। आज भारत की शिक्षा पद्धति में भले ही वैदिक पाठयक्रम का विरोध होता हो, लेकिन अमेरिका के सेटन हाॅल विश्वविद्यालय में सभी छात्रों के लिए गीता का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया है। न्यूजर्सी में 1856 में स्थापित स्वायत्त कैथोलिक सेटन हाॅल विश्वविद्यालय में अनिवार्य पाठयक्रम के तहत गीता के अध्ययन को शामिल करने का फैसला किया गया है। निःसन्देह यह अपनी तरह का दुनिया में पहला निर्णय है। उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के 10,800 छात्रों में से एक-तिहाई से ज्यादा गैर-ईसाई हैं और इनमें भारतीय छात्रों की संख्या भी प्रभावी है। इस विश्वविद्यालय में कोर कोर्स के तहत सभी छात्रों के लिए अनिवार्य पाठयक्रम होता है, जिसका अध्ययन सभी विषयों के छात्रों को करना होता है। वर्ष 2001 में विश्वविद्यालय ने विश्व में अपनी अलग पहचान कायम करने के लिए कोर कोर्स की शुरूआत की थी। इसमें छात्रों को सामाजिक जीवन से जुड़े सरोकारों और दायित्वबोध से अवगत कराया जाता है, जिससे युवा वर्ग को सामाजिक व्यवस्था से सीधे तौर पर जोड़ा जा सके। विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार इस मामले में गीता का ज्ञान सर्वोत्तम साधन है और इसकी महत्ता को समझते हुए विश्वविद्यालय ने सभी छात्रों के लिए इस ग्रंथ का अध्ययन अनिवार्य करने का फैसला किया।........ तो योग के बाद अब ज्ञान-कर्म-भक्ति की त्रिवेणी ‘गीता‘ में अमेरिकी भी डुबकी लगायेंगे और जिस दौर में उनकी अर्थव्यवस्था भहरा रही हो, गीता का ज्ञान उन्हें कर्म की तरफ आकृष्ट करेगा। आखिर यूँ ही भारत को जगदगुरु नहीं कहा जाता।

सोमवार, 19 जनवरी 2009

वैश्विक स्तर पर पहुँची भगवान कृष्ण की रासलीला

भगवान कृष्ण का रासलीला से अनन्य संबंध रहा है। भगवान कृष्ण और गोपियों की रासलीला पर सारा जग न्यौछावर होता है। पर पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण ने रासलीला की पवित्रता को न सिर्फ ठेस पहुँचाई बल्कि इसे लोगों से दूर भी कर दिया। सालों तक बंद कमरे में होती आ रही रासलीला की प्रस्तुति को आम लोगों तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है राजस्थान में भरतपुर के गाँव जनुथर में जन्मे हरिदेव गोविन्द ने। जैसा नाम, वैसा काम। रासलीला को लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने देश के साथ विदेशों में भी कई प्रस्तुतियाँ कीं। यह प्रस्तुतियाँ इतनी प्रभावी थीं कि अहिन्दीभाषी प्रदेशों में भी लाखों लोग इसका आनन्द उठाने आते थे। यहाँ तक कि दक्षिण भारत में प्रस्तुति के लिए बकायदा द्विभाषिया तक रखना पड़ा। 7 वर्ष की उम्र से ‘रासलीला‘ से जुड़े हरिदेव के पिताजी उन्हें इस विधा से जुड़े एक रिश्तेदार के पास वृन्दावन छोड़ आए थे। फिर क्या था हरि-हरि कहते हरिदेव कब गोविन्द के चरणों में आकर रासलीला के पुजारी बन गये, पता ही नहीं चला। 16 वर्ष की उम्र तक इस लीला को उन्होंने नजदीक से देखा और सीखा। 20 साल की उम्र में बृज रासलीला संस्थान, वृन्दावन नाम अपनी मण्डली बना ली। ‘बकौल 81 वर्षीय हरिदेव गोविन्द-‘‘जब मैंने इस कला को सीखा तो यह एक

कमरे में हुआ करती थी। वजह यह थी कि जो इसका मर्म समझे बस वही इसका आनन्द उठाए। पर मैं चाहता था कि दुनिया के हर कोने तक पहुँचे।‘‘........... खैर हरिदेव जी की मेहनत रंग लाई और भगवान कृष्ण की कृपा से आज वे भारत में रासलीला के सर्वोत्कृष्ट प्रस्तुतिकारों में जाने जाते हैं। रासलीला विधा को नूतन आयाम देने के लिए वर्ष 2006 में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथो उन्हें पदमश्री से भी नवाजा गया। कईयों के लिए यह आश्चर्य का विषय था कि यह प्रतिष्ठित सम्मान किसी को सामाजिक कार्य या साहित्य लेखन के लिए नहीं बल्कि ‘रासलीला‘ जैसी लोक कला को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए मिला।

अथक समाजसेवी जी.आर.एस. यादव भाई

देश की राजधानी दिल्ली में समाजसेवा खास तौर पर बालसेवा के क्षेत्र में एक जाना माना नाम है- श्री जी।आर.एस. यादव भाई ‘‘निर्मोही‘‘ का, जिन्होंने अपनी सुयोग्य सहधर्मिणी के सहयोग से आजीवन समाजसेवा करने के अपने व्रत में पत्नी-बिछोह के बाद भी कोई अन्तर नहीं आने दिया। महात्मा गांधी और आचार्य बिनोवा भावे के आदर्शों पर चलकर ‘सादा जीवन उच्च विचार‘ के सिद्धान्त का पालन करने वाले सुसंस्कारित परिवार के धनी यादव भाई यद्यपि अपनी कर्तव्य-परायण पत्नी श्रीमती सरला यादव ‘क्रान्ति के‘ सन् 1984 में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुए असामयिक निधन के बाद अकेले पड़ गये थे फिर भी वे अपने सेवा-पथ से विचलित नहीं हुए। अपनी कर्तव्यनिष्ठा, लगन एवं धैर्य के बल पर अपने चार पुत्रों तथा एक पुत्री को पढ़ा-लिखा कर सुव्यवस्थित कर यादव भाई अब अपना अधिकांश समय समाज-सेवा में ही लगाते हैं।

उत्तर प्रदेश के कन्नौज शहर में सन् 1929 की शिवरात्रि को जन्में और फतेहगढ़ जिलान्तर्गत भोलेपुर में बचपन बिताने वाले यादव भाई को अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में अपने पिता, विख्यात आर्यसमाजी नेता श्री सन्तव्रत यादव ‘वानप्रस्थी‘ तथा माता श्रीमती सुशीला देवी यादव का स्नेहपूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ और वे अपनी प्रतिभा के बल पर एक के बाद दूसरी परीक्षाएं उत्तीर्ण करते हुए निरंतर आगे बढ़ते गये। इन्होंने एम0ए0 (अर्थशास्त्र) तथा पत्रकारिता व ‘बाल मनोविज्ञान‘ की उपाधियां प्राप्त की और केन्द्रीय सरकार के सचिवालय में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी के रूप में काम करते हुए सन् 1972 से 1977 तक प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ सहायक निजी सचिव के रूप में काम करने का सौभाग्य भी प्राप्त किया। 30 जून सन् 1987 को ये सरकारी नौकरी से सेवा-निवृत्त हुए। यादव भाई अपने सरकारी कामों को अंजाम देते हुए भी बालकनजी-बारी, बाल सेवक बिरादरी, भारत सेवक समाज, मित्र संगम, आल इण्डिया ब्वाय स्काउट एसोसियेशन इत्यादि सेवा-संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। यही नहीं श्री यादव समय निकाल कर डाक टिकटों व सिक्कों के संग्रह जैसे अपने शौक भी पूरा करते रहते हैं। पढ़ना-लिखना, सामाजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधयों में भाग लेकर अपने विश्व मैत्री के अभियान को आगे बढ़ाना आदि इनको व्यस्त रखने वाले कार्य हैं। इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की यात्राएं कर चुके यादव भाई अपने सौम्य एवं मृदुभाषी स्वभाव, मिलनसारिता एवं निश्छलता के चलते काफी लोकप्रियता भी अर्जित कर चुके हैं। ‘‘यदुकुल‘‘ श्री जी.आर.एस. यादव भाई की लम्बी उम्र एवं अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए आशा करता है कि वे इसी प्रकार अनवरत समाज सेवा में संलग्न रहकर युवा पीढ़ी के लिए प्रकाश पुंज बनें।
सम्पर्कः जी0आर0एस0 यादव भाई, 28-प्रधानमंत्री सचिवालय अपार्टमेन्ट्स, विकासपुरी, नई दिल्ली-110018

सोमवार, 5 जनवरी 2009

राष्ट्रीय नेतृत्व का संकट

बड़े अफसोस की बात है कि राष्ट्र आज जिस संकट की घड़ी से गुजर रहा है, उसके प्रति न तो राष्ट्र का नेतृत्व, न साहित्यकार, न मीडिया और न ही बुद्धिजीवी संवेदनशील है। लगता है सभी संवेदनहीन हो चुके हैं, शून्य हो चुके हंै। देश में बड़ा से बड़ा हादसा हो जाता है, क्षण भर के लिये रेडियो व टी0 वी0 अपनी जानी-पहचानी आवाज में उसे खबरों का रूप दे देते हंै , अखबार वाले अपने पन्ने रंग देते हैं, फिर आया-गया हो जाता है।, लोगबाग भूल जाते हैं, कारण कि इस देश की जनता का भुलक्कड़पन पुराना है। यद्यपि कि इसमें जनता का दोष नहीं, बल्कि दोष तो राष्ट्रीय कर्णधारों का है, जिन्होंने समाज का माहौल और संस्कार ही ऐसा निर्मित कर दिया है कि इसके सिवा कुछ नहीं हो सकता।

दरअसल बात यह है कि राष्ट्र के शिखर नेतृत्व की नीयत साफ नहीं है या यूँ कहिये कि आज का नेतृत्व राष्ट््र के प्रति समर्पित न होकर बल्कि राष्ट्र को ही अपने प्रति समर्पित मान लेता है। यही कारण है कि नेतृत्व पर आया संकट राष्ट्र का संकट मान लिया जाता है एवं नेतृत्व का हित राष्ट्र का हित मान लिया जाता है। ऐसे में जब देश के सभी बड़े राजनैतिक दल खुद ही नेतृत्व को लेकर संकट में हैं, उनसे सक्षम नेतृत्व की आशा करना ही व्यर्थ है। देश पर सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी का हाल देखें तो स्वयं महात्मा गाँधी ने आजादी पश्चात कांग्रेस को भंग करने की बात कही थी क्योंकि उन्हें आजादी के बाद की भारत की तस्वीर दिखने लगी थी। यह अनायास ही नहीं है कि कांग्रेस मात्र एक परिवार विशेष के व्यक्तियों के भरोसे रह गई है और अपनी स्थाई नियति मानकर उनसे ही किसी करिश्मे की आशा करती है। कभी स्वतन्त्रता आन्दोलन का पर्याय रहे कांग्रेस की यह मनोदशा स्वयं में बहुत कुछ स्पष्ट कर देती है। उत्तर प्रदेश जैसे सशक्त राज्य में अपनी जमीन खिसकने के बाद जिस प्रकार कांग्रेस छटपटा रही है, उसे समझा जा सकता है। युवराज के रूप में प्रचारित किये जा रहे राहुल गाँधी बुन्देलखण्ड के एक दलित परिवार में रात गुजार कर इस बात की आसानी से घोषणा करते हैं कि ऊपर से चले एक रूपये में से मात्र पाँंच पैसा ही इन इलाको में पहुँचता है, पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है बताना भूल जाते हंै। इसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी तो सदैव मुखौटों की राजनीति से ही ग्रस्त दिखती है। कभी अयोध्या तो कभी गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाने वाली भाजपा के कर्णधार सत्ता में आते ही गठबन्धन की आड़ में अपने मूल मुद्दों को दरकिनार कर देते हैं। ऐसे ही तमाम अन्य राजनैतिक दल क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद जैसी भावनाओं के सहारे येन-केन-प्रकरेण सत्ता हासिल करते हैं और विकास की बातों को पीछे छोड़ देते हैं। निश्चिततः इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता और इसी का नतीजा है कि आज अराजकता, आतंकवाद, अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार, सामाजिक असुरक्षा का दूषित महौल पूरे राष्ट्र् में व्याप्त है।

इस बिगड़े माहौल के लिये राजनैतिक नेतृत्व के साथ-साथ पूँजीपति वर्ग, धर्माचार्य व मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी से आँख नहीं चुरा सकते। ये आये दिन देश की जनता को राष्ट्रीयता, ईमानदारी, मितव्ययिता, अनुशासन व कर्मठता का पाठ पढ़ाते हंै पर कभी अपने गिरेबान में झांँकने की कोशिश नहीं करते। लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया इन कथित कर्णधारों द्वारा कही गई एक-एक बात को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर देश की जनता को उबाता रहता है। जनता की आवाज उठाने की बजाय मीडिया की प्राथमिकता सरकारी विभागों और कारपोरेट जगत से प्राप्त विज्ञापन हैं, जिन पर उनकी रोजी-रोटी टिकी हुई है। रोज प्रवचन देने वाले धर्माचार्य जनता को धर्म की चाशनी खिला रहे हैं और कर्मवाद की बजाय लोगों को कर्मकाण्ड की तरफ प्रेरित करके अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो यह वर्ग यह समझकर प्रवचन झाड़ता है कि इस देश की जनता अनपढ़ और नासमझ है अथवा वे इस सूत्र पर काम कर रहे हैं कि किसी भी झूठ को बार-बार दोहराने से सच मान लिया जाएगा। वस्तुतः राजनैतिक दल, पूँजीपति या धर्माचार्य इन सबका निहित स्वार्थ एक है और दुनिया की सारी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण इस वर्ग के पास अभाव नामक चीज फटक भी नहीं सकती। यही कारण है कि यह वर्ग यथास्थितिवाद का पुरजोर पक्षधर है। इन्हें किसी भी प्रकार का परिवर्तन पसन्द नहीं - भले ही आम जनता अकाल, भुखमरी, महामारी से त्रस्त हो, देश का शिक्षित युवा वर्ग रोजी-रोटी की तलाश में बुढ़ापे को पहुँच जाये, देश की आधी से अधिक जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करती रहे, भोला-भाला देहाती नौकरशाही के जाल में पिसता रहे, किन्तु इस देश के नेताओं, पूँजीपतियों व धर्माचार्यों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। इनका सब कुछ तो ‘सिंहासन’, ’गद्दी’ व ‘आसन’ तक सीमित है। यही उनका राष्ट्र है, यही उनकी देशभक्ति है, बाकी चीजों के प्रति यह वर्ग अपनी संवेदनशीलता खो बैठा है।

आये दिन बड़े से बडे हादसे हो रहे हैं किन्तु यह कत्तई नहीं लगता कि शिखर नेतृत्व इन हादसों के प्रति गम्भीर व जागरूक है। कभी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि उनका वश चले तो जमाखोरों और कालाबाजारी करने वालों को बिजली के खम्भों से लटका दें। पर भ्रष्टाचार का दौर नेहरू के समय में ही आरम्भ हो गया। इन्दिरा गाँधी ने भ्रष्टाचार को ‘विश्वव्यापी समस्या‘ बताकर इसकी स्वीकार्यता स्थापित कर दी तो राजीव गाँधी यह जानकर भी 100 में से मात्र 15 पैसा अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचता है, राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में इस रोग का उपचार नहीं बता सके। महात्मा गाँधी का नाम लेकर राजनीति करने वाले उनकी इच्छानुसार समाज के अन्तिम व्यक्ति के आँसू नहीं पोछ सके और अन्ततः सारी चोट अन्तिम व्यक्ति के ही हिस्से में आयी। लुभावने नारों के साथ अन्य राजनैतिक दल जब सत्ता में आये तो भी स्थिति जस की तस रही। गरीब तबकों हेतु रोज नई योजनाएं लागू की जाती हैं, पर उनमें से अधिकतर कागजों में ही अपना लक्ष्य पूरा करती हैं। यही कारण है कि भ्रष्टाचार को ‘शिष्टाचार‘ बनने में देरी नहीं लगी। आँकड़े गवाह हैं कि देश के 62 प्रतिशत लोगों को रिश्वत देकर काम करवाने का प्रत्यक्ष अनुभव है और आम नागरिक प्रतिवर्ष करीब 21,068 करोड़ रूपये रिश्वत देता है। वस्तुतः भ्रष्टाचार व्यक्तिगत आचरण से अब संस्थागत रूप ले चुका है। यह आम जनता का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जब ऐसे मसलों पर बहुत शोर-शराबा होता है तो मामले को आयोग की चहरदीवारी या न्यायिक जाँच प्रक्रिया की जंजीर से बाँध दिया जाता है और फिर तो भूलना ही भूलना है, कारण कि मामला अदालती जाँँच प्रक्रिया से गुजर रहा है अतएव इस पर किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना परिधि के अन्तर्गत आता है। इसी प्रकार बाढ,़ सूखा, अकाल या अन्य आपदाओं के समय मंत्रीगण व अधिकारी विमान, हेलीकाॅप्टर और कारों के काफिले का प्रयोग करते हैं, नतीजन जितनी राहत पीड़ित-जनों को नहीं मिल पाती है उससे कहीं ज्यादा मंत्री व अधिकारियों पर खर्च पड़ जाता है। वस्तुतः भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने की जिम्मेदारी जिन लोगों और संस्थाओं पर है, खुद वे भ्रष्टाचार में बुरी तरह उलझे हुए हैं। पहले के राजनेता भ्रष्टाचार में अपना नाम आने पर शरमाते थे, आज वे पूरी ताकत से अपने भ्रष्ट आचरण का बचाव करते हैं। हाल ही में चारा घोटाले मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय को भी टिप्पणी करनी पड़ी कि भ्रष्टाचारियों को लैम्पपोस्ट से लटकाकर फँासी दे देनी चाहिए, तो उसकी वेदना और आक्रोश को समझाा जा सकता है।

भारतीय संविधान भारत को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित करता है पर सत्ता शीर्ष पर बैठे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का चरित्र देखें तो अच्छे-अच्छे राजा-महराजा भी शरमा जायें। संसद व विधान सभाओं में आरोप-प्रत्यारोप की भाषा ही नहीं बल्कि मारपीट व गाली गलौज भी आम चीज बन गई है। घरों में टी0वी0 पर बैठकर जनप्रतिनिधियों का यह तमाशा देखने वाले बच्चे और युवा पीढ़ी इन घटनाओं से क्या सीख लेंगे, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हमारे अधिकतर जनप्रतिनिधि अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के चलते वैसे भी सदैव चर्चा का विषय बने रहते हैं। अपराधियों का राजनीतिकरण हो रहा है या राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है, कुछ भी कहना बड़ा कठिन है। अभिनेता-अभिनेत्रियों के मन्दिर और उनकी पूजा अब पुरानी बात हो गई है, भारतीय राजनीति में भी इसके उदाहरण खुलकर सामने आने लगे हैं। यहाँ ‘व्यक्ति पूजा‘ मुहावरा नहीं बल्कि यथार्थ बन गया है। धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मूलभूत तत्व माना गया है पर तमाम राजनेता धर्म एवं देवी-देवताओं की शरण लेते रहते हैं। इसे उनका व्यक्तिगत आग्रह समझकर दरकिनार भी कर दिया जाय तो यहाँ देवी-देवताओं व पौराणिक चरित्रों से तुलना ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधियों को स्वयं देवी-देवता बना दिया गया। कभी धर्म के नाम पर वोट माँगना, कभी चाटुकारिता की हद तक जाकर एक ही व्यक्ति का नाम जपना, तो कभी नेताओं को ईश्वर बना देना- इससे बड़ा मजाक लोकतन्त्र में और नहीं हो सकता। आपातकाल के दौर में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकान्त बरूआ ने कहा था- ‘‘इन्दिरा इज इंडिया एण्ड इंडिया इज इन्दिरा।‘‘ मानो यहाँ लोकतन्त्र नहीं सामन्तवाद या राजतन्त्र का साया हो। तमिलनाडु में एम0जी0रामचन्द्रन की मृत्यु पश्चात चेन्नई में उनका मन्दिर बनवाया गया, जिसमें उन्हें देवता के रूप में दिखाया गया। जयललिता को पोस्टरों में ‘काली माँ‘ के रूप में दिखाया गया तो मायावती ने कहा कि मै ही माया (लक्ष्मी) हूँ। राजस्थान में वसुन्धरा सरकार के तीन साल पूरे होने के उपलक्ष्य में जारी कैलेण्डर में उन्हें अन्नपूर्णा देवी एवं भाजपा के शीर्ष नेताओं अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी व राजनाथ सिंह को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु व महेश के रूप में दर्शाया गया। मुरादाबाद में सोनिया गाँधी को दुर्गा माँ की वेशभूषा में भ्रष्टाचार और आतंकवाद का संहार करते हुए दिखाया गया तो जबलपुर में एक पूर्व विधायक ने सोनिया गाँधी को रानी लक्ष्मीबाई के रूप में पोस्टर में दिखाया। महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख को गोवर्धन उठाते श्रीकृष्ण के रूप में दिखाया गया। ऐसे न जाने कितने उदाहरण है जो राजतन्त्र व सामंती समाज की याद दिलाते हैं। जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को सुनने और उनका उपचार करने की बजाय राजनैतिक दलों के शीर्ष नेताओं की वन्दना, राजनीति में पर्दापण करने व कुर्सी पाने का शार्टकट तरीका बन गया है। ‘‘चालीसा‘‘ राजनीति इसी की देन है।

अब जरा संवेदनशील होकर इन संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में देश के कर्णधारों की कारगुजारियों पर गौर करें कि आये दिन अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, टी0वी0 और मंचों पर देश का युवावर्ग, किसान, मजदूर, कारीगर इन बातों को सुनकर या पढ़कर गुनेगा तो उसके मानस-पटल पर क्या प्रभाव अंकित होगा? अपने इन राष्ट्रीय कर्णधारों की कारगुजारियों व फिर लम्बे-लम्बे प्रवचनों से उसकी क्या धारणा बनेगी? जब देश का उच्चपदस्थ वर्ग ही भ्रष्टाचार के आरोपों के संशय में कैद हो, उसका आचरण लोगों की निगाह में साफ-सुथरा न हो तो फिर उस देश का भविष्य क्या होगा? इसी कारण डाॅ0 राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि यदि भ्रष्टाचार को खत्म करना है तो इसकी शुरूआत उच्चपदस्थ लोगों से होनी चाहिये। पर दुर्भाग्यवश आज इस देश का नेतृत्ववर्ग अपने स्वार्थ में अंधा हो अपने पद का सारा फायदा अपनों के लिये बटोर रहा है। वह चाहे जाति के रूप में हो, भाई-भतीजावाद के रूप में हो, क्षेत्रवाद के संदर्भ में हो- किन्तु दायरा संकीर्णता व स्वार्थ का है। आज चूँकि सारे लोग इसी संकीर्णतावादी नजरिये में कैद हैं सो ‘हमाम में सब नंगे हैं‘ की तर्ज पर एक दूसरे की कमजोरियों और बुराईयों को अनदेखा कर रहे हैंै। निश्चिततः आज स्वस्थ एवं समग्र नेतृत्व का संकट देश पर मंडरा रहा है और जब तक स्वस्थ नेतृत्व नहीं पैदा होगा, भारत की धरती पर से जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार, अराजकता, आतंकवाद का खात्मा नामुमकिन है। यह मंथन का विषय है कि हमारे साथ ही आजादी पाये तमाम राष्ट्र विकास के कई पायदान चढ़ गये, पर भारत में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। वर्तमान के तथाकथित कर्णधारों की आवाज में दम नहीं है क्योंकि आवाज में दम, संस्कार, विचार और चरित्र से आता है पर ये कर्णधार अन्दर से खोखले हैं। इसे राष्ट्र की बदकिस्मती ही कहा जायेगा कि इन नेताओं की कोई नीति नहीं है, नैतिकता नहीं है, चरित्र की पवित्रता नहीं है, समग्रता नहीं है, समदर्शिता नहीं है। ये राजनीति को सिद्धांत के तहत नहीं, बल्कि कूटिल नीति के तहत चला रहे हंै, क्यांेकि ये अवसरवादी हैं। हर नेतृत्व अपने सिंहासन को बचाये रखने के लिये राष्ट्रीयता, अखंडता, एकता, धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व, समता का नारा लगाता है किन्तु सबकी मानसिकता एक जैसी है। आज सभी राजनैतिक दलों एवं नेताओं का एकमात्र लक्ष्य सत्ता है और सत्ता की इस कुर्सी तक पहुँचने के लिये कभी ये राष्ट्रीयता, अखंडता, एकता, धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व, समता व समाजवाद की सीढ़ी लगा लेते हैं तो कुछ को रामनाम की सीढ़ी लगाने में भी परहेज नहीं।

आज स्पष्ट रूप से दो वर्ग आमने-सामने हैं-एक, संतुष्ट वर्ग एवं दूसरा, असंतुष्ट वर्ग। संतुष्ट वर्ग चूँकि राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और धार्मिक हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व बना चुका है अतः वह यथास्थितिवाद को बनाये रखने के लिये कटिबद्ध है, चाहे इसके लिये कितने भी झूठ का सहारा लेना पड़े। राष्ट्रहित में जरूरी है कि यह वर्ग लोगों को उपदेश देने की बजाय अपनी कथनी-करनी का अंतर स्वयं मिटाकर ईमानदारी, चरित्र, कर्मठता, अनुशासन को अपने आचरण में उतारे। जिस दिन यह सुविधाभोगी वर्ग संकल्पबद्ध होकर त्याग का आदर्श उपस्थित कर देगा, देश-समाज की दशा सुधरने में वक्त नहीं लगेगा। दूसरी तरफ असंतुष्ट वर्ग का नेतृत्व सत्ता की कुर्सी के लिये लोगों की भावनाओं का शोषण व दोहन कर रहा है। अभी तक वह समाज को नवीन विचार नहीं दे पाया और जब तक विचार नहीं पैदा होंगे, तब तक समाज में न तो बदलाव आयेगा और न ही क्रांति।
राम शिव मूर्ति यादव

मुंबई में आतंकियों के विरुद्ध जिल्लू यादव की बहादुरी

क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाले जो नेता उत्तर भारतीयों और मराठियों को अलग-अलग चश्में से देखते हैं, उनके लिए यह आँखें खोलने वाली घटना हो सकती है। २६ नवम्बर २००८ को जब मुंबई के सीएसटी रेलवे स्टेशन पर आतंकियों ने खूनी खेल शुरू किया, तब जिल्लू यादव वहीं तैनात थे। बनारस के मूल निवासी जिल्लू आरपीएफ में हेड कांस्टेबल हैं। उनके हाथ में सिर्फ एक डंडा था। आतंकी एके 47 रायफल से अंधाधुध गोलियाँ बरसा रहे थे। टिकट काउंटर के अहाते के पास खड़े जिल्लू यादव यह दृश्य देख एक बार तो दहल उठे। लेकिन जल्दी ही संभल भी गए। जिल्लू यादव उस पल को याद करते हुए कहते हैं- डर तो मुझे भी लग रहा था, लेकिन तुरंत मन ने कहा कि यदि इन आतंकियों को रोका नहीं गया तो बहुत से लोगों को मार डालेंगे। लेकिन जिल्लू यादव करते भी तो क्या। आरपीएफ के पास हथियार की कमी के कारण इस बहादुर सिपाही के हाथ में सिर्फ एक डंडा था। गलियारे के दूसरे छोर पर खड़े जीआरपी के एक सिपाही के हाथ में 303 राइफल तो थी, लेकिन डर के मारे उसके हाथ पैर फूल गए थे। जिल्लू यादव ने चिल्ला कर उससे गोली चलाने को कहा, लेकिन निशाना साधने के बजाय वह छुपने का रास्ता खोजने लगा। तब जिल्लू यादव से नहीं रहा गया। वह जान जोखिम में डाल कर करीब 10 फुट चैड़ा गलियारा पार कर खुद उस सिपाही के पास जा पहुँचे और उसके हाथ से बंदूक झपट कर एक आतंकी पर निशाना साधकर दनादन दो फायर झोंक दिये। बंदूक की गोलियाँ समाप्त हो चुकी थी। जबकि आतंकी फायरिंग का रूख उनकी ओर कर चुके थे। जिल्लू ने पहले तो इधर-उधर दूसरी बंदूक या कारतूस के लिए ताकझांक की, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा तो सीधे वहाँ रखी एक कुर्सी उठाकर अपनी ओर बढ़ रहे एक आतंकी पर दे मारी। उनके दिमाग में तो बस यही था कि वह जिनकी जान की फिक्र कर रहे हैं, वे सब इंसान है। इस बीच जिल्लू की हिम्मत देख स्टेशन पर तैनात जीआरपी व आरपीएफ के अन्य जवानों में भी जोश आ गया और दोतरफा गोलियाँ चलने लगीं। आरपीएफ इंस्पेक्टर खिरतकर और सब इंस्पेक्टर भोंसले ने एक ओर से तो जीआरपी के दो जवानों ने दूसरे छोर से मोर्चा संभाल लिया था। जिल्लू यादव की इस बहादुरी के लिए उन्हें रेलवे विभाग की तरफ से 10 लाख रूपए का इनाम देने की घोषणा हुई है। इस पर उनकी प्रतिक्रया पूछने पर जिल्लू यादव सीधा सा जवाब देते हैं- ‘‘उस वक्त मैंने जो किया वह वक्त की जरूरत थी।‘‘ 52 वर्षीय जिल्लू यादव उत्तर प्रदेश के बनारस जिले में हरहुआं ब्लाक स्थित गोसाईं पर मोहाब गाँव के मूल निवासी हैं। जिल्लू यादव की इस बहादुरी को ‘यदुकुल‘ सलाम करता है।

रविवार, 4 जनवरी 2009

होटल ताज आपरेशन के कमांडो ग्रुप के जाँबाज जवान गौरी शंकर यादव

मुंबई में शिवाजी टर्मिनल पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करने वाले कमांडो ग्रुप में शामिल गौरी शंकर यादव अब किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। मध्यप्रदेश के खंडवा जनपद के ग्राम नागचूंड के रहने वाले इस जांबाज सिपाही को जब शिवाजी टर्मिनल पर आतंकियों द्वारा गोलीबारी की जा रही थी तो वहाँ तैनात कमांडो ग्रुप को होटल ताज पहुँचने का एकाएक आदेश मिला। गौरीशंकर यादव अपने साथियों के साथ होटल ताज के लिए निकल पड़े, जहाँ अन्य फोर्स के जवानों से जानकारी लेकर तैयारी की गई। 51-51 कमांडरों के ग्रुप बनाए गये। श्री यादव जिस ग्रुप में शामिल थे,उसको आपरेशन टारनेडो नाम दिया गया। फिर शुरू हुआ आपरेशन ताज। गौरी शंकर यादव ने कहा कि होटल ताज पर आतंकियों से मुठभेड़ के समय हमारे साथी वहाँ पड़ी लाशों और गोलियों को देखकर कुछ देर के लिए ठिठक गए,यह सोचकर कि खून-खराबे के बिना इन आतंकियों पर काबू किया जा सके। पर अंततः वीरता का प्रदर्शन करते हुए इन कमांडों ने आतंकियों को मार गिराया। ऐसे जांबाजों की बहादुरी को 'यदुकुल' का सलाम !!

लालू प्रसाद यादव पर एनीमेशन फिल्म

राजनीति के अखाड़े में अपने जुमलों से मशहूर लालू प्रसाद यादव एक बार फिर धमाके की तैयारी में हैं। बिहार के कार्टूनिस्ट पवन ने उनकी लाजवाब हाजिरजवाबी और गंवई अंदाज पर एक एनीमेशन फिल्म बनाई है। कार्टूनिस्ट कैरेक्टर के तौर पर लालू प्रसाद यादव की पहली क्लिप ने बाजार में धूम मचाना शुरू कर दिया है। इस एनीमेशन प्रोजेक्ट को मंजूरी देने में लालू प्रसाद यादव ने एक सेकंड की भी देरी नहीं लगाई। लोकसभा चुनाव के पहले यदि लालू प्रसाद यादव का यह कार्टून हिट हो गया तो अन्य लोग भी ऐसे ख्वाब पाल सकते हैं। फिलहाल तो लालू प्रसाद यादव ने बाजी मार ली है। 'यदुकुल' की तरफ से लालू प्रसाद यादव जी को शत्-शत् बधाई !!

शनिवार, 3 जनवरी 2009

डा. पृथ्वी यादव को प्रथम एम्स इंटरनेशनल फेलो पुरस्कार

Gaurhari Singhania Inst. of Management & Research (GSSIMR), कानपुर के निदेशक डा. पृथ्वी यादव को प्रथम एम्स इंटरनेशनल फेलो पुरस्कार से सम्मानित किया गया. नोयडा स्थित इंडियन बिज़नस अकादमी में २८-३० सितंबर, २००८ के दौरान आयोजित छठें इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑफ़ एम्स इंटरनेशनल में उन्हें सम्मानित किया गया. डा. पृथ्वी यादव को आई.आई. टी. कानपुर की सीनेट में भी शामिल किया गया है. इन उपलब्धियों पर डा. पृथ्वी यादव को 'यदुकुल' की तरफ से ढेरों बधाई !!

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

समाज की जीवंत कहानियाँ

‘तीस बरस घाटी‘ गोवर्धन यादव का ‘महुआ के वृक्ष‘ पश्चात दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह में कुल 12 कहानियाँ संकलित हैं। श्री गोवर्धन यादव की कहानियों में आसपास का समाज और लोग हैं जो अतीत और भविष्य के बीच व्याप्त विरोधाभासों के बीच जी रहे हैं। इन कहानियों में पर्यावरण पर छाये संकट की चर्चा भी है, और अपनी जमीन और सम्पत्ति के प्रति परंपरागत मोह भी है। नई प्रौद्योगिकी और नए विचारों के साथ पुराने विचारों की टकहराहट की ध्वनि भी है। स्त्री स्वतंत्रता की बात भी प्रकारान्तर से मौजूद है। सबसे बड़ी विशेषता आदिवासी जीवन की गहरी समझ ने कहानियों को जीवन्त बना दिया है। प्रकृति से लेखक का विशेष लगाव है। शायद इसीलिए कहानियों में सूरज का उगना, चाँद का दिखना, देनवा नदी का प्रवाह, चिड़ियों का चहचहाना, बादलों का उमड़ना- घुमड़ना, लौट-लौट कर कहानियों में जगह पाते हैं। कभी-कभी ये प्रवाह में अवरोधक भी बने हैं। गोवर्धन यादव ने यदि लैश बैक के जरिये कथा वस्तु को विस्तार देने की शैली विकसित कर ली है, तो उन्हें पुनरावृत्ति के दोष से बचने के लिए इस विशिष्ट शैली के आग्रह से बचना होगा।
एक रचनाकार की सफलता इसी बात में निहित है कि वह पाठक को ऐसा परिवेश उपलब्ध कराए जहाँ वह अपनी उपस्थिति महसूस कर सके, और तभी ऐसा प्रति यथार्थ रच दे जहाँ तक पाठक घटित होती घटनाओं के बावजूद नहीं पहुँच पाता। इस कसौटी पर इस संग्रह की कहानियों को पढ़ा जाएगा तो गोवर्धन यादव की लेखनी में धारा से हटकर बहुत कुछ प्राप्त होगा। श्री यादव ने उपदेशक बनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने कहानियों की वस्तु के साथ न्याय किया है। कहानी के ढाँचे की रक्षा करते हुए यथार्थ और प्रति यथार्थ को सहजता से सँवारने तथा सहज भाषा का प्रवाह बनाए रखने के लिए गोवर्धन जी बधाई के पात्र हैं।
पुस्तक-तीस बरस घाटी (कहानी-संग्रह), लेखक- गोवर्धन यादव, पृष्ठ- 148, मूल्य- 150/-, प्रकाशन वर्ष-2008, प्रकाशक-वैभव प्रकाशन, रायपुर (छत्तीसगढ़)

पर्यावरणीय चेतना जागृत करने का प्रयास करती कवितायें

‘धरती का बुखार‘ श्रीमती मीरा यादव ‘आनंद‘ का प्रथम कविता-संग्रह है। इस संग्रह में कुल 56 कविताएँ संकलित हैं। संग्रह की कविताओं का अध्ययन करने के पश्चात् ऐसा महसूस होता है कि कवयित्री के मानस पटल पर प्रकृति एवं उसके द्वारा प्रदत्त पर्यावरण के प्रति अटूट सम्बन्ध है। प्रकृति के साथ मनुष्य द्वारा की गई छेड़छाड़ तथा उसके प्रति व्यक्त उदासीन भावनाओं से प्रतीत होता है कि कवयित्री उसके भविष्य के प्रति काफी संवेदनशील है। कहीं न कहीं उनके मन को आशंका होती रही है कि इसी तरह से मनुष्य पर्यावरण के संरक्षण एवं उसकी सुरक्षा के प्रति लापरवाह रहा, तब मानव समूह के लिए उसका भविष्य बड़े ही खतरनाक दिशा की ओर इंगित करता है। इस अनुपम कविता-संग्रह द्वारा एक सद्गृहणी का पर्यावरणीय चेतना जागृत करने का यह प्रयास एकला चलो की याद दिलाते हुए भविष्य की ओर आश्वस्त तो करता ही है साथ ही कवयित्री को गार्गीय परम्परा के अनुरूप ज्ञानार्जन एवं लोकहित वाहिका घोषित कर उन्हें भी उसी पथ का पथिक घोषित करता है।
पुस्तक-धरती का बुखार(कविता-संग्रह), कवयित्री- श्रीमती मीरा यादव ‘आनंद‘ , पृष्ठ-128,
मूल्य- 150/-, प्रकाशन वर्ष-2007 , प्रकाशक-पाथेय प्रकाशन, जबलपुर(म0प्र0)

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

नूतन वर्ष मंगलमय हो

*****आप सभी को नूतन वर्ष-२००९ की ढेरों शुभकामनायें *****

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

१८५७-१९४७ के स्वातंत्र्य समर को सहेजती "क्रांति-यज्ञ"

कृष्ण कुमार यादव एवं युवा लेखिका आकांक्षा यादव द्वारा सुसम्पादित पुस्तक ''क्रांति-यज्ञ'' भी यदुकुल हेतु प्राप्त हुयी है. मानस संगम, कानपुर द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में 124 पृष्ठों में कुल 41 सारगर्भित लेख समाहित हैं. इनमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम की अमर बलिदानी गौरव गाथाओं एवं इनके विभिन्न पहलुओं को विविध जीवन क्षेत्रों से संकलित करके राष्ट्रीय अस्मिता के भावपूर्ण परिवेश में अंकित करने का सार्थक प्रयास किया गयाा है, जो अपने राष्ट्रीय जीवन के आदर्शमय संदेशों से परिपूर्ण है।
‘क्रान्ति-यज्ञ‘ में जिन लेखों को संकलित किया गया है, उन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम भाग 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम की पृष्ठभूमि, क्रान्ति की तीव्रता और क्रान्ति के नायकों पर केन्द्रित है, तो दूसरे भाग में 1857 की क्रान्ति के परवर्ती आन्दोलनों और नायकों का चित्रण है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर स्वयं सम्पादक कृष्ण कुमार यादव का लिखा हुआ लेख ‘1857 की क्रान्ति: पृष्ठभूमि और विस्तार‘ सर्वाधिक उल्लेखनीय है। कृष्ण कुमार ने बड़े नायाब तरीके से घटनाओं का तर्कसंगत विश्लेषण करते हुए इस क्रान्ति को मात्र ‘सिपाहियों का विद्रोह‘ अथवा ‘सामन्ती विरोध‘ के अंग्रेज इतिहासकारों के झूठे प्रचार का खण्डन किया है। क्रान्तियज्ञ में स्वतंत्रता संग्राम के हर पहलू को समेटने की कोशिश की गयी है। जवाहर लाल नेहरू व रामविलास शर्मा के लेख 1857 की क्रान्ति के बहाने तत्कालीन राष्ट्रीय विचारधाराओं व उनके प्रभावों के सांस्कृतिक-सामाजिक पक्ष की गहन पड़ताल करते है। रामशिवमूर्ति यादव ने मंगल पाण्डे की शहादत का वर्णन किया है तो बहादुरशाहजफर, नाना साहब, तात्या टोपे, अजीमुल्ला खां, मौलवी अहमदुल्ला शाह जैसे क्रान्तिकारी नायकों की भूमिका को भी इस पुस्तक में प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। गुरिल्ला युद्ध में माहिर तात्या टोपे के सम्बन्ध में अंग्रेजों ने यूँ ही नहीं कहा कि-‘‘यदि उस समय भारत में आधा दर्जन भी तात्या टोपे सरीखे सेनापति होते तो ब्रिटिश सेनाओं की हार तय थी।‘‘
‘‘क्रान्ति-यज्ञ‘‘ में कृष्ण कुमार लिखते हंै कि- ‘‘भारत का स्वाधीनता संग्राम एक ऐसा आन्दोलन था जो अपने आप में एक महाकाव्य है। लगभग एक शताब्दी तक चले इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा से संगठित हुए लोगों को एकजुट किया। यह आन्दोलन किसी एक धारा का पर्याय नहीं था बल्कि इसमें सामाजिक- धार्मिक-सुधारक, राष्ट्रवादी साहित्यकार, पत्रकार, क्राान्तिकारी, कांग्रेसी, गाँधीवादी इत्यादि सभी किसी न किसी रूप में सक्रिय थे।‘‘ इस धारणा को मजबूत करता एवं ‘शासन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं‘ जैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करता आकांक्षा यादव का लेख ‘वीरांगनाओं ने भी जगाई स्वाधीनता की अलख‘ एवं पिछड़ी-दलित जातियों के रक्त का मूल्यांकन करता के0 नाथ का लेख ‘‘1857 और दलित शहीद‘‘ महत्वपूर्ण हैं। आशारानी व्होरा द्वारा प्रस्तुत ‘प्रथम क्रान्तिकारी शहीद किशोरीःप्रीतिलता वादेदार‘ एवं स्वतंत्रता सेनानी युवतियों में सर्वाधिक लम्बी जेल सजा भुगतने वाली नागालैण्ड की रानी गिडालू के सम्बन्ध में लिखे लेख भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
पुस्तक का सबसे सार्थक और महत्वपूर्ण अंश वह है, जिसके माध्यम से स्वाधीनता आन्दोलन में साहित्य की अग्रगामी भूमिका को स्पष्ट किया गया है। जनमानस में क्रान्तिकारियों की केवल विद्रोही और शहादत देने वाली छवि अंकित हैं, उनके वैचारिक और संवेदनशील पहलू से बहुत कम लोग परिचित हैं। यह अनायास ही नहीं है कि तमाम क्रान्तिकारी व नेतृत्वकर्ता अच्छे साहित्यकार व पत्रकार भी रहे है। विचार-साहित्य-क्रान्ति का यह बेजोड़ संतुलन रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह, अशफाकउल्ला खान, शचीन्द्र नाथ सान्याल, भगत सिंह, बाल गंगाधर तिलक इत्यादि जैसे तमाम क्रान्तिकारियों में देखा जा सकता है। सूर्य प्रसाद दीक्षित ने ‘‘क्रान्तिकारी आन्दोलन और साहित्य रचना‘‘ में क्रान्ति की मशाल को जलाये रखने में लेखनी के योगदान पर खूबसूरती से प्रकाश डाला है तो डा0 रमेश वर्मा द्वारा प्रस्तुत लेख ‘स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में प्रताप की भूमिका‘ को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। यह साहित्यिक क्रान्ति का ही कमाल था कि अंग्रेजों ने अनेक पुस्तकों और गीतों को प्रतिबन्धित कर दिया था। मदनलाल वर्मा ‘कांत‘ ने इन दुर्लभ साहित्यिक रचनाओं को अनेक विस्मृत आख्यानों और पन्नों से ढँूढ़ निकाला है और ‘‘प्रतिबन्धित क्रान्तिकारी साहित्य‘‘ में ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त की गयी पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं पर सूचनात्मक ढंग में महत्वपूर्ण लेख लिखा है। क्रान्तिकारी साहित्य सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किंवदंतियों के माध्यम से भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। ऐतिहासिक घटनाओं के सार्थक विश्लेषण हेतु इस लोकेतिहास को समेटना जरूरी है। डा0 सुमन राजे ने अपने लेख ‘‘लोकेतिहास और 1857 की जन-क्रान्ति‘‘ में इसे दर्शाने का गम्भीर प्रयास किया है। इसी कड़ी में युवा लेखिका आकांक्षा यादव के लेख ‘‘लोक काव्य में स्वाधीनता‘‘ में भी 1857-1947 की स्वातंत्र्य गाथा का अनहद नाद सुनाई पड़ता है।
‘क्रान्ति यज्ञ‘ दूसरे भाग में 1857 की क्रान्ति के परवर्ती आन्दोलनों व नायकों का चित्रण है। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा‘ की भावना को आत्मसात करते हुए अमित कुमार यादव ने ‘स्वतंत्रता संघर्ष और क्रान्तिकारी आन्दोलन‘ के माध्यम से क्रान्तिकारी गतिविधियों को बखूबी संजोया है तो कृष्ण कुमार यादव का लेख ‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में काफी प्रासंगिक है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2007 से ‘गाँधी जयन्ती‘ को ‘विश्व अहिंसा दिवस‘ के रूप में मनाये जाने की घोषणा करके शान्ति व अहिंसा के पुजारी गाँधी जी के विचारों की प्रासंगिकता को एक बार पुनः सिद्ध कर दिया है। क्रान्ति की अलख जगाने वाले क्रान्तिकारियों में क्रान्तिकारी रामकृष्ण खत्री का ‘आजाद‘ पर लिखा संस्मरणात्मक आलेख एवं बिस्मिल व अशफाकउल्ला पर लेख ध्यान आकृष्ट करते हैं। क्रान्तिकारी मन्मथनाथ गुप्त की कलम से अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देनी वाले ‘काकोरी काण्ड का सच‘ युवा पीढ़ी को बलिदानी भावना सहेजने का संदेश देता है। लोगों में स्वाधीनता की अकुलाहट बढ़ने के साथ-साथ अंग्रेजों ने स्वाधीनता की आकांक्षा का दमन करने के लिए तमाम रास्ते भी अख्तियार किये। कृष्ण कुमार यादव का लेख ‘‘क्रान्तिकारियों के बलिदान की साक्षीः सेल्युलर जेल‘‘ मानवता के विरूद्ध अंग्रेजों के कुकृत्यों का अमानवीय पक्ष स्पष्ट करता है।
वर्ष 2007-08 क्रान्तिकारियों - भगत सिंह, सुखदेव और दुर्गादेवी वोहरा का जन्म शताब्दी वर्ष भी रहा है। भगत सिंह पर उनके क्रान्तिकारी साथी शिव वर्मा द्वारा लिखा संस्मरणात्मक आलेख महत्वपूर्ण है तो गिरिराज किशोर ने ‘‘जब भगत सिंह ने हिन्दी का नारा बुलन्द किया‘‘ में एक नये संदर्भ में भगत सिंह को प्रस्तुत किया है। क्रान्तिकारी सुखदेव पर सत्यकाम पहारिया का लेख और दुर्गादेवी वोहरा पर आकांक्षा यादव का लेख उनके विस्तृत जीवन पर प्रकाश डालते हैं। आकांक्षा यादव ने इस तथ्य को भी उदधृत किया है कि एक ही वर्ष की विभिन्न तिथियों में जन्मतिथि पड़ने के बावजूद भगतसिंह अपना जन्मदिन दुर्गा देवी के जन्मदिन पर उन्हीं के साथ मनाते थे और उनके पति भगवतीचरण वोहरा सहित तमाम क्रान्तिकारी इस अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे।
विश्व साहित्य में राष्ट्रीय भावना का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। राष्ट्रीय और क्रान्तिकारी साहित्य ने भारतवर्ष की जीवन गति को भी क्रान्तिदर्शी भूमिका प्रदान करने में योगदान दिया कृष्ण कुमार और आकांक्षा यादव ने ‘क्रान्तियज्ञ‘ द्वारा अतीत व वर्तमान की जो भूली-बिसरी विरासत थी, उसे समाज के सामने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राष्ट्रीय स्तर पर आदर्शोन्मुख होकर प्रस्तुत किया है। निःसन्देह यह संकलन लेखकीय कर्तव्य का ही प्रतिपालन है। इससे वर्तमान पीढ़ी और आने वाले समय व समाज के लिए यह पुस्तक स्वाभिमान का, मानवीय गुणों का और राष्ट्रप्रेम का अनुपम पथ प्रशस्त करने वाली संदर्शिका बनेगी तथा इसके सन्दर्भों से शोध और चिंतनपरक साहित्य को उत्कृष्ट सन्दर्भ प्राप्त हो सकेंगे। ‘‘क्रान्ति यज्ञ‘‘ पुस्तक वस्तुतः अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का ही दर्शन है. पुस्तक के बारे में भारत सरकार के गृह राज्य मंत्री श्रीयुत श्रीप्रकाश जायसवाल के शब्द गौर करने लायक हैं- " क्रांति-यज्ञ एक पुस्तक नहीं बल्कि अपने आप में एक शोध-ग्रन्थ है।"

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

विचारों की दस्तावेजी धरोहर: अनुभूतियाँ और विमर्श

कृष्ण कुमार यादव का द्वितीय निबंध-संकलन ‘‘अनुभूतियाँ और विमर्श’’ लखनऊ के नागरिक उत्तर प्रदेश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है.इसमें उनके विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित विभिन्न 15 लेखों को निबन्ध संग्रह के रूप में संकलित कर प्रस्तुत किया गया है। इस संग्रह के निबंधों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है-व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित निबंध, संास्कृतिक प्रतिमानों पर आधारित निबंध एवं समसामयिक व ज्वलन्त मुद्दों पर आधारित निबंध। व्यक्तित्व व कृतित्व आधारित लेखों मंे देश के मूर्धन्य साहित्यकारों व मनीषियों- मुंशी प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, मनोहर श्याम जोशी, अमृता प्रीतम व डा0 अम्बेडकर के जन्म से महाप्रयाण तक के सफर को क्रमशः लिपिबद्ध कर बिखरे मनकों को एकत्र कर माला के रूप में तैयार कर उनके जीवन-संघर्ष व भारतीय समाज में योगदान को रेखांकित करने का सार्थक प्रयास किया गया हैे। इस पुस्तक का विमोचन करते हुए पद्मश्री गिरिराज किशोर जी ने कहा था- ''आज जब हर लेखक पुस्तक के माध्यम से सिर्फ अपने बारे में बताना चाहता है,ऐसे में ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ में तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के बारे में पढ़कर सुकून मिलता है और इस प्रकार युवा पीढ़ी को भी इनसे जोड़ने का प्रयास किया गया है।'' मनुष्य एक विचारवान प्राणी है। उसे साहित्य, समाज और परिवेश से प्राप्त मानस संवेदनों के सन्देशों से जिन अनुभूतियों की उपलब्धि होती है, उनके ही विमर्श से नई-नई व्याख्याओं को आधार मिलता है। कृष्ण कुमार यादव का निबंध संग्रह ‘‘अनुभूतियाँ और विमर्श’’ इसी चिन्तन, मनन और विवेचन को आधार देती मानसी वृत्ति का परिणाम है, जिसमें लेखक ने साहित्य और साहित्यकार, व्यक्ति और समाज, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, वैश्विक चेतना तथा सांस्कृतिक अध्ययन के अनेक आधुनिक और उत्तर आधुनिक तथ्यों को व्याख्यायित करने का प्रयास किया है।
इस संग्रह के अन्य निबन्धों में नारी विमर्श, युवा भटकाव, भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावाद चिन्तन के विविध आयाम सहज संलक्ष्य है। लेखक की श्रेष्ठ-जीवन मूल्यों के प्रति प्रखण्ड आस्था, भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध अनुराग तथा समग्रता भारतीयता के प्रति एकनिष्ठा की स्पृहणीय चेतना से प्राणवान यें निबन्ध हिन्दी जगत की स्थायी निधि हैं। इनमें लेखक का स्वाध्याय तथा अभिव्यक्ति की निश्छलता अपने पूर्ण वैभव के साथ विद्यमान है। वैज्ञानिक विश्लेषण की दक्षता लेखन में है, इसलिए उसका कथ्य प्रत्येक पाठक का कथ्य बन गया है। इनमें हिन्दी से सम्बन्धित निबन्ध महत्वपूर्ण हैं। ये निबन्ध अनुभूतिपरक हैं चिन्तन प्रधान हैं तथा दार्शनिकता का पुट लिये हुये हैं, इसलिए सर्वस्पर्शी हैं। इनमें न तो किसी वाद का आग्रह है और न किसी मत के खण्डन का दुराग्रह। सन्तुलन धर्मिता इनकी विशिष्टता है।
कुल मिलाकर एक प्रशासक होने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं से गहरे रूप में जुड़े हुए कृष्ण कुमार यादव का यह संकलन वैश्विक जीवन दृष्टि, आधुनिकता बोध तथा सामाजिक सन्दर्भों को विविधता के अनेक स्तरों पर समेटे हिन्दी निबन्ध के जिस पूरे परिदृश्य का एहसास कराता है वह निबंध कला के भावी विकास का सूचक है। सर्वथा नई शब्द योजना, नई प्रासंगिकता, नई अनुभूतियाँ और नई विमर्श शैली के साथ यह एक दस्तावेजी निबंध संग्रह है, जो विचारों की धरोहर होने के कारण संग्रहणीय भी है।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बंधों की पड़ताल करता ''अभिव्यक्तियों के बहाने''

यदुकुल हेतु कृष्ण कुमार यादव के प्रथम निबंध-संकलन ''अभिव्यक्तियों के बहाने'' की प्रति भी प्राप्त हुयी है. शैवाल प्रकाशन, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित इस निबंध संग्रह में कुल 10 लेख/निबंध प्रस्तुत किये गये हैं। भारतीय जीवन, समाज, साहित्य और राजनीति के अंतर्सूयों से आबद्ध इन लेखों में तेजी से बदलते समय और समाज की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। संग्रह का प्रथम लेख ‘‘बदलते दौर में साहित्य की भूमिका‘‘ समकालीन परिवेश में साहित्य और इसमें आए बदलाव को बखूबी रेखांकित करता है। नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, बाल-विमर्श जैसे तमाम तत्वों को सहेजते इस लेख की पंक्तियाँ गौरतलब हैं- ‘‘रचनाकार को संवेदना के उच्च स्तर को जीवंत रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप से जोड़कर देखना चाहिए एवं अपने सत्य व समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये।’’ इसी प्रकार ‘‘बाल-साहित्य: दशा और दिशा‘‘ में लेखक ने बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उनकी मनोभावनाओं को भी बाल साहित्य में उभारने पर जोर दिया है।
आज लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं वरन् वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है। कृष्ण कुमार यादव की नजर इस पर भी गई है। ‘‘लोकतंत्र के आयाम‘‘ लेख में भारतीय लोकतंत्र के गतिशील यथार्थ की सच्ची तस्वीर देखी जा सकती है। किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए बिना भारतीय समाज के पूरे ताने-बाने को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि इस लेख को महत्वपूर्ण बना देती है। सत्य-असत्य, सभ्यता के आरम्भ से ही धर्म एवं दर्शन के केद्र-बिंदु बने हुये हैं। महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है ने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। भारत सरकार के राजकीय चिन्ह अशोक-चक्र के नीचे लिखा ‘सत्यमेव जयते’ शासन एवं प्रशासन की शुचिता का प्रतीक है। यह हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। इस भावना को सहेजता लेख ‘‘सत्यमेव जयते‘‘ बड़ा प्रभावी लेख है। एक अन्य लेख में लेखक ने प्रयाग के महात्मय का वर्णन करते हुए इलाहाबाद के राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया है। इसमें इतिहास और स्मृति एक दूसरे के साथ-साथ चलते हुए नजर आते हैं।
सृष्टि का चक्र चलाने वाली, एक उन्नत समाज बनाने वाली, शक्ति, ममता, साहस, सौर्य, ज्ञान, दया का पुंज है नारी। एक तरफ वह यशोदा है, तो दूसरी तरफ चण्डी भी। आज महिलायें समुद्र की गहराई और आसमान की ऊँचाई नाप रही हैं। ‘‘रूढ़ियों की जकड़बन्द तोड़ती नारियाँ‘‘ ऐसी नारियों का जिक्र करती है जो फेमिनिस्ट के रूप में किन्हीं नारी आन्दोलनों से नहीं जुड़ी हैं। कर्मकाण्डों में पुरूषों को पीछे छोड़कर पुरोहिती करने वाली, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने वाले ऐसे तमाम कार्य जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है, आज महिलायें खुद कर रही हैं। आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठाई थी पर अब महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं। इसी क्रम में ‘‘लिंग समता: एक विश्लेषण‘‘ नामक लेख पुरूष व महिलाओं के बीच जैविक विभेद को स्वीकार करते हुए सामंजस्य स्थापित करने और तद्नुसार सभ्यता के विकास हेतु कार्य करने की बात करता है।
कोई भी लेखक या साहित्यकार अपने समय की घटनाओं और उथल-पुथल के माहौल से प्रेरित होकर साहित्य की रचना करता है। कृष्ण कुमार भारतीय संस्कृति, उसके जीवन मूल्यों और माटी की गंध को रोम-रोम में महसूस करते हैं। आज हमारी लोक-संस्कृति व विरासत पर चैतरफा दबाव है और बाजारवाद के कारण वह संकट में है। ऐसे में लेखक भारतीय संस्कृति और उसकी विरासत का पहरूआ बनकर सामने आता है। अपने लेख ‘‘शाश्वत है भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत‘‘ में कृष्ण कुमार जब लिखते हैं- ‘‘वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं‘‘, तो उनसे असहमति जताना बड़ा कठिन हो जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की हिमायती रही हैं। आज जातिवाद, सम्प्रदायवाद की आड़ में जब इस पर हमले हो रहे हैं तो युवा लेखक की लेखनी इससे अछूती नहीं रहती। बचपन से ही एक दूसरे के धर्मग्रंथों और धर्मस्थानों के प्रति आदर का भाव पैदा करके अगली पीढ़ियों को इस विसंगति से दूर रखने की सलाह देने वाले लेख ‘‘साम्प्रदायिकता बनाम सामाजिक सद्भाव‘‘ में समाहित उदाहरण इसे समसामयिक बनाते हैं।
आज की नई पीढ़ी महात्मा गाँधी को एक सन्त के रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। महात्मा गाँधी पर प्रस्तुत लेख ‘‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘‘ उनके जीवन-प्रसंगों पर रोचक रूप में प्रकाश डालते हुए समकालीन परिवेश में उनके विचारों की प्रासंगिकता को पुनः सिद्ध करता है। वस्तुतः गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हंै।
साहित्य रचना केवल एक कला ही नहीं है बल्कि उसके सामाजिक दायित्व का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही कारण है कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। ऐसे में व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बधों की संश्लिष्टता को पहचान कर उसे मौजूदा दौर के परिपे्रक्ष्य में जाँचना-परखना कोई मामूली चुनौती नहीं। कृष्ण कुमार यादव मूकदृष्टा बनकर चीजों को देखने की बजाय भाषा की स्वाभाविक सहजता के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिसका प्रतिरूप उनका यह प्रथम निबंध-संग्रह है। कृष्ण कुमार यादव की यह पुस्तक पढ़कर जीवंतता एवं ताजगी का अहसास होता है।

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

अभिलाषा: जागरूक संवेदना की कविताएं

यदुकुल हेतु युवा प्रशासक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव जी की चार पुस्तकें प्राप्त हुयी हैं। इन्हें सहर्ष स्वीकार किया जाता है. इनमें प्रथम पुस्तक कृष्ण कुमार यादव के प्रथम काव्य-संकलन ''अभिलाषा'' की प्रति है. शैवाल प्रकाशन, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित इस संकलन में १४४ पृष्ठों में जीवन के विभिन्न आयामों व अनुभूतियों को सहज भाषा में समेटे 12 खण्डों में विभक्त कुल 88 मुक्त छंद में रचित कविताएं हैं। कवि ने अपनी कविताओं में माँ, बचपन, नारी, प्रेयसी, प्रकृति, एकाकीपन, द़तर, ईश्वर व सम्बन्धों सभी को संजोया है। इस पुस्तक के आरंभ में पद्मभूषण श्री गोपाल दास नीरज जी के शब्द गौर करने लायक हैं- ‘श्री कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। वे यद्यपि छन्दमुक्त कविता से जुड़े हुये हैं लेकिन उनके समकालीनों में जो अत्यधिक बौद्धिकता एवं दुरुहता दिखाई पड़ती है, उससे वे सर्वथा अलग हैं। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। उनकी रचनायें जहाँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं, वहीं हृदय को भी रसाद्र करती हैं। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’’
युवा कवि एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘‘अभिलाषा’’ में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलंबनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयत्न किया है। श्अभिलाषाश् का संज्ञक संकलन संस्कारवान कवि का इन्हीं विशेषताओं से युक्त कवि कर्म है, जिसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं और विषमताओं तथा जीवन मूल्यों के साथ हो रहे पीढ़ियों के अतीत और वर्तमान के टकरावों और प्रकृति के साथ पर्यावरणीय विक्षोभों का खुलकर भावात्मक अर्थ शब्दों में अनुगंुजित हुआ है। परा और अपरा जीवन दर्शन, विश्व बोध तथा विद्वान बोध से उपजी अनुभूतियों ने भी कवि को अनेक रूपों में उद्वेलित किया है। इन उद्वेलनों में जीवन सौन्दर्य के सार्थक और सजीव चित्र शब्दों में अर्थ पा सके हैं। इस संग्रह की कविताएं एक नए पथ का निर्माण करती हैं, जहाँ अत्यधिक उपमानों, भौतिकता, व दुरूहता की बजाय स्वाभाविकता, समाजनिष्ठा एवं जागरूक संवेदना है।

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

दमित आन्दोलन को दी नई दिशाः डा0 अम्बेडकर (पुण्यतिथि: ६ दिसम्बर पर विशेष)

डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे युगपुरूष थे जिन्होंने समाज में पिछड़ों, दलितों और शोषितों की मूकता को आवाज दी। बचपन से ही डाॅ0 अम्बेडकर ने जातिवाद की आड़ में फैलाए जा रहे जहर को महसूस किया और उस जहर को समाज से उखाड़ फेंकने की सोची। एक ऐसे समय में जब दलितों को देखते ही लोग अपवित्र हो जाने के भय से रास्ता बदल लेते थे, डाॅ0 अम्बेडकर ने उस दौरान बैरिस्टरी पास कर तमाम आयोगों के सामने दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। वे गाँधी जी के ‘हरिजन’ शब्द से नफरत करते थे क्योंकि दलितों की स्थिति सुधारे बिना धर्म की चाशनी में उन्हें ईश्वर के बन्दे कहकर मूल समस्याओं की ओर से ध्यान मोड़ने का गाँधी जी का यह नापाक नुस्खा उन्हें कभी नहीं भाया। उन्होंने गाँधी जी के इस कदम पर सवाल भी उठाया कि-‘‘सिर्फ अछूत या शूद्र या अवर्ण ही हरिजन हुए, अन्य वर्णोंं के लोग हरिजन क्यों नहीं हुए? क्या अछूत हरिजन घोषित करने से अछूत नहीं रहेगा? क्या मैला नहीं उठायेगा? क्या झाडू़ नहीं लगाएगा? क्या अन्य वर्ण वाले उसे गले लगा लेंगे? क्या हिन्दू समाज उसे सवर्ण मान लेगा? क्या उसे सामाजिक समता का अधिकार मिल जायेगा? हरिजन तो सभी हैं, लेकिन गाँधी ने हरिजन को भी भंगी बना डाला। क्या किसी सवर्ण ने अछूतों को हरिजन माना? सभी ने भंगी, मेहतर माना। जिस प्रकार कोई राष्ट्र अपनी स्वाधीनता खोकर धन्यवाद नहीं दे सकता, कोई नारी अपना शील भंग होने पर धन्यवाद नहीं देती फिर अछूत कैसे केवल नाम के लिए हरिजन कहलाने पर गाँधी को धन्यवाद कर सकता है। यह सोचना फरेब है कि ओस की बूँदांे से किसी की प्यास बुझ सकती है।’’
वस्तुतः डाॅ अम्बेडकर यह अच्छी तरह समझते थे कि जाति व्यवस्था ही भारत में सभी कुरीतियों की जड़ है एवं बिना इसके उन्मूलन के देश और समाज का सतत् विकास सम्भव नहीं। यही कारण था कि जहाँ दलितों के उद्धार का दम्भ भरने वाले तमाम लोगों का प्रथम एजेण्डा औपनिवेशिक साम्राज्यशाही के खिलाफ युद्ध रहा और उनकी मान्यता थी कि स्वतंत्रता पश्चात कानून बनाकर न केवल छुआछूत को खत्म किया जा सकता है अपितु दलितों को कानूनी तौर पर अधिकार देकर उन्हें आगे भी बढ़ाया जा सकता है पर डाॅ0 अम्बेडकर इन सवर्ण नेताओं की बातों पर विश्वास नहीं करते थे वरन् दलितों का सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में तत्काल समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ही वर्ष 1919 के अधिनियम में पहली बार दलित जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकारते हुये गर्वनर जनरल द्वारा केन्द्रीय धारा सभा के नामित 14 नाॅन-आॅफिशियल सदस्यों में एक दलित के नाम का भी समावेश किया गया। इसी प्रकार सेन्ट्रल प्राॅविन्सेंज से प्रान्तीय सभाओं में भी चार दलितों को प्रतिनिधित्व दिया गया। इसे डाॅ0 अम्बेडकर की प्रथम जीत माना जा सकता है।
डाॅ0 अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि व्यापक अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा तभी सम्भव है जब ब्राह्मणवाद का खात्मा कर दिया जाय, क्योंकि ब्राह्मणवाद की आड़ में ही लोकतांत्रिक मूल्यों-समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का गला घोंटा जा रहा है। अपने एक लेख ‘हिन्दू एण्ड वाण्ट आॅफ पब्लिक कांसस’ में डाॅ0 अम्बेडकर लिखते हैं कि- ‘‘दूसरे देशों में जाति की व्यवस्था सामाजिक और आर्थिक कसौटियों पर टिकी हुई है। गुलामी और दमन को धार्मिक आधार नहीं प्रदान किया गया है, किन्तु हिन्दू धर्म में छुआछूत के रूप में उत्पन्न गुलामी को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त है। ऐसे में गुलामी खत्म भी हो जाये तो छुआछूत नहीं खत्म होगा। यह तभी खत्म होगा जब समग्र हिन्दू सामाजिक व्यवस्था विशेषकर जाति व्यवस्था को भस्म कर दिया जाये। प्रत्येक संस्था को कोई-न-कोई धार्मिक स्वीकृति मिली हुई है और इस प्रकार वह एक पवित्र व्यवस्था बन जाती है। यह स्थापित व्यवस्था मात्र इसलिए चल रही है क्योंकि उसे सवर्ण अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है। उनका सिद्धान्त सभी को समान न्याय का वितरण नहीं है अपितु स्थापित मान्यता के अनुसार न्याय वितरण है।’’ यही कारण था कि 1935 में नासिक में आयोजित एक सम्मलेन में डाॅ0 अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग देने की घोषणा कर दी। अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि- ‘‘सभी धर्मो का निकट से अध्ययन करने के पश्चात हिन्दू धर्म में उनकी आस्था समाप्त हो गई। वह धर्म, जो अपने में आस्था रखने वाले दो व्यक्तियों में भेदभाव करे तथा अपने करोडा़ें समर्थकों को कुत्ते और अपराधी से बद्तर समझे, अपने ही अनुयायियों को घृणित जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर करे, वह धर्म नहीं है। धर्म तो आध्यात्मिक शक्ति है जो व्यक्ति और काल से ऊपर उठकर निरन्तर भाव से सभी पर, सभी नस्लों और देशों में शाश्वत रूप से एक जैसा रमा रहे। धर्म नियमों पर नहीं, वरन् सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिये।’’ यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि डाॅ0 अम्बेडकर ने आखिर बौद्ध धर्म ही क्यों चुना? वस्तुतः यह एक विवादित तथ्य भी रहा है कि क्या जीवन के लिए धर्म जरूरी है? डाॅ0 अम्बेडकर ने धर्म को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा था। उनका मानना था कि धर्म का तात्त्विक आधार जो भी हो, नैतिक सिद्धान्त और सामाजिक व्यवहार ही उसकी सही नींव होते हैं। यद्यपि बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म में भी सम्भावनाओं को टटोला पर अन्ततः उन्होंने बौद्ध धर्म को ही अपनाया क्योंकि यह एक ऐसा धर्म है जो मानव को मानव के रूप में देखता है किसी जाति के खाँचे में नहीं। एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित है न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अन्धविश्वास पर। डाॅ0 अम्बेडकर बौद्ध धर्म के ‘आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और दलितों व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे। डाॅ0 अम्बेडकर इस तथ्य को भलीभांति जानते थे कि सवर्णों के वर्चस्व वाली इस व्यवस्था में कोई भी बात आसानी से नहीं स्वीकारी जाती वरन् उसके लिए काफी दबाव बनाना पड़ता है। स्वयं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने डाॅ0 अम्बेडकर के निधन पश्चात उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि -‘‘डाॅ0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया। वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरूद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।’’
यहाँ पर उपरोक्त सभी बातों को दर्शाने का तात्पर्य मात्र इतना है कि डाॅ0 अम्बेडकर समाज की रूढ़िवादी विचारधारा एवं ब्राह्मणवाद को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाये और उनके विचार पुंज भी कहीं ब्राह्मणवादी व्यवस्था का समर्थन करते नजर नहीं आते। यही कारण था कि डाॅ0 अम्बेडकर के निधन पश्चात ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पक्षधर नेताओं, विचारकों, साहित्यकारों और इतिहासकारों ने जानबूझकर उन्हें इस कदर भुला दिया कि जैसे वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे। इसके विपरीत द्विजवादी नेतृत्व को बढ़ा-चढ़ाकर उभारा गया, जैसे वे ईश्वर के अवतार हों। यह द्विजवादियों की मानसिक बेईमानी ही कही जायेगी। कुछ लोगों ने तो डाॅ0 अम्बेडकर के साहित्य को न्यायालय में घसीटकर उसे प्रतिबंधित कराने का प्रयास भी किया। इन सब के पीछे मानसिकता यही रही कि डाॅ0 अम्बेडकर को भुला दिया जाय। द्विजवादियों की यह पुरानी मानसिकता है कि गाँधीवाद को जरूरत से ज्यादा फैलाव मिले जबकि अम्बेडकरवाद को जरूरत से ज्यादा कतर दिया जाए। मण्डल को दबाने के लिये कमण्डल (मंदिर) मुद्दा जरूरत से ज्यादा उछाल दो, जिससे कि ब्राह्मणवादियों का निहित स्वार्थ सुरक्षित रहे। यही नहीं स्वतन्त्रता पश्चात तमाम लोगों ने डाॅ0 अम्बेडकर पर किताबें लिखकर, लेख लिखकर और विभिन्न विचार गोष्ठियों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि डाॅ0 अम्बेडकर एक सामान्य व्यक्ति थे और अंग्रेजों ने उनको बरगलाकर गाँधी जी के विरूद्ध खड़ा करने का प्रयास किया था। यही नहीं संविधान निर्माण में भी उनकी भूमिका को महत्वहीन घोषित करने का प्रयास किया जाता रहा पर 1990 के दशक की राजनीति ने बहुत कुछ बदल दिया। राजनैतिक क्षितिज पर अपने विचारों के साथ तेजी से उभरती बहुजन समाज पार्टी और भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मायावती की मुख्यमंत्री रूप में ताजपोशी ने मानो दलितों में चेतना की ज्वाला पैदा कर दी हो। कल तक बूथों पर दलितों के नाम पर लाठियों की बदौलत फर्जी वोट डालने वाले रंगबाजों का जलवा अचानक दरकता नजर आया। बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों पर नीली झण्डियों के बीच दलित पुरूष और महिलायें बूथों तथा बसपा की रैलियों में ऐसे नजर आते मानो किसी त्यौहार में भाग लेने जा रहे हों। यह एक दिन उत्तर प्रदेश जैसे सामन्तवादी राज्य में ऐसा होता है जिस दिन कोई दलित किसी की मजदूरी नहीं करता, किसी के खेत पर नहीं जाता। प्रतीकात्मक रूप में इस चीज का बहुत महत्व है और इसे समाज के तथाकथित ब्राह्मणवादियों ने भी गहराई से महसूस किया। ऐसा नहीं है कि इसकी काट के लिए प्रयास नहीं किये गए। अयोध्या में राम मन्दिर की आड़ में लोगों की भावनाएँ भड़काकर भाजपा द्वारा यह दर्शाया गया कि या तो आप हिन्दू हो सकते हैं या मुसलमान पर वे यह भूल जाते हैं कि यह उसी राम की बात हो रही है, जिनके राम-राज्य के बारे में तुलसीदास ने लिखा है कि- ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।
निश्चिततः दलित वर्गों में पनपी इस जन चेतना से वक्त का पहिया तेजी से बदला और कल तक जो ब्राह्मणवादी शक्तियाँ अपनी निरपेक्षता का दावा करती थीं, अचानक वे समाज के सापेक्ष विकास क्रम को समझने लगीं। विभिन्न राज्यों में दलित चेतना के उभार ने इन्हें मजबूर कर दिया कि वे इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने के लिए इनकी प्रेरणा के केन्द्र बिन्दु पर नजर डालंे जो कि डाॅ0 अम्बेडकर और उनके विचारों के रूप में हैं। अचानक कल तक ब्राह्मणवाद का दंभ भरने वाली भाजपा डाॅ0 अम्बेडकर से अपनी नजदीकियाँ साबित करने लगी। लोगों को यह समझाया जाने लगा कि दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवतावाद’ का तात्पर्य ही यही था कि दलित भी समाज के अभिन्न अंग हैं और उनके बिना समाज का विकास सम्भव नहीं। संघ परिवार के थिंक टैंक माने जाने वाले साहित्यकार ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का पारम्परिक और घिसा-पिटा राग छोड़कर डाॅ0 अम्बेडकर का गुणगान करने लगे। इसी क्रम में आर0एस0एस0 विचारक दत्तोपन्त ठेंगड़ी द्वारा लिखित ‘डाॅ0 अम्बेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा‘ अक्टूबर 2005 में प्रकशित हुयी। आर0एस0एस0 खेमे के ही लेखक हृदय नारायण दीक्षित ने ‘डाॅ0 अम्बेडकर का मतलब’ नामक पुस्तक लिखी, जो कि किसी साहित्य की बजाय राजनीतिक तरकश का तीर ज्यादा प्रतीत होती है। हालात तो यहाँ तक हैं कि आर0 एस0 एस0 और भाजपा के सम्मेलनांे व मंचों पर भगवान राम के बगल में डाॅ0 अम्बेडकर का चित्र नजर आने लगा। यहाँ पर इस तथ्य को नहीं भुलाया जा सकता कि किस प्रकार बौद्ध धर्म से खतरा महसूस होने पर ब्राह्मणवादी शक्तियों ने बुद्ध को भगवान विष्णु का 24वाँ अवतार घोषित कर दिया और पशु बलि पर रोक लगाकर गाय को पवित्र जीव घोषित कर दिया। अब शायद यही काम ये डाॅ0 अम्बेडकर के साथ भी करना चाहते हैं। जब उनके लाख षडयंत्रों के बावजूद दलितों ने डाॅ0 अम्बेडकर को पूजनीय मानना नहीं छोड़ा तो वे भी डाॅ0 अम्बेडकर को हाईजैक करके अपने मंच पर लेते आए। हद तो तब हो गई जब डाॅ0 अम्बेडकर को पूर्णतया हाईजैक करने की कोशिशों के तहत भाजपा मुख्यालय पर 115वीं अम्बेडकर जयन्ती के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में लोकसभा में भाजपा के उपनेता श्री वी0 के0 मलहोत्रा ने दावा किया कि- ‘‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन पश्चात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ नेताओं की जनसंघ के नेतृत्व के लिये बाबा साहेब अम्बेडकर पसन्द थे और इस सम्बन्ध में एक प्रस्ताव भी रखा गया था।’’ पर वे यह नहीं बता पाए कि इस प्रस्ताव का आखिर हुआ क्या? यही नहीं डाॅ0 अम्बेडकर को हिन्दूवादी घोषित करने के लिए उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि- ‘‘डाॅ0 अम्बेडकर ने कभी भी इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने के बारे में नहीं सोचा। यहाँ तक कि हैदराबाद के निजाम ने तो इस्लाम धर्म अपनाने के लिए उन्हें ब्लैंक चेक तक भेजा था, जिसे उन्होंने वापस कर दिया।’’ इससे भी आगे बढ़ते हुए वर्ष 2006 में विजयदशमी के मौके पर दिए अपने बयान में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख के0एस0सुदर्शन ने बताया कि डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर ने 30 जनवरी 1948 को महात्मा गाँधी की हत्या के बाद आर0एस0एस0 पर लगे प्रतिबन्ध को हटाने की कोशिश की थी। दलितों और नवबौद्धों के बीच अब अपनी पैठ बढ़ाने को उत्सुक के0 एस0 सुदर्शन ने जोर देकर कहा कि 14 अक्टूबर 1956 को डाॅ0 अम्बेडकर ने नागपुर में विजयदशमी के दिन धर्म परिवर्तन किया था और इसी दिन 1925 में आर0एस0एस0 की भी स्थापना हुयी थी। आर0एस0एस0, नागपुर और डाॅ0 अम्बेडकर का सम्बन्ध जोड़ते हुए उन्होंने यह भी बताया कि दशहरे के दिन नागपुर में हर वर्ष दो कार्यक्रम अवश्य मनाए जाते हैं- पहला, आर0एस0एस0 की विजयदशमी रैली और दूसरा, अम्बेडकर समर्थकों की धर्मचक्र परिवर्तन रैली। के0एस0 सुदर्शन ने दिवंगत आर0एस0एस0 नेता एम0एस0गोलवल्कर के उस बयान का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने डाॅ0 अम्बेडकर द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए बौद्ध धर्म का चयन करने की तारीफ की थी। ज्ञातव्य हो कि आर0एस0एस0 मानता है कि बौद्ध धर्म उपनिषद पर आधारित दर्शनशास्त्र को मानता है और इसलिए यह पूरी तरह भारतीय धर्म है। यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है कि महात्मा बुद्ध और महावीर जैन ने हिन्दू धर्म की जिन कुरीतियों के विरुद्ध नए धर्मों का आगाज किया, वे कहाँ तक हिन्दू धर्म की शाखा हो सकते हैं? के0एस0 सुदर्शन ने उन हिन्दू पुजारियों की टिप्पणियों का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि भारतीय संविधान के निर्माता ने हमारे पूर्वजों की गलतियों से दुखी होकर हिन्दू धर्म छोड़ा था। निश्चिततः अपनी भूल स्वीकारने की यह एक मोहक अदा है, पर क्या पूर्वजों की गलतियों को स्वतन्त्रता पश्चात् एक लम्बे समय तक सुधारने का कोई प्रयास इन हिन्दू पुजारियों द्वारा किया गया? इस पर आर0एस0एस0 प्रमुख ने प्रकाश डालना उचित नहीं समझा। यही नहीं, हाल ही में जैन और बौद्ध धर्मों को हिन्दू धर्म का हिस्सा मानकर हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनी गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा धर्मान्तरण विरोधी कानून को लेकर उठे बवाल के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विरोध को समाप्त करने के लिए पुनः डाॅ0 अम्बेडकर को आगे खड़ा कर कि उन्होंने बौद्ध, जैन, सिक्ख और सनातनी हिन्दुओं को एक ही भारतीय परम्परा का अंग बताया था। पर नरेन्द्र मोदी जी यह नहीं बता पाये कि तब आखिर डाॅ0 अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़कर उसे कोसते हुए बौद्ध धर्म क्यों ग्रहण किया? 2 मार्च 1930 को नासिक के कालाराम मन्दिर के प्रमुख पुरोहित की हैसियत से डाॅ0 अम्बेडकर को दलित होने के कारण मन्दिर में प्रवेश करने से रोकने वाले रामदासबुवा पुजारी के पौत्र और विश्व हिन्दू परिषद के मार्गदर्शक मंडल के महंत सुधीरदास पुजारी ने यह कहकर बसपा में शामिल होने की इच्छा जाहिर की कि वे इससे अपने दादा की भूल का प्रायश्चित कर सकेंगे। आर0 एस0 एस0 पृष्ठभूमि के तमाम बुद्धिजीवी अपने लेखों और किताबों में डाॅ0 अम्बेडकर को अपने समर्थन में उद्धृत करते नजर आते हैं। आरक्षण के मसले पर अक्सर ही डाॅ0 अम्बेडकर को इस रूप में उद्धृत किया जाता है मानो वे आरक्षण विरोधी हों। निश्चिततः डाॅ0 अम्बेडकर के विचारों को बिना उनकी पृष्ठभूमि बताये सपाट लहजे में अपने पक्ष में उद्धृत करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह एक सच्चाई है कि डाॅ0 अम्बेडकर आजीवन ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरूद्ध संघर्ष करते रहे एवं अपनों को इसके प्रति सचेत भी करते रहे। ऐसे में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषकों द्वारा डाॅ0 अम्बेडकर को हाईजैक करके अपने मंचों पर स्थान देना व अपने समर्थन में उद्धृत करना दर्शाता है कि डाॅ0 अम्बेडकर वाकई एक सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रहे हैं और उनके बिना सामाजिक और राष्ट्रीय चिन्तन की कल्पना नहीं की जा सकती। देर से ही सही, अन्ततः वर्णवादी व्यवस्था के पोषकों को भी डाॅ0 अम्बेडकर की वर्तमान परिवेश में प्रासंगिकता को स्वीकार करना पड़ा, भले ही इसके लिए उन्हें अपने वर्णवादी मूल्यों से समझौता कर डाॅ0 अम्बेडकर को हाई जैक करने की कोशिशें करनी पड़ी हों या उनके बयानों को बिना उसकी पृष्ठभूमि बताये अपने पक्ष में रखना हो।
राम शिव मूर्ति यादव